पैदा कर मोहे माँ मेरी ने दुनियाँ देयी दिखाई, मैं मूरख मुझको माँ की न ममता समझि में आई, दूर सफर में चलत मोहे जब कछु न दिया दिखाई, तब बचपन की एक शाम अनोखी […]

पैदा कर मोहे माँ मेरी ने दुनियाँ देयी दिखाई, मैं मूरख मुझको माँ की न ममता समझि में आई, दूर सफर में चलत मोहे जब कछु न दिया दिखाई, तब बचपन की एक शाम अनोखी […]

कुर्सी की चाहत बचपन ऐ दिल में सजाये बैठे हैं, शतरंज के सारे मोहरे अपनी मुट्ठी में दबाये बैठे हैं, इरादे किसी शीशे से साफ़ नज़र आते हैं के हम, ख़्वाबों की एक लम्बी फहरिस्त […]

इतनी खुद्दारी थी मुझमें के भिखारी हो गया, हर रिश्ता जैसे मुझपर ही भारी हो गया, संबंधों की सारी फहरिस्त झूठी निकली, एक जानवर जब मेरे जीवन की सवारी हो गया॥ राही (अंजाना)

पन्ने ज़िन्दगी की किताब में जोड़ने पड़ते हैं, अपने हिस्से के किस्से खुद ही लिखने पड़ते हैं, छोड़कर कई बार रास्तों को सफर में, हाथ किताबों से मिलाकर दोस्त छोड़ने पड़ते हैं।। राही (अंजाना)

खेल खेलने को बहुत कुछ जुटाते हैं हम, कुछ न कुछ सोंच के कुछ तो बनाते हैं हम, जिंदगी के सागर में नसीब पानी नहीं हमें, तो मजबूर होके कचरे की नाव चलाते हैं हम।। […]

बिन निज भाषा के ज्ञान के बजे ना कोई बीन, अंग्रेजी जो भी पढ़े होवे हिय से हीन, संस्कारों की खेती अब न कर पाये कोई दीन, हिन्दी को अपनी कोई ले न हमसे छीन।। […]

मैं तुमको अपना मित्र बना लूँ क्या? मैं तुमको अपने दिल की हर बात बता दूँ क्या? कोई तो इशारा कर दो एक बार, मैं तुम्हें अपने दिल में बसा लूँ क्या? राही (अंजाना)

जो कभी किया ही नहीं वो वादा याद आया, मुझको तेरी गली से निकला तो वो इरादा याद आया, न मन्दिर न मस्ज़िद थी राह में मेरे कोई, फिर सर झुका तो तेरा चेहरा याद […]

यूँ तो हर एक नज़र को किसी का इंतज़ार है, किसे दिख जाये मन्ज़िल और कौन भटक जाए, कहना कुछ भी यहाँ दुशवार है, एक ही नज़र है फिर भीे पड़े हैं पर्दे हजार आँखों […]

चाँद से चांदनी और तारों से उनके घर का पता पूछते हैं, चलो एक बार फिर से उनके इंकार की वजह पूछते हैं, दिल लगाया ही था तो मुकर क्यों गए, आओ उनसे मिलकर उनके […]

कचरे की गठरी लेकर मुझको चलना पड़ता है, हर कदम पर मुझको बहुत सम्भलना पड़ता है, पैरों पर चुभते कंकड़ भी मुझको रोक नहीं पाते, जब रोटी की खातिर घर से मुझको निकलना पड़ता है, […]

कदम दूसरों के लड़खड़ाकर खुद की अकड़ कायम रखती है, ये वो शराब की बोतल है जो अपना रुतबा कायम रखती है, भुला देती है खून के रिश्ते जितने हों गहरे सारे, पर ये बोतल […]

पैरों की अपने वो झुर्रियां छुपा लेता है, चेहरे पर झूठी वो हंसी सजा लेता है, बनाने को किस्मत की लकीरें बच्चों की, पिता हाथों की अपने लकीरें मिटा लेता है।। राही (अंजाना)

अदब से झुकने की कला भूल गए, मेरे शहर के लोग अपना गुनाह भूल गए, भटकते नहीं थे रास्ता कभी जो अपना, आज अपने ही घर का पता भूल गए, महज़ चन्द पैसों की चमक […]

चलो मिलकर एक नया मुल्क बनाते हैं, जहाँ सरहद की हर दिवार मिटाते हैं, छोड़ कर मन्दिर मस्ज़िद के झगड़े, हरा और भगवा रंग मिलाते हैं, चलो मिलकर एक….. जिस तरह मिल जाते हैं परिंदे […]

वो ऊपर बैठ कर ही सारे हिसाब लिख देता है, इस ज़मी पर हम सबकी किताब लिख देता है, आता नहीं उतर कर कभी चेहरा अपना दिखाने, अंतर्मन के हमें पर वो सारे जवाब लिख […]

तुम जहां भी रहोगी निहारा करूँगा, तुम्हे ख्वाबों में अपने पुकारा करूँगा, दिखेंगी नहीं जब मुझे आँखे तुम्हारी, तुम्हें आईने में अपने उतारा करूँगा।। राही (अंजाना)