क्यों दिल्ली आज हिल रही
क्यों इतना डर रही
वो ह़क लेने आ रहे
जान की बाजी लगा रहे
राह में कितने रोड़े अटकाओगे
अब रोक नहीं पाओगे
जितनी बंदिशे लगाओगे
संघर्ष का उग्र रूप पाओगे
क्या सुलगता रक्त देखा कभी
क्या उलझता युद्ध देखा कभी
यही तो दिल्ली को हिला रहा
नही, वो डराने नहीं आ रहा
आ बैठ,सुन उसकी बात
बस वो अपना हक़ लेने आ रहा ।
अपना हक
Comments
11 responses to “अपना हक”
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अतिसुंदर रचना
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धन्यवाद जी
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बहुत ही सुन्दर भाव है
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शुक्रिया जी
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किसानों के प्रति भाव पूर्ण रचना
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धन्यवाद जी
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बहुत खूब
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शुक्रिया जी
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किसानों पर पानी की बौछार और आँसू गैस का छिड़काव करने के पैसे सरकार के पास हैं और वक्त भी..
मगर किसानों की व्यथा समस्या सुनने का
समय नहीं है
बहुत उम्दा -

भाव को समझने के लिए धन्यवाद प्रज्ञा जी
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Welcome
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