Category: ग़ज़ल

  • कुछ तो दायरे हो

    कुछ तो दायरे हो , जिसमे रहना जरूरी है
    जिस के अंदर खुद को भी रखना जरूरी है

    प्रगति के हम एक कारीगर है मगर
    वक़्त के साथ कारीगर बदलते रहना भी जरूरी है

    कुछ क़र्ज़ हमारे ऊपर खुद का भी है
    अदा उसका होते रहना भी जरूरी है

    अनंत है इच्छाए उस पर कई दौड़
    कुछ दौड़ में पिछड़ते रहना भी जरूरी है

    ज़िंदगीकी कोई डोर नहीं है तेरे हाथों में
    हर साँसों को जीते रहना भी जरूरी है

    राजेश’अरमान’

  • चल पड़ा फिर जिस्म

    चल पड़ा फिर जिस्म
    किसी राह में
    मन को छोड़ अकेला
    क्यों नहीं चलते
    दोनों साथ -साथ
    कोई रंजिश नहीं
    फिर भी रंजिश
    फूल की बगावत
    किसी टहनी से
    भवरे की शिकायत
    किसी फूलों से
    मन की तिजारत
    किसी जिस्म से
    मन रहता है
    जिस्म में किसी
    मुसाफिर की तरह
    जिस्म की हसरत
    जिस्म की तरह
    नश्वर है
    काश रग़ों में
    मन दौड़ता
    जिस्म की
    उमंगों जैसा
    किसी जिस्म
    किसी मन
    की राह अलग न होती
    राजेश’अरमान’

  • रात अपना ही कोई

    रात अपना ही कोई
    किस्सा बन जाता हूँ
    दिन के उजाले में कोई
    हिस्सा बन जाता हूँ
    निकल तो जाता हूँ
    बाज़ारों में कहीं
    शाम के होते ही
    न चलने वाला कोई
    सिक्का बन जाता हूँ
    राजेश’अरमान’

  • दरके आइनों को

    दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
    गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है

    फासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है
    ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत है

    हरसूँ बिखर गए तेरे पन्नें नसीब के
    अब तो खाली जिल्द की हसरत है

    वक़्त रूठा किसी बच्चे की माफिक
    जिसकी जिद है या कोई शरारत है

    अब किस और जहान जाएँ’अरमान’
    जिस तरफ देखिये बस नफरत है

    दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
    गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है

    राजेश’अरमान’

  • कहाँ तो आरजुएं थी

    वक़्त की चाल के अंदाज़ निराले तो न थे
    ख्वाब ही सो गए लेके कोई करवट शायद

    कहाँ तो आरजुएं थी तेरे मिलने की
    यां तो खुद ही हिस्सों में बट गए शायद

    जुबान पे क्यों कोई इल्ज़ाम रहें
    खता मेरी जो चुप रह गए शायद

    मैं ही चल न सका साथ कारवां के
    फ़ासले काफिलों से यू बढ़ गए शायद

    हर सीने में मंज़िलें धड़कती है
    यही रिश्ता बस रह गया शायद

    निस्बत कुछ इस तरह निभाई गई
    पास रहकर भी दूर रह गए शायद

    चंद कतरे भीगे साथ रख ‘अरमान’
    अब आँखों में नमी आ जाये शायद

  • धुंधले आईने में

    धुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता
    वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जाता

    वो चिरागों सा रोशन कभी एक नूर सा था
    क्या हुआ शख्स अब वो नज़र नहीं आता

    कहता रहा रहने दो रिश्तों को पर्दों में
    कुरेदने से सच रिश्तों का बदल नहीं जाता

    उसकी हसरत थी महफूज उसके हाथों में
    हाथों की जिन लकीरों को कोई बदल नहीं पाता

    कौन देखेगा इन हवाओं में मुड़ के ‘अरमान’
    साथ दुनिया के आखिर वो क्यों चल नहीं पाता

    धुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता
    वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जाता
    राजेश ‘अरमान’

  • हर सांस है मुजरिम न

    हर सांस है मुजरिम न जाने किस गुनाह में
    हर ख्वाईश है क़ैद न जाने किस गुनाह में

