अश्क मेरे, नैन तेरे

अश्क मेरे, नैन तेरे
बूंद निकली, कब गिरी यह,
तू बता दे, बात क्या है,
मैं समझता, हूँ नहीं यह।
चूक मत यूँ, बोल दे अब।
जो हो कहना, आज ही कह।
कल कहेंगे, कल सुनेंगे,
इस तरह , उलझे न रह।
यह विदाई, है क्षणिक तू
इस विदाई, से न डरना,
बैठ दिल में, साथ हूँ मैं
बस कभी भी, याद करना।
तार दिल के, जुड़ चुके हैं,
दूर हों या, पास हों हम।
अब नहीं है, डर जुदाई,
एक हैं हम, नेक हैं हम।
मधुमालती छंदाधारित कविता – शीर्षक – मन
(कुल 14 मात्रा, विन्यास 2212, 2212)

Comments

12 responses to “अश्क मेरे, नैन तेरे”

  1. वाह पाण्डेय जी, आज तो छन्दबद्धरचना हो रही है,

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत ही सुंदर कविता है मन को छू गई और अश्क भी आ गये

    1. Satish Pandey

      बहुत सारा धन्यवाद प्रज्ञा जी, भाव अश्क के हैं, कोई सहृदय कवि ही भाव ग्रहण कर सकता है। बहुत बहुत आभार

      1. Geeta kumari

        बहुत ही सुन्दर कविता है सतीश जी ,कवि के कोमल हृदय की कोमल भावनाएं हैं । हृदय स्पर्शी रचना .

      2. बहुत बहुत धन्यवाद

    1. सादर धन्यवाद जी

  3. बहुत सुंदर छंद,बहुत सुन्दर भाव

    1. बहुत सारा आभार

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