आती नहीं है नींद क्यों रातों में आजकल।
तस्वीर बन रही है एक आँखों में आजकल।
फूलों से दोस्तीदोस्ती है या उल्फत का असर है।
शोखी घुली है उसकी बातों में आजकल।
कुछ दिल से हो रही है क्यों महकी हुई फ़िज़ा।
मेहंदी रचा रही है वो हाथो पे आजकल।
#कुलदीप अनजाना

आती नहीं है नींद क्यों रातों में आजकल।
तस्वीर बन रही है एक आँखों में आजकल।
फूलों से दोस्तीदोस्ती है या उल्फत का असर है।
शोखी घुली है उसकी बातों में आजकल।
कुछ दिल से हो रही है क्यों महकी हुई फ़िज़ा।
मेहंदी रचा रही है वो हाथो पे आजकल।
#कुलदीप अनजाना

हम अपना हाल -ए- दिल आपसे कहते रहे
कभी बच्चा तो कभी मासूम आप हमें कहते रहे
आज तक कोई सबक पढा न जिंदगी में हमने
ताउम्र हम आपकी आखों जाने क्या पढते रहे
इक अरसा बीत गया हम मिले नहीं आपसे
तुझसे मुलाकात के इंतजार में हम तनहा मरते रहे
न हुई सुबह न कभी रात इस दिल ए शहर में
कितने ही सूरज उगे कितने ही ढलते रहे
अनजान राहों में चलते रहे मंजिल की तलाश में
चलना ही मुसाफिर का नसीब है सो हम चलते रहे

काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें
देखो बता रही हैं, चादर की सलवटें।
उधड़ेगी किसी रोज सिलाई ये देखना
यूं इस तरहं जो लेकर अंगडाईयां उट्ठे।
पहले ही हो रही है, बड़ी जोर की बारिश
अब आप लगे भीगी जुल्फों को झटकनें।
तस्वीर मेरी सीने पे रखकर न सोइये
हर सांस मेरी नींद भी लगती है उचटने।
एकटक न देख लेना कहीं डूबता सूरज
मुमकिन है रात भर फिर वो शाम न ढले।
……….सतीश कसेरा
झगड़ों में घर के, घर को शर्मसार मत करो
आंगन तो खुला रहने दो, दीवार मत करो।
मारे शर्म के आंख उठा भी सकूं न मैं
अहसानों का इतना भी कर्जदार मत करो।
हर ओर चल रही हैं, नफरत की आंधियां
और आप कह रहे हो कि प्यार मत करो।
लफ्जों की जगह खून गिरे आपके मुंह से
अपनी जबां को इतनी भी तलवार मत करो।
हंसती हुई आंखों मेें छलक आये न आंसू
हर शख्स पे इतना भी तो एतबार मत करो।
—————–सतीश कसेरा
कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है
कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।
चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं
पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।
गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने
कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।
यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के
सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।
ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर
नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।
—————-सतीश कसेरा
यहां कोई न भला लगता है
अब बियाबान मेंं जी लगता है।
आ के शमशान में है ढ़ेर हुआ
वो उम्र भर का चला लगता है।
तुम भी ले आये क्या नकाब नई
आज चेहरा तो बदला लगता है।
आप ऐसे न छुआ कीजे मुझे
मेरे अंदर से कुछ चटकता है।
गरीबी जब से है जवान हुई
घर का दरवाजा बंद रहता है।
छोडिय़े, उसको कहां ढूंढेंगे
जो कहीं आस्मां में रहता है।
………सतीश कसेरा
