Category: मुक्तक

  • किताबें

    किताबें दोस्त थी मेरी, दुख सुख की साथी,
    अकेलेपन में किसी की कमी ना खलने देने वाली,
    हंसती मुस्कुराती।
    मुझे जहां भी कोई किताब मिल जाती
    मेरे पुस्तकालय में सुशोभित हो जाती।
    इंटरनेट ने तो कहीं का ना छोड़ा
    लोगों ने किसानों से नाता ही तोड़ा।
    सूनी पड़ी रहती पुस्तकालय
    एक बटन दबाते ही फोन में सब कुछ आ जाता।
    पर किताबें हमसे बहुत कुछ कहती हैं
    जो यह फोन नहीं कह पाता।
    निमिषा सिंघल

  • खुदगर्ज

    सोचो अगर हर जीव खुदगर्ज हो जाता
    पल पल हर पल थम सा जाता
    ना पेड़ देता फल कोई वह पेड़ पर ही सड़ जाता
    वह जाओ ना देते तो पथिक रास्ता कैसे तय कर पाता
    नदिया जो पानी ना देती हर जीव प्यासा मर जाता
    वह समंदर में ना गिरती तो हर घर पानी में बह जाता
    ना मां देती जन्म बच्चे को जीवन मरण चक्कर रुक जाता
    जो हो जाती खुदगर्ज वह कोई घर नहीं बस पाता
    हवा अगर थम जाती तो दम सभी का घुट जाता
    वह ना हर जगह बहती तो जीवो का प्राण पखेरू उड़ जाता
    दयावान होना जरूरी है दया ना होती तो सृष्टि का सर्जन ना हो पाता
    खुदगर्ज जो हो जाता ब्रह्मांड खुद ही पैदा होकर खुद ही वह मर जाता

  • मोह

    उड़ चलता है हर पक्षी घोंसला बनाने
    होते ही उम्मीदों का सवेरा
    श्याम को थक्कर ढूंढता फिरे
    अपना ही रैन बसेरा
    भटकती फिरे हर मधुमक्खी
    फूल फूल पत्ता पत्ता
    करके शहद इकट्ठा
    हजारों फूलों को छानती
    बार-बार पहुंचती देखने अपना छत्ता
    इंसान भी मोह का पुलिंदा हैमो
    परिवार की फिकर उसे सताती रहती है
    मुंह के बस में हर प्राणी
    सृष्टि सारी यही कहती है

  • भौर

    बाला घट भरने चल पड़ी
    भौर की लालिमा नभ मे बिखर पड़ी
    पगो से रोंदते हुए ओंस की बूँद
    बाला पनघट की ओर मुड़ चली.

    रस्सी खींचती सुकोमल हाथों से
    बिन कहे ही कहती बातें आँखों से
    हार गया तुम्हारी मनमोहनी चालो से
    सुंदरता का बखान कैसे करू मै तुछ बातों से.

    घट सर पर रख मंद- मंद मुस्काए
    नखरे करें और खूब इतराए
    कमरिया तेरी लचकती जाये
    अधजल गगरी छलकती जाये.

    देखता उसे मै रह गया
    गाँव की गलियों मे वो खो गई
    कुछ डग भरे उसकी ओर
    फिर ना जाने कहाँ घुन्ध मे वो ओझल हो गई.

    ध्यान उसका आता बार बार
    उस एहसास को कैसे भूलूँ
    काश ! ये मनोरम दृश्य
    मै हर रोज ही देखूँ.

    अर्थ :-
    मनोरम -प्यारा
    अधजल -आधा भरा घड़ा
    रोंदते -दबाते, कुचलते

  • मजदूरो के बच्चे

    मेरे घर के सामने
    मजदूरो का जमावड़ा लगा था
    ईंटो का ढेर बड़ा था
    शायद कोई बंगला बन रहा था.

    कोई मजदूर ईंटे ढो रहा था
    कोई दीवार चिन रहा था
    हर मजदूर काम मे लगा था
    बच्चों की कोई परवाह नहीं कर रहा था.

