पूरी रात भर उडगन

सोचता है मन
कि पूरी रात भर उडगन,
समय कैसे बिताते हैं
अपने घौंसलों मे रह।
न मोबाइल न टीवी है
न खाना बनाना है,
साँझ होते ही
दुबक कर बैठ जाना है।
जो पा लिया दिनभर
उसे ही खा लिया दिनभर,
आठ-दस घंटे
न खाना न पीना है।
बड़ी अद्भुत कहानी है
बड़ा विस्मय है मन मे यह
कि प्रकृति का कैसा
बनाया ताना-बाना है।

Comments

14 responses to “पूरी रात भर उडगन”

  1. Geeta kumari

    पंछियों के बारे में इतनी गहराई से एक कवि मन ही विचार कर सकता है।
    ….. अद्भुत लेखन , विलक्षण प्रतिभा…
    सैल्यूट सर, कलम को सलाम

    1. Satish Pandey

      इतनी बेहतरीन समीक्षा हेतु सादर अभिवादन, उत्साह वर्धन हेतु आभार।

  2. इतना अद्भुत लेखन, वाह,

    1. Satish Pandey

      थैंक्स

  3. बहुत बढ़िया

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  4. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      Thank you

  5. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    भूख दिया जो जीव को
    अन्न भी देगा आप।
    जिसकी रचना रात है
    नींद भी देगा आप।।
    एक भरोसा एक बल
    एक आश विश्वास।
    तुलसी ऐसे जीव का
    करे राम प्रतिपाल।।
    बहुत खूब सुंदर चित्रण अतिसुंदर रचना

    1. Satish Pandey

      आपने समीक्षा में इतनी सुंदर पंक्तियाँ प्रस्तुत की, आपका हृदय की अतल गहराईयों से धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। यह स्नेह सदा रहे। सादर नमस्कार

  6. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर भाव

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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