खुशहाली

अपने पन की बगिया है ,खुशहाली का द्वार

जीवन भर की पूंजी है ,एक सुखी परिवार

खुशहाली वह दीप है यारों ,हर कोई जलाना चाहता है

खुशहाली वह रंग है यार्रों ,हर कोई रमना चाहता है

खुशहाली वह दौर था यारों ,कागज़ की नावें होती थीं

मिट्टी के घरौंदे थे ,छप्पर की दुकानें होती थी

कहीं सुनाई देती थी रामायण ,कहीं रोज अजानें होती थी

खुशहाली को नजर लग गयी ,अब मद सब पर छाया है

खुशहाली कहीं दब गई ,इंसानों ने इसे हराया है

यह बदकिश्मती है खुशहाली की ,हर रोज दंगा होता है

गणतंत्र यहाँ चौराहों पर ,रोज रोज ही रोता है

जो शासक है वो ईश्वर से ,खुद की तुलना करते हैं

और नेता आज के दौर का बस ,गिरगिट सा रंग बदलता है

खुशहाली को कोई समझ न पाया ,यह दौलत से नहीं मिलती है

खुशहाली को नजर लग गई ,अब वह रुदन करती है ||

Comments

7 responses to “खुशहाली”

  1. Geeta kumari

    पुराने और नए दौर का बख़ूबी चित्रण करती बहुत सुंदर रचना

  2. Rishi Kumar

    बहुत खूब लिखा है आप ने
    बहुत अच्छा है

  3. Prayag Dharmani

    आज के दौर का यथार्थ चित्रण..सुंदर प्रस्तुति

  4. सुन्दर रचना

  5. लाजबाब, अतिसुन्दर

Leave a Reply

New Report

Close