मां ने जब रोटियां…

मां ने जब रोटियां बनाना सिखाया ,
मुझे कुछ समझ ना आया ,
कभी रोटियां जली तो कभी हाथ,
फिर सीख ही गई मैं,
रोटियां बनाना,
और अब रोटियां नहीं जलती ,
बस जलते हैं हाथ।

Comments

16 responses to “मां ने जब रोटियां…”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar

    पढ़ने में जितना सरल लग रहा है भाव, उतना सरल है नहीं
    नारी के शोषण का किस्सा सुनाती बहुत ही बेहतरीन पंक्तियां👏👏👏

    1. भाव को समझने के लिए हार्दिक आभार 🙏

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    अरे वाह मैम…. आपकी रचना पढ़ के मुझे प्रेमचंद जी के
    “ईदगाह” के हामिद की याद आ गई।…..
    …….रचना के पात्र को चिमटे की जरूरत है🙂।

    1. Pratima chaudhary

      बहुत बहुत धन्यवाद मैम
      मगर जैसा कि मोहन जी ने भाव को समझाने की कोशिश की थी
      ठीक वैसे ही लक्ष्णा शब्द शक्ति का प्रयोग है यहां।
      अब हाथ जलते नहीं जलाएं जाते हैं दहेज की वजह से

      1. Geeta kumari

        मेरा भी वहीं तात्पर्य है मैम, कि बेटियों के हाथ में शिक्षा रूपी चिमटा
        थमा दिया जाए तो वे आत्मनिर्भर बनेंगी और कोई भी उनके हाथ जला नहीं पाएगा। वैसे समाज में काफ़ी परिवर्तन आ चुका है।

      2. Pratima chaudhary

        बिल्कुल सही कहा गीता मैम आपके दूसरे कमेंट से आपके भाव सही रूप से समझ में आए
        बहुत-बहुत धन्यवाद

  3. Praduman Amit

    सरल शब्दों के चादर में लिपटी कविता” माँ ने जब रोटियां “ज़माने को बहुत कुछ सिखाती है। इसके अनेक अर्थ निकलते है।

  4. Pratima chaudhary

    बहुत बहुत आभार 🙏 सर

  5. बहुत बहुत सुन्दर भाव और सटीक विचार वाह वाह

  6. श्लेष अलंकार का सुन्दर प्रयोग..
    विवाहित स्त्री की प्रताड़ना का मार्मिकता के साथ वर्णन
    हृहय को रुलाकर रख दिया है आपके भाव नें

    1. Pratima chaudhary

      इस सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद, प्रज्ञा जी

      1. Pragya Shukla

        आभार डियर

  7. Deep

    नारी का जीवन दर्शाती हुई पंक्तियां

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