Month: October 2016

  • सत्य की जीत

    दशहरा का तात्पर्य, सदा सत्य की जीत।
    गढ़ टूटेगा झूठ का, करें सत्य से प्रीत॥

    सच्चाई की राह पर, लाख बिछे हों शूल।
    बिना रुके चलते रहें, शूल बनेंगे फूल॥

    क्रोध, कपट, कटुता, कलह, चुगली अत्याचार
    दगा, द्वेष, अन्याय, छल, रावण का परिवार॥

    राम चिरंतन चेतना, राम सनातन सत्य।
    रावण वैर-विकार है, रावण है दुष्कृत्य॥

    वर्तमान का दशानन, यानी भ्रष्टाचार।
    दशहरा पर करें, हम इसका संहार॥

  • आया दशहरा

    विजय सत्य की हुई हमेशा,
    हारी सदा बुराई है,
    आया पर्व दशहरा कहता
    करना सदा भलाई है.

    रावण था दंभी अभिमानी,
    उसने छल -बल दिखलाया,
    बीस भुजा दस सीस कटाये,
    अपना कुनबा मरवाया.

    अपनी ही करनी से लंका
    सोने की जलवाई है.

    मन में कोई कहीं बुराई
    रावण जैसी नहीं पले,
    और अँधेरी वाली चादर
    उजियारे को नहीं छले.

    जिसने भी अभिमान किया है,
    उसने मुँह की खायी है.

    आज सभी की यही सोच है,
    मेल -जोल खुशहाली हो,
    अंधकार मिट जाए सारा,
    घर घर में दिवाली हो.

    मिली बड़ाई सदा उसी को
    जिसने की अच्छाई है.

  • आ गया पावन दशहरा

    फिर हमें संदेश देने
    आ गया पावन दशहरा
    संकटों का तम घनेरा
    हो न आकुल मन ये तेरा
    संकटों के तम छटेंगें
    होगा फिर सुंदर सवेरा

     

    धैर्य का तू ले सहारा
    द्वेष हो कितना भी गहरा
    हो न कलुषित मन यह तेरा
    फिर से टूटे दिल मिलेंगें
    होगा जब प्रेमी चितेरा
    फिर हमें संदेश देने
    आ गया पावन दशहरा

    बन शमी का पात प्यारा
    सत्य हो कितना प्रताड़ित
    रूप उसका और निखरे
    हो नहीं सकता पराजित
    धर्म ने हर बार टेरा
    फिर हमें संदेश देने
    आ गया पावन दशहरा

  • जलता रहेगा रावण यूं ही आखिर कब तक?

    जलता रहेगा रावण यूं ही आखिर कब तक?

     

    देखते है सभी जलते रावण को
    आग की विषम लपटो कों
    जिनमें फ़टाकों के चिन्गारियों के बीच
    बेचारा रावण जल रहा है
    खाक हो जाता है हर साल
    फिर न जाने कहां से
    जन्म जाता है हर साल
    आग भी रावण को खाक न कर पाई है अब तक
    जलता रहेगा रावण यूं ही आखिर कब तक?

  • मुक्तक

    किसलिए हर आदमी खुद को जला रहा है?
    सिलसिला-ए-दर्द़ से खुद को सता रहा है!
    ढल रही है जिन्दगी शीशे की शक्ल में,
    रास्तों में तन्हा पत्थर सा जा रहा है!

    मुक्तककार- #महादेव’

  • Kisi ko shikayat he,

    Kisi ko shikayat he,

    kisi ko gila he

    Hum magar beparvaah he,

    Nahi matlab agar koi jala he

     

  • मुक्तक

    हर सुबह ख्वाबों से रिश्ता टूट जाता है!
    प्यार का पलकों में गुलिस्ताँ छूट जाता है!
    खोजता हूँ मंजिलें तमन्नाओं की लेकिन,
    मुझसे चाहतों का फरिश्ता रूठ जाता है!

    मुक्तककार- #महादेव’

  • मुक्तक

    तेरा ख्याल तन्हा छोड़कर आया हूँ!
    दीवार-ए-दर्द को तोड़कर आया हूँ!
    भूला हूँ मंजिलों को वक्त-ए-सितम से,
    यादों की लहर को मोड़कर आया हूँ!

    मुक्तककार- #महादेव’

  • The “getting free” lure …..!.

    The “getting free” lure …..!.

    A young family,
    Mr. John, his wife, two kids,
    Doing well for themselves,
    Staying in a small bungalow,
    Found one morning,
    Their new car missing,
    Stolen from garage
    where it was parking.

    Very upset, disheartened
    they investigated, searched,
    looked everywhere
    But the car was no where.

    “Immediately complain to the police”,
    was neighbors advice, sound
    & they helped them lodge an FIR,
    with all details of the right kind.

    John & family were now praying,
    For the Police for quickly finding
    The Car, which like a family member,
    they were greatly missing,
    Wife & kids helpless & crying….

    While the police, were as usual,
    still busy (or lazy) investigating,
    & calling them often for interrogating
    To the surprise of them all,
    On the 3rd day Morning,
    They found, their car, back
    Parked in the same place,
    From where it went missing,
    And more so without any damage,
    which was amazing & heartening.