    न कुछ बस में तेरे न कोई डोर हाथ में
    जाएँ तो ज़िंदगी किन क़दमों की पनाह में

    थमा वक़्त कभी तेज भागता वक़्त बेपैबंद
    हर लम्हा दुबका बैठा ज़िंदगी की राह में

    ख्वाब के बाद ऑंखें सदा खुली रखना
    न जाने कब आ जाएँ कोई निगाह में

    कब तलक खुद को बहलाएगा ‘अरमान’
    फिर किसी अजनबी से मरासिम की चाह में

    हर सांस मुजरिम है न जाने किस गुनाह में
    हर ख्वाईश क़ैद है न जाने किस गुनाह में

    राजेश ‘अरमान

  • ज़िंदगी कभी गूंथे हुए

    ज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती
    कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगती

    आस के फूल हर शाख पे खिलने दो
    टूटी आस चुभते हुए काटें की तरह लगती

    वक़्त की मार से कब कौन बचा यारों
    कभी मुक्के तो कभी लातों की तरह लगती

    ख्वाइश से उगती खवाइश का खेल ज़िंदगी’अरमान’
    कभी चुप तो कभी चीखते सनाटे की तरह लगती

    ज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती
    कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगती
    राजेश ‘अरमान’

  • कोई दिल का मेरे चारागर होता

    कोई दिल का मेरे चारागर होता
    यूँ न तन्हा मेरा सफ़र होता
    आज फिर दिल ने आरजू की है
    घर के अंदर मेरा घर होता /
    वो जो रहते थे हमसाये की तरह
    मेरी परछाई में फिर क्यों न बसर होता
    अब गिला क्या करें किन बातों का
    गर जो होना था कुछ असर होता
    आज मैं दूर बहुत दूर चला आया हूँ
    काश के पास मेरा शहर होता/…
    जुस्तजू की भी कोई होती अगर जुस्तजू
    फसले-गुल न होती, न कोई शजर होता
    कोई दिल का मेरे चारागर होता———–
    RAJESH ‘ARMAN’

  • हर लम्हा गुजर गुजर

    हर लम्हा गुजर गुजर कर कुछ कह गया
    अपनी आँखों में हल्का सा कुछ तैरता गया
    ज़िद जिनकी थी वो ज़िद में रह गए
    हाथ से उनके कोई फैसला सा गया
    ज़िंदगी कुनकुनी धुप तो कभी चुभती तपन
    वो कहते क्यों वो कुम्हलाया सा गया
    असर किसी का किसी पे होने में
    वक़्त लगता मगर किसी से लगाया न गया
    फासले कैसे भी हो मिट सकते है
    सरहद की तरह कभी हमसे बनाया न गया
    जिसको हासिल बुत सी ख़ामोशी ‘अरमान’
    क्यों कहते उससे हाथ मिलाया न गया
    राजेश ‘अरमान’

  • रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात

    रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    तंगदिल है मेरा या तेरा सिलसिला क़ाफ़िर
    न तुम समझे न कुछ हम समझ नहीं पाएं
    वक़्त के वलवले कुछ कम नज़र आते
    ज़ख्म अपने ही मगर भर नहीं पाएं
    तेरी रुखसत से जुड़ा कोई किस्सा हूँ
    पढ़ना चाहा भी मगर पढ़ नहीं पाएं
    अपनी मर्ज़ी भी कोई मर्ज़ी है ‘अरमान’
    जो हुआ हम कुछ कर नहीं पाएं
    रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    राजेश ‘अरमान’
    की बरसात

    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    तंगदिल है मेरा या तेरा सिलसिला क़ाफ़िर
    न तुम समझे न कुछ हम समझ नहीं पाएं
    वक़्त के वलवले कुछ कम नज़र आते
    ज़ख्म अपने ही मगर भर नहीं पाएं
    तेरी रुखसत से जुड़ा कोई किस्सा हूँ
    पढ़ना चाहा भी मगर पढ़ नहीं पाएं
    अपनी मर्ज़ी भी कोई मर्ज़ी है ‘अरमान’
    जो हुआ हम कुछ कर नहीं पाएं
    रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    राजेश ‘अरमान’

