सालो पहले मेने लगाया एक पौधा
निश्चिंत होकर सालो से रहा मै सोता
फिरसे देखने उसे
साथ चल दिया मेरा पोता
मिला नहीं वो मुझे कही
ना ढूंढ़ पाया मेरा पोता
प्रदूषण जो ना इतना होता
मै कभी ना खोता प्यारा पौधा
Category: मुक्तक
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पौधा
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शिकायत
रूठो ना मुझसे तुम
किस चीज की शिकायत है
रूठने से पहले
जान लो की बस
इस दिल पर तुम्हारी ही रिवायत है
प्यार की मंजिल tu
तुझसे मेरी इनायत है
रूठी हो मुझसे तुम
छोटी सी मेरी भी ये शिकायत है -
मंगलवार
बीवी ने कहा आज मंगलवार है
मन्दिर मुझे जाना है
कुछ पेसो के फूल होंगे
कुछ का गुलदाना है
मेने कहा आज की तू टाल मार
फिर से आएगा मंगलवार
उसे क्या पता मै हूँ पैसे का पुजारी
मन्दिर जाने की इच्छा
कभी पूरी ना होने दूंगा तुम्हारी -
शनिवार
घर घर आवाज लगता भिखारी
जय शनि देव.. जय शनि देव
मै तो पैसे का हूँ पुजारी
नाम मेरा राम हजारी
आज शनिवार नहीं मंगल है
चल यहाँ से भाग भिखारी. -
इतवार
पैसा बचाने के लिए
सब कुछ दिया टाल
पर खर्चा करने के लिए
सब रहते है तैयार
कितना बचाऊ हाय पैसा
पड़ गया आज ही इतवार -
साँसे
ज़िन्दगी भी कैसे साँसे तलाश करती है,
मौत की आहोश में बाहें तलाश करती है,यूँहीं बंध कर रहने वाली धकड़न मेरी,
अक्सर आहें तलाश करती है,जिस्म से मोहब्बत करने वाली रूह,
आज भी राहें तलाश करती है।।राही अंजाना
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मुक्तक
मैं कतरा कतरा बिखर जाऊं मुझे गम नहीं
मैं देश के लिए कुर्बान हो जाऊं मुझे गम नहीं
मेरी ख्वाहिश है बस इतनी मेरा साथ देना दोस्तो
मैं मर कर भी देश के लिए काम आऊ यही तमन्ना हैमहेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
लुटा मैं आज खजाना आबाद बैठी हूं
तेरे रहमों करम से मैं बर्बाद बैठी हूं
जरा सी इज्जत बची हो तो लगा लेना गले से
नहीं तो मैं जिल्लत कि ज़िन्दगी अपना बैठी हूंमहेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
बचपन लड़कपन की याद अभी वही हैं
रिस्ते में दोस्ती की मिठास अभी वही हैं
चन्द पल की ही तो दुरी हुयी हैं ऐ दोस्त
मिलेगें फिर उसी गली में महफिल जमानेमहेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
वतन की मिट्टी पर हमने पैगाम लिख दिया,
अपने वीर जवानो की पहचान लिख दिया,
जो धर्म पर बँट गये वो गद्दार निकल गये,
जो देश के लिए कुर्बान हुए जवान निकल गये,महेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
मैं साफ सुथरा कोरा पन्ना,
तुम कलम स्याही बन जाना,
बनकर मेरी प्रेम दिवानी,
तुम शब्द प्रहार से लड़ जाना,महेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
नारी शक्ती कि पहचान हो हिमा
देश कि गौरव अभिमान हो हिमा
बेटी नहीं तुम भाग्य कि लकिर हो हिमा
साहस धैर्य सुर्य कि प्रकाश हो हिमा
ये सिध्द किया हैं तुमने हिमा
बेटी बेबस लाचार नहीं हैं हिमामहेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
कुल्हड़ कि चुस्की कुछ याद दिलाती हैं,
दोस्त कि दोस्ती साथ निभाती हैं,
महक मिट्टी कि वतन पर प्यार लुटाती हैं,
चाय कि चुस्की बचपन जवानी कि कहानी सुनाती हैं,महेश गुप्ता जौनपुरी
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मुक्तक
तेरी मासुमियत का मैं हूं दिवाना
तेरे प्यार में फिरता हूं आवारा