    And to a greater surprise,
    There was a prominent note,
    Left in the car, in bold, reading:-

    “We working on a secret National mission,
    utilized your car in a holy operation
    Sorry for the inconvenience,
    Hope you pardon us in the situation,
    But as our obligation,
    Here are 4 free movie tickets,
    It will be to our great satisfaction,
    If you & your whole family enjoy,
    As from us, this humble reparation”
    Note was signed by Head of the mission

    Mr. John & family
    felt moved by this gesture from the mission
    Delighted that their car did work in a noble operation
    Were also more happy,
    As the free classy tickets were for,
    Highly Acclaimed, 4 ½ hour running,
    none other movie than the famous “Gandhi”
    Getting any tickets for this movie then was not easy

    The whole family
    in due gratitude, did go for the movie,
    Enjoyed it fully,
    With no cut backs on interval snacking,
    Returned feeling full & very happy,
    For the movie was also a beauty…

    Unfortunately only to find on return,
    their house completely burgled
    in the period interim,
    with all household valuables missing…..!

    The burglars had nicely planned,
    what they had in mind…..!
    And the family was lured,
    into this free gift grind,
    of a horrible kind……!

    I am reminded of this story,
    Whenever I find people running to any degree,
    To acquire anything advertised as available free
    Without realizing nothing in the world is given free,
    One has to always spend very much more,
    Whenever anyone has acquired anything free.

    Better & always wise to buy whatever you want
    Of the right quality & of the right kind,
    Paying its appropriate price with wisdom in mind,
    Never to fall a prey to free offers promoted by crooked minds

    Very sorry for this write, so lengthy
    For, even for reading anything free
    We have to spend,…. Expend our time,
    Time which is money, valuable very
    especially in these times
    When we are racing, always in a hurry ……!

    ” Vishvnand “

    (P.S.: This is a modified version & adoption from a happening, a news item; I recall reading in a newspaper abroad, in late 70’s. I get reminded of it due to the lure of free gifts & giveaway’s being flouted about galore presently to fool the public)

  • मुन्तजिर हूं मैं मोहब्बत का

    मुन्तजिर हूं मैं मोहब्बत का
    मयखानों की मुझे तलाश नहीं
    इक दरिया है जिसे मैं ढ़ूढ़ता हूं
    पैमानों के जामों की मुझे प्यास नहीं

  • जिन्दगी भर भटका किये राह-ए-उम्मीद में,

    जिन्दगी  भर  भटका  किये  राह-ए-उम्मीद  में,
    कभी   पहुँच   ही  ना  पाये  दयार-ए-हबीब में,

    शाम  ढ़ल  गयी  और  हम  यूँ  ही  बैठे रह गये,
    वो आये और जा बस गये निगह-ए-अंदलीब में,

    क्या   खता   खुदा  की  क्या  उनकी खता थी,
    जब  लिख  दिये  हो  किसी  ने  ग़म-नसीब  में,

    जब  वो  अक्स-ए-रूख थे देख रहे मेरे रकीब में,
    हम पूँछते ही रह गये क्या कमीं थी मुझ गरीब में,

    वो आके हमसे पूछते क्या हो किसी तकलीफ में,
    हम  घुट घुट के  यूँ ही  मर  गये हिज्र-ए-हबीब में,

  • पैमाना

    न जाने किस पैमाने में तोला करते हैं वो मोहब्बत,
    लुट गए उनकी वफ़ा में फिर भी न क़ाबिल-ऐ-ऐतबार ही रह गए…

  • क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

    क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..
    क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

    इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी..
    छुपकर तुमसे और किसी से पहले बात तो मैंने की थी..
    एक भरोसा था शीशे सा जो चटकाकर तोड़ दिया था..
    संदेहों के बीच तुझे जब तन्हा मैंने छोड़ दिया था..
    अपना सूरज आप डुबोकर पहले रात तो मैंने की थी..
    इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी..
    क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..
    क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

    अब कर्मों की मार पड़ी है तो फिर तुमसे कैसा बैर..
    अपनी बारी आन पड़ी है तो फिर तुमसे कैसा बैर..
    कैसा बैर रखूं मैं बोलो कैसा अब विद्वेष रखूं..
    हम दोनों में किसके दिल के टूटे अब अवशेष रखूं..
    अपने ही उपवन में शोलों की बरसात तो मैंने की थी..
    इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी..
    क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..
    क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

    #सोनित

  • Ab khyaal bhi log loot ke le gaye

    Mere jajbaato ko koi nahi samjata yahan

    Ghayal haalato ki koi kadr nahi kisi ko

    Ek khyaal tha jo sirf apna tha

    Ab khyaal bhi log loot ke le gaye

  • मुक्तक

    कोई नहीं है मंजिल न कोई ठिकाना है!
    हरवक्त तेरे दर्द़ से खुद को सताना है!
    मुमकिन नहीं है रोकना नुमाइश जख्मों की,
    हर शाम तेरी याद में खुद को जलाना है!