  • एक जरूरी दस्तावेज

    एक जरूरी दस्तावेज ही तो है जीवन
    न कागज़ अपना न स्याही अपनी
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    अपनी सासें अपनी धड़कन से विवाद करती
    कभी तालमेल नहीं मन से मन का
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    मन से मन मिलता नहीं फिर भी
    हर संयम अपना ही उपहास करता
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    यथार्थ हो गए पुराने अख़बार से
    हम लिपट गए किसी शै की तरह
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    राजेश ‘अरमान’

  • मुड़े कागज़ की तरह

    मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
    मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है
    अपने हिस्से की गिरवी रखी उदासी को
    देख अब उस पे कितनी सूद चढ़ गई है
    माना हस्ती अपनी खुद की न कतरे से जुदा
    खुद ये कतरा मेरा आईना बन गई है
    मेरी कलम से निकली हुई स्याही यूँ हुई खफा
    ज़ीस्त अपनी कोई बिगड़ी कहानी बन गई है
    क्या है अर्ज़ तेरी कौन सुनेगा ‘अरमान’
    ख्वाइशें खुद बखुद खौफ बन गई है
    मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
    मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है

    राजेश ‘अरमान’

  • कभी तो मेरे माजी

    कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
    जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
    माना की शब की जीस्त दुआओं से है भरी
    हो असर ऐसा ख़्वाबों को सहर कर दिया जाएँ
    फूल भी चुभते रहे ताउम्र किसी खंजर की तरह
    चलो किसी खंजर को फूलों से भर दिया जाएँ
    लाजिमी हो के कुछ वक़्त यू भी मिल जाएँ
    किसी पिंजरे से रिहा खुद को कर दिया जाएँ
    तिश्नगी सेहरा की न थी इस दिल को ‘अरमान’
    कभी ऐसा हो तस्सवुर में समुन्दर भर लिया जाएँ
    कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
    जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
    राजेश ‘अरमान ‘

  • पत्थर ही पत्थर है दिल

    पत्थर ही पत्थर है दिल की जेब मेँ
    है बड़ी सच्ची मगर गर्दिशों की बात है
    अब के गर्मिओं मेँ ठंडक है तो हैरत किसलिए
    किस कदर गर्मियां थी पिछली सर्दियों की बात है
    किस कदर ओढ ली थी तुमने ख़ामोशी की चादर
    अब के गर्मिओं मेँ ये आई कैसी बरसात है
    न कोई शिकायत न कोई मूह फेरने की रस्म
    ऐसी चुप सी मुलाक़ात भी कोई मुलाकात है
    तेरे सवालों की कोई किताब नहीं ‘अरमान ‘
    ज़िंदगी तो खुद अपनी एक सवालात है
    पत्थर ही पत्थर ——–
    राजेश ‘अरमान ‘

  • जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी

    जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी
    समझ पाया तो ढह गयी ज़िंदगी

    करते गुजरा हर सांसों का हिसाब
    ज़िंदगी से कुछ कम रह गयी ज़िंदगी

    पहलूँ में लिए बैठे कई चाँद उदास
    जाने क्याक्या न सह गयी ज़िंदगी

    लम्हां लम्हां मिलके सजी मिलके बनी
    जाते जाते चुपचाप कह गई ज़िंदगी

    उम्र गुजरी किसी सेहरा में ‘अरमान’
    आखरी दौर दरिया में बह गयी ज़िंदगी
    राजेश ‘अरमान’

  • बिखरे ख्वाबों को

    बिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है
    ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या है

    इन हवाओं से कब कोई मुड़ के देखा
    सेहरा की रेत पे बारहा लिखता क्या है

    गैर हो न सके, न अपनों में रहे
    देख तजुर्बों से तुझे दिखता क्या है

    वो बैठा रहा सच की बाँहों में
    देख सही तेरे बाजार में बिकता क्या है

    यही दुंनिया के दस्तूर रह गए ‘अरमान’
    डूबते चाँद को बारहा तकता क्या है

    बिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है
    ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या है
    राजेश’अरमान’

