सावन की रिमझिम बूंदें

सावन की रिमझिम बूंदों में,
भीगे तुम भी, भीगे हम भी
भीग गया है तन – मन सारा।
नभ से मेघा जल बरसाते,
धरती को हैं सरस बनाते
गीले हैं आगे के रस्ते।
अरे! अरे, आगे फिसलन है,
ज़रा संभलकर, हाथ पकड़कर
फिसल ना जाए पांव हमारा।
पवन तेज़ है, छतरी भी उड़ गई
कैसे पहुंचें अभी दूर है, लक्ष्य हमारा।

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Responses

  1. वाह
    भीगे तुम भी, भीगे हम भी
    भीग गया है तन – मन सारा।
    नभ से मेघा जल बरसाते,
    धरती को हैं सरस बनाते
    बहुत सुंदर पंक्तियाँ, लेखन प्रतिभा की उत्कृष्टता को दर्शाती कविता।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी 🙏 आपकी प्रेरक समीक्षाएं मुझे और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करती हैं। आपका हृदय से आभार।

  2. बारिश के मौसम का लुफ़्त उठाने का अलग ही अनुभव होता है
    रिम -झिम बारिश की बूंदें जब तन पर गिरती है काया आनंदित हो जाती है और चारों तरफ हरियाली को देखकर मन भी खुश हो जाता है
    अतिसुंदर भाव

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