रिश्तों के धागों से खुद को सिलना सीख लेते हैं,
आसमां से ज़मी के बीच ही खिलना सीख लेते हैं,
बनाते ही नहीं ख्वाब वो उन मखमली बिस्तरों के,
गरीबी की गोद में ही जो बच्चे हिलना सीख लेते हैं।।
राही अंजाना
रिश्तों के धागों से खुद को सिलना सीख लेते हैं,
आसमां से ज़मी के बीच ही खिलना सीख लेते हैं,
बनाते ही नहीं ख्वाब वो उन मखमली बिस्तरों के,
गरीबी की गोद में ही जो बच्चे हिलना सीख लेते हैं।।
राही अंजाना
वफ़ा करनी भी सीखो इश्क़ की नगरी में ए दोस्त,
फ़क़त यूँ दिल लगाने से दिलों में घर नहीं बनते !!
बन रंगरेज इस तरह रंग डाले,
रंग ए रूह और भी निखर जाए।
मिले गले इस तरह दोस्त बनकर,
दुश्मनी हो अगर, टूटकर बिखर जाए।।
क्यों तुम मेरी यादों में ग़म कर जाते हो?
आकर मेरी निगाह को नम कर जाते हो।
दर्द की आहट से डर जाती है ज़िन्दग़ी-
मेरी ख़ुशियों के पल को कम कर जाते हो।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
तेरा तसव्वुर मुझे जुनून देता है।
तेरे सिवा कुछ नहीं सुकून देता है।
रातों को जगाती है तेरी तमन्ना-
तेरा हुस्न दिल को मज़मून देता है।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
तेरे सिवा नज़र में कोई तस्वीर नहीं है।
तेरे सिवा ख़्याल की कोई जागीर नहीं है।
चाहत के हर पन्ने पर परछाई है तेरी-
तेरे सिवा ख्व़ाब की कोई ताबीर नहीं है।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
तुम बॉलिवुड अभिनेत्री सी, मैं भागलपुर का अभियंता।
तुम भरी विद्वता की चर्चा, मैं चुटकुलों का सन्ता बन्ता।
तुम झांसी की रानी जैसी, मैं धरने पर बैठी ममता।
तुम कॉर्पोरेट की लीडर, मैं जनधन खाते की निर्धनता।
होते ही सुबह तेरी तस्वीर से मिलता हूँ।
अपनी तमन्नाओं की ज़ागीर से मिलता हूँ।
नज़रों को घेर लेता है यादों का समन्दर-
चाहत की लिपटी हुई जंजीर से मिलता हूँ।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
आज फ़िर हाथों में जाम लिए बैठा हूँ।
तेरे दर्द का पैगाम लिए बैठा हूँ।
वस्ल की निगाहों में ठहरी हैं यादें-
आज फ़िर फुरक़त की शाम लिए बैठा हूँ।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
ना होली-दिवाली ना ईद रमजान।
एक ही जश्न हिफाजत-ए-हिंदुस्तान।
गर हो जाऊं शहीद सरहद पे ‘देव’,
पहना देना बतौर कफन तिरंगा-महान।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
मैं जब कभी तेरी तस्वीर देख लेता हूँ।
मैं अपने ख़्यालों की तक़दीर देख लेता हूँ।
ख़्वाबों के समन्दर में उठती है चिंगारी-
मैं तेरी अदाओं का तीर देख लेता हूँ।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
देखा है दुनिया को रंग बदलते।
मुंह में राम बगल में छुरा लिए चलते।
गैरों को मतलब कहां हैं हमसे ‘देव’,
यहां अपने ही अपनों को हैं छलते।
देवेश साखरे ‘देव’
जुस्तज़ू क़ुरबत की फ़िर से बहक रही है।
तेरी बेरुख़ी से मगर उम्र थक रही है।
रात है ठहरी सी तेरे इंतज़ार में-
तिश्नगी आँखों में फ़िर से चहक रही है।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
जीवन न्यौछावर कर दो हेतु परमार्थ।
प्रतिफल की अभिलाषा बिना निःस्वार्थ।
ईश्वर स्वयं बन जाएंगे जीवन सारथी,
और बना लेंगे अपना सखा पार्थ।
देवेश साखरे ‘देव’
मेरी नज़र के सामने साक़ी को रहने दो।
हाथों में जाम है मगर बाक़ी को रहने दो।
धधक रही हैं तस्वीरें यादों की दिल में-
चाहत की ज़ेहन में झांकी को रहने दो।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
मां भारती का सहस्त्र वंदन, रही है आवृत ये गोधुली से
यहीं दिगम्बर ये अन्नदाता, लगे है पाथेय संबली से।
यहीं पे खेले चराए गैया, जगत खिवैया किशन कन्हैया
यहीं त्रिलोकेश सूर्यवंशी, यहीं कपिश्वर महाबली से।
मंदाकिनी का है काव्य अविरत, है धैर्य अविचल सा हिमगिरी का
प्रथमवृष्टि की सुगंध अनुपम, है स्वाद अद्भुत सा पंजिरी का।
युगों युगों से युगों युगों तक रहा सुशोभित रहेगा चिन्हित
आशीष है ये स्वयं प्रभु का, है भाग्य अतुलित सा गिलहरी का।
न काल परिधी परे निराशा, न दुःख है पारिव्याप्त इस जगत में
सही समय पर हुए प्रस्फुटित ये पुष्प पर्याप्त इस जगत में।
है धैर्य की यह सतत कसौटी सतत करेंगे इसे भी पारित
रावण भागिनी प्रणय निवेदन, कुब्जा को प्राप्त इस जगत में।
करो अहम को तुरत विसर्जित, नहीं विजित ये कभी समय से
यदि बनोगे विवेकानंदम , बनोगे केवल विधु विनय से।
अहम को त्यागें करें परिश्रम, हमारा भारत हो विश्व शीर्षम
प्रभु बचाए मनु अहम से, मनु बचाए पृथा प्रलय से।
है काव्य अपना हे मान्य कविवर, है शब्द अपने कृति स्वयं की
बने कलम ये सशक्त संबल, करे सबल अभिव्यत्कि स्वयं की
ये स्याह छींटे कभी न छोड़े, ये शब्द गरिमा कभी न तोड़े
सतत शत गरिमा भंग कर दे, शिशुपाल आहुति स्वयं की।
अँधेरा कहीं भी हो दूर होना चाहिए,
सूरज न सही दिए के माफ़िक जलना चाहिए,
क्या हुआ जिंदगी में उदासियाँ बहुत हैं,
औरों की ख़ुशी देखकर भी मुस्कुराना चाहिए।
तेरे बग़ैर तन्हा रहने लगा हूँ मैं।
तेरी बेवफ़ाई को सहने लगा हूँ मैं।
जब भी ग़म तड़पाता है मेरे ख़्यालों को-
अश्क़ बनकर पलकों से बहने लगा हूँ मैं।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
मैं तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ?
मैं तड़पाती यादों की जागीरों का क्या करूँ?
मैं अश्कों को पलकों में रोक सकता हूँ लेकिन-
मैं दर्द की लिपटी हुई जंजीरों का क्या करूँ?
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
मेरे दर्द को तेरा अफ़साना याद है।
मेरे ज़ख्म को तेरा ठुकराना याद है।
लबों को खींच लेती है पैमाने की तलब-
हर शाम साक़ी को मेरा आना याद है।
मुक्तककार- #मिथिलेश_राय
वो कहती है
लिखा हुआ आज सुना दो
मैंने सिर्फ इतना ही कहा
जुबाँ लड़खड़ा जाएगी
एहसास बड़े गंभीर हैं
-मनीष