कोई तो दे दो वजह जीने की
वरना मत पूछो वजह पीने की।
दर्द अब आ गया है सहना तो
क्या जरुरत है जख्म सीने की।
मेरी खता नहीं तो कैसी सजा
बात कुछ तो करो करीने की।
कोई कह दे कि याद करते हैं
आग बुझ जाये कुछ तो सीने की।
न गले लग के अब मिले हमसे
न फिर आई महक पसीने की।
———सतीश कसेरा
दोस्त, दुश्मन तमाम रखता हूं
मैं हथेली पे जान रखता हूं।
शाम तक जाम क्यूं उदास रहे
मैं तो अपनी ही शाम रखता हूं।
कफन खरीद के है रखा हुआ
आखिरी इन्तजाम रखता हूं।
जब भी चाहे उजाड़ देना मुझे
मैं जरा सा सामान रखता हूं।
मैं किसी काम का नहीं क्यूंकि
काम से अपने काम रखता हूं।
मुझे तो इसलिये बदनाम किया
मैं शहर में जो नाम रखता हूं।
……….सतीश कसेरा
थकी सोई हुई लहरों को चलकर थपथपाते हैं
समंदर में चलो मिलकर नया तूफान लाते हैं।
न आये पांव में छाले तो मंजिल का मजा कैसा
सफर को और थोड़ा सा जरा मुश्किल बनाते हैं।
अंधेरे में बहुत डरती है घर आती हुई लड़की
अभी सूरज को रुकने का इशारा करके आते हैं।
गया हो घोंसले से जो परिन्दा फिर नहीं लौटे
कभी जाकर के देखो पेड़ वो आंसू बहाते हैं।
हमें मालूम है कागज की कश्ती डूब जायेगी
मगर ये देखते हैं इससे कितनी दूर जाते हैं।
उन्हें मालूम है सबका यही अंजाम होना है
खिलौने तोड़कर बच्चे तभी तो खिलखिलाते हैं।
————————————————–सतीश कसेरा
कुछ न था हाथ की लकीरों में
वरना होते न क्या अमीरों में।
भरे जहान में भी कुछ न मिला
हैं खाली हाथ हम फकीरों से।
आपके प्यार से तो लगता है
बंधे हो जैसे कुछ जंजीरों से।
किसके जाने से जान जाती है
कौन रहता है वो शरीरों में।
कोई भटका हुआ ही आएगा
हम हैं तन्हा खड़े जजीरों सेे।
———सतीश कसेरा
खुशी तलाश की, तो मिल ही गई
दर्द के नीचे दब गई थी कहीं।
छेड़ बैठे वो अपना ही किस्सा
बीच में बात मेरी, रह ही गई।
एक दीवार सी थी दोनों में
गिराने बैठे, तो फिर गिर भी गई।
मुद्दतों बाद वो घर आये मेरे
चलो अपनी दुआ भी, सुन ली गई।
सारी यादों की खूब कस कर के
गठरी बांधी थी,मगर खुल ही गई।
कश्ती तूफां से निकल ही आई
किसी तरह भी चली, चल ही गई।
………..सतीश कसेरा
वो नदी सी थी, मैं किनारा सा
कुछ ऐसा ही मिलन, हमारा था।
खुद में बस डूबते, उतरते रहे
न समन्दर था, न किनारा था।
उसने शायद, सुना नहीं होगा
मैने शायद, उसे पुकारा था।
कसूर ये नहीं कि किसका था
सवाल ये है, क्या तुम्हारा था।
बिना देखे, गुजर गए दोनों
मुड़ के फिर देखना गवारा था।
———सतीश कसेरा
हरे-भरे से थे रस्ते पहाड़ होने लगे
नदी क्या सूखी, इलाके उजाड़ होने लगे।
कौन से देवता को खुश करें कि बारिश हो
रोज चौपाल में ये ही सवाल होने लगे।
लकीरे खिंचने लगी रिश्तों में तलवारों से
जमीं के टुकड़ों को लेकर बवाल होने लगे।
इतना लंबा तो नहीं होता है चिट्ठी का सफर
कि आते-आते महीने से साल होने लगे।
कमर के साथ लचकती थी और छलकती थी
प्यासी उस गगरी में मकड़ी के जाल होने लगे।
नाम तक लेता नहीं है कभी उतरने का
कर्ज के पंजों में अब जिस्म हाड़ होने लगे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा
सोचता हूं अभी पाजेब बजी है उसकी………..