    मुक्तककार- #महादेव’

  • आज कोई भी ले जाये मुझे मै चला जाऊंगा

    आज कोई भी ले जाये मुझे मै चला जाऊंगा
    इस दुनिया से लेना देना नही अब से कुछ

  • खालिस बेमेल है जिंदगी मेरी

    खालिस बेमेल है जिंदगी मेरी
    निखरे हुए है जज्बात मेरे
    लफ़्ज मेरे एकदम मासूम है
    मगर फिर भी धोखे देती रहती है जिंदगी

  • एक रस होने की आस

    वो पूर्ण शक्ति जब बिखर गया,

    कण-कण में  सिमट गया ,

    तब हुआ इस जग का निर्माण,

    वो परमपिता सृजनकर्ता जो,

    नित्य सूर्य बन अपनी किरणो से,

    नव स्फूर्ति का जीवो में करता संचार,

    वो ममतामयी चाँद की चाँदनी बन,

    स्नेहिल शीतलता का आँचल फैलाए,

    हम जीवो को सहलाता,

    टिम-टिम तारो के मंद प्रकाश में,

    नयनो में निद्रा बन समाता,

    खुली नयनो के अनदेखे सपने,

    ले आगोश में हमें दिखाता,

    पूर्ण प्रेम जो कण-कण में बिखरा,

    एक रस होने की आस जगाता,

    तनमयता. को प्रयासरत जीव,

    घुलने को, मिटने को,

    आपस में जुड़ने को,

    पूर्ण प्रेम को पाने को,

    व्यथित हुआ है जगत में,

    जीव अपना अस्तित्व बनाने को,

    इसी धुन में जन-जीवन चलता,

    तन मिलता, मन नहीं जुड़ता,

    कण-कण में जब बिखरा है,

    वो कैसे मिले जमाने को ।।

  • ता उम्र

    ता उम्र मैं इक अनजान सी राह में रहा,

    जागते हुए भी मैं सफ़र ए ख़्वाब में रहा,

    वो जिसे पाने को भटका मैं दर बदर ज़माने में,

    अंत समय में जाना वो मेरी जिस्मों जान में रहा,

    पार नहीं कर पाया जिस समन्दर को मैं,

    हर रोज उसी समन्दर के मैं बहाव में रहा,

    चुभती रही जो दूर रहकर भी बात मुझे सनम की,

    हकीकत में मैं हर मोड़ पर उसी के साथ में रहा॥

    राही (अंजाना)

  • चेहरे

    एक जैसे हो गए हैं चेहरे सारे,
    मेरी आँखों से कहीं खो गया है चेहरा तेरा,

    मुद्दते बीत गयी हैं सपना तुम्हारा देखे,
    जागता रहता है हर रोज बिस्तर पर तकिया मेरा,

    फ़हरिस्त होगी मरने वालों की कातिलों के पास मगर,
    मेरे जिस्म ही नहीं रूह पर भी हो गया है इख़्तियार तेरा,

    तेरी ही जुस्तजू में लगा हूँ मैं हर पल,
    सच ये के अब हद से जादा हो गया है इंतज़ार तेरा॥

    राही (अंजाना)

  • आहट

    तेरे कदमों की आहट से खुश होती थी माँ तेरी,

    आज लगे रहते हैं लोग तेरे कदम उखाड़ने के लिए,

    कोई खुश नहीं होता आज तरक्की से तेरी,

    लोग मौका ढूंढते हैं आज हर कदम काट खाने के लिए,

    मिल रहा था लाखों का ताज मुझे सर पर लगाने को,

    मैंने सर नहीं झुकाया अपना सम्मान गिराने के लिए,

    कोई अक्स नहीं कोई साया नहीं,

    कुछ लोग आते हैं ज़माने में बस आईना दिखाने के लिए,

    बात सबको न बताओ अपने दिल की सुनो,

    कोई आएगा नहीं आगे मरहम लगाने के लिए,

    “राही” अनजाना है अभी अपनी पहचान के लिए,

    निकला है अभी सफर में मन्ज़िल पाने के लिए॥

    राही (अंजाना)

  • राही

    थक कर के बैठ जाऊँ वो “राही” मैं नहीं,

    आँखों में ठहर जाऊँ वो आँसु मै नहीं,

    चिराग हूँ माना बुझना है मुझे मगर,

    रौशन ज़माना जो ना कर पाऊँ वो मैं नहीं,

    दिखता हूँ कविताओ में झलक अपनी,
    अपनी जो पहचान ना छोड़ पाऊँ वो मैं नहीं,

    अकसर होता है खामोशियों में भी ज़िक्र मेरा,

    तस्वीर अपनी सबके दिलों में ना बना पाऊँ वो मै नहीं।

    राही (अंजाना)

  • मुक्तक

    दर्द के दामन में चाहत के कमल खिलते हैं!
    अश्क की लकीर पर यादों के कदम चलते हैं!
    रेंगते ख्यालों में नज़र आती हैं मंजिलें,
    जिन्दगी में जब भी ख्वाबों के दिये जलते हैं!

    मुक्तककार – #महादेव’
    ,

  • मुक्तक

    मेरा नसीब मुझसे क्यों रूठ गया है?
    राहे-मंजिल से रिश्ता टूट गया है!
    यादें सुलग रहीं हैं पलकों में लेकिन,
    तेरा दामन हाथों से छूट गया है!

    मुक्तककार – #महादेव’

  • शब्दों का खेल

    सब शब्दों का खेल है भैया
    वरना लड़ाई मे तो दोनो ही हारते है

  • ‘हर अश्क सोख लेता है…………….