    हम अपने बच्चों को
    धूल भी नहीं लगने देते है
    और मजदूरो के बच्चे देखो
    किस तरहा मिटटी मे लेटे है.

    मिटटी उड़ा उड़ा कर
    खेल रहे है मजदूरों के बच्चे
    सब अपने कर्मो का खाते
    ये कहते है हम वचन सच्चे

    गाढ़ा पसीना बहाया
    अपने परिवार के लिए कमाया
    शाम को खरोंच भरे हाथों से
    बच्चे को गोद मे उठाया.

    म से मिटटी म से मजदूर
    नाता मिटटी से गहरा है
    कितना शोर मचा ले बेचारे
    ना सुनेगा उनकी, समाज हमारा बहरा है.

  • पथिक

    जीवन की राह को
    नंगे पैर ही नापना पड़ता है
    मिटटी की गर्मी को
    छूकर ही भापना पड़ता है

    चलते चलते कभी
    रेत के टीले राह रोक लेते है
    मै डर जाऊ मै घबराऊ
    इसका ही तो मजा लोग लेते है

    राह मे कांटे आए जब
    रोता चलता रहा मै पथिक
    पर जीना छोड़ दू
    मन मे विचार ना आया तनिक.

    सारा मनोबल टूट गया मेरा
    जब राह मे एक बड़ा पत्थर आया
    उससे भी मै बच गया
    क्योंकि साथ था मेरे माँ-बाप का साया.

    एक मोड़ पे मुझे कुछ लोग मिले
    नेंन उनके ईर्ष्या और द्वेष से भरे
    मैंने ध्यान ना दिया उनपर
    पर चुगलियां करें बगैर उनको कैसे सरे.

    मैंने सोच लिया है बस
    मै चलता ही जाऊंगा
    तभी तो जीवन की रहो का
    पथिक मै कहलाऊंगा.

  • मुक्तक

    मन्दिर बांटा मस्जिद बांटा बांट दिया संसार,
    बोली भाषा रहन सहन बांट दिया इंसान ,
    जाति धर्म मजहब बांट दिया भगवान ,
    ईश्वर अल्ला का धर्म बताकर कर दिया सत्यानाश ,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • चन्द्रयान

    हौसले कि उड़ान अभी बाकी है ,
    मेरे जज़्बातों का ख्याल अभी बाकी है ,
    चन्दा मामा हम फिर से आयेंगे ,
    अभी मेरे दिल का हाल बाकी है ,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • नशा

    तू होनहार था
    तू सबसे होशियार था
    सबका तू गुरुर था
    अपनी प्यारी सी जिंदगी मे
    सपना तूने भी कोई
    देखा तो जरूर था

    झुक गया गमों के आगे
    दुनिया नाचे पैसे के आगे
    तब तो तू मजबूर था
    क्यों खोया लत मे ऐसा
    बहाया पानी की तरहा माँ-बाप का पैसा
    गुनाह करना भी तुझे मंजूर था
    तुझपे नशे का ऐसा भी क्या सरूर था

    छूटते जा रहे अपने
    तोड़े क्यों तूने अपनों के ही सपने
    ये करना क्या जरूर था
    तू इतना क्यों मजबूर था
    भागता रहा बस नशे के पीछे
    देखे ना माँ के आँसू बैठा रहा आंख मींचे
    तू इतना क्यों मगरूर था
    जाने कैसा चढ़ा तुझपे ये फितूर था.

    फिर से हाथ थाम अपनों का
    पुलिंदा बना नये घोंसलों का
    छोड़ दे ये लत
    दे खुदको भी कुछ फुर्सत
    छोड़ उसको जो सर चढ़ा जनून था

    फेंक शराब की बोतलों को
    जिनका लगा घर पर हुजूम था
    खुद की तू मदद कर
    कोई ना करें चाहे तू खुद की तो कदर कर
    बसा ले वो आशियाना फिर से
    जिसमे तुझे सकून था
    जी वही जिंदगी
    जिसमे तू भी मासूम था.