  • हर चेहरे अपने पर

    हर चेहरे अपने पर कोई आश्ना न मिला
    गिला खुद से मगर कोई आईना न मिला

    अपनी तक़दीर-बुलंदी का क्या कहना
    बर्क़ को जब कोई आशियाँ न मिला

    फ़िज़ां मिली तो मगर खुशगवार न थी
    तल्खियों भरा कोई सेहरा न मिला

    हस्ती अपनी जमाने में जुदा निकली
    कोई शख्स शहर में जब बेजुबान न मिला

    एक चुप से लिपट बैठा ‘अरमान’
    क्यों कहते हो कोई तज़ुर्बा न मिला

    राजेश’अरमान’

  • सिर्फ एहसास है

    सिर्फ एहसास है वफ़ा फिर छूने को जी करता है
    यह कौन देता है सदा सुनने को जी करता है

    हर शख्स का वज़ूद जुदा फितरत भी जुदा
    फिर भी उम्मीद वो खुद के वज़ूद सा करता ह

    क्या हो तामीर तेरे घर की तेरी आरज़ू से जुदा
    हर दरीचा मेरे जेहन का तेरी गली खुलता है

    ये अंधेरों की है वफ़ा या उजालों की जफ़ा
    ज़ख्म इक मगर दर्द बारहा मिलता है

    कितने कुचले हुए लिए बैठा है ‘अरमान’
    कोई उजड़ा हुआ गुलशन कभी खिलता है

    राजेश ‘अरमान’

  • बुझे चरागों को हवाओं

    बुझे चरागों को हवाओं का करम न दे
    मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न दे

    जो गुजरा नहीं खुद , मगर आखिर गुजरा
    तुम फ़क़त कोई उदास सा वहम न दे

    जुबाँ जो है हाथों को कोई खंजर क्या दे
    मेरे ज़ख्म हरा रख, कोई मरहम न दे

    फिर कोई मौसम गुजरा मेरे वीरानो में
    तेरी चुप से लिपटा कोई मौसम न दे

    जो भी लिखता, दिल से लिखता ‘अरमान’
    मेरे इन हाथों को कोई कलम न दे

    बुझे चरागों को हवाओं का करम न दे
    मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न दे
    राजेश ‘अरमान’

  • मेरे सफिनों का नाखुदा हो

    मेरे सफिनों का नाखुदा हो , जो तूफानों का तलबगार न हो
    मुझे ऐसा चराग बना दे जो हवाओं का कर्ज़दार न हो

    मेरे हिस्से की हर शे पे लिख दिया तेरा नाम आखिर
    गिला करें वो हरदम और तेरा तरफदार न हो

    ऐसा कोई सौदा न हो और कोई सौदाई भी न हो
    बिक जाएँ जहाँ मेरी वफ़ा ऐसा कोई बाजार न हो

    ज़ीस्त की राहों में ऐसा किसे नसीब गुलशन
    फूल की चाह हो और हाथों में खार न हो

    मत ओढ़ के सो जाना चादर किसी वीरानी की
    कौन समझेगा इसे कहीं हस्ती तेरी शर्मशार न हो

    न हो ऐसा कोई लम्हा मेरी किस्मत में ‘अरमान’
    ख्वाब देखूं तो तेरे चेहरे का दीदार न हो

    राजेश ‘अरमान’

  • कतरा कतरा लहूँ का

    कतरा कतरा लहूँ का जिस्म में सहम गया
    चलो इसी बहाने रगों में बहने का वहम गया

    वो कोई हिस्सा था मेरे ही जिस्म का
    जुदा हुआ वो तोड़ कोई कसम गया

    मेरे मिटने की तारीख एक फ़लसफ़ा ही थी
    जाने क्यों बाँट वो मेरी मौत का परचम गया

    कब था इंकार मुझे मेरी तन्हाई के सौदे का
    वो देख खुद मेरी तन्हाई आखिर सहम गया

    वो तेरे लब्ज़ों की बाज़ीगरी न थी तो क्या थी
    फिर कोई छेड़ मेरे ज़ख्मों में कोई नज़्म गया

