बनाकर बातों से बातें यहां बातें निकलती हैं,
बस यूँहीं जिंदगी के सफर की रातें निकलती हैं,
भरकर बैठे रहते हैं कुछ लोग अपने अंदर इतना,
के पूछो एक और बाहर भरमार कहानी निकलती हैं…
आगे है…..
राही (अंजाना)
बनाकर बातों से बातें यहां बातें निकलती हैं,
बस यूँहीं जिंदगी के सफर की रातें निकलती हैं,
भरकर बैठे रहते हैं कुछ लोग अपने अंदर इतना,
के पूछो एक और बाहर भरमार कहानी निकलती हैं…
आगे है…..
राही (अंजाना)
ढह गए कितने ही ईमान ऐ मकाँ एक बोतल की चाहत में,
मगर बोतल ने बिक कर भी अपना ज़मीर नहीं छोड़ा।।
राही (अंजाना)

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ,
मैं तब से अपने ही ख्यालों में वयस्त हूँ,
रंग तो बहुत हैं ज़माने में मगर,
मैं इंद्रधनुष के रंग छुड़ाने में वयस्त हूँ,
चाँद है सितारे हैं आसमाँ रौशन है मगर फिर भी,
मैं अपने ही घर के जुगनू जलाने में व्यस्त हूँ।।
राही (अंजाना)
मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ,
मैं तब से अपने ही ख्यालों में वयस्त हूँ,
रंग तो बहुत हैं ज़माने में मगर,
मैं इंद्रधनुष के रंग छुड़ाने में वयस्त हूँ,
चाँद है सितारे हैं आसमाँ रौशन है मगर फिर भी,
मैं अपने ही घर के जुगनू जलाने में व्यस्त हूँ।।
राही (अंजाना)
बातों में से बात निकलती है,
चुप रहता हूँ आवाज़ निकलती है,
शब्दों का ही खेल है मानो,
जैसे समन्दर से सौगात निकलती है।
सड़कों पर खेल खुलेआम खेले जाते थे,
होकर मिट्टी के रंग हम घर चले जाते थे,
पिता की डाँट जब पड़ती थी अक्सर,
माँ के आँचल में चुपके से हम छिप जाते थे,
मुँह मोड़ लेते हैं जहाँ आज ज़रा सी बात पर,
वहीं दोस्त कभी पहले मिसाल बन जाते थे॥
राही (अंजाना)

तेरे घर की गलियों में हम अक्सर भटका करते थे,
तेरी नज़रों से छिपकर हम तुझको घूरा करते थे,
साँझ सवेरे जब भी तू तितली बन मंडराती थी,
रात अँधेरे जुगनू बन हम तुझको ढूंढा करते थे,
एक तुम तकिये पर सर रख के चैन से सोया करती थी,
एक हम तुमसे मिलने को ख़्वाबों में जागा करते थे।।
राही (अंजाना)
मैं प्यादा हूँ मुझे प्यादा ही रहने दो,
यूँ हाथी और घोड़ों से न भिड़ाओ तुम,
मैं तो शतरंज का खिलाड़ी हूँ दोस्त,
मुझे सांप सीढ़ी में न उलझाओ तुम।।
राही (अंजाना)
जब तुमने मिलना छोड़ दिया,
दिल ने धकड़ना छोड़ दिया,
राह फ़िज़ाओं ने बदली
पुष्पों ने खिलना छोड़ दिया,
बहक उठा मन का पंछी
कदमों ने लहकना छोड़ दिया,
जब से रुस्वा हुई मन्ज़िंल
“राही” ने मचलना छोड़ दिया।।
राही (अंजाना)
तेरे घर की गलियों में हम अक्सर भटका करते थे,
तेरी नज़रों से छिपकर हम तुझको घूरा करते थे,
साँझ सवेरे जब भी तू तितली बन मंडराती थी,
रात अँधेरे जुगनू बन हम तुझको ढूंढा करते थे,
एक तुम तकिये पर सर रख के चैन से सोया करती थी,
एक हम तुमसे मिलने को ख़्वाबों में जागा करते थे।।
राही (अंजाना)
लड़ते लड़ते ज़माने की रीतिरिवाजों से थक गया हूँ,
मगर कमाल ये ही की मैं अब भी किताब पढ़ता हूँ।।
राही (अंजाना)
सोंचता हूँ अपनी एक नई दुनियाँ बना लूँ,
जिसमे अपनी ही मनचाही तस्वीरें लगा लूँ,
खुशियों के बिस्तर बिछा लूँ और दुखों को अपने घर का रस्ता भुला दूँ,
सूरज चँदा को अपनी छत पर लटकाकर,
जब चाहे बादलों से कहूँ और वर्षा करा लूँ,
इंद्रधनुष को बोल के सारे रंग निकलवाकर,
अपने दिल ओ दिवार पर सारे रंग करा लूँ,
चिड़ियों को कहूँ के वो हर दिन गाना सुनाएँ,
और अपनी आँखों पर रातों की चादर उढ़ा लूँ।।
राही (अंजाना)
न दिन खरीद पाओगे न रात बेच पाओगे,
इन हाथों में न तुम अपने हालात बेच पाओगे,
खरीदने की चाहत जो तुम दिल में सजाये हो,
इन आँखों से तुम न ये ख्वाब बेच पाओगे,
खरीद लो सरे बाजार तुम मेरी यादें मगर,
मेरे दिल में बसी तुम न ये तस्वीर बेच पाओगे।।
राही (अंजाना)
अपनी मोहब्बत की इन्तहा तुम्हें क्या बताऊँ,
गर हवा भी तुम्हें छूकर गुजरे तो शोले भड़कते हैं।।
राही (अनजाना)