  • तू मेरा छोटा भाई है

    जब तू पालने मे खेलता था
    कई खिलोने तेरे सराहने रहते थे
    खुश होती तुझे देख- देख
    मेरे नन्हे हाथ तेरे सर को सहलाते रहते थे.

    जब तू थोड़ा बड़ा हुआ
    मेरे खेल का साथी मुझे मिल गया
    टॉफी,चॉकलेट बांटकर खाने वाला
    साझी मुझे मिल गया.

    साथ स्कूल जाते थे
    साथ पढ़ाई करते थे
    साथ मे लंच, साथ मे खेल
    साथ मे स्कूल का काम करते थे.

    स्कूल बदल गया
    सब्जेक्ट बदल गए
    अलग राहों पे आना -जाना हो गया
    कुछ ही सालो बाद तू
    मुझसे भी लम्बा हो गया.

    आज फिर से भैया दूज पर
    वही बातें याद आई है
    मै तेरी बड़ी बहन हूँ
    और तू मेरा छोटा भाई है.
    ✍️✍️✍️✍️नीतू कंडेरा ✍️✍️✍️✍️

  • आतिशबाजी

    वो आतिशबाजी किस काम कि
    जो कानो को बहरा कर दे
    अगले ही दिन प्रदूषण से
    वातावरण को धुए से भर दे.

    मै तो चाहूँ ऐसी लड़ी जलाना
    कि जिंदगी फुलझड़ी जैसी जगमग हो
    चाहूँ ऐसा अनार जलाना
    जिसमे खुशियों कि फुहार पग पग हो.

    ऐसा फोड़ू मुस्कुराहटो का सुतली बम
    जो लोगो का दिल उत्साह से भर दे
    ऐसा जलाऊ उमंगो का रॉकिट
    जो आसमान रंगबिरगी खुशियों से भर दे.

  • दीपावली का अगला दिन

    हम अपने घरों का का
    कोना कोना चमकाते है
    ताकि अच्छे से मना सके
    दीपावली का दिन
    और कितना कूड़ा फैला देते है
    दीपावली के दिन ही दिन.

    छिड़कते है गंगाजल
    वातावरण स्वच्छ बनाने को
    ताकि घर पवित्र रहे दीपावली के दिन
    और इतने पटाखे फोड़ते है कि
    धुआँ धुआँ कर देते है
    दीपावली के अगले ही दिन.

    काम से छुट्टी करके मनाते है
    दीपावली का दिन
    तीन गुना गाड़ियां भगाते है सड़को पर
    दीपावली के अगले ही दिन.

    देश का सबसे बड़ा त्यौहार है
    दीपावली का दिन
    देश का सबसे बड़ा प्रदुषण प्रेरक है
    दीपावली का अगला ही दिन.

  • औरत

    औरत तेरी कहानी
    जैसे बहता पानी
    महानता तेरी जगमानी
    वेग है तू जबरदस्त तूफानी.
    पर्वतों मे तू नदी वेगवाहिनी
    मैदानों मे तू स्थिर विरानी
    खेतो मे तू अन्न गर्भ धारणी
    महान होकर भी तू सदाचारणी.
    धरातल मे तू पाताल वासनी
    पालन करे तू पालनहारिणी
    गृह उद्धारक तू ह्रदय वासनी
    सृष्टि का आरम्भ तू और जग कल्याणी.

  • चुनाव प्रचार

    गलियों मे चुनाव प्रचार के ढ़ोल आजकल बजते रहते है
    वोट मुझे ही देना भाई, सभी यही कहते है
    मीठा बोलने से उनके, भावनाओ मे हम नहीं बहते है
    जब दाल ना गले उनकी, हमपर धर्म प्रहार वो करते है.

    हिन्दू कहे, मै जीत गया तो मंदिर मै बनवाऊंगा
    मुस्लिम कहे, मै जीत गया तो मस्जिद मै बनवाऊंगा
    बेवकूफ़ अच्छे से बना सकता हूँ तुमको
    जीतने के बाद ठेंगा तुम्हे दिखाऊंगा.