    ‘हर अश्क सोख लेता है वो आंख से मेरे,
    रोने भी नहीं देता मुझे,  दर्द का सहरा…।’
    ………………………………………..सतीश कसेरा

  • वतन में आज नया आफताब निकला है,

    वतन में आज नया आफताब निकला है,

    हर एक घर से गुल ए इंकलाब निकला है।

    सवाल बरसों सताते रहे थे जो हमको,

    सुकूनबख्श कोई अब जवाब निकला है।

    गये थे सूख समन्दर उदास आंखो के,

    हर एक सिम्त से दरिया ए आब निकला है।

    शुतुरदिली से जो छुप छुप के वार करते थे,

     उन्हें चखाने मज़ा मुल्क़ताब निकला है।

    सुकूं की सांस शहीदों के सारे कुनबे में,

    खिला है चेहरा यूँ ताजा गुलाब निकला है।

    अलग थलग है पड़ा मुल्क वो ही दुनिया में,

    के जिसके मुल्क का खाना खराब निकला है।

    इधर सुकूं तो उधर मौत का मातम पसरा,

    असद को छेड़ने का ये हिसाब निकला है।

    किसी की ईद किसी की “मिलन” है दीवाली,

    नयी जगह से नया माहताब निकला है।

                                   ———–मिलन.

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    कठिन शब्दों के अर्थ-

    आफ़ताब-सूरज.

    गुल ए इंकलाब-परिवर्तन का फूल.

    सुकूनबख्श-संतोषजनक.

    सिम्त-तरफ.

    शुतुरदिली-बुजदिली.

    मुल्क़ताब-मुल्क़ को रौशन करने वाला.

    कुनबा-परिवार.

    खानाखराब-बदनसीब

    असद-शेर.

    माहताब-चाँद.

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  • WORLD OF LOVE

    Two beautiful souls together,
    Lost in themselves altogether,
    In each other’s eyes
    Their entire world lies,
    Her flowing hair
    Shades him from all harm and despair,
    Her loving arms around him,
    Filling his life with her love to the brim.

    Their looks meet,
    Their smiles sweet,
    Lips trembling with passion,
    Hearts full of red velvety emotions,
    The small love talks,
    Quietly the hour walks
    Disturbing them not,
    As the fastened breaths turned hot.

    Kissing and cuddling,
    Smiling and melting
    Into each other
    Without a bother
    Of the world around,
    Love multiplies in leaps and bounds
    Being a part of the entire Universe,
    Mingling with the whole cosmos.

    Wanting to be in each other’s embrace,
    All bad memories they efface
    Of people, against the beautiful love of theirs,
    To be forever
    In each other’s loving care,
    Resting on the wooden chair,
    They created their own world
    Of love, with bundles of love that destiny at then hurls.

    ©Madhumita

  • SOLITARY FRIEND

    The vast expanse of green
    High trees weaving a lovely screen
    And the solitary bench
    Like me alone, on this ground entrenched,
    Every morning we both sit together,
    Share our stories as birds chatter,
    Her old nuts squeak,
    My old bones creak,
    I sit for hours with her,
    Taking in the beauty around her,
    Breathing the fresh air,
    At times saying my morning prayers,
    My rosary in hand,
    Trying to reach out to The Lord in another Land.

    The green around soothes,
    The smiling flowers move,
    The few good morning wishes from walkers,
    A few bonny children cheer,
    Preparing us for our day burdensome,
    To spend the lonely hours, cumbersome,
    Fills my old blood with new oxygen,
    Although I am now, not even like the acrogen,
    Still I get a new life
    To continue with my lonely life,
    Along with this bench solitary,
    To sit with her is now customary
    To keep me happy till the end
    Is now on her, my dearest solitary friend!

    She gets closer to me,
    Her pain I can clearly see,
    She too does empathise,
    We both with each other sympathise
    And give each other company,
    Missing nobody,
    She does not even mind my quirkyness,
    I do not bother her jerkiness,
    I am an old hag,
    She can crumble and go anyday in a gunny bag,
    Still I love her,
    Inseparable now we are,
    The day I do not visit her anymore,
    Dear World! Please know that ‘I exist nomore.’

    ©Madhumita

  • अपनी माँ को तरसती हूँ

    दो रोटी गर्म गर्म फूली हुई सी
    आज भी जो मिल जाये
    तो मै दौङी चली आऊँ,
    दो कौर तेरे हाथों से
    खाने को जो अब मिल जाये,
    तो मै सब कुछ छोङ आ जाऊँ।

    तेरे हाथों की चपत खाने को
    अब तरसती हूँ मै,
    तेरी मीठी फटकार खाने को
    अब मचलती हूँ मै,
    बहुत याद आती हैं हर डाँट तेरी,
    वो झूठा गुस्सा शरारतों पर मेरी।

    वो हाथ पकङकर लिखवाना,
    कान पकङ घर के अंदर लाना,
    वो घूमती आँखों के इशारे तेरे,
    भ्रकुटियाँ तन जाने तेरे,
    मुझको परी बनाकर रखना,
    मुझमें खुदको ही खोजना।

    मुझे खिलाना और नहलाना,
    पढ़ना और लिखना सिखलाना,
    कलाओं की समझ देना,
    अच्छे बुरे का ज्ञात कराना,
    मानविक प्रवृतियों को जगाना,
    प्रेम प्यार का पाठ पढ़ाना।

    खाना बनाना,
    कढ़ाई करना,
    स्वेटर बुनना,
    बाल बनाना,
    पेङ पर चढ़ना, दौङना भागना,
    सब कुछ तेरी ही भेंट माँ।

    चुन-चुनकर कपङे पहनाना,
    रंग बिरंगे रिबन लाना,
    गुङियों के ढेर लगाना,
    किताबों के अंबार सजाना,
    कितनी ही कहानियाँ मुझसे सुनना
    और मुझको भी ढेरों सुनाना।

    काश बचपन फिर लौट आये,
    मेरे पास फिर से मेरी माँ को ले आये,
    जिसकी गोद में घन्टों घन्टे,
    पङी रहूँ आँखें मूंदे,
    प्रेरणा की तू मूरत मेरी,
    क्यों छिन गयी मुझसे माँ गोदी तेरी?