आँखों की पहुंच से बाहर देखना होगा,
एक बार तो समन्दर पार देखना होगा,
मेरे आईने में वो मुझे नज़र नहीं आती,
उसके आईने में मुझे यार देखना होगा,
राही (अंजाना)
छोटी सी ख़ता पे दोस्ती तोड़ दे,
रिश्तों के समन्दर का जो मुँख मोड़ दे,
उम्मीदों पर टिकी हुई दुनियाँ छोड़ दे,
वो सम्बन्ध ही क्या जो बन्धन छोड़ दे।।
RAAHI
कल्पनाओं की कलम से जो चित्र बनाये वो कवि,
खामोश आवाजों को सुन कर जो अल्फ़ाज़ बनाये वो कवि,
समन्दर को बाहों में समेट कर जो दिखाए वो कवि,
कलम को शमशीर से भी तेज चलाये वो कवि,
हर मौसम के मन-भाव जो पढ़ जाए वो कवि,
जो किसी भेद भाव में न उलझ पाये वो कवि,
फांसलो को एक पल में जो मिटाये वो कवि,
धरती को चाँद पर जो ले जाए वो कवि,
सरहद के आर पार देखती हैं नज़रें उसकी,
ज़िगर के आर पार देखती हैं नज़रें उसकी,
खामोश दिखती हैं मगर बहुत बोलती हैं नज़रें उसकी,
दिल में मोहब्बत का रंग घोलती हैं नज़रें उसकी।।
राही (अंजाना)
वो न दिन देखती है न रात देखती है,
वो बस एक मुझसे मिलने की बाट देखती है।।
राही (अंजाना)
सौ लाख झूठी कसमें खाकर भी वो मुझसे प्यार को कुबुलने को तैयार नही हुआ।।
राही (अंजाना)
कोई पानी पीकर अपने तन को जेसे तैसे भर लेता है,
और मन को देखो खुद ब खुद ही ये अपने घर को भर लेता है।।
कलम की स्याही से शब्दों के औजार बनाकर,
कल्पनाओं के चित्रों को मैने सरेआम ठोक दिया।।
राही (अंजाना)
मैं ही हल हूँ उस उलझे सवाल का,
जिसे किसीने अब तक पूछा नहीं।।
राही (अंजाना)
एक नज़र उसे देखने के बाद उस रोज़ से,
मेरी आँखों को और कोई चेहरा नहीं दिखता।।
राही (अंजाना)
रूठी हुई मोहब्बत को मनाते मनाते,
हम उन्हीं के चेहरे के दीवाने हो गए।।
राही
Harshit Shukla
रूठी हुई मोहब्बत को मनाते मनाते,
हम उन्हीं के चेहरे के दीवाने हो गए।।
राही
लोग जबसे खामोशी को मेरी कमजोरी समझने लगे,
राही उसी दिन से बहुत ज्यादा बोलने लगा ।।
राही (अंजाना)
जब दुनियाँ की भीड़ में मुझे कोई सुनने वाला न था,
उसने मेरे दिल पर हाथ रखा और सब समझ गई।।
राही (अंजाना)
शोर तो बहुत था मेरे चारों तरफ सफर में,
मगर मुझे सिर्फ उसकी खामोशी सुनाई दी।।
राही (अंजाना)
हम दिए जलाते हैं रौशनी ही करेंगे,
अब कागज़ हो या यादें दिल में राख ही बनेंगे।।
राही (अंजाना)
नुमाइश मेरी बरबादी का लगाकर,
वो मुस्कराहट सरे बाजार बेचता है।।
राही (अंजाना)
जब किसी ने न देखा पलटकर मुझको,
तब आइना भी मुझे देखकर मेरे साथ रोया,
जब सूख गया मेरे दिल का हर एक कोना,
तब समन्दर भी मेरे बिस्तर पर साथ सोया।
राही (अंजाना)
बस चन्द पन्ने पलते और किताब छूट गई,
मोहब्बत के विषय पर हमारी पकड़ बहुत थी।।
राही (अंजाना)
बहुत कुछ कहते हैं मगर सामने नहीं आते,
कुछ लोग अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते।।
राही (अंजाना)
जो प्रश्न उसने कभी पूछा ही नहीं,
उसके जवाब में रात दिन उलझा हूँ।।
राही (अंजाना)
जहाँ भी रहे नज़र आती है,
वो हवाओं सी मुझे सुहाती है,
हाथ आये न आये वो मेरे,