    चाहे कोई भी जीते
    जनता जरूर फंसती है
    कभी बिजली की कटौती
    कभी पानी की बूँद को भी तरसती है
    धोखे के समंदर मे डबोते वो हमको
    क्योंकि गहरे पानी मे जनता की कश्ती है.

  • जीवन जीना

    जीवन बहुत कठिन है गरीबो का
    आगे बढ़ना मुश्किल है शरीफों का
    सीखना जरुरी है जीवन के सलीखो का
    डटकर खंडन करती हूँ बेईमान तरीको का.

    सिर्फ मांगने से हक मिलता कभी ना
    पैसे के आगे सस्ता है बहुत पसीना
    आभारी हूँ मै अपनी माँ की जिसने
    सिखाया मुझे ये जीवन संघर्ष से जीना.

    गरीबी के साथ कैसे है जीना
    तुमने मुझे बचपन मे ही सीखा दिया
    न्याय के लिए आवाज उठाओ
    इस सोच ने बाग़ी मुझे बना दिया.

    सवाल करती हूँ खुद से और सबसे
    मेरा भी रास्ता वही, तुम्हारा जहाँ है
    तुम्हे तो मिला इन रास्तो मे सब कुछ ही
    पर मुझे तो मिला मेरा हक भी कहाँ है?

    मै बुराई से लड़ रही
    दुनिया की सीख पढ़ रही
    धकेलते पीछे मुझे बार बार
    फिर भी मै आगे बढ़ रही.

    ✍️✍️✍️✍️नीतू कंडेरा✍️✍️✍️✍️✍️

  • मुक्तक

    मैं तेरी सूरत का दीवाना हूँ कबसे।
    मैं तेरी चाहत का अफ़साना हूँ कबसे।
    अंज़ामें-बेरुख़ी से बिख़री है ज़िन्दग़ी-
    मैं तेरे ज़ुल्मों का नज़राना हूँ कबसे।

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • करवा चौथ

    आज बहुत सुन्दर लग रही हो तुम
    इस चाँद से चेहरे पर कुछ कहना चहुँ तो
    पहले ही शर्मा कर हाथो से
    चेहरे को ढक लेती हो तुम.

    मुझे देखकर जो तेरे चेहरे की
    लालिमा बढ़ती जाती है
    देख- देख तुझे मेरे दिल की कलि
    खिलती जाती है.

    सबको रात का इंतजार है
    देखने चमकते चाँद को दिल बेक़रार है
    इतना सुन्दर श्रृंगार किया है
    दिल तो लूटने को भी तैयार है.

    आज सुनती सभी महिलाये
    करवा चौथ की कहानी
    सुनो प्रिया, श्रृंगार सहित श्रृंगार रहित
    तुम ही सदा रहोगी मेरे दिल की रानी.

  • कर्मठ

    आलसी लोग जो ना मेहनत करते
    दिन के उजयारो मे
    देखा रात को स्ट्रीट लाइट के निचे पड़ते
    एक बच्ची को अंधरे गलयारो मे.

    सर्द हवाओ में मैंने उसे देखा पढ़ते
    कांप -कांप कर
    जाने क्यों पढ़ती है वो
    जागकर रात- रात भर.

    इतनी ठण्ड थी की कोई अभागा रोए
    तो आंसू भी जम जाए
    इस हाल में पढ़ते देख उसे
    किसी की सांसे भी थम जाए.

    अगली सुबह मैंने उसे जब
    उसे फूल बेचते देखा
    सोचा मन मे
    की ये कैसा है भाग्य का लेखा
    एक दिन जरूर बदल देगी
    वो अपने हाथो की रेखा.

    हमेशा आलसी को फूलों के बिस्तर
    और कर्मठ को ठोकरें ना मिलेंगी
    एक दिन ऐसा आएगा
    जब सारी खुशियाँ आधी -आधी बटेंगी.