ना समझ मुझे जाहिल निकम्मा सनम
तेरे ही प्यार से मुझे गीले हैं सितम महेश गुप्ता जौनपुरी
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आसमां
आसमां कि बुलंदी पर पैगाम भेजा है
अपने दोस्त को मैंने सलाम भेजा है
ख़त को मेरे यार को ही पकड़ना
ख़त में मैं दर्द जुदाई एहसास भेजा हैमहेश गुप्ता जौनपुरी
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उम्मीद
करोडो लोगो की उम्मीद
अभी भी अटके है प्राण
मरा नहीं अभी भी,
है उसमें जान
हमेशा हमको याद रहेगा
हमारा प्यारा मंगलयान -
वृक्ष
कुछ ऐसे ही हाल होने वाला हैं मानव तेरा ,
सांस थमेगा जब तेरा याद आयेगा मेरा ,
सिसक सिसक दम हैं मैंने तोड़ा ,
तेरी भी बारी आयेगी होने दे सवेरा ,महेश गुप्ता जौनपुरी
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majhab
जहा विधा को उम्मीद समझा जाए
यूवा को देश की नीव समझा जाए
चलो ऐसा एक मजहब बनाया जाए
जहां ईनसान को ईनसान समझा जाए -
तू गर्व कर तू नारी है
कितनी ऊँची अटल अम्बारी है
निर्मल, कोमल और सबसे न्यारी है
माँ -बाप की तू दुलारी है
तू गर्व कर तू नारी है.दुनिया समझें तू तो एक बेचारी है
हमेशा दबकर रहने की तेरी ये लाचारी है
पर वक्त पड़े तो नारी सब पर भारी है
तू गर्व कर तू नारी है.तेरा हक़ तुझे ना देगी, स्वार्थी दुनिया सारी है
लड़ने की ठान ले तो कभी नहीं तू हरी है
शत शत नमन है तुझको,
ये सृस्टि सारी तेरी ही आभारी है
तू गर्व कर तू नारी है -
नन्हा सा पेड़
एक नन्हा सा पेड़
आज ही अंकुरित हुआ
अब उसपर जिम्मेदारी
बड़ी और भारी है
सारा जीवन उसका
प्रदूषण मे कटेगा
उसकी यही अब
लाचारी है.
हवा पानी और खान पान,
पेड़ पर भी इसका प्रकोप है
फिर भी क्यों नहीं बदलता इंसान,
उठते काले धुँए जैसी उसकी सोच है.
अब तो ज़हरीली हुई हर सांस है,
जलते प्लास्टिक की हर जगह बांस है
उम्मीद बस इतना है कि पेड़ हमारे पास है,
मानवता की अब तो पेड़ ही एक आस है -
तेरी ओकात
भारत का गुणगान होगा,
तू बचाना अपनी जान,
तुझे तेरी ओका,
दिखा देंगे पाकिस्तान,
चाँद तो तेरा अब मामा नहीं,
ये ले तू जान,
क्योंकि उसपे अब,
तेरा बाप खड़ा है हिंदुस्तान. -
आऊँगा
मैं दिन नहीं रात में आऊंगा,
ख़्वाब हूँ ख़्वाब में आऊंगा,न देखो मुझे इस कदर यारों,
जो आऊंगा रुवाब में आऊंगा, -
पकड़ा गया
चाहें जहाँ भी छुपना चाहा हर बार पकड़ा गया,
रास्ता साफ दिखने वाला भी अक्सर पथरा गया,बड़े प्यार से काम पर काम निकलता रहा पहले,
फिर नज़रें मिलाने वाला भी बचकर कतरा गया।।राही अंजाना
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निकल आया
किसी के पीछे नहीं घर से अकेला निकल आया हूँ मैं,
लोग कहने लगे के डर के अकेला निकल आया हूँ मैं,वो कैसे देखेंगें दिन और रात के उजाले में मुझको यूँ,
ख़्वाब जिनके अपनी आँखों में भरके निकल आया हूँ मैं,राही अंजाना
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साज़िश
जो नज़र आया मुझे तो उस आरिश में खो जाऊंगा,
होजाये गर जो बारिश तो उस बारिश में सो जाऊंगा,लगे हैं लोग रास्ता भटकाने की फ़िराक में यारों मेरा,
लगाता है मैं खुद शामिल इस साजिश में हो जाऊंगा,राही अंजाना
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hindustan-पाकिस्तान
तेरे चाहने से पाकिस्तान
मेरी सांसे कम ना होंगी,
हिम्मत से दम भरूंगा इतना,
मेरी सांसे सरहद तक तुझे सुनाई देंगी.
