नदी के दो किनारों पर मेरी नज़र टिकी थी, एक छोर पे मैं और दूजे छोर वो खड़ी थी, समन्दर था लहरें थीं कश्ती थी सामने, इन सब के मध्य भी मेरी मोहब्बत डटी थी।। […]
नदी के दो किनारों पर मेरी नज़र टिकी थी, एक छोर पे मैं और दूजे छोर वो खड़ी थी, समन्दर था लहरें थीं कश्ती थी सामने, इन सब के मध्य भी मेरी मोहब्बत डटी थी।। […]
जितना पास बुलाया वो उतना दूर होता गया, रात का अन्धेरा रौशनी में चूर होता गया, खुदा की बनाई इस मशहूर दुनियाँ में, इंसा खुद इंसा के हाथों ही मजबूर होता गया।। राही (अंजाना)
आजाद भारत के आजाद परिंदे न रहे, हम अपने ही देश के बाशिंदे न रहे।। राही (अंजाना)
हर रोज़ मेरी इज़्ज़त को तार-तार किया जाता है, ये गुनाह मेरे साथ क्यों बार-बार किया जाता है।। राही (अंजाना)
मुझे मरे गुनाहों की कोई सफाई नहीं देनी, मुझे तुम्हारी मोहब्बत में उम्र कैद मंजूर है।। राही (अंजाना)
बहुत तरक्की कर ली मेरे गांव ने मगर, मेरी गरीबी का बादल छटा ही नहीं।। राही (अंजाना)
कोई माहौल कोई मौसम नहीं देखता, जब प्यार सच्चा हो तो कोई पर्दा नहीं देखता।। राही (अंजाना)
तेरी यादों के आँगन में मेरा मन खिल जाये, जैसे खुली हवा में कोई पंछी मण्डराये, तेरी समृति की छवियों का जब लगे मेला, मेरा शांत उम्मीदों का फिर मन भर जाए।। राही (अंजाना)
तसल्ली है के तुम मुझे याद नहीं करती, मेरी तस्वीर को रखकर उससे प्यार नहीं करती।। राही (अंजाना)
टूटकर बिखर जाने को तैयार रहती है, गर कच्ची हो चिनाई तो दीवारों में दरार रहती है, इस ज़मी पर आकर मुम्किन है मोहब्बत की गिरफ्त में आना, नहीं तो सारी ज़िन्दगी यूँही ख़ाकसार रहती […]
जब जी चाहे बुला लेता हूँ, मैं तेरी यादों को अपना बना लेता हूँ, पहुंचता नहीं जब कोई पैगाम मेरा तुझतक, मैं हवाओं को फिर अपना गुलाम बना लेता हूँ।। राही (अंजाना)
किस्मत को अपनी तू कस मत, देदे ढील तू अपने अरमानों को, सोते हैं तो सो जाएँ किस्मत जगाने वाले, जागने दे तू हर घड़ी अपने ख़्वाबों को, किस्मत को अपनी… बदलती नहीं है हाथों […]
आओ किताबों के पन्नों से बाहर निकल चलते हैं, काले अक्षरों से निकल रौशनी की ओर चलते हैं, बहुत पढ़ लिए विषय इन किताबों के, आओ हकीकत के दो पन्ने पलट कर देखते हैं।। राही […]
गमों के आसमान का तू परिंदा क्यों है, झूठी उम्मीदों की ज़मी पर तू ज़िंदा क्यों है, सिकोडे हैं हौंसलों के तू क्यों पर अपनें, उम्मीदों पर न टिके तू वो वाशिंदा क्यों है।। राही […]
जब रात स्वप्न में मैं सोया था, एक गहरे समन्दर में खोया था, दूर दूर तक सच कुछ नहीं था, मैं एक झूठी दुनियाँ में रोया था, राही (अंजाना)
उसका मुख देखना जारी रहा, मेरा प्यार उस पर भारी रहा। राही (अंजाना)
गमों के आसमान का तू परिंदा क्यों है, झूठी उम्मीदों की ज़मी पर तू ज़िंदा क्यों है, सिकोडे हैं हौंसलों के तू क्यों पर अपनें, उम्मीदों पर न टिके तू वो वाशिंदा क्यों है।। राही […]
उस पल को तो आना ही था, तुझको विदा हो जाना ही था, ये रीती रिवाजों की ज़ंज़ीर थी, जिसमे तुझे बन्ध जाना ही था, बेटी रही तू मेरी जान से प्यारी, तुझको बहु बन […]
अपने ग़म और खुशियों के बीच दूरी रखता हूँ, मैं राही अंजाना मगर सबकी ख़बर रखता हूँ।। राही (अंजाना)
तैरने निकला था समन्दर ने मुझको सहसा डरा दिया, फिर लहरों ने ही कश्ती को मेरी साहिल दिला दिया।। राही (अंजाना)
आओ किताबों के पन्नों से बाहर निकल चलते हैं, काले अक्षरों से निकल रौशनी की ओर चलते हैं, बहुत पढ़ लिए विषय इन किताबों के, आओ हकीकत के दो पन्ने पलट कर देखते हैं।। राही […]
मेरी खुशियों और गमों का भी हिसाब रखते हैं, न जाने क्यों लोग मुझसे इतना प्यार करते हैं।। राही (अंजाना)
हक मेरे भगवान पर सारे बाशिंदों का है, किसी एक के घर का वो पहरेदार नहीं।। राही (अंजाना)
अब घर में बिजली का मेरे बिल नहीं आता, तेरे प्यार की रौशनी में हर कोना घूम लेता हूँ।। राही (अंजाना)
