मजदूर हूँ मैं

मजदूर हूँ मैं
मजबूर नहीं।
नहीं कभी चिंता
अपन रोटी की
सबका घर मैं
भरना चाहूँ।
चिलचिलाती धूपों ने जलाया,
कभी बारिश के पानी ने भींगाया।
कपकपाती ठंढी से भी लड़ना चाहूँ।।
क्योंकि मजदूर हूँ मैं।।
किसानी से कारखाना तक
अपनी सेवा का क्षेत्र बड़ा है।
अपने हीं दम पर तो
व्यापारियों का व्यापार खड़ा है।।
कर्तव्य बोध के कारण
अपनों से दूर हूँ मैं।।
सेवा धर्म है अपना
क्योंकि मैं मानव हूँ।
सेवा के हीं खातिर
कष्ट उठाऊँ न हीं श्रम का दानव हूँ।।
एक मजूरी दे ‘विनयचंद ‘
कह दे जग में नूर हूँ मैं।
मजदूर हूँ मैं।।

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

New Report

Close