    आजीवन अब तुझ बिन रहना है,
    फिर भी दिल मचलता है,
    भाग कर तेरे पास जाने को,
    तुझको गले से लगाने को,
    हर पल तुझको याद मैं करती हूँ,
    माँ हूँ, पर अपनी माँ को तरसती हूँ ।।

    ©मधुमिता

  • मुक्तक

    मेरा नसीब मुझसे क्यों रूठ गया है?
    राहे-मंजिल से रिश्ता टूट गया है!
    यादें चल रहीं हैं पलकों में हर घड़ी,
    तेरा दामन हाथों से छूट गया है!

    मुक्तककार – #महादेव’

  • गुमान

    गुमान ही नहीं होता ऐसे महसूस
    इश्क़ जो हमें कभी मिला नहीं है
    मैंने तो दिया था उधार में दिल
    खुद का समझ वापस दिया नहीं है

  • देशभक्ति का भाषण तब तक देशभक्ति को गाली है

    एक शहीद सैनिक दिल्ली से क्या कहना चाहता होगा इसी विषय पर मेरी एक कल्पना देखें-

    सुलग उठी है फ़िर से झेलम हर कतरा अंगारा है,
    हिमगिरी के दामन में फ़िर से मेरे खून की धारा है,
    चीख रही है फ़िर से घाटी गोद में मेरा सिर रखकर,
    पूछ रही है सबसे आखिर कौन मेरा हत्यारा है,
    मेरे घर में कैसे दुश्मन सीमा लांघ के आया था,
    छोटी सी झोली में बाईस मौतें टांग के लाया था,
    क्या मेरा सीना उसके दुस्साहस का आभूषण था,
    या मेरे ही घर में रहने वाला कोई विभीषण था,
    मैं जब ये प्रश्न उठाता हूं तो उत्तर से डर जाता हूं,
    ये दिल्ली चुप रह जाती है मैं चीख-चीख मर जाता हूं ll

    मेरी मौतों पर अक्सर ये ढोंग रचाया जाता है,
    कि मक्कारी वाली आंखों से शोक मनाया जाता है,
    दिल्ली की नामर्दी मुझको शर्मिंदा कर देती है,
    मेरी मौतों पर सरकारें बस निंदा कर देती हैं,
    मैं इस जिल्लत का बोझ उठाये ध्रुवतारा हो जाता हूं,
    ये दिल्ली चुप रह जाती है मैं चीख-चीख मर जाता हूं l

    दुश्मन से गर लड़ना है तो पहले घर स्वच्छंद करो,
    आस्तीन में बैठे हैं जो उन सांपों से द्वंद करो,
    सैनिक को भी शत्रु-मित्र का शंका होने लगता है,
    जहां विभीषण होते हैं घर लंका होने लगता है,
    मतलब कुछ पाना है गर इन लहु अभिसिंचित द्वंदों का,
    तो ऐ दिल्ली हथियार उठाओ, वध कर दो जयचंदों का,
    मैं दुश्मन की बारूद नहीं छल वारों से भर जाता हूं,
    दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं l

    मेरी मां की ममता मेरे साथ दफ़न हो जाती है,
    बूढे बाप की धुंधली आंखें श्वेत कफन हो जाती हैं,
    जल जाती हैं भाई-बहनों, बेटी की सारी खुशियां,
    मेरी विधवा जीते जी ही मृतक बदन हो जाती है,
    मेरा घर मर जाता है जब कंधों पर घर जाता हूं,
    दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं l

    दिल्ली वालों आंखें खोलो सेना का सम्मान करो,
    चार गीदड़ों के हमले में बाईस सिंहों को मत कुर्बान करो,
    मेरी गज़ल दिशा देती है, बहर बताती है तुमको,
    कि विरह वेदना बंद करो अब युद्ध गीत का गान करो,
    जब भारत माता की खातिर मरता हूं तो तर जाता हूं,
    पर ऐ दिल्ली तू चुप रहती है इसिलिये मर जाता हूं l

    ये क्यूं हर हमले पर तुमने बातचीत की ठानी है,
    अरे लातों के भूतों ने आखिर कब बातों की मानी है,
    लेकिन तुम भी कुत्ते की ही दुम हो, आदत छोड़ नहीं सकते,
    यही वजह है की सीमा पर दुश्मन की मनमानी है,
    मैं हाथों में हथियार लिये भी लाश बिछाकर जाता हूं,
    दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं l

    दिल्ली गर देना है तुझको मरहम मेरे दर्दों को,
    तो सेना से कह दो कि मारे चुन-चुन दहशतगर्दों को,
    प्रेमशास्त्र को पीछे रखकर सीमा लांघ चले जाओ,
    और अभी औकात बता दो इन हिजड़े नामर्दों को ll

  • मेरी कलम नहीं उलझी है माशूका के बालों में

    मेरी कलम नहीं उलझी है माशूका के बालों में,
    मेरे लफ्ज नहीं अटके हैं राजनीति के जालों में,
    मैने अपने अंदर सौ-सौ जलते सूरज पाले हैं,
    और सभी अंगारे अपने लफ्जों में भर डाले हैं,
    मैने कांटे चुन डाले फूलों का रास्ता छोड़ दिया,
    जकड़ रहा था जो मुझको उस नागपाश को तोड़ दिया,
    अब मैं जख्मी भारत के अंगों को गले लगाता हूं,
    कवि हूं लेकिन मैं शोलों की भाषा में चिल्लाता हूं l

    All rights reserved.