दूर अपने से उसे होने नहीं देता हूं
मैं ख्यालों में उसके साथ-साथ रहता हूं।
मैने दीवार पे टांगें हुए हैं फ्रेम कई
उसको मैं सोच के तस्वीर लगा लेता हूं।
खोल देता हूं कई बार खिड़कियां सारी
किसी झोंके में हवा के उसे पा लेता हूं।
कमरे में आती हुई धूप की चुटकी लेकर
उसकी तस्वीर पे बिंदिया सी सजा देता हूं।
सोचता हूं अभी पाजेब बजी है उसकी
फिर कई चाबियां जमीं पे गिरा देता हूं।
तार पर उड़ता हुआ उसका ही आंचल होगा
मैं सभी भीगी सी यादों को सूखा देता हूं।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा

घुल गया उनका अक्स कुछ इस तरह अक्स में मेरे
आईने पर भी अब मुझे न एतबार रहा
हमारी मोहब्बत का असर हुआ उन पर इस कदर
निखर गयी ताबिश1-ए-हिना, न वो रंग ए रुख़्सार रहा
हमारी मोहब्बत पर दिखाए मौसम ने ऐसे तेवर
न वो बहार-ए-बारिश रही, न वो गुल-ए-गुलजार रहा
भरी बज्म2 में हमने अपना दिल नीलाम कर दिया
किस्मत थी हमारी कि वहां न कोई खरीददार रहा
तनहाईयों में अब जीने को जी नहीं करता
दिल को खामोश धडकनों के रूकने का इंतजार रहा

1. ताबिश : चमक
2. बज़्म= सभा
जिन्दगी जब जरा घबराने लगी
फिर किताबों की याद आने लगी।
कितना जागा हुआ था रातों का
अब किताबें मुझे सुलाने लगी।
उसकी तस्वीर अचानक निकली
तो वो किताब मुस्कराने लगी।
धूल का रिश्ता था किताबों से
जब उड़ाई, वहीं मंडराने लगी।
फूल सूखा हुआ मिला लेकिन
उसी खुश्बू की महक आने लगी
कुछ किताबें थी जिंदगी जैसी
जरा सा खोला तो कराहने लगी।
थूक से पन्ने कुछ ही पलटे थे
जुबां लफ्जों को गुनगुनाने लगी।
मैली जिल्दों सी जिंदगी अपनी
फटे पन्नों सी याद आने लगी।
———सतीश कसेरा
मिले थे फिर से तो, पर बात न होने पाई
उनके लब कांप गए, मेरी आंख भर आई।
बुझ गए थे सभी चिराग मगर इक न बुझा
तो हवा जा के आंधियों को साथ ले आई।
जंहा से दूर निकल आये थे, वहीं पहुंचे
मेरे सफर में हर इक बार उसकी राह आई।
अपने हालात पे खुद रोये और खुद ही हंसे
हमीं तमाशा थे और हम ही थे तमाशाई।
मेरे हर दर्द से वाकिफ है आस्मां कितना
हम न रोये थे तो बरसात भी नहीं आई।
जिंदगी भर उनकी हर याद संभाले रक्खी
उम्र भर इस तरह हम उनके रहे कर्जाई।
~~~~~~~~सतीश कसेरा
जो आँख देख ले उसे वो वहीं ठहर जाती है
देखते देखते उसे शाम ओ सहर बीत जाती है
फ़लक से चाँद भी उसे देखता रहता है रातभर
उसकी रूह चाँदनी ए नूर में खिलखिलाती है
महकते फूल भी उससे आजकल जलते है
तसव्वुर से उसके फिजा सारी महक जाती है
मदहोश हो जाता है मोसम लहराए जो आचॅल उसका
जुल्फें जो खोल दे वो तो घटाऍ बरस जाती है
तनहाइयों में जब सोचता हूं उनको
शब्द ओ शायरी खुद ब खुद सज जाती है

पत्ता-पत्ता हिसाब लेता है
तब कहीं पेड़ छांव देता है।
भीड़ में शहर की न खो जाना
ये दुआ सबका गांव देता है।
हम भी तो डूबने ही निकले थे
वरना कौन अपनी नाव देता है।
किसी उंगली में जख्म देकर ही
कोई कांटा गुलाब देता है।
जहां बिकेगा बेच देंगे ईमां
कौन मुहमांगा भाव देता है।
जान देने का हौंसला हो अगर
फिर समंदर भी राह देता है।
जिंदगी दे के ले के आया हूं
कौन यूं ही शराब देता है।
प्यार खिलता है बाद में जाकर
पहले तो गहरा घाव देता है।
~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा
कौन सा दर्द सुनाया जाए……….