    कोई फ़रियाद क्या करें अपनी सांसों से ‘अरमान’
    जब सांसें ही हो क़ातिल ,ठहरा मुझे मुजरिम गया
    राजेश ‘अरमान’

  • हम लुत्फ़ कुछ

    हम लुत्फ़ कुछ बारिशों का यूँ उठा रहे है
    अपने आंसुओं को बारिशों में छुपा रहे है

    उसी को याद करना और हमेशा याद रखना
    किसी को भूलने की क्या अदावत निभा रहे है

    हम तो हो गए कायल अपने नए हुनर के
    खाक दीवानगी की हर तरफ उड़ा रहे है

    अभी तो कारवां कोई गुजरा नहीं फिर भी
    जनाब आप आखिर किस गुबार से घबरा रहे है

    जहाँ में कौन कब किसी का हुआ ‘अरमान’
    बस ये सोच हम तबियत अपनी बहला रहे है

    हम लुत्फ़ कुछ बारिशों का यूँ उठा रहे है
    अपने आंसुओं को बारिशों में छुपा रहे है
    राजेश’अरमान’

  • मेरे तस्सवुर के रंग

    मेरे तस्सवुर के रंग क्यों फीके होने लगे है
    मेरे सायें भी अब मुझसे दूर होने लगे है

    मैंने गिन गिन के सजाये थे जो मेरी वसीयत थी
    वो लम्हे क्यों मेरी ज़िंदगी से कम होने लगे है

    माना की जुस्तजू से ताल्लुक रखना है गुनाह
    अब तो हर ताल्लुक मेरे अपनों से खोने लगे है

    मिज़ाज़ वक़्त का होता है किसी मदारी जैसा
    हम भी चुपचाप किसी खेल में होने लगे है

    अपने दरवाजें को बंद कर दे ‘अरमान’
    ख्वाब आँखों में आके फिर सोने लगे है
    राजेश’अरमान’

  • रिश्तों का सत्य

    रिश्तों का सत्य जो लगता यथार्थ से परे सदा
    मानते हुए छलावा हम जुड़े रहना चाहते है सदा

    ये रिश्तें जो खून से बनते ,खून में ही पनपते है
    अंत होता है खून में ही ये सनते है सदा

    इन्हे तोड़ने का साहस भी न कोई जुटा पाया कभी
    है कोई इस खोखलेपन से गहरा जुड़ा है सदा

    अदा करना जरूरी नहीं जितना जताना जरूरी है
    इन रिश्तों ने जताया है अपना हक़ वो सदा

    जिसे सीखे गए बस औरों को सीखने के लिए
    सिखाये है रिश्तों ने ऐसे ही दस्तूर सदा

    इन रिश्तों का भ्रम कब तक कोई पाले
    अहसास एक पल भी न होने का रहता है सदा

    तोड़ डाले पर होगा ये यथार्थ से सीधा पलायन
    जुड़े बैठे है अनचाहे इन रिश्तों से सदा

    राजेश’अरमान’ ०५/०२/१९९२

  • फूलों की हसरत

    फूलों की हसरत की ,यही कसूर है मेरा
    काटें ही काटें मिले ये नसीब है मेरा

    सोचा था तूफां से कस्ती पार निकल जाएगी
    तूफां का क्या कसूर, निकला नाखुदा नासेह मेरा

    कल तक जो अपने थे बन गए बेगाने खास
    रिश्तों की डोर से कुछ ऐसा है ताल्लुक मेरा

    फूल लगे गैर मुझे काटें कुछ अपनों से लगे
    बस यही गुलशन से है शायद रिश्ता मेरा

    याद कर के फिर हो जाता उदास ‘अरमान’
    सूखे पत्तों की तरह हो गया वज़ूद मेरा

  • ये ख्वाइशें

    रेत के महलों की तरह ,हरदम ढहती है ये ख्वाइशें
    फिर भी हर पल क्यों सजती सवरती है ये ख्वाइशें