    -Er Anand Sagar Pandey

  • मैं तुझे अपनी वफाओं की दुहाई नहीं दूंगा

    तेरी कलम को कभी अपनी रुबाई नहीं दूंगा,
    मैं तुझको चश्म-ए-नम की कमाई नहीं दूंगा l

    तेरी आंखों में वहम के कई पर्दे टंगे हुए हैं,
    मैं तुझे सामने रहकर भी दिखाई नहीं दूंगा l

    अभी गुरूर तेरे सर पे चढ के बोल रहा है,
    ऐसे हाल में मैं तुझको सुनाई नहीं दूंगा l

    तू बेफिक्र होकर अपनी फितरतों से वफ़ा कर,
    मैं तुझे अपनी वफाओं की दुहाई नहीं दूंगा l

    तेरा जो फ़ैसला है बेझिझक मुझको बताती जा,
    मैं बेकसूर हूं मैं कोई सफ़ाई नहीं दूंगा l

    तू मुझे अपनी जिन्दगी से रिहा कर भी दे मगर,
    मैं तुझे अपनी जिन्दगी से रिहाई नहीं दूंगा ll

    All rights reserved.

    -Er Anand Sagar Pandey

  • तेरा होके और शर्मिन्दा नहीं होना

    ज़रा सा गौर से सुन अब ये आईंदा नहीं होना,
    कि मुझको तेरा होके और शर्मिन्दा नहीं होना|

    जहां मतलबपरस्ती आशनाई नोच खाती है,
    मुझे ऐसी तेरी बस्ती का बाशिन्दा नहीं होना|

    बहोत ही बेरहम होकर किया था कत्ल खुद तूने,
    मेरे दिल में तेरी ख्वाहिश को फ़िर ज़िंदा नहीं होना|

    जहां खुदगर्ज़ियों में रास्ते मंज़िल बदलते हैं,
    मुझे ऐसी तेरी राहों का कारिन्दा नहीं होना|

    All rights reserved.

    -अनन्य

  • जीवन का आधार

    लिपट कर एक बेल
    एक पेड़ को,आधार पा गई थी
    बहुत खुश थी सुंदर फूल उगाती थी
    और गिराती थी जैसे पुष्प वर्षा हो
    वो समझती थी की अब
    आसान सफर है जिंदगी का
    पेड़ की जड़ें भी गहरी है
    और विशाल भी है ये
    और मुझे इसने अपने चारों और
    लिपटने की मौन अनुमति दे दी है
    पर नियति और नीयत …
    किसका बस चलता है
    पेड़ का पालक मर गया
    बेटे आये घर का बंटवारा हुआ
    पेड़ बिच में आ रहा था
    बोले काट दो
    आरी चली कुल्हाड़ी चली
    बेल बहुत परेशां थी
    आज उसका आधार कट रहा था
    उसका प्यार कट रहा था
    बहुत सहने के बाद पेड़
    लहराकर गिरा
    पर बेल ने अपनी असीम ताकत लगा दी
    पेड़ को गिरने से रोकने को
    पर कुछ देर हवा में झूलने के बाद
    पेड़ गिर पड़ा
    और गिर पड़ी उसके उपर
    वो बेल भी दोनों निष्प्राण थे
    दोनों सूख गए पर सूखी बेल आज भी
    लिपटी पड़ी है उस
    बेजान पेड़ से….
    ?? जयहिंद ??

    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • बचपन की यादें

    ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    कमीज के बटन
    ऊपर नीचे लगाना,
    वो अपने बाल
    खुद न काढ़ पाना,
    पी टी शूज को
    चाक से चमकाना,
    वो काले जूतों को
    पैंट से पोंछते जाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो बड़े नाखुनों को
    दांतों से चबाना,
    और लेट आने पर
    मैदान का चक्कर लगाना,
    वो प्रेयर के समय
    क्लास में ही रुक जाना,
    पकड़े जाने पर
    पेट दर्द का बहाना बनाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो टिन के डिब्बे को
    फ़ुटबाल बनाना,
    ठोकर मार मार कर
    उसे घर तक ले जाना,
    साथी के बैठने से पहले
    बेंच सरकाना,
    और उसके गिरने पे
    जोर से खिलखिलाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    गुस्से में एक-दूसरे की
    कमीज पे स्याही छिड़काना,
    वो लीक करते पेन को
    बालों से पोंछते जाना,
    बाथरूम में सुतली बम पे
    अगरबत्ती लगाकर छुपाना,
    और उसके फटने पे
    कितना मासूम बन जाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो Games Period
    के लिए Sir को पटाना,
    Unit Test को टालने के लिए
    उनसे गिड़गिड़ाना,
    जाड़ो में बाहर धूप में
    Class लगवाना,
    और उनसे घर-परिवार के
    किस्से सुनते जाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो बेर वाली के बेर
    चुपके से चुराना,
    लाल–पीला चूरन खाकर
    एक दूसरे को जीभ दिखाना,
    खट्टी मीठी इमली देख
    जमकर लार टपकाना,
    साथी से आइसक्रीम खिलाने
    की मिन्नतें करते जाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो लंच से पहले ही
    टिफ़िन चट कर जाना,
    अचार की खुशबू
    पूरे Class में फैलाना,
    वो पानी पीने में
    जमकर देर लगाना,
    बाथरूम में लिखे शब्दों को
    बार-बार पढ़के सुनाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो Exam से पहले
    गुरूजी के चक्कर लगाना,
    लगातार बस Important
    ही पूछते जाना,
    वो उनका पूरी किताब में
    निशान लगवाना,
    और हमारा ढेर सारे Course
    को देखकर सर चकराना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ? ? ? ? ?

