ये दो मज़हब की लड़ाई नहीं है दोस्त, यहाँ प्यार की शमशीर पर दो जानें लगी हैं।। राही (अंजाना)
छोड़कर मेरे घर को जब जाने लगा बादल, मुझसे मुँह मोड़ कर जब जाने लगा बादल, रोका पर बारिश के संग वयस्त लगा बादल, शायद धरती से मेरे गांव की रुष्ट लगा बादल, जब देखकर […]
शैलेन्द्र जीवन से एक दिन शिला खण्ड जब टकराया, पिता की छाया हटी तो जैसे संकट मुझपर गहराया, संस्कारों का दम्ब था मुझमें सब धीरे-धीरे ठहराया, मेरे कन्धों पर परिवार का जिम्मा जैसे बढ़ आया, […]
वो कागज़ की कश्ती वो लहरों की हस्ती, वो छोटी सी बस्ती में हम बच्चों की मस्ती, वो कहाँ खो गई है मैं ये सोंचता हूँ, वो कहाँ सो गई है मैं ये सोंचता हूँ, […]
बहुत ही हल्की हो गई हैं पलकें मेरी, अरसों बाद कोई उतरा है मेरी पलकों से आज।। राही (अंजाना)
वक्त कैसा भी हो हाथ से छूट ही जाता है, रिश्तों के समन्दर में यहाँ हर कोई डूब ही जाता है, चोंच में दाने खिलाता है जो पंछी, एक दिन तनहा छोड़ ही जाता है।। […]
उस बेगुनाह ने बस सरल रस्ते बनाये थे, एक दूजे से जोड़ने को कुछ रिश्ते बनाये थे, सरदार खुद बन बैठे गुनाह ऐ अज़ीम करके, जिस इंसान के उस मालिक ने साँचे बनाये थे।। राही […]
खेल खेलना सीख लो तो हर खेल अच्छा लगेगा, ज़िन्दगी की इस बिसात पर हर मोहरा सच्चा लगेगा, मोहब्बत तो रंग है चढ़ा के देख लो एक बार, इसके बाद कोई और रंग तुम्हें पक्का […]
बिन निज भाषा के ज्ञान के बजे ना कोई बीन, अंग्रेजी जो भी पढ़े होवे हिय से हीन, संस्कारों की खेती अब न कर पाये कोई दीन, हिन्दी को अपनी कोई ले न हमसे छीन।। […]
शब्दों का क्या है इनकी तो कोठरी बहुत बड़ी है, तेरी खामोशी भी पर्याप्त है इनके कद के आगे।। राही (अंजाना)
एक छोटी सी शीशी में गिरतार हो गई, भला कैसे ये जिंदगी शर्मोसार हो गई, यूँ तड़पी बेहद फिर तार-तार हो गई, बेरुखी दुनियाँ भी तो बार-बार हो गई, क्यों छिपती-छिपाती मेरी लाज एक दिन, […]
सृष्टि के नियनों को बदला नहीं करते, रात हो तो उसे दिन कहा नहीं करते, फूलों की चाहत में वृक्ष बोया नहीं करते, जिंदगी के सच से हम मुकरा नहीं करते।। राही (अंजाना)
अंकुर विस्तार पाकर व्रक्ष रूप धर लेता है, जिंदगी का ये पौधा कभी विश्राम नहीं लेता है, सिकुड़ जाते हैं रिश्ते तो सिकुड़ जाने दो इन्हें, जिंदगी जिंदगी है मान लो इसे कोई थाम नहीं […]
पकड़ न सही पर साथ चल सकते हैं, हम वक्त के पहिये के आस पास चल सकते हैं।। राही (अंजाना)
ज़िन्दगी एक रेस है जिसमे दौड़ना ही होगा, वक्त रहते वक्त का मुँह मोड़ना ही होगा, कालचक्र का काम है चलना, चलेगा दोस्तों, हमें अपने मन को एक बार फिर टटोलना ही होगा, ऋतुएँ परिवर्तित […]