  • देश का कण- कण- स्वर्ण महान है

    हिमालय ताज सर पर सजा
    डटकर खड़ा अम्बर में सटा
    स्थिरता जिसकी पहचान है
    ऐसा ही हर भारतीय का रुझान है
    क्योंकि इस देश का कण-कण-सवर्ण महान है

    नम्र ह्रदय उच्च विचार
    मानते हम अतिथि को भगवान है
    प्रतिभा ऐसी कूट -कूट भरी
    जानकर दुनिया भी हैरान है
    क्योंकि इस देश का कण-कण-स्वर्ण महान है.

    सुन्दर- नदिया, बहते -झरने
    स्वर्ग से लगी सीढ़ी के समान है
    सुंदरता फैली हर कण मे
    मुश्किल करना इसका बखान है
    क्योंकि इस देश का कण कण- स्वर्ण- महान है.

    ऊँचा सोचते बुरे विचारों से अनजान है
    किस तरहा निकलना है मुश्किलों से
    जनता देश का बच्चा -बच्चा विद्वान है.
    हिम्मत लिए बढ़ते चलते आगे
    भारत हौसलों का मैदान है
    क्योंकि इस देश का कण -कण -स्वर्ण महान है
    🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳नीतू कंडेरा 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

  • सन्तुलन

    सन्तुलन

    दिल और दिमाग के बीच सन्तुलन बैठाना मुश्किल था,
    पहली बार देखा था उसे अमलन छुपाना मुश्किल था,

    अकेले ही काटी थी यूँही राहों पर उम्र भर जो जिंदगी,
    मिला जो उनसे तो ठहरी अंजुमन लगाना मुश्किल था।।

    राही अंजाना

    अंजुमन – सभा
    अमलन – सच में

  • मुक्तक

    मुक्तक

    धड़ाधड़ अंधाधुन हो रहा पेड़ों की कटाई,
    मूक बाधिर बने रहे तनिक लाज नहीं आई,
    सूलग रहा आरे आज राजनीति के करतुतो से,
    पर्यावरण प्रेमी को दबोच रहें हैं आरे कालोनी से,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • जीवन

    जीवन

    जीवन हर पल एक खेल होता है।

    यहाँ सभी के कर्मों का मेल होता है।

    जिंदगी के खेल बड़े निराले होते हैं।

    किश्मत का हर सिक्का हेड, टेल होता है।

    इस खेल में तो कोई पास तो कोई फैल होता है।

  • गरीब कवि

    भूखे पेट जीना सीखा मैंने
    पेट भर खाने की जरुरत भी समझी नहीं |

    नंगे पैर दौड़ पड़े सफर में
    बस भागता रहा
    ना देखा, पाँव में चप्पल है के नहीं |

    बुझी मशालों को मैंने शब्दों से जाला डाला
    इतनी भड़का दी आग के
    सूरज के आगे,
    इसकी चमक कभी धुंधली पड़ी नहीं |

    धरती से चाँद तक मैंने लिख डाला
    ब्रम्हांड को भी छू लेता
    पर छलांग लगाने के लिए
    गरीब कवि के पास दो गज ज़मीन भी नहीं.
    “”””””””….राम नरेश…. “”””””””

  • मोर पखा

    मोर पखा

    मोर पखा सिर धरने वाले ।
    उंगली पर गिरी रखकने वाले ।
    है कान्ह हे नंद दुलारे हे यशुमति के प्यारे।
    कृष्णा, मोहन , श्याम सब हैं तेरे नाम
    द्वारिका, मथुरा , वृंदावन हैं तेरे धाम ।
    हे मेरे प्यारे ये जान, जिगर , दिल, है सब , दिलवर हे तेरे नाम।

  • पता

    जलाकर रख दिए ख़त मगर यादों को अग्नि दगा दे गई,
    मुट्ठी में दबाकर रखी थी मगर खुशबू को हवा उड़ा ले गई,

    बेबाक यूँही नशे में गुज़र रही थी लडखड़ाती हुई ज़िन्दगी,
    आई एक रात फिरजो ख्वाबों में मुझे तुम्हारा पता दे गई।।