सुनकर जय जय कार मेरी,
कान तूने बंद कर लिए,
सिर्फ 370 लगाकर ही मेने,
तेरे जैसे कितने ही अपनी जेब मे धर लिए.
आतंकवाद फैलाकर, गोली चलाकर
कुछ बिगड़ नहीं सकता पाकिस्तान,
सिर्फ मेरे मिराज की दहाड़ ही
कहीं मिटा ना दे तेरा नमो निशाना.
मार्स पर अब खड़ा है हिंदुस्तान,
7सितम्बर को सुन लेना मेरा गुण गान,
दुबक कर बैठ जइयो बिल मे तू,
जब चाँद पे उतरेगा दुबारा चंद्र यान. -
काम कर कोई नेक
जेब मे भरकर नोट,
और मन मे भर कर खोट,
दुसरो के लिए गढ्डा खोद,
पाप की गठड़ी कंधो पर उठा ,
चला ढूंढने बरगद की ओट.
पैसा खूब कमा लिया,
और सोचे पैसा ही दुनिया को चलाए है,
पर सच तो है की,
निर्धन और धनवान को
सिर्फ भूख -प्यास ही नचाये है.
बोझ तू अपना हल्का करके देख,
मिलेगी गर्मी मे राहत और सर्दी मे सेंक,
बैठना फिर बरगद के सहारे तू लगाके टेक,
एक बार तो काम कर कोई तो नेक. -
मुक्तक
कुल्हड़ कि चुस्की कुछ याद दिलाती हैं,
दोस्तों कि दोस्ती साथ निभाती हैं,
महक मिट्टी कि वतन पर प्यार लुटाती हैं,
चाय कि चुस्की बचपन जवानी कि कहानी सुनाती हैं, -
मुक्तक
जाति धर्म के बंटवारे में ,
इंसानियत का गला घुटता हैं ,
मन्दिर मस्जिद के चक्कर में ,
लहू लाल रंग का बहाता हैं ,महेश गुप्ता जौनपुरी
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मज़ा
यार इसमे तो मजा है ही नही
कोई हमसे खफा है ही नही
इश्क़ है मर्ज़ है मेरे यार सुनो,
इसकी कोई दवा है ही नही।। -
mera Raja beta
Mera Raja beta
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किश्तें बाकी रह गई
गलतफहमियों की कितनी और किश्तें बाकी रह गईं,
इंसानों की कितनी और देखनी किस्में बाकी रह गईं।।नज़र-नज़ारे दिल-दिमाग और जुदाई सबपे लिखा मैंने,
कहना मुश्किल है के और कितनी नज़में बाकी रह गईं।।राही अंजाना
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माहिर
जितना सुलझाती है उतना ही उलझाती है मुझको,
उधेड़कर पहले खुद सिलना सिखलाती है मुझको,खोलकर दिल को जोड़ने में माहिर बताने वाली वो,
सच को रफू कर बस झूठ ही दिखलाती है मुझको।।राही अंजाना
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वक्त से गुजारिश
उस सूखे पेड़ पर
क्या चिड़िया फिर न चहचहाएंगी
सूख गया जो शजर
वक्त की बेवक्त मार से
क्या उस शजर की डालियाँ फिर न लहराएगी
जिन्दगी बन गयी गुमसुम
और, हम गुमनाम बनकर रह गए
क्या जीवन में
खुशियों की वो घडियां, कभी लौटकर न आएंगी
आखिर क्या उदासी ही छाई रहेगी इधर
कभी खुशियाँ इधर न आएंगी।
2-वक्तकी मार से झुलसी हुई जमीं
क्या सूखे से बच, पुनः जीवित हो जाएगी
सूख गई जो फसलें, इक- इक पल के इन्तजार में
क्या पलटेगी पासा प्रकृति
क्या सूखी फसलें, फिर लहलहाएंगी
कर्ज में सिर से पांव तक डूबे हुए
किसान के घर, क्या खुशियाँ लौटकर आएंगी
उस मेहनतकश के पसीनों का हिसाब
क्या जमीं उसे दे पाएगी
इक- इक सपने जोडकर
जो उठाई थी खुशियों की दीवारें