सारे आईने अपने घर से बाहर निकाल फैंके, तुम्हारी आँखों में ही जब चेहरा अपना देख लिया।। राही (अनजाना)
जब से तेरे प्यार के मौसम की चपेट में आया है, राही पर किसी मौसम का कोई असर नहीं होता।। राही (अंजाना)
अच्छा बनने के लिए अच्छे लिबास पहन लूँ, ये कौन सा पैमाना है मेरी पहचान का। राही (अंजाना)
लौट कर आते ही नहीं जाने वाले इस डर से, लोगों को रुखसत करना ही छोड़ दिया मैने।। राही (अंजाना)
ज़िन्दगी एक अनसुलझी पहेली सी नज़र आती है, कभी किसी कि सगी तो कभी सौतेली सी नज़र आती है, रूठना रूठ कर मान जान जाना इंसानों की फितरत होगी, पर ज़िन्दगी गर रूठ जाए तो […]
खुशियों की दुकाने भरने की खातिर, दर्द की तस्वीरें खरीदी जाती हैं, खुद की तारीफों के पन्ने भरने को, क्यों सरेआम न्यूज़ बटोरी जाती हैं।। राही (अंजाना)
ओस की बूंदों सी वो मुझको नज़र आती है, जब छूने चलों उसको तो वो झट से छटक जाती है, पेड़ पौधों पर हक ऐ प्यार जताती है मगर, मेरी मौजूदगी सी भी जैसे दुश्मनी […]
हर एक काम में हुनर अपना दिखाती है, हर मुश्किल से जैसे लड़ना सिखाती है, जल्द ही गिरकर उठते नहीं हम लोग, वो हर बार बढ़कर हौंसला बढ़ाती है, खुली आँखों जिसे ठोकर मारते हैं […]
वो मेरे घर में मेरे साथ नहीं रहती, वो मेरी होकर भी मेरे पास नहीं रहती, वो है मगर दूर मुझसे रहती है, वो दिल है तो धड़कन मेरी साथ नहीं रहती।। राही (अंजाना)
जख्म हो तो मरहम लगाना ही पड़ता है, दिल में कुछ तो छुपाना ही पड़ता है, बोल दो हर बात ज़ुबा से जरुरी तो नहीं, कभी खामोश भी तो हमें ही हो जाना पड़ता है।। […]
दिल लेकर भी जब मेरा चैन नहीं आया उन्हें, उन्होंने मेरे ख्वाबों को भी अपने नाम कर लिया।। राही (अंजाना)
मोहब्बत ऐ इम्तेहान की इंतहा तो तब हुई, जब दिन में भी उसके ख्वाबों से बाहर न आ सके हम।। राही (अंजाना)
मुझे कुछ भी कहने की ज़हमत नहीं होती, वो खुद ब खुद मेरी आँखों से छलक जाती है।। राही (अंजाना)
खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालोन को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना)
खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालो को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना)
घड़ी की मरम्मत तो करा लूं मगर, अपने समय को ठीक कराऊँ कैसे।। राही (अंजाना)
छोटी छोटी बातों से ही बन्धन से बन्ध जाते हैं, हम अपनों से भी जादा अक्सर दूजों से जुड़ जाते हैं, कुछ कहना हो तो खुलकर हम अपने मन की कह जाते हैं, कुछ रिश्तों […]
यादों की पोटली तेरी खोल के न देखूंगा, आँखों की कोठरी मैं खोल के न देखूंगा, तू जब समझी नहीं मेरी ज़ुबानी ये कहानी, तो अब खामोशी के एहसासों की कोई टोकरी न देखूंगा।। राही […]
जात-पात के बन्धन में एक पुतला बनकर इतराता है, क्यों छोटी छोटी बातों पर ही तू अपनों को ठुकराता है, एक माँ की सन्तान है पर क्यों अलग-थलग मंडराता है, अपने ही घर में तू […]
हुनर तुम्हारे तुम पर ही आजमाए गए, तुम जुल्मी बस हमारे ही कहाये गए।। Rahi
यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी, तो मैं भी क्यूँ दिखाऊं खुलकर उनको खूबियां मेरी, अभी सीख रहा हूँ तैरना तो हंसी बनाने दो मेरी, जब डूब कर समन्दर से निकल आऊंगा तो […]
ढह गए कितने ही ईमान ऐ मकाँ एक बोतल की चाहत में, मगर बोतल ने बिक कर भी अपना ज़मीर नहीं छोड़ा।। – राही (अंजाना)
बनाकर बातों से बातें, यहां बातें निकलती हैं, यूँ ही, ज़िन्दगी के सफर की रातें निकलती हैं, के जिंदा है जो ग़र कोई, तो अपनी वो ज़ुबाँ खोले, यहाँ बेजुबानों की जुबाँ से भी खुराफातें […]
बनाकर बातों से बातें, यहां बातें निकलती हैं, यूँ ही, ज़िन्दगी के सफर की रातें निकलती हैं, के जिंदा है जो ग़र कोई, तो अपनी वो ज़ुबाँ खोले, यहाँ बेजुबानों की जुबाँ से भी खुराफातें […]
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