    राही अंजाना

  • हौसले

    हाथ की आड़ी टेड़ी लकीरें
    क्या खाख बताएगी तकदीरे
    उड़ जा होंसलों के आसमान में
    क्या बिगड़ लेंगी जर्ज़र समाज की जंजीरे
    🌋🗽♨️✈️🚀⏳️

  • मुक्तक

    फूल लताओं को समेट कर रखता मेरा गांव
    नल कूप को सहेज कर रखता मेरा गांव
    रिस्ते को मदमस्त खुशहाल रखता मेरा गांव
    मिट्टी की खुशबू को सहेज कर रखता मेरा गांव

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मुक्तक

    मेरे गलती पर साहब भौं भौं करके दौड़ लगाते,
    कानुनी नियम का पाठ पढ़ाकर पैसा जनता से खुब ऐंठते,
    ये कैसा कानून व्यवस्था है हमको भी बतलाओ यारों,
    नेता गिरी है या दादागिरी कोई तो जनता को बतलाओ,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • Rana prtap

    Rana prtap

    वह राणा अपना कहाँ गया ,
    जो रण में हुंकारें भरता था।
    वह महा प्रतापी कहाँ गया,
    जिससे काल युद्ध में डरता था ।
    जिसके चेतक को देख – देख ,
    मृगराज दंडवत करता था।
    वह वीर प्रतापी कहाँ गया ,
    जिसके भाले को देख देख ,
    खड्ग निज तेज खण्डवत करता था।
    वह विकराल वज्र मय कहाँ गया ,
    जिससे अकबर समरांगण में डरता था।

  • खुद्दार

    लोगो की नफरतो के आगे,
    खुद्दार कभी झुकता नहीं|
    अडचन चाहे कितनी भी आये,
    चलते चलते वो रुकता नहीं|
    महफिलों की रौनको से,
    फर्क उसे पड़ता नहीं|
    संघर्ष की मशाल लिए वो,
    भागता हुआ थकता नहीं|
    दिखावे के सुन्दर तालाब मे,
    कमल कभी खिलता नहीं|
    कीचड मे सना कमल का जीवन,
    स्वच्छ जल की चाह रखता नहीं|
    खुदार बनो,
    जीवन को कर्म की तरफ मोड़ दो
    मेहनत कर के कमा लो,
    भीख, भिखारी के लिए छोड़ दो |

  • राजनीति

    राजनीति

    सह आंखो से देखे तो पड़ जाता है पाला
    कोई हाथों से छीनकर खा जाता निवाला
    क्या होगा यहां उन मासूम पंख परिंदो का
    आज कल बस्तियो में खूब होता है घोटाला

  • मुक्तक

    मुक्तक

    छप्पन भोग लगा कर बेटा आज नदी के पास बैठा है
    पिण्ड बनाकर मेवे का ढोंग देखो रचा कर बैठा है
    जो मर गये एक निवाले के लिए घुट-घुट कर चार दिवारी में
    क्या क्या ना सुना बुढ़ापे में बाप ने बुढ़ापे की लाचारी में

  • पानी

    सुनो आज तुम्हे सुनाऊ
    पानी की कहानी
    कीमती है पानी
    कहती थी मेरी नानी |

    कभी अमृत जैसा मीठा था
    मेरे गांव का ये पानी
    अब विषैला होता जा रहा
    हर घट- घट का पानी |

    बचपन मे पानी पिया
    अब विष पीते पीते आ गई जवानी
    बुढ़ापा शायद ना आये
    जहरीला हो रहा अब देश का भी पानी |

    गली गली मे बर्बाद हो रहा
    नालियों मे बह गया स्वच्छ पानी
    आज बचाओ मेरे भाई
    कभी अंतिम समय ना गंगाजल मिले और ना मिले ये
    ~~~~~~पानी ~~~~~~~~~~~~
    – – – – – – – – – – – – – – – – – राम नरेश ——