सिफ़त माँ के मेरे बड़े साफ़ नज़र आते हैं, तामील दिलाने को मुझे जब वो खुद को भूल जाती है, पहनाती है तन पर मेरे जिस पल कपड़े मुझे, वो सर से खिसकता हुआ अपना […]
हर कदम पर साथ निभाते हो, तुम मुझको बहुत सताते हो, पर जैसे भी हो सच कहती हूँ, तुम बस मेरे मन को भाते हो, छोटी छोटी बातों पर तुम, मुझको टोका करते हो, सही […]
तोड़ कर हर ज़ंज़ीर तूने हौंसला दिखाया है, जो बुत बन चुके थे उन्हें भी तूने बोलना सिखाया है, जुदा रही तू जैसे चाँद की चांदनी से सदियों, फिर बखूबी तूने सबको अपना रूतबा दिखाया […]
शर्तिया ऐसा कोई बन्धन नहीं था जो मुझे बाँध पाता, मगर तेरी जुल्फों से मैं अपनी ये शर्त हार गया।। राही (अंजाना)
शब्दों की दुनियाँ का कोई साहिर मिले तो बताना, किसी राह में मिल जाए गर वो ताहिर तो बताना।। राही (अंजाना)
गर दिल नहीं होता तो ये दरार कहाँ होती, मेरे जिस्म और रूह के बीच दीवार कहाँ होती।।। राही (अंजाना)
बहुत कम वक्त लगा मुझे मकाँ मेरा बनाने में, मगर एक मुद्दत लगी मुझे उसे घर बनाने में।। राही (अंजाना)
किनारे पर बैठे बैठे हम कैसे दरिया में डूब रहे हैं, न जाने इतना गहरा दरिया हम कैसे देख रहे हैं, आरक्षण का पानी पीकर देखो कैसे फूल रहे हैं, कैसे एकतरफा सिस्टम से हम […]
बड़े दिनों के बाद बेचारी आँखों ने, स्वप्नों भरी एक रात गुजारी आँखों ने, बेचैनी भरपूर दिखाई आँखों ने, जिस पल उनसे नज़र मिलाई आँखे ने, कल्पनाओं की कलम चलाई आँखों ने, हर दिन नई […]
बेशक खुशबू से भरा होगा मेरे दोस्त तेरा सनम, मगर मुझे तो माँ का मैला आँचल ही सुहाता है।। – राही (अंजाना)
जब किसी ने ना देखा एक नज़र मुझे पलटकर, तब आइना भी रो दिया मेरा चेहरा देखकर।। – राही (अंजाना)
खामोश तस्वीरों की जैसे कोई आवाज बन गया हूँ, अनजाने में ही जैसे उनके अल्फ़ाज़ बन गया हूँ, जो कह नहीं पाती वो अपनी आँखों से खुलकर, मैं उनके कबीले का कोई सरदार बन गया […]
रेत हाथों से यूँ ही न सरक पाएगा, गर उँगलियों में दूरी रखोगे नहीं, रंग चेहरे का फीका न हो पायेगा, गर रिश्तों में किस्से रखोगे नहीं, अब कुछ नहीं इन आँखों से हो पायेगा, […]
माँ के दिल और पिता के दिमाग से परखा जाएगा, ये बचपन का पौधा बड़े हिसाब से ख़र्चा जाएगा, मेहनत लगी है गहन किसकी परवरिश में कितनी, दो एक रोज़ में सरेआम इसका चर्चा हो […]
पत्थरों को भी खड़े होने का सलीका सिखाने में, कितना काबिल दिखता है वो पिरामिड बनाने में, सन्तुलन कोई रखता नहीं दो रिश्ते निभाने में, बेहद तस्सली सुझाता है वो शिलाओं को सिखाने में, सहज […]
सिखाता कोई नहीं बस सीखना पड़ता है, अपने रिश्तों को खुद ही सूझना पड़ता है, दिल की जितनी ही पहरेदारी की जाती है, उसको उतनी ही बिमारी से जूझना पड़ता है।। राही (अंजाना)