नींद को ढूंढ के लाया जाए
चलो कुछ देर तो सोया जाए।
जल गई इंतजार में आंखें
अब जरा अश्क बहाया जाए।
आ के फिर बैठ गईं हैं यादें
कौन सा दर्द सुनाया जाए।
हमने जाना है दर्द जलने का
इन चरागों को बुझाया जाए।
रात को टूटेंगे कितने तारे
ये जमीं को भी बताया जाए।
अपनी तकदीर में रोना है अगर
सबको हंस-हंस के बताया जाए।
~~~~~~~~~~~सतीश कसेरा
वो जमीं आसमां भी दूर रह के मिलते रहे
हम अपने फासिलों में रहके बस तड़पते रहे।
हमारे बीच खामोशी की नदी बहती रही
हम किनारों की तरह वैसे साथ चलते रहे।
जरा सा जिक्र ही छेड़ा था उनके वादों का
वो सर झुका के बेबसी से हाथ मलते रहे।
लबों तक आ के बर्फ हो गई कितनी बातें
लफ्ज अंगारे से बनकर जुबां पे जलते रहे।
हवा हम दोनों के जिस्मों की छुअन लाती रही
ऐसे महसूस हम इक दूसरे को करते रहे।
उदास नजरों से उठकर चले गए वो तो
उनके कदमों के निशां देर तक सिसकते रहे।
~~~~~~~~~~~~~~~~~सतीश कसेरा
कुछ तो होता जरुर नाता है
ऐसे कोई नहीं मिल जाता है।
उसी के सामने दिल को खोलें
जिसे कुछ हाल पढऩा आता है।
फिर कोई भीड़ ही नहीं लगती
भीड़ में जब वो नजर आता है।
किसको रख लें, किसे गिरा दें वो
ये तो नजरों को खूब आता है।
साथ चलती रहे दुनिया सारी
साथ कोई एक ही निभाता है।
उसके दिल में उतर के देखेंगे
दूर से कब वो समझ आता है।
साथ उनका तो बस बहाना था
रास्ता तो हमें भी आता है।
………….सतीश कसेरा
कहीं बेघर ने इक छत का सहारा कर लिया होता
तो फिर हर हाल में उसने गुजारा कर लिया होता।
मुसाफिर का सफर थोड़ा जरा आसान हो जाता
अगर रस्तों ने मंजिल का इशारा कर दिया होता
किनारे पर ही आकर के अगर हर बार डूबेगी
तो तूफां में ही कश्ती ने किनारा कर लिया होता।
अभी बाकी तुम्हारी दास्तां थी, क्या पता उनको
वो रुक करके चले जाते, इशारा कर दिया होता।
तेरी रंगीन दुनियां देखने को वो भी तरसे हैं
जो आंसू सूख पाते तो नजारा कर लिया होता।
वो पहली चोट भारी न पड़ी होती अगर दिल पर
तो हमने इश्क भी यारो दोबारा कर लिया होता।
………….सतीश कसेरा
चांद पे चरखा चलाती रही……..