    उम्मीदे इन्ही ज़िंदा रखती सांसों में रचती -बसती
    पलती-बढ़ती सब चुपचाप सहती है ये ख्वाइशें

    एक खवाइश पूरी होते ही अपनी कोख से
    दे जाती जनम कोख में पलती है ये ख्वाइशें

    इन्हे पूरा होने की आस में रहते बैचेनी की गोद में
    जाने -अनजाने दर्द से आलिंगन चाहती है ये ख्वाइशें

    कभी होगा खत्म इन ख्वाइशों का अनवरत क्रम
    जिंदगी का है अंत पर अमर होती है ये ख्वाइशें

    हर खवाइश बंधी आशा की सुनहरी जंजीरों से
    जिसे तोड़ने की खवाइश भी ,जन्म देती चंद नई ये ख्वाइशें

    कौन कहता है होती नहीं इन ख्वाइशों की जुबान
    हर पल टूटती न जाने ,क्या चीखती है ये ख्वाइशें

    शायद इन ख्वाइशों और धड़कनों का नहीं कोई रिश्ता
    मर जाता है इंसान, पर मरती नहीं है ये ख्वाइशें

    लगता इन ख्वाइशों का सच अपनी समझ से परे ‘अरमान’
    शायद यही ज़िंदगी है कुछ उम्मीदें और अनंत है ये ख्वाइशें

  • चलो चुप लफ्जों

    चलो चुप लफ्जों को मिल के बाँट लेते है
    चल निकले लफ्जों को मिटटी से पाट देते है

    वो तेरा कहना मुझे मौसम की तरह
    चल तीर को किसी शाख पे गाड़ देते है

    वो तेरा मिलना किसी अजनबी जैसे
    चल इसे पहली मुलाक़ात का नाम देते है

    वो तेरा बारहा जाना फिर रूठ के मुझसे
    चल इसे तेरे क़दमों की ख़ता मान लेते है

    वो हर बात पे कहना तुम वैसे न रहे ‘अरमान’
    चल इसे वक़्त के साथ चलना जान लेते है

  • गर वाबस्ता हो

    गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर न तेरे शिकवे होते न शिकायत होती
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    अंधे ख्वाबों का न सिलसिला गर होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    जज़्बे की तौहीन न दिल तार तार होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    तेरी कलम की रोशनाई सूख जाती ‘अरमान’ गर
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    राजेश’अरमान’ 12/04/1991

  • बिखरे बिखरे ख्वाब

    बिखरे बिखरे ख्वाब
    सुलगते सुलगते आंसूं
    सीने में तूफ़ान
    दिल में बस कशिश
    काफिले यादों के लम्बे
    कोई शै मुकम्मल नहीं
    तनहा तनहा सफर
    लम्बी लम्बी रातें
    न वफ़ा का इल्म
    न जफ़ा का तजुर्बा
    बस एक गहरी खाई सी जीस्त
    उस पर भी सुकु के ,
    पंख होते तो उड़ते फिरते
    खुली हवा में भी ,
    पिंजरे का बंदपन
    सांसें भी लेते है ,
    खुद पे अहसान जताकर
    लगता है सृष्टि रचते वक़्त ही ,
    ग़ज़ल भी रच दी गई थी
    राजेश ‘अरमान’ १४/०२/१९९०

  • फरियाद बन के

    फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में
    कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली में

    यूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की
    कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली में

    दरो-दीवार से लिपटी हुई एक तस्वीर सही
    कौन मुड़ के देखेगा यहाँ तेरी गली में

    बात दरियां की करों या समुन्दर की
    डूब के देखेगा मुझे कौन भला तेरी गली में

    मेरी आहट भी मुझे नागवारा गुजरी ‘अरमान’
    मेरे सनाटों को सुनेगा कौन भला तेरी गली में
    राजेश ‘अरमान’

