पत्थर की आंख

तंग आ चुके दुनियां के ताने से,
उस बेचारे काने ने
पत्थर की आंख लगवाली,
नज़र तो फ़िर भी नहीं आया
मगर दुनियां की नज़र बदल डाली ।।

*****✍️गीता

Comments

12 responses to “पत्थर की आंख”

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी 🙏

  1. बहुत खूब वाह वाह

    1. Geeta kumari

      सादर आभार सर बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  2. बहुत ही सुंदर लिखा है waah waah

    1. Geeta kumari

      Thanks for your valuable compliment Piyush ji.

  3. बहुत ही सुंदर

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका अनुपम जी

  4. शारिरिक अक्षमता मनुष्य के मन में निराशा के भाव पैदा करती है। उस पर लोगों द्वारा दिये जाने वाले ताने उसके मन में हीन भावना पैदा करते हैं। वह अपना तो किसी तरह जी जाए, लेकिन दुनिया उसे जीने नहीं देती, क्योंकि दुनिया को दिखावट ज्यादा पसंद होती है। ऐसे में आम जीवन की कवि गीता जी ने सरल शब्दों का प्रयोग कर अभिधागत व्यंजना में बहुत ही प्रखर तरीके से भाव को प्रकट किया है।

  5. Geeta kumari

    कविता के भाव को इतने विद्वत तरीके से समझाने और समझने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी ।समीक्षा के लिए
    आपका शुक्रिया सर 🙏

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत शुक्रिया आपका चंद्रा जी 🙏

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