जो वक्त के कहर से गिर गई
या, यूँ कहे कि वक्त ने उसे गिरा डाला
क्या उन्हीं सपनों को लेकर
वो, दीवारें पुनः खडी हो पाएंगी।
3-पूंछता हूँ, दिशाओं से, उन बेदर्द हवाओं से
हर बार बदलती, उन सभी फिजाओं से
जो सूख गए पत्ते-जो सूख गई शाखें
क्या गिरकर वो पुनः
अपने साथी से मिल पाएंगी
या, इक गरीब के टूटे हुए, स्वपनों की तरह
दबेंगी जमीं में, या, जमींदोज ही हो जाएंगी।
4-ये मानता हूँ कि वक्त, तू बड़ा बलवान है
चलता रहता है तू, तुझको चलने का मान है
क्या किसी की खुशियों की खातिर
तेरी सुईयां थम न जाएंगी
अधेंरे ही रहेंगे क्या जिन्दगी भर के साथी
क्या रोशनियां, कभी अपनी दोस्ती न निभाएंगी।
उस सूखे पेड़ पर……..
धन्यवाद
धन्यवाद
Dharamveer Verma’धर्म’ -
सहारे
समन्दर के कभी दो किनारे नहीं मिलते,
हमसे तो आकर ही हमारे नहीं मिलते,बात ये है के विचारधारायें भिन्न हैं सभीकी,
तभी तो ढूढे से किसी को सहारे नहीं मिलते।।
राही (अंजाना) -
मैं हर बात पर रूठ जाता हूं
जरा सी बात में टूट जाता हूं ,
गुस्से से आकर फुट जाता हूँ।
लोग समझते है आदत है मेरी
मैं हर बात पर रुठ जाता हूँ।हृदय पर हल्की घाट होती है,
बिना बात की बात होती है।
बढ़ जाता है द्वेष का किस्सा,
फिर मन मे खुराफात होती है।।गलतफहमी धीरे से बढ़ जाती है।
गुरुर दिमाग में गढ़ जाती है।
मन मे बनती है ख्याली पुलाव,
कुछ और ब्यथा बढ़ जाती है।।बुराई का मैं सरताज नही हूँ।
बुझदिलों का आवाज नही हूँ।
प्रलयकारी होता है संबंध टूटना,
झूठे रिश्तों का मोहताज नही हूँ।। -
प्रेम कविता
प्रेम कवितासबने प्रेम पर
जाने क्या-क्या लिखा
फ़िर भी अधूरी ही रही
हर प्रेम कविता -
Barsaat
इन हाथों में अरसों तक थी उनके हाथ की खुशबु।
जैसे रातरानी से महकती रात की खुशबु।
इत्र हो गई जो बूंदें लिपटकर उनसे,
दुनिया को ये भरम कि ये बरसात की खुशबु। -
माईने
सच और झूठ के माईने बदल गए,
ऐसा हुआ क्या के आईने बदल गए,साध के बनाई जब हाथों की लकीरें,
तो राहों में लोग क्यों लाईने बदल गए,राही अंजाना
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दिखावे के प्यार
दिखावे के प्यार
दिखावे का खुला आसमां मिला
जब भी उड़ना चाहा
मुझको बस नीचे का रास्ता मिला -
बिजली चले जाने पर हम
बिजली चले जाने पर हम
रात चांद के तले बिताते हैं
क्रंक्रीट की छत पर
बैठ हम प्रकृति को कोसते हैं
हवाओं से मिन्नते करते
शहरों की छतों पर
तपती गरमी में नई सभ्यता रचते
दौड़ जाती हमारी आवेषों में बिजली
कंदराओं के मानव
आग की खोज में इतरा रहा था
एडिषन एक बल्ब में इतना परेषान था
हम उस बिजली के लिए शहरों में
तपते छतों में
इतिहास नहीं बने
हवाओं के बहने और पानी के बरसने में
हमने रूकावटे खड़ी कर दी
क्रंक्रीट की छतों और छज्जों में
कोसते हम प्रकृति को
और चांद देखता छतों पर
अपनी ओर बढते इंसानी कदमों पर
रोकने की सोच में डूबा
हम अपनी छतों पर सोचते
चांद पर क्या होगा?
