पति की गलती पुत्र की गलती
गलती करे चाहे भाई-बाप।
हर गलती पर रोए नारी
आखिर ये है कैसा संताप।।
अपराध नहीं करती कोई
एक अपराधी की बन रहती।
बस यही एक अपराध सदा
अँखियाँ आँसू भर नित सहती।।
‘विनयचंद ‘ ममता नारी की
कवच रूप जो पाकर।
निज उत्कर्ष करे न
न औरों का बने ठहर।।
वीर नहीं कायर है जग में
नारी को रुलानेवाला।
नमकहलाल बनो विनयचंद
नित नित नमक खानेवाला।।
आखिर ये है कैसा संताप
Comments
3 responses to “आखिर ये है कैसा संताप”
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नारी के सम्मान में बहुत सुंदर रचना, अति सुंदर भाव
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अबला नारी हाय तुम्हारी
यही कहानी,
आंचल में है दूध और आँखों में पानी…
बहुत खूब -
बहुत ही सुन्दर कविता
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