    वो farewell पार्टी में
    पेस्ट्री समोसे खाना,
    और जूनियर लड़के का
    ब्रेक डांस दिखाना,
    वो टाइटल मिलने पे
    हमारा तिलमिलाना,
    वो साइंस वाली मैडम
    पे लट्टू हो जाना…

    ? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
    जरा फिर से तो बुलाना…

    ??????

    वो मेरे स्कूल का मुझे,
    यहाँ तक पहुँचाना,
    और मेरा खुद में खो
    उसको भूल जाना,
    बाजार में किसी
    परिचित से टकराना,
    वो जवान गुरूजी का??
    बूढ़ा चेहरा सामने आना…
    तुम सब अपने स्कूल
    एक बार जरुर जाना…

    ?? जयहिंद ??

    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • नारी वर्णन

    मयखाने में साक़ी जैसी
    दीपक में बाती जैसी

    नयनो में फैले काजल सी
    बगिया में अमराई जैसी

    बरगद की शीतल छाया-सी
    बसन्त शोभित सुरभी जैसी

    गीता कुरान की वाणी-सी
    गंगा यमुना लहराती जैसी

    बगीचे की हरि दूब जैसी
    आँगन में हो तुलसी जैसी

    आकाश में छाय बदल सी
    शीतल बहती पुरवाई जैसी

    फूलों की खिलती क्यारी सी
    समुदर की गहराई जैसी

    रंगों में इन्द्रधनुष जैसी
    सावन में धार झरती जैसी

    मौत में जीने की चाह सी
    मृग में छिपी कस्तूरी जैसी

    मन में रहती हिम शिला सी
    हिमालय की उच्चाई जैसी

    चुभती मन में काँटों जैसी
    पूनम रात चांदनी जैसी

    सजन मन छाय बात याद की
    याद रहे परछाई जैसी

    ?? रीता जयहिंद ??

  • माता – पिता पर आधारित

    दिल के एक कोने मे मन्दिर बना लो।
    मात-पिता की मूरत उस मे बिठा लो।
    दिया ना जलाओ पर गले से लगा लो।
    आरती के बदले ,
    कुछ उनकी सुनो ,
    कुछ अपनी सुनाओ।
    पहला भोग मात-पिता को लगा कर तो देखो।
    इनके चरणों मे माथा झुका क़र तो देखो।
    धर्म स्थलो पर जो मागने जाओगे।
    अरे !!!
    बिन मागे घर मे पाओगे ।।
    जिस के घर मे माँ-बाप हसते है
    प्रभु तो स्वयं ही उस घर मे बसते है..

    ?? जयहिंद ??

    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • मां की महिमा

    कौन बिन माँ के जगत में जन्म पाया ,
    देव से बढ़कर तुम्हारी मातृ माया ,
    है नही ऋण मुक्त कोई मातृ से ,
    जन्म चाहे सौ मिले जिस जाति से ,
    दूसरा है रूप पत्नी का तुम्हारा ,
    जो पुरुष का रात दिन बनती सहारा ,
    सुख दुःख में है सदा संधर्ष करती ,
    धर्म अपना मानकर अनुसरण करती ,
    तू बहन है तीसरे परिवेश में ,
    भ्रातृ की रक्षा करे परदेश मे ,
    ले बहन का रूप जब आती धरा पर ,
    भावनाये याद है राखी बराबर ।
    एक तेरा रूप पुत्री में समाया ,
    पितृ सुख है पिता मन में समाया ,
    कौन तेरी रात दिन रक्षा करेगा ,
    हो वरण कैसे पिता चिंता करेगा ।
    वंश की उन्नति तुम्हारे योग से ,
    नित्य समरसता तुम्हारे भोग से ,
    तू सुधा सी धार बन जीवन निभाती ,
    प्राण की बलि भी चढ़ा कर मुस्कुराती ।

    ?? जयहिंद ??

    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • नाज हमें है उन वीरों पर

    नाज हमें है उन वीरों पर, जो मान बड़ा कर आये हैं।
    दुश्मन को घुसकर के मारा, शान बड़ा कर आये हैं।I

    मोदी जी अब मान गये हम, छप्पन इंची सीना है।
    कुचल, मसल दो उन सब को अब, चैन जिन्होंने छीना है।I

    और आस अब बड़ी वतन की, अरमान बड़ा कर आये हैं।
    नाज हमें है उन वीरों पर, जो शान बड़ा कर आये हैं।I

    एक मरा तो सौ मारेंगे, अब रीत यही बन जाने दो।
    लहू का बदला सिर्फ लहू है, अब गीत यही बन जाने दो।I

    गिन ले लाशें दुश्मन जाकर, शमसान बड़ा कर आये हैं।
    नाज हमें है उन वीरों पर, जो मान बड़ा कर आये हैं।I

    अब बारी उन गद्दारों की, जो घर के होकर डसते हैं।
    भारत की मिट्टी का खाते, मगर उसी पर हँसते हैं।I

    उनको भी चुन चुन मारेंगे, ऐलान बड़ा कर आये हैं।
    नाज हमें है उन वीरों पर, जो मान बड़ा कर आये हैं

    – भारतीय सेना के वीर जवानों को नमन !!