वो तितली अपनी ओर बुलाती है।।
राही (अंजाना)
बन्द आँखों में भी नज़र आने लगा है,
एक चेहरा मुझे इस तरह सताने लगा है।।
राही (अंजाना)
हर्षित मन फुलवारी में सुंदर फूल अनोखा देखा,
मैने जंगल में हिरण एक अद्भुत रंग सलोना देखा,
जब भी सोया स्वप्नों में मैंने ख़्वाब सुनहरा देखा,
सावन के व्यक्तित्व को मैने सबके मनको मोहता देखा।।
Raahi
वक्त कैसा भी हो हाथ से छूट ही जाता है,
रिश्तों के समन्दर में यहाँ
हर कोई डूब ही जाता है,
चोंच में दाने खिलाता है जो पंछी,
एक दिन तनहा छोड़ ही जाता है।।
राही अंजाना
जमाने में लोगों की जब से भीड़ जमने लगी,
लोगों के बीच अपनेपन की कमी खलने लगी,
बन तो गए हर दो कदम पर मकाँ चार दीवारों के,
मगर जहाँ देखूं मुझे घरों की कमी खलने लगी।।
राही (अंजान)
वो देखते ही नहीं आईना पलटकर यारों,
गर आईने में चित्र की जगह चरित्र उनके दिखाई देते,
और होता ही नहीं जो सामना शमशीर ऐ नज़र से उनकी,
तो जिंदगी के सफ़र में ‘राही’ हम बेमाने दिखाई देते।।
राही (अंजाना)
वो देखते ही नहीं आईना पलटकर यारों,
गर आईने में चित्र की जगह चरित्र उनके दिखाई देते,
और होता ही नहीं जो सामना शमशीर ऐ नज़र से उनकी,
तो जिंदगी के सफ़र में ‘राही’ हम बेमाने दिखाई देते।।
राही (अंजाना)
वो देखते ही नहीं आईना पलटकर यारों,
गर आईने में चित्र की जगह चरित्र उनके दिखाई देते,
और होता ही नहीं जो सामना शमशीर ऐ नज़र से उनकी,
तो जिंदगी के सफ़र में ‘राही’ हम बेमाने दिखाई देते।।
राही (अंजाना)
कुछ इस कदर के दुआएं बेअसर हो गई,
के सारे मर्ज़ों की दवाएं मेरे ही सर हो गई,
इलाज मिला मगर कहीं कुछ कसर हो गई,
जिंदगी इससे पहले ही मोहब्बत की नज़र हो गई।।
राही (अंजाना)
आइना देखने से ज्यादा दिखाने में लगा है,
यहाँ हर कोई अपना चेहरा छिपाने में लगा है,
खुद गुनाहों के समन्दर में डूबा हो मगर,
हर कोई एक दूसरे पे ऊँगली उठाने में लगा है,
झुका ही नहीं जो सर किसी भी दर पर कभी,
आज वही हाथ जोड़ कर सबको मनाने में लगा है।।
राही (अंजाना)
हवाओं के रुख से आहट पहचान ले कोई,
ऊँगली जो उठे तो मुट्ठी बाँध ले कोई,
कोई करे अनदेखी और बिन कहे सब जान ले कोई,
साफ़ नज़र आता है क्यों न इसे मोहब्बत मान ले कोई।।
राही (अंजाना)
पकड़ कर ऊँगली जो समन्दर पार कराता है,
बहके गर जो कश्ती तो साहिल यार दिलाता है,
भुलाकर शरारत जो मुझे अपने सर पर उठाता है,
मैं जो रूठूँ तो मुझे वो हर बार मनाता है,
ख़ुशियों की बारिश हो या गमों की धूप,
बस एक वही मेरे सर पर छाया बनाता है,
यूँ तो रिश्ते बहुत हैं जो साथ रहते हैं मेरे,
मगर बस पापा रूपी पर्वत ही मेरा हौंसला बंधाता है।।
राही (अंजाना)

बेगुनाह को किस गुनाह की सज़ा सुनाई गई,
सारी कायनात में क्यों ये खबर फैलाई गई,
जुर्म किया ही नहीं जिस मालिक ने उसको,
क्यों भरी अदालत में गीता की कसम खिलाई गई।।
राही (अंजाना)

स्वप्न तेरे साथ ज़िन्दगी का देखकर,
सदियाँ बीत गई ‘राही’ की सोते सोते।।
राही (अंजाना)
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