मन में बिजली-सी कौंध जाती
छतों पर गरमी में तपते हम। -
हुकूमत बदल जाओ
चंद वक्त ले लो
दुनिया भी बदल लो।
एक एहसान करो
तुम ही बदल जाओ
आजकल में
चीखों को सुनो
फिर सोचो
क्या तुम काबिल हो।
एक बार तुम घर में बैठ जाओ
देखों लोग कैसे बदलते हैं- जमाना।
बस तुम चले जाओ
देखो की कैसे बदलता है
सबका जीवन
तुम सब जिम्मेदार बनो
तो जानो की
कैसे बदलता है
हुकूमत की सत्ता
देखो कैसे बनते लोग
तख्त तुम उलट जाओ
फिर देखो बदलती
नई तस्वीर।
जिंदा है हम
तैयार हैं
बस तुम चले जाओ
अबकी बार हमें बैठाओ
हम बदल देंगे भारत।
अभिषेक कांत पाण्डे -
पहरा
ख्वाबों ख्यालों में किसी का कोई पहरा नज़र नहीं आता,
जो नज़र में आता तो उसका कोई चहरा नज़र नहीं आता,घूमती गुमराह सी नज़र आती हैं जो खामोश राहें हमको,
उन राहों पे ढूंढ़े से दूर तलक कोई ठहरा नज़र नहीं आता,राही अंजाना
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मुक्तक
तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ?
मैं तेरे ख़्यालों की जंज़ीरों का क्या करूँ?
अश्क़ों को छुपा लेता हूँ पलकों में लेकिन-
मैं तेरे सपनों की ज़ाग़ीरों का क्या करूँ?मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
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शिकार
शिकार करने चली थी बाज का,
हुस्न के गुरूर मे ।।हँसी थामे ‘सच’ कहू …
पर भी ना मिला कबुतर का ।।
~ सचिन सनसनवाल -
चाँद
छोड़ कर पीछे सबको आज चाँद को घुमाने निकला हूँ,
सच कहता हूँ दोस्त मेरे आज खुद को गुमाने निकला हूँ,सोया था न जाने कब से समन्दर की बाँहों में यूँ अकेला,
पिघले हुए एहसास को आज फिर जमाने को निकला हूँ,राही अंजाना
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बहोत ख़ूब
मैं बहोत खूब जानता हूँ उसे,
खुद से जादा ही मानता हूँ उसेवो कहीं भी ढूढ़ता नहीं मुझको,
मैं ख्वाबो में भी छानता हूँ उसे।।
राही अंजाना -
मुक्तक
है परिभाषित सतत संघर्ष और संग्राम अभिनंदन।
हैं हम सारे अयोध्या के निवासी, राम अभिनंदन।
वो जो हर भौंकते से श्वान का मुंह वाण से भर दे।
कि इस कलयुग में उस एकलव्य है नाम अभिनंदन। -
मुक्तक
मात्र श्रृंगार की ना रहे पराकाष्ठा
इसमें अंगार भी चरम होना चाहिए।
मात्र प्रेम और आसक्ति ना बने कविता
पंक्तियों में वंदे मातरम होना चाहिए। -
दीवार
उसने मेरे दिलो दीवार के पार देख लिया,
मुझसे पूछे बिना ही मुझमे यार देख लिया,बैठा तो था मैं अंधेरे की चौखट पर गुमसुम,
पर वही था जिसने मुझमे प्यार देख लिया।।राही अंजाना