  • मुक्तक

    ख़्वाब टूटते हैं मग़र यादें रह जातीं हैं।
    चाहतों की दिल में फ़रियादें रह जातीं हैं।
    देख़तीं रहतीं हैं आँखें राहें मंज़िल की-
    वस्ल की भटकी हुई मुरादें रह जातीं हैं।

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • काश !देश का शासन कलम चलती

    काश !
    देश का शासन कलम चलती,
    निर्दोष को न्याय दिलाती,
    और दोषी पर कहर बरसाती,
    काश !देश का शासन कलम चलाती |

    अन्याय का नाम ना होता,
    भ्रष्टाचार का काम ना होता,
    दुष्ट नेताओं को होती शब्दों की फांसी,
    न्याय का फंदा ऐसा कस्ता,
    ना जान जाये और ना गले से उठ पाए खांसी,
    काश ! देश का शासन कलम चलती |

    वो राजकवि ऐसा होता,
    मुजरिमों पर भावनाओ के जाल फेंकता,
    तिल-तिल कर जीते अपराधी,
    आंसू आँख से रुक ना पता,
    फिर तो गरीब जनता रहती राजी,
    कहती, वाह ! क्या चाल चली कविराज जी,
    काश ! देश का शासन कलम चलती |

    देश फिर से अहिंसावादी होता,
    “अहिंसा परमो धर्म ” कवि का नारा होता,
    देश फिर से सोने की चिड़िया कहलाता,
    सब को मिलती असली आजादी,
    बिना लड़े ही न्याय दिलाती,
    काश !
    देश का शासन कलम चलती |
    ………राम नरेश……..

  • मुक्तक

    फूल लताओं को समेट कर रखता मेरा गांव ,
    नल कूप को सहेज कर रखता मेरा गांव ,
    रिस्ते को मदमस्त खुशहाल रखता मेरा गांव ,
    मिट्टी की खुशबू को सहेज कर रखता मेरा गांव ,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मुक्तक

    कोई कहे कैसे उसको ग़म नहीं है?
    जो कुछ मिल गया है उसको कम नहीं है।
    तुम हर तरफ़ ढूँढ़ लो इलाज़े-मर्ज़ को-
    इस दर्द का कोई भी मरहम नहीं है।

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • माँ -बाप

    माँ बाप की क्या इच्छा होती है
    अपने बच्चों से
    थोड़ा सा प्यार थोड़ी सी इज्जत
    चाहते है उन गढ़े पक्के रिश्तो से

    दुख के दिनों मे तुम साथ दो ना दो
    तुम्हारे साथ सुख के कुछ क्षण गुजरना चाहते है
    जिंदगी के खेल मे जीतो तुम
    पल पल हारने के लिए अपनी मात चाहते है

    सुखी तुम जिंदगीभर रहो
    तुम्हारे दुख मे तुम्हारा साथ चाहते है
    बुढ़ापे मे कांपते हुए शरीर को थमने वाला
    तुम्हारा मजबूत हाथ चाहते है

    बस मेरे बच्चों हम तुम्हारा साथ चाहते है…….

  • मुक्तक

    मेरे दर्द को तेरा अफ़साना याद है।
    मेरे ज़ख़्म को तेरा ठुक़राना याद है।
    ख़ींच लेती है तलब मुझको पैमाने की-
    हर शाम साक़ी को मेरा आना याद है।

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • मुक्तक

    उठो खड़े हो जाओ वीर तुम,
    लड़ लड़ कर अपना अधिकार लो,
    दुम दबाकर डर के मारे,
    ज़िन्दगी भर लागान मत दो,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • सरकार

    वाह री सरकार
    क्या गजब बनाए है तूने ट्रेफिक रूल.
    दिमाग मे बस चलता रहता हेलमेट, इंश्योरेंश, लाइसेंस कभी ना मै जाऊ भूल.
    वाह री सरकार
    सब्सिडी तो तूने give up करा दी
    पर सिलेंडर-चूल्हा किसे मिला ?
    इसकी तो तूने खबर भी ना दी.
    वाह री सरकार
    बिजली चोरी के छापे तो तो तूने खूब मारे
    25%की रियायत दी…. बाकि सारा तू खा ले.
    खा ले ले मर.