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है,
ये बचपन बस अपने आप में मदहोश होता है,
इच्छाओं की दूर तलक कोई चादर नहीं होती,
बस माँ के आँचल में सिमटा हुआ स्वरूप् होता है।।
– राही (अंजाना)

अदब से झुकने की कला भूल गए,
मेरे शहर के लोग अपना गुनाह भूल गए,
भटकते नहीं थे रास्ता कभी जो अपना,
आज अपने ही घर का पता भूल गए,
महज़ चन्द पैसों की चमक की खातिर देखो,
यहां अपने ही अपनों की पहचान भूल गए।।
राही (अंजाना)

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला,
एक बन्दर को उसका मदारी न मिला,
ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे,
कि हमारी चालोन को कोई जबाबी न मिला।।
राही (अंजाना)
यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी,
तो मैं भी क्यूँ दिखाऊं खुलकर उनको खूबियां मेरी,
अभी सीख रहा हूँ तैरना तो हंसी बनाने दो मेरी,
जब डूब कर समन्दर से निकल आऊंगा तो देखेंगे वो करामात मेरी॥
राही (अंजाना)
उनकी तरफ से तो
इक इशारा भी ना हुआ…
ऒर हम कम्बखत…
उनसे इश्क़ कर बैठे हैं….
राजनंदिनी रावत
कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’….
जब भी तेरे दर पे आऊँ….
उसके संग ही आऊँ !
राजनंदिनी रावत-राजपूत

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ,
मैं तब से अपने ही ख्यालों में वयस्त हूँ,
रंग तो बहुत हैं ज़माने में मगर,
मैं इंद्रधनुष के रंग छुड़ाने में वयस्त हूँ,
चाँद है सितारे हैं आसमाँ रौशन है मगर फिर भी,
मैं अपने ही घर के जुगनू जलाने में व्यस्त हूँ।।
राही (अंजाना)

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे,
एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे,
बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में,
इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।।
राही (अंजाना)
लौट आने दो उस हवा को
गुनगुनाने दो उस हवा को
वह आयी है गीत सुनाने
थरथराने दो उस हवा को।
अशोक बाबू माहौर
बहुत दूर तलक जाकर भी कहीं दूर जा पाते नहीं,
परिंदे यादों के तेरी मेरे ज़हन से उड़ पाते नहीं,
बनाकर जब से बैठे हैं मेरी रूह पर घरौंदा अपना,
किसी जिस्म पर चैन से ये ठहर पाते नहीं।।
राही (अंजाना)
रोज प्यार के गीत गुनगुनाए हर कोई मन ,
मुसीबतों को ,सबक सिखाए हर कोई मन।
नाच ले ,झूम ले मस्ती भरे , मधुर तरानों पर,
खुशियों की बाँहों में ,झूल जाए हर कोई मन ।
^^ जानकी प्रसाद विवश^^
कदम दर कदम मै बढाने चला हूँ।
सफर जिन्दगी का सजाने चला हूँ।
ज़माने की खुशियाँ जहाँ पें रखकर
दौर जिन्दगी बनाने चला हूँ।।
योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा
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