  • आँखों में रखा

    आँखों  में रखा बुलंदिओं का जोश है
     यहाँ हर इंसा खुद में   मदहोश है

    वहां से निकल तो आया था जहाँ शोर था
    कैसे निकलू जो अपने ही अंदर सरफ़रोश है

    कौन सी दुनिया को कोसते हो जी भर के
    कौन नहीं  भला यहाँ अहसान-फरामोश है

    न हवाओं न फ़िज़ाओं का कोई कसूर यहाँ
    हर शख्स अपनी ही दौड़ का सोता खरगोश है

                                   राजेश’अरमान’

  • aankhon mein rakha

    aankhon mein rakha bulandion ka josh hai
     yahan har insaa khud mein  madhosh hai

    wahan se nikal to aaya tha jahan shor tha
     kaise nikaloon jo apne hi ander sarfarosh hai

    kaun si duniya ko koste  ho jee bhar ke
    kaun nahin bhala yahan ahsaan-faramosh hai

    na hawaon na fizaon ka koi kasoor yahan
    har shaksha apni hi daud ka sota khargosh hai

                      rajesh’armaan’

  • अब भी मेरा नाम

    अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
    उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

    ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना
    ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार है

    वो नाम भी मेरा लेते है और कसम भी खाते है
    हम तो पहलू में उसके मिटने को कब से तैयार है

    यक़ीनन उसके इरादों पे कोई शक नहीं मुझे
    भरे ज़ख्मों को भी हिला देंगे मुझे ऐतबार है

    अभी तो इब्तिदा है तेरे सितम की ‘अरमान’
    तेरे सहने को पड़े कतार में अभी गम हज़ार है

    अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
    उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

    राजेश’अरमान’ २१/०४/2012

  • सब कुछ है जहाँ में

    सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है
    ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है

    आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की
    और हमें सच बोलते आईनों की इल्लत से बैर है

    देखिये उस तरफ फिर कोई मकां जल रहा है
    शायद वहीँ अपने अपने हिस्से की आदमियत का शोर है

    हर्फ़ निकलते ही लब से, बन जाते है अफ़साने कई
    कौन देखेगा यहाँ किस अफ़साने से मिटा कोई दौर है

    चल कोई ऐसी फिज़ा इफ़्फ़त भरी तलाश करें ‘अरमान’
    या तो पहले ही से फैला फिज़ाओं में हर तरफ जहर है

    राजेश ‘अरमान’
    इफ़्फ़त= शुद्धता, पवित्रता
    इल्लत= दोष, बुरी आदत,

  • आराईश अपने अंदर

    आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है
    तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है

    परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो
    बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब सा दस्तूर ह

    तिरा हर फैसला निकलता है सिर पे पत्थर की तरह
    कोई मेरे हक़ में भी हो ,जिसे मैं भी कहूँ मंजूर है

    या के इन परिंदो के आसमां में भी कोई पिंजरे न सजा दे
    ताक के इनको उड़ता है कोई ,जो अपने पंख से मजबूर है

    इस तस्सली के दरिया में कब तक रहे ‘अरमान’
    मेरे हिस्से का भी बना कोई समुन्दर कहीं जरूर है

    राजेश’अरमान’

  • आए न रास किश्तों के क़त्ल

    आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो
    मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो

    देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच पाएंगे वो
    अपने गिरेबां में झाकने से जो गुरेज करें,वो खुद से क्या शर्मशार हो

    चल के बैठे फिर उस महफ़िल पे क्यों गैरत के खिलाफ
    उस महफ़िल कभी न जाना जहाँ तेरे वज़ूद की मजार हो

    तिनके तिनके से बिखर जाते है न जाने क्यों ये नशेमन
    किसी नशेमन का इन आंधिओं से इस कदर न प्यार हो

    आ लेके चल खाक अपने सफर की निशानी समझ ‘अरमान’
    ना जाने किस मोड़ पे आके , यही खाक तेरी ग़मगुसार हो

    राजेश ‘अरमान’

  • वो इतना ही कह सका

    वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
    जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

    बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से
    जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे

    कौन समझा है इन हवाओं के रुख को यहाँ
    इख्तियार नहीं है इन हवाओं के आक़िबत पे

    हर्फ़ निकले लबों से ,ज्यों जां निