मैं खुद को ना पहचान सकी..

‘मैं खुद को ना पहचान सकी,
ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..
उसमें नफरत भी बेहद थी,
तेज़ाब जो तुमने उड़ेल दिया..

तुमने जो छीनी है मुझसे,
मेरी पहचान वो थी लेकिन,
मेरे भीतर जो सरलता थी,
तुमसे अंजान वो थी लेकिन..
अब क्या हासिल हो जाएगा,
नफरत का खेल था खेल दिया..
मैं खुद को ना पहचान सकी,
ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..

इक छाला भी हो जाए तो,
कितना दुखता है सोचा है?
वो आँसू भी तकलीफों का,
कैसे रुकता है सोचा है ?
वो क्या मुझको खुश रख पाता,
जिसने तकलीफ से मेल दिया..
मैं खुद को ना पहचान सकी,
ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..

तुम क्या जानो कि जिस्मों की,
जब परतें जलती जाती हैं..
किस दर्द,जलन की तकलीफ़ें
सब रौंदके चलती जाती हैं..
वो कैसा जलता लावा था,
जो तुमने मुझपे उड़ेल दिया..
मैं खुद को ना पहचान सकी,
ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..’

#एसिडअटैक

– प्रयाग

Comments

16 responses to “मैं खुद को ना पहचान सकी..”

  1. Vasundra singh Avatar

    बहुत सुन्दर

    1. बहुत आभार आपका

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही मार्मिक एवं भावपूर्ण प्रस्तुति
    वास्तव में यह एक अमानवीय तथा दरिंदगी भरा कार्य होता है
    मेरे ख्याल से तेजाब फेंकने वाला व्यक्ति शैतान से भी बढ़कर है फिर ऐसे शैतान के मन में प्रेम भावना कैसे हो सकती है

    1. जी बिल्कुल ठीक कहा आपने..हौसला बढ़ाने के लिए आपका शुक्रिया

      1. मोहन सिंह मानुष Avatar
        मोहन सिंह मानुष

        🙏

  3. क्या बात है
    उत्तम

    1. बहुत बहुत बल्कि और भी अतिरिक्त आभार आपका ☺️☺️

      1. बेहतरीन
        क्योकिं मार्मिक रचना है

    1. Prayag Dharmani

      बहुत शुक्रिया आपका

  4. Geeta kumari

    उफ्फ, तेजाब से पीड़ित बहनों का दर्द कागज़ पर उड़ेल दिया है आपने।
    सच में वो इंसान नहीं दरिंदा होगा,
    जिसने ये अमानवीय कृत्य किया होगा।
    एक इंसान के लिए तो ऐसा सोचना भी गुनाह ही है।

    1. बहुत दिन से सोच रहा था ऐसा कुछ लिखने का लेकिन ये काम मैं पूरा वक्त लेकर ही करना चाहता था यूँ समझ लीजिए आज वो वक्त मिल गया

      1. Geeta kumari

        तेज़ाब पीड़ित बहनों के लिए सच में बहुत बुरा लगता है😭आपकी कलम ने उनके दर्द को महसूस किया है।
        आपकी कलम को सलाम🙏

  5. Rishi Kumar

    रोए कैसे होंठ भी तो खुद जल रहे हैं,
    आंसू आए कैसे आंसू खुद सूख रहे हैं|

    यह दर्द बयां नहीं मैं कर सकता,
    जिस पर बीता वह भी कुछ ना कह सकता|

    आपकी बहुत सुंदर रचना

  6. सुन्दर अभिव्यक्ति

  7. अतिसुंदर रचना

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