  • मुक्तक

    हम ज़िन्दग़ी में ग़म को कब तक सहेंगे?
    हम राह में काँटों पर कब तक चलेंगे?
    क़दम तमन्नाओं के रुकते नहीं मग़र-
    हम मुश्क़िले-सफ़र में कब तक रहेंगे?

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • ए मन जरा थम

    ए मन, ज़रा थम.
    तू चला है… थाम के,
    अपनी पतवार…
    नदी तो, बहती रहती,
    जो सतत् , चाहे
    जैसे भी हों रास्ते…
    कंकरीले.. पथरीले…
    पतवार ना छूटे, हाथों से…
    तू कौन??
    तेरा वजूद क्या??
    सिर्फ़ एक आत्मा!!
    राह में, जो मुकाम आए…
    वो पड़ाव भर ;
    इस सफ़र के…
    तू घिरा,है। जिस भीड़ से..
    उनके , कुछ ॠण हैं बाकी,
    भरदे, अपने प्रेम के प्यालों से..
    पार करके, ये पड़ाव…
    फिर थामले, अपनी पतवार…
    कि,ये तेरी नियति नहीं..
    अभी तो, सफ़र है बाकी.
    कि,पहचान ख़ुद की,
    अभी है बाकी…..

    ……..कविता मालपानी

  • अब ऐसा वक्त आ गया

    कवि तो खुशिया फैलाने का जरिया था
    पर अब ऐसा वक्त आ गया
    कागज़- कलम को छोड़ सबने
    लेपटॉप कंप्यूटर को अपना लिया
    लिखने का कीमती वक्त तो
    Whats up twiter खा गया
    उंगलियां you tub को छनती
    दिमाग़ को pub G खा गया
    अब ऐसा वक्त आ गया

  • पहले से ज्यादा

    जिन्हें चाहते थे खुद से भी ज्यादा
    न निभा सके वो अपना वादा
    तन्हा जब छोड़ दिया जमाने ने हमको
    हम खुद के करीब हो गए पहले से ज्यादा

  • युवा

    मै हूँ देश का युवा
    आतंकवाद को जवाब दे के रहूँगा
    मेरे देश के लिए दिलमे नफरत रखने वालो के
    सीने मे गोलियाँ उतार दूंगा
    ऐ पाकिस्तान तू मेरा नाम जान ले
    अपना परिचय तो मै देश का झंडा गाड़ के दूंगा
    तेरी बर्बादी मेरे हाथो होगी
    इस बात की रसीद तेरे हाथ मे फाड़ के दूंगा

  • कवि तो उड़ता पंछी है

    सारे पिंजरे तोड़ चुका वो
    . मन की मर्जी से जीता है.
    कवि तो उड़ता पंछी है जो
    उमंगो के आसमान मे उड़ता है
    कवि तो बहुत ही प्यासा है
    बस भावनाओ मे बहती नदी का पानी पीता है
    शान से वो रहता है
    कलम की डाल पर बैठकर
    सकून के पल वो जीता है

  • मुक्तक

    अनजाने से संसार में खुशीयों को लो बटोर
    अपने पराये में ब्यर्थ ना करो रिस्ते का डोर
    समय बहुत मुल्यवान है करते रहो तुम प्रेम
    सहज ही उत्पत्ति होगी भाई बंधू का प्रेम

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • परिंदा

    ऊड़ न सकूँ, पंख कतरा मैं परिंदा हूँ।
    पर मरा नहीं अभी तक, मैं जिंदा हूँ।
    आजादी तुझे ही नहीं हमें भी है पसंद,
    तू ना सही, तेरे कृत्य पर मैं शर्मिन्दा हूँ।

  • तलाश

    पत्थर पत्थर कण कण
    ढूंढे आस पास
    चाहे ढूंढ मुझे तू मस्जिद
    चाहे काबे कैलाश
    जो खुद को टटोल लिया
    समझ ख़तम तेरी तलाश

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