खुदा की दुनिया है, इसमें तो क्या कमी होगी
हमारी आंख ही में ठहरी कुछ नमी होगी।
जितना जीने के लिये चाहिये वो सब कुछ है
नहीं लगता है कि ऐसी कहीं जमीं होगी।
फिर से कोई सुना के हो सके तो बहला दे
वो सब कहानियां बचपन में जो सुनी होंगी।
चांद पे चरखा चलाती रही बुढिया कब से
इतना काता है तो कुछ चीज भी बुनी होगी।
आईना बन के चमकती है आस्मां के लिये
वो बर्फ आज भी पहाड़ पर जमी होगी।
………………सतीश कसेरा
वो जब गली से गुजरें तो, कोई वहां न हो
घर के सिवाय मेरे कोई, घर खुला न हो।
बेहतर है कि दीवारों से, कुछ दूर ही मिलें
दीवारों के भी कान कहीं दरम्यां न हों।
मुमकिन है मिल रहीं हों, हाथों की लकीरें
पर बीच में तो कोई बुरा, ग्रह पड़ा न हो।
अब ये भी अदाकारियां, देता है इश्क ही
कि दिल का हाल चेहरे से कुछ ब्यां न हो।
ये डर भी साथ हो कि मोहब्बत की राह में
खाई तो पार कर लें, आगे कुआं न हो।
कितने ही दर्द इश्क के आंखों से बहेंगे
बस दिल जले तो ऐसे जले कि धुंआ न हो।
…………..सतीश कसेरा
उसने जब उठते हुए रोका नहीं
मैने भी चलते हुए सोचा नहीं।
सामने सबके गले लग के मिले
कभी तन्हाई में तो पूछा नहीं।
इतना हंसना, ये मुस्कराना तेरा
कहीं जमाने से तो धोखा नहीं।
कैसे आऊं बता तेरे दिल में
कोई खिड़की नहीं, झरोखा नहीं।
नींद आ जाए, अश्क बहते रहें
वैसे इस तरह कोई सोता नहीं।
आप हीं बदलें खुद अपना चेहरा
आईने में तो हुनर होता नहीं।
…….सतीश कसेरा
भुला सकोगे न तुम कभी भी ,
की तुमको इतना मैं प्यार दूंगा .
जो होगा चुलमन वो होंगी आँखे ,
उसी से तुमको निहार लूंगा .
मगर रहे याद तुम्हे सदा ये,
उसी में नज़रें उतार लूंगा .
तू मेरा साकी मैं रिन्द तेरा,
ये मयकदा ही तेरा बसेरा ,
पिला कभी तो मेरे हमनफ़स ,
तुम्हारे दर पे खड़ा हु बेबश ,
नज़र न फेरो , पिला के जाओ,
कसम है दिल में उतार लूंगा ..
भुला सकोगे न तुम कभी भी,
की तुमको इतना मैं प्यार दूंगा..
…atr
कोई तो रंग मिलाया जाये
दिल का धुंआ भी तो देखा जाये।
बेबसी ये कि रोक भी न सको
और कोई पास से चला जाये।
जहां सेे भूले थे घर का रस्ता
फिर उसी मोड़ पे जाया जाये।
आईने और कितने बदलोगे
अक्स अपना कभी बदला जाये।
जिदंगी की किताब देखें जरा
कोई तो लफ्ज समझ में आये।
वक्त की तरह मिला हूं उनसे
क्या पता लौटकर न हम आये।
…………सतीश कसेरा
कौन किस्मत से भला जीता है……….
