पड़ चुकी है साँझ
घर घर में चमकते बल्ब ऐसे
लग रहे हैं, जैसे तारों ने किया
धरती में डेरा।
और चंदा आसमां में
आ चुका है, फुल चमक में,
चाँद-तारे और बल्बों का मिलन
फैला चमन में।
साथ देने आ गयी शीतल हवा
भी साथ में,
अद्भुत नजारा सज गया है,
इस अंधेरी रात में।
पड़ चुकी है साँझ
Comments
11 responses to “पड़ चुकी है साँझ”
-
पर्वतों का बहुत सुंदर नज़ारा प्रस्तुत किया है ।”चांद तारों और बल्बों का मिलन फैला चमन में, साथ देने आ गई शीतल हवा भी साथ में ” यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग । ऐसा ही दृश्य देखने को मिलता है पर्वतीय इलाकों में। सौंदर्य से परिपूर्ण अद्भुत वर्णन ।
लेखनी की विलक्षण प्रतिभा को अभिवादन ।-
सादर प्रणाम है आपको जो इतनी खूबसूरत समीक्षा की है आपने। यह आपकी विद्वता को परिलक्षित करती है। सादर धन्यवाद गीता जी
-
-
अतिसुंदर रचना
-
बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी
-
-

प्रकृति का बहुत बढ़िया चित्रण वाह
-
सादर धन्यवाद
-
-
लाजवाब
-
बहुत बहुत धन्यवाद जी
-
-

बहुत शानदार कविता वाह
-

अदभुत रचना पाण्डेय जी वाह
-

Uttam
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.