उर्मिला की विरहाग्नि

जब मैं कली बन मुस्कुराई अली
तब ही प्रियतम बन आए अली…

घेरा मुझको बाहुपाश में
डूब गई मैं प्रेमपाश में…

प्रिय चले गए वनवास अली
जब बिछोह की हवा चली…

नित क्रंदन, रुदन करूं मैं अली
कामेच्छा से विरहाग्नि भली…

ना मैं जलूँ सती सम अग्नि की ज्वाला
ना डूबूँ लक्ष्मी सम पयोनिधि धारा…

हे प्रभु! जब दी विरहाग्नि मुझे
करो सहने की भी शक्ति प्रदान मुझे…

बीते शीघ्र निशा हो सुप्रभात
उर्मिला की कर दो आकर प्रतीक्षा समाप्त…

Comments

25 responses to “उर्मिला की विरहाग्नि”

  1. दूसरी पंक्ति में अलि होगा
    जिसका अर्थ भौरा है

  2. Rishi Kumar

    Very nice👏👍😊

    1. Pragya Shukla

      आभार आपका
      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर कविता है,शब्दों का बहुत उचित प्रयोग है,वाह!

    1. धन्यवाद बस अभी
      हिन्दी साहित्य पढ़ रही थी तो
      मन किया की पुराने कवियों की भाषा-शैली में लिखकर देखूँ

      1. Geeta kumari

        बहुत सुंदर लिखा है आपने, उच्चस्तरीय रचना

    2. थैंक्स दी

      1. Geeta kumari

        Welcome sis

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    1. धन्यवाद आपका बहुत बहुत आभार

  6. Prayag Dharmani

    खुद में भरपूर हिंदी साहित्य समाहित किये हुए प्रस्तुत रचना बेहतर बन गई है

    1. इतनी सुंदर समीक्षा करने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया

  7. बहुत बढिया लिखा है आपने

  8. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर रचना

    1. धन्यवाद आपका

    1. आभार आपका

  9. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    वास्तव में उर्मिला की करूण व्यथा एक विचारणीय बिंदु है
    आपने बहुत ही बेहतरीन तरीके से उसे प्रस्तुत किया है
    👌👏👏👏

    1. जी सर
      आपका बहुत बहुत आभार व्यक्त करती हूँ मैं

  10. शुद्धतम,उच्चतम तथा
    परिपूर्ण रचना
    हिंदी को आत्मसात करती हुई रचना

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