ये उसके खेल का तरीका है
कौन किस्मत से भला जीता है।
पहुंच न पाते कभी मंजिल तक
रास्तों को भी साथ खींचा है।
सुबह दिल खूब लहलहायेगा
रात भर अश्क से जो सींचा है।
कोई दुआ या बद्दुआ तो नहीं
कौन करता ये मेरा पीछा है।
सुबह उठ जाये वो ऐसे-कैसे
रात भर बैठ कर तो पीता है।
लकीरें हाथ की न गिर जाएं
कस के मुट्ठी को जरा भींचा है।
………………सतीश कसेरा

उसके चेहरे से नजर हे कि हटती नहीं
वो जो मिल जाये अगर चहकती कहीं
जिन्दगी मायूस थी आज वो महका गयी
जेसे गुलशन में कोई कली खिलती कहीं
वो जो हंसी जब नजरे मेरी बहकने लगी
मन की मोम आज क्यों पिगलती गयी
महकने लगा समां चांदनी खिलने लगी
छुपने लगा चाँद क्यों आज अम्बर में कहीं
भूल निगाओं की जो आज उनसे टकरा गयी
वो बारिस बनकर मुझ पे बरसती गयी
कुछ बोलना ना चाहते थे मगर ये दिल बोल उठा
धीरे- धीरे मधुमयी महफिल जमती गयी
आँखों का नूर करता मजबूर मेरी निगाहों को
दिल के दर्पण पर उसकी तस्वीर बनती गयी
सदियों से बंद किये बेठे थे इस दिल को
मगर चुपके से वो इस दिल में उतरती गयी
तिल तिल जलता हे दिल मगर धुआं हे कि उठती नहीं
परवाना बनकर बेठे हे शमां हे की जलती नहीं
हो गयी क़यामत वो जो सामने आ गयी
दर्द ऐ दिल से गजल आज क्यों निकलती गयी
थोडा सा शरमाकर, हल्के से मुस्कुराकर झुकी जो नजर
नज़रे-नूर-ओ-रोशनी में मेरी रंगे-रूह हल्के से घुलती गयी

आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे
आप हमारी हकीकत तो बन न सके
ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे
आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे
सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे
जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे

खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन——————-
पता करो कि कहां, किसने जाल फैलाया
सुबह गया था परिन्दा वो घर नहीं आया।
रोशनी में ही चलेगा वो साथ—साथ मेरे
कितना डरता है अंधेरों से ये मेरा साया।
मेरी आहट को सुनके बंद रही जब खिडकी
बडी खामोशी से मैं उसकी गली छोड आया।
धूप में जलते हुए उससे ही देखा न गया
पेड मेरे लिये कुछ नीचे तलक झुक आया।
मुझे पता था कि तूफान यूं न मानेगा
मैं अपनी कश्ती डूबो करके घर चला आया।
खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन
कि डूबा जैसे ही सूरज, तो चांद उग आया।
.———————————————सतीश कसेरा

जिंदगी मेरी जिंदगी से परेशान है
बात इतनी है कि लिबास मेरे रूह से अनजान है
तारीकी है मगर, दिया भी नहीं जला सकते है
क्या करे घर में सब लाक के सामान है
ऐसा नहीं कि कोई नहीं जहान में हमारा यहां
दोस्त है कई मगर, क्या करें नादान है
कोई कुछ जानता नहीं, समझता नहीं कोई यहां
जो लोग करीब है मेरे, दूरियों से अनजान है
घर छोड बैठ गये हैं मैखाने में आकर
कुछ नहीं तो मय के मिलने का इमकान है
ढूढ रहा हूं खुद को, कहीं कभी मिलता नहीं
चेहरे की तो नहीं, मुझे उसके दिल की पहचान है
गुजर जायेगी जिंदगी अब जिंदगी से क्या डरना
जो अब बस पल दो पल की मेहमान है
मोहब्बत करके पछताने की खुद को यूं सजा दूंगा
तुम्हें यादों में रक्खूंगा मगर दिल से भूला दूंगा।
रहो बेफ्रिक तूफानों तुम्हारा दम भी रखना है
किनारा आने से पहले मैं कश्ती को डूबा दूंगा।
ऐ लंबी और अकेली रातों इतना मत सताओ तुम
मैं सूरज को किसी दिन वक्त से पहले उगा दूंगा।
यूं ही घुट—घुट के रोने की मुझे आदत नहीं यारो
किसी दिन टूट कर बरसूंगा, सब आंसू बहा दूंगा।
कहानी कहने में भी हुनर की होेती जरुरत है
यूं अपना गम सुनाउंगा कि तुम सबको हंसा दूंगा।
जहर मत घोलना नफरत का, तुमको आग से मतलब
मुझे पहले बता देना,मैं अपना घर जला दूंगा।
…………………सतीश कसेरा
नैनो के सूखे मेघो से मैं आज अगर बरसात करूँ ,
हल करुँ ज़मीन ए दिल में मैं नीर कहाँ से मगर भरूँ?
