हिन्दी के व्याख्याता एक
बोल रहे थे सेमिनार में।
हिन्दी का प्रसार हो
जन-जन और सरकार में।।
बजवाई खूब तालियाँ
बात- बात पे मञ्च से।
समय खत्म होते ही
बेमन आए मञ्च से।।
खूब अनोखे भाषण थे
मस्त महोदय खाओ पान।
आप सरीखे हो सब तो
निश्चय हिन्दी का कल्याण।।
टन-टन टन-टन घण्टी बज गई
तत्क्षण उनके खीसे से।
हलो डीयर हाउ आर यू
बाहर आए बतीसे से।।
निहार रहा था केवल मैं
सुनकर उनकी बातचीत।
‘विनयचंद ‘बतलाओ कब तक
हिन्दी रहेगी यूँ भयभीत।।
कब तक हिन्दी………. भयभीत
Comments
6 responses to “कब तक हिन्दी………. भयभीत”
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बहुत सुंदर रचना है भाई जी, और जो लोग इसे उपेक्षित करते है उन पर बहुत अच्छा तंज भी है।
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खूबसूरत कविता
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बहुत ही यथार्थ प्रस्तुति
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बहुत सुंदर चित्रण आपने प्रस्तुत किया है।
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सच्चाई को प्रस्तुत करती सुन्दर प्रस्तुति
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