जब दिल नहीं कोई आत्मा दुखाने लगे, आँखों में ठहरा वो पानी छलकाने लगे, स्वप्नो की बनाई दुनियाँ को भुलाने लगे, अपने ही रिश्ते का दीपक बुझाने लगे, चेहरे से झलकते भावों से नज़र चुराने […]
मेरे जिस्म से हर रोज़ मेरे वस्त्र उतारे जाते हैं, दरख्त काटकर पंछियों के घर उजाड़े जाते हैं, साँसे हैं मेरी ही बदौलत यहाँ जिनके जीवन की, उन्हीं हाथों से अक्सर मेरे वजूद उखाड़े जाते […]
जाने अनजाने रिश्तों के मध्य खड़ा नज़र मैं आता हूँ, मैं मतलब हूँ बेमतलब लोगों के साथ कभी जुड़ जाता हूँ, कभी मैं आता काम बड़े कभी किसी मोल न भाता हूँ, थाली के बैगन […]
होंठो पर झूठी हंसी और आँखों में नमी लिए बैठी थी, वो अंदर से हजार बार टूटकर भी बाहर से जुडी बैठी थी।। राही (अंजाना)
स्वप्नों के तराजू पर वजन मेरी जिम्मेदारी का ज्यादा निकला, मेहनत के कागज़ों पर नोटों का रंग थोड़ा ज्यादा निकला, बहुत बहाया पसीना दो रोटी कमाने की खातिर मैंने, मगर मेरे वजूद से मेरी कमर […]
सारी यादें बन्द दरवाज़े के पीछे कैद कर रहा हूँ, हर एक निशानी को मैं कैसे सुफैद कर रहा हूँ, कोई आंकलन ही नहीं मुझे इस सनक का मेरी, क्यों सांकल लगा कर मैं खुद […]
तेरे रवैये पे तू इतराया ना कर, ऐ दोस्त तू चेहरे को अपने यूँ बनाया ना कर, तू झूठ पर पर्दा उढ़ाया ना कर, यूँ सच को आईना दिखाया ना कर, तेरे रवैये पे तू […]
अब डूबने के डर से बेखौफ हो गया हूँ मैं, लहरों से सीख़ आया हूँ वापस लौट के आने का हुनर।। – राही (अंजाना)
पेट भरने को कितनी जद्दोजहद दिखाता है, जब कोई बच्चा सड़कों पर खेल दिखाता है, चोट दिल पे लगे और जिस्म को झुकाता है, क्यों पैसों की खातिर यूँ मासूम जज़्बा दिखाता है।। राही (अंजाना)
जब देख ही लिया उनके चेहरे को जी भर के, तो अब किसी तस्वीर को आढ़ा देख कर क्या होगा, बदल ही गया जब वक्त के साथ रुख उनका, तो अब किसी रिश्ते का रंग […]
एहसासों की एक चादर को रोज़ बिछाया करता हूँ, अपने दिल के टुकड़ों को उसपे रोज़ सजाया करता हूँ, बहुत अन्धेरा लगता है जब कभी मुझे अंतर्मन में, मैं उसकी एक तस्वीर मात्र को देख […]
बात करते हैं मगर चेहरा छिपा लेते हैं लोग, अक्सर खुद पर ही पेहरा लगा लेते हैं लोग, आते क्यों नहीं भला खुल के सामने सबके, जो दर्द भी दूजे के अपना बना लेते हैं […]
भला मौन रहकर भी कैसे कोई गहरे तीर चला लेता है, छोटी-छोटी बातों से ही मन की तस्वीर बना लेता है, लगे चोट अपनों से तो खुद को ही समझा लेता है, चेहरे पर झूठा […]
अब कोई तो बादल ही ढूंढ ले मुझको, बारिश ए बून्द ही सही चूम ले मुझको, एक अरसे से सूखी हैं ये आँखे मेरी, कोई हवा का झोंका ही सूंघ ले मुझको।। राही (अंजाना)
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