है सूख चुका अब नेत्र कूप न मन का उहापोह बचा ,
न मेघ रहा न सावन है ,मिट गया जो कुछ था पास बचा .
एक बार हौसला करके मैंने बीज प्रेम के बोये थे ,
न मौसम ने रखवाली की ,सावन ने पात न धोये थे .
अब न मन है , न मौसम है ,न उर्वर क्षमता धरती की ,
न नैनो में अब पानी है ,न दिल में इच्छा खेती की .
रोते है मेघ और कूप सभी ,करता विलाप अब ये मन है ,
फिर भी न आंसू गिरते है ,न नैनो में इतना दम है .
अब बस अंधियारी रातो का यह निपट घना सन्नाटा है ,
दिल रोता है , मैं लिखता हूँ ,जीवन से पल का नाता है .
मैं जाऊँ पर ये गीत मेरे ,फिर किसी जमीन ए बंज़र में ,
मेघ बने ,बरसात करे ,फिर किसी अकालिक मंज़र में …
…atr
ज़रा कुछ देर रहमत हो सके तो अच्छा हो ,
ज़रा मन शांत होकर सो सके तो अच्छा हो.
.
ख़तो के ज़ाल में उलझे हुए है मीर हम ,
ज़रा कुछ देर खुद में खो सके तो अच्छा हो .
.
गुज़र गया है मुसाफिर फिर शहर से तेरे ,
तेरा कुछ राब्ता दिल हो सके तो अच्छा हो .
.
न कह पाया जुबा से हाल दिल का अब तलक,
ज़रा अब हर्फ़ मेरे कह सके तो अच्छा हो.
.
सुना है हिज़्र के किस्से ,विरह की दास्ताँ समझी,
ज़रा अपना भी दिल अब रो सके तो अच्छा हो
…atr
यहाँ हर शख्स है तेरा, वहां हर कब्र है मेरी,
जहाँ कैसा बनाया है खुद ने क्या इरादा था?
अब तो हालात भी मुझसे मिचौली आँख करते है,
को सपनो में आता है ,किसी को याद करते है.
मुझे है डर कहीं फिर से किसी हूरों की महफ़िल में,
उड़ाया फिर से न जाये ,ये कुचला जिगर मेरा..
तेरी चाहत में इतना मैं पराया हो गया खुद से ,
कि दिल मेरा है फिर भी बात करता है सदा तेरी..
कभी वो चांदनी मेरी थी, अब पावस की है यह रात,
नहीं दिल में मेरे अब वो, नहीं हाथो में उसका हाथ..
न वो मेरी न मैं उसका तो फिर ये बीच का क्या है,
नहीं देखूंगा अब उसको जो चेहरा चाँद जैसा है…
…atr
मोहब्बत में हारे, क़यामत में हारे
की ये ज़िंदगी हम शराफत में हारे..
न कोई है अपना ,न कोई पराया,
अब जियें किसलिए और किसके सहारे..
न है यामिनी आज जीवन में मेरे ,
मिटे, मिट गए आज हम फिर किनारे..
कभी लए से सांसे जो चलती थी मेरी ,
मगर अब खड़े आज बेबस बेचारे..
मिला भी नहीं कुछ ,बचा भी नहीं कुछ,
जो था पास में सब तुम्हारे पे हारे…
मोहब्बत में हारे ,क़यामत में हारे,
की ये जिंदगी हम शराफत में हारे…
…atr
वो मंज़र याद है तुमको ,जुदा हम तुम हुए थे जब,
समंदर याद है तुमको जहाँ पत्थर चलाया था..
कभी जब याद आ जाये ,ज़रा हमको भी करना याद ,
किसी के साथ जो तुमने वहां कुछ पल बिताया था.
नहीं दिल से अभी वो शाम जाती है , नहीं होता सवेरा,
की जब से तुम गए हो मीर, मेरा जीवन अँधेरा.
ख़ुदा कैसी तमन्ना है,की मैं अब भी तरसता हूँ,
पता मुझको , यकीं मुझको, मगर फिर भी मचलता हूँ…
…atr
छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ?
वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या?
कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,
न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात..
जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या?
वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को,
वो नदियां है क्यों प्यासी सी, बुलाती है बुलाने को,
उन्ही नदियों की रहो में रुकावट आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
…atr
आज हम भी है मेहमान तेरे शहर में,
दिखता नहीं मकान तेरे शहर में.
ग़ुम हो गयी है शाम की मस्ती भी अब यहाँ,
ग़ुम हो गया करार तेरे शहर में..
आते राहों में मिल गया तेरा आशिक,
कहने लगा न जाओ तेरे शहर में.
जब से तुमने छोड़ा है दस्त ए गुलाब को,
वन हो गया वीरान ,तेरे शहर में.
बन्दों का हाल ऐसा मैं कह न सकता मीर,
पागल हुए जवान तेरे शहर में.
दिन भर उठी है धूल,पैरों में आ लगी,
मैंने कहा सलाम है,तेरे शहर में.
हर दिन यहाँ पर तेरी यादो का तमाशा,
बिकता है हर मकान तेरे शहर में.
जो गुल था ,गुलदान था,गुलशन ,ग़ुलाब था,
अब आंधी है ,और तूफ़ान तेरे शहर में..
…atr
आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे
आप हमारी हकीकत तो बन न सके
ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे
आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे
सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे
जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे


तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है
तुझसे एक बार मैं कह दू, तू मेरी जुस्तजु है
भॅवरा बनकर भटकता रहा महोब्बत ए मधुवन में
चमन में चारो तरफ फैली जो तेरी खुशबु है
जल जाता है परवाना होकर पागल
जानता है जिंदगी दो पल की गुफ्तगु है
दर्द–ए–दिल–ए–दास्ता कैसे कहे तुझसे
नहीं खबर मुझे कहां मैं और कहां तू है
शायर- ए- ग़म तो मैं नहीं हूं मगर
मेरे दिल से निकली हर गज़ल में बस तू है
इन परों में वो आसमान, मैं कहॉ से लाऊं
इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं (कफ़स = cage)
हो गये पेड सूने इस पतझड के शागिर्द में
अब इन पर नये पत्ते, मैं कहॉ से लाऊं
जले हुए गांव में अब बन गये है नये घर
अब इन घरों में रखने को नये लोग, मैं कहॉ से लाऊं
बुझी-बुझी है जिंदगी, बुझे-बुझे से है जज्बात यहॉ
इस बुझी हुई राख में चिन्गारियॉ, मैं कहॉ से लाऊं
पथरा गयी है मेरे ख्यालों की दुनिया
अब इस दुनिया में मुस्कान, मैं कहॉ से लाऊं
अब न चांदनी रही न कोई चिराग रहा
राहों में रोशनी के लिए न कोई आफताब रहा
उनकी महोब्बत के हम मकरूज़ हो गए
उनका दो पल का प्यार हम पर उधार रहा
वेवफाई से भरी दुनिया में हम वफा को तरस गए
अब तो खुद पर भी न हमें एतबार रहा
शम्मा के दर पर बसर कर दी जिंदगी सारी
परवाने को शम्मा में जलने का इंतजार रहा
उन्हे देख देख कभी गज़ल लिखा करते थे हम
अब न वो गजल रही और न वो हॅसी गुबार रहा

वो आये कभी पतझङ कभी सावन की तरह
जिंदगी हमें मिली हमेशा बस उनकी तरह
फूलों के तसव्वुर में भी हुआ उनका अहसास
आये वो मेरी जिंदगी में खिलती कली की तरह
जब से दी जगह खुदा की उनको दिल में हमने
याद करना उनको हो गया इबादत की तरह
डूब गया दिल दर्द ए गम ए महोब्बत में
बहा ले गयी हमें साहिल ए इश्क में लहरो की तरह
हुई जब रुह रुबरु उनसे जिंदगी ए महफिल में
समा गयी वो मेरी रुह में सांसो की तरह
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