जब भी देखता हूँ मैं इस रोटी के खुरचन को तो माँ आ जाती है यादों में। तवे पे रोटियाँ बनाती जब जला -जला के रोटियाँ की सौंधी सुगन्ध फैल जाती वातों में।। तोड़ -तोड़ […]

अक्सर कहा करता था मैं माँ जाऊँगा परदेश को। “”ना ना वश कर”कहती माँ को मत कलेश दो।। दृढ़ संकल्प होकर ऐसा एक दिन निश्चय कर डाला। आजिज होकर मान गई और कहने तू सुन […]

कोई वरिष्ठ था कोई गरिष्ठ था कोई पहनके इच्छामृत्यु का चोला। पुत्र मोह के चादर में कोई और प्रतिशोध आदर में कोई ले तन मन में प्रतिकार का गोला।। मित्र सम्बन्धी बनकर कोई लवण की […]

चटपटी स्वाद की इमली व कड़वा होता नीम यहाँ। मूँह में पानी आ जाते हैं देख इमली जहाँ -तहाँ।। बिन खाए सांसों से केवल स्वास्थ्यलाभ दे नीम हमेशा। ‘विनयचंद ‘ ऐसे हीं संतन हरे सकल […]

माँ तेरी ममता का कोई हिसाब नहीं। तेरी आँचल की छाया और जिसको तेरी गोद मिले। खुशनसीब है वो संतान जिसको ममता की मोद मिले।। तेरे मन की शीतलता के सम कोई माहताब नहीं । […]

मातृदिवस पर माँ को बच्चे याद बखूबी करते हैं। सोशल मीडिया पर आकर अह्लाद बखूबी करते हैं। माँ ने अपने दूध की ममता फेसबुक पर डाला क्या? दिल के एस डी कार्ड से भैया तेरा […]

कुछ खट्टी कुछ मीठी बातों को सुनने और सुनाने को जी करता है मेरा जब भी तेरी आँचल में आ जाता हूँ। तू जननी है जन्मभूमि है तेरी गोद में आकर मैया सुख जन्नत का […]

एकांतवास में रहकर भी नहीं हुई तपस्या पूर्ण। खान -पान में समय बिताया सोया पूरम पूर्ण।। घटा नहीं कोरोना जालिम घट गया सीधा-पानी। ‘विनयचंद ‘कुछ ऐसा कर जो सुखी बसे सब प्राणी।।

अब तो घर में भी रहना कारावास है क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर। देख विरयानी में भी है खिचड़ी का स्वाद क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।। क्यों अनजाना -सा लगता है अपना शहर […]

सचिव सयाने कुटिया में रहते थे चाणक्य यहाँ पर। निर्मल हृदयकुञ्ज मनोहर निर्मल गंगा बहे जहाँ पर।। एक छत्र राज था भारत मुँह की खाई जहाँ सिकन्दर। ह्वेनसांग भी हतप्रभ रह गया झाँक झाँक भारत […]

फूलों की खुशबू को बोलो आखिर किसने देखा? बहती हवाओं को बोलो आखिर किसने देखा? खुशबू हीं तो तितली है और खुशबू हीं तो मधुकर है। सुरभित पवन नासिका होकर दिलो दिमाग बीच सुघर है।।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हुए जब। भक्त शिरोमणि हनुमान हुए तब ।। बन मातु पिता के आज्ञाकारी श्रीराम अयोध्या छोड़ गए। श्री राम के सेवा ख़ातिर हनुमत निज मातु पिता भी छोड़ गए।। ऐसे स्वामी सेवक […]

इन अँखियों न देखी बड़ दुनिया अब क्या देखूँ हे गिरिधारी? जब भी देखा दुनिया में तो देखा पंचविकार कबाड़ी।। काम दिखा और लोभ दिखा। मोह महामद क्रोध दिखा।। इन पांचों ने मिलकर मुझको बना […]

एक पीड़ है हृदय में एक दर्द है भयंकर। तड़प रही है धरती और रो रहा है अंबर।। जिसने मुझे है लूटा ज़िन्दगी बनाई बदतर। कहता मुझे लुटेरा आखिर बताओ क्योंकर।। मेहमाॅ बानाके जिसको रखा […]

मजदूर हूँ मैं मजबूर नहीं। नहीं कभी चिंता अपन रोटी की सबका घर मैं भरना चाहूँ। चिलचिलाती धूपों ने जलाया, कभी बारिश के पानी ने भींगाया। कपकपाती ठंढी से भी लड़ना चाहूँ।। क्योंकि मजदूर हूँ […]

तीन मित्र थे अपने वफादारी के परम मिसाल। मरणासन्न होकर मैं तीनों से पूछा एक सवाल।। कौन चलोगे मेरे साथ किसको पास सदा मैं पाऊँगा? बहुत दिया मैं साथ नहीं अब तेरा साथ निभाऊँगा। बोला […]

कानून के रक्षक भी अब भक्षक हो गए , करें भरोसा आखिर किस पर? खाकी वर्दी भी गुलाम बन हुक्म बजाती सफेदपोश की। काले कोट के जेब बड़े हो गए, करें भरोसा आखिर किस पर? […]

निर्दोष समर्थ गुरू को भी पीटा था नादान किसान। छत्रपति से माफ कराकर गन्ने का दिया खेत बथान।। संत सदा से इस दुनिया में होते दया धर्म के मूल। ‘विनयचंद ‘कभी होना ना इनके प्रतिकूल।।

खुद को साध रहा जो मानव औरों के कल्याण को। सुख-सविधा और परिजन त्याग दिए अरमान को।। ऐसे साधु सन्यासी को पीट -पीटकर मार दिया। दुख इतना है यही है रोना आस्था को भी मार […]

कागज का टुकड़ा बना पतंग उड़ना चाहे नील गगन में। हम पंछी का जीवन क्योंकर डाल रहे हो पिंजर बन्ध में।। पतंड उड़ाने के शौकीनों मुझको भी तो उड़ने दो। मेरे भी हैं कुछ अरमान […]

चमक रहा चांद पूनम का जगमग आज आंगन है। प्रफुल्लित हर कण वसुधा का सुहानी रात साजन है।। हृदय के कुंज में प्रीतम सजाया सेज फूलों का। नयन पथ से उतर आओ नहीं है आतंक […]

फिर बैसाखी आई है देखो आज पंजाब में। दर्द पुराना जाग गया है उन सूखे हुए घाव में।। क्रूर फिरंगी ने हम पर कितना जुल्म किया था। जालियावाला बाग में वीरों जन समूह भून दिया […]