नादान बचपन:-कहाँ गई वो गुड़िया

याद आती हैं वो बचपन की बातें
जब पापा के हाथों से
चोटी करवाती थी।
माँ लोरी गाकर सुलाती थी।
कहाँ गई वो बचपन गुड़िया ?
जिसकी शादी मैं रोज़ कराती थी।
बाबा की भजन संध्या में
मैं ही आरती सुनाती थी ।
भाईयों से रोज़ का झगड़ा
और माँ से खफ़ा हो जाती थी।
तुम बेटों को ही प्रेम करती हो
पापा की दुलारी बन जाती थी।
कहाँ गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
कागज़ की नाव पर बैठकर
दुनिया की सैर हो जाती थी।
कहां गई वो बचपन की गुड़िया ?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
दादी बात-बात पर डाटती थी
उन्हें देखकर मैं पुस्तक खोल
पढ़ने बैठ जाती थी।
कहां गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
मेले से हर बार मैं
चश्मा खरीद लाती थी।
भईया के तोड़ने पर
पापा से मार खिलाती थी।
कहां गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
यही कुछ निशानियाँ हैं मेरे पास
‘नादान बचपन’ की
जब नानी के घर जाती थी।
जब माँ जबरन मुझे खिलाती थी।
कहाँ गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।

Comments

17 responses to “नादान बचपन:-कहाँ गई वो गुड़िया”

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  3. Praduman Amit

    बचपन हर गम से बेगाना रहता है।

  4. कहाँ गई वो बचपन गुड़िया ?
    कहाँ गई वो बचपन, गुड़िया ?
    कहाँ गई वो बचपन, वो गुड़िया ?
    कहाँ गई वो बचपन और गुड़िया ?
    प्रज्ञा जी इसमें से क्या चीज है जो गायब है

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      बहुत सुंदर रचना लगा जैसे बचपन लौट आया है

    2. कुछ नहीं,पूरी पढ़ो जवाब मिल जायेगा

  5. बचपन की मीठी अभिव्यक्ति

  6. जितनी तारीफ की जाए उतनी कम

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