किताबों के दिन !!

कहाँ रहे अब किताबों के दिन !!
अब तो बस अलमारी में
रखी हुई किताबें
धूल खाया करती हैं
गुजरती हूं जब कभी
उनके करीब से तो
मुझे बड़ी उम्मीद से देखती हैं
कि शायद आज मैं उन्हें
स्पर्श करूंगी, उठाऊंगी,
खोलूंगी, पढूँगी और झाड़ूगी
उनके ऊपर से धूल की परतें !
जो न जाने कब से जमी हैं
और जब मैं मुंह मोड़कर चल देती हूँ
तो वह ना-उम्मीद उठती हैं।।

Comments

12 responses to “किताबों के दिन !!”

  1. आपकी रचना पढ़कर मुझे गुलजार साहब की रचना याद आ गई
    सही बात है आज के डिजिटल जमाने में किताबें सिर्फ अलमारी में शोभा बढ़ाने की वस्तु ही रह गई हैं
    और उनकी पीर को एक कवि ही अनुभव कर सकता है आपकी कविता में किताबों का मानवीकरण बहुत ही सराहनीय है
    करूंगी उठूंगी खोलूंगी पढ़ूंगी जा डूंगी ऐसे शब्दों का प्रयोग करके आपने कविता को जीवंत और रोचक बनाया है बहुत ही उम्दा कविता

    1. बहुत दिनों बाद इतनी सुंदर समीक्षा में ले सचमुच आप बहुत अच्छे आलोचक हैं आते रहा करिए

  2. बहुत सुन्दर और सच्ची अभिव्यक्ति

  3. Virendra sen Avatar
    Virendra sen

    किताबों के दर्द की सुंदर अभिव्यक्ति

  4. This comment is currently unavailable

  5. Pratima chaudhary

    किताबों के प्रति लोगों की उदासीनता को प्रकट करती सुंदर अभिव्यक्त

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

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