    प्रस्तुति – रीता जयहिंद
    ?? जयहिंद ??

  • राम अब बनवास पर है।

    कई मंथराओं का मिलन– परिहास पर है
    कैकयी फिर भृमित कोप में उपवास पर है
    तड़फ रहे जनता के दशरथ हाथ मल रहै
    देख रहै सव कि -राम अव वनवास पर है

    सीता भी अव बन जाने के लिऐ भ्रमित है
    आज के रावणों के चरित्र से बह चकित है
    लक्ष्मण -हनुमान के चरित्र अव खो गऐ है
    हॉ- बिभीषणों की भरमार स्वार्थ सहित है

    अयोध्या को आतुर कई भरत बन गऐ है
    कई तो आपस में लड़कर ही बिखर गऐ है
    राम से मिलने- चरण पादुका चर्चा नही है
    राम राज कहते सव खजाना कुतर गऐ है

    प्रस्तुति – रीता

    जयहिंद

  • तुम आओ सिंह की सवार बन कर

    तुम आओ सिंह की सवार बन कर !
    माँ तुम आओ रंगो की फुहार बनकर !
    माँ तुम आओ पुष्पों की बहार बनकर !

    माँ तुम आओ सुहागन का श्रृंगार बनकर !
    माँ तुम आओ खुशीयाँ अपार बनकर !
    माँ तुम आओ रसोई में प्रसाद बनकर !

    माँ तुम आओ रिश्तो में प्यार बनकर !
    माँ तुम आओ बच्चो का दुलार बनकर !
    माँ तुम आओ व्यापार में लाभ बनकर !

    माँ तुम आओ समाज में संस्कार बनकर !
    माँ तुम आओ सिर्फ तुम आओ,
    क्योंकि तुम्हारे आने से ये सारे सुख
    खुद ही चले आयेगें तुम्हारे दास बनकर !

    ~ रीता

    जयहिंद

  • समुन्दर किनारे

    हर लहर उठती है एक नयी उम्मीद लेकर
    खाती ठोकर चट्टानों की,अपना सबकुछ देकर
    फिरभी खिंचती चली आए, मिलने किनारे से
    इन दोनों का प्यार चला है इक ज़माने से

    एक अरसे से किनारा भी उसकी कदर करे
    खुली बाहें और प्यार भरे दिल से सबर करे
    वहीँ मिलते ही खुशियों के बुलबुले बने
    और वहां बैठे प्रेमियों के भी सिलसिले चलें

    कुदरत के रोमांस का ये अद्भुत अंदाज
    खुद ही संगीत दे और खुद ही है साज़
    जीते ये सदियों से एक दूसरे के सहारे
    कुछ देर और बीठलु मैं समुन्दर किनारे

  • जो इन दिलों में नफरतों के बीज बोयेगा

    हम भारतवासी हैं
    हम सभी धर्मों का आदर करते हैं
    जो भारत मां की तरफ आंखों उठायेगा
    उसका सीना चीर दिया जाएगा
    जो इन दिलों में नफरतों के बीज बोयेगा
    वह जिंदगी भर रोयेगा
    भारत मां के रखवाले हमारे वीर सैनिक हमें जान से ज्यादा प्यारे है
    मां कसम एक वीर के बदले सौ – सौ
    दुशमनों को मार गिराने की हम ठाने हैं
    जितने भी गद्दारों तुमने पाले हैं
    वह सब लगे हमारे निशाने हैं
    एक वीर की जगह सौ गद्दारों को गिरायेंगे
    और तिरंगे का मान बढ़ायेंगे
    पाकिस्तान के गद्दारों के लहू से शोभित होगी हमारी धरती
    उस लहू से तिलक करेंगे अपनी भारत मां का
    तभी शहीदों की शहादत को सच्ची श्रद्धांजलि होगी
    भारत माता की जय
    रीता जयहिंद

  • पाक के गद्दारों के लहू से कर दो धरती लाल

    पाक के गद्दारों के लहू से कर दो धरती लाल
    उसी खून से करना है माँ भारती का श्रंगार
    तत्पश्चात चिड़ियाघर में भूखे शेरो और
    चीतों के आगे फेंक दो मेरी सरकार
    तो दीपक जलाऊॅ मैं जाकर सरहद पार
    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • कितना भी मैं करना चाहूँ

    कितना भी मैं करना चाहूँ
    मैं अपने प्यार का इजहार
    आई लव यू कहकर पर
    कमबख्त जुबान फिसल जाती है
    और मुँह से निकल जाता है
    जयहिंद
    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • किसी की ऑख़ों में ऑसू थे मेरे लिए

    किसी की ऑख़ों में ऑसू थे मेरे लिए
    वह शख्स मुझे दुनिया में सबसे प्यारा लगा
    प्रस्तुति – रीता जयहिंद

  • जब घर से निकली तो

    जब घर से निकली तो
    बिलकुल अकेली थी मैं
    जब मुसीबतों ने घेरा मुझे
    तो मदद करने वालों की
    कोई कमी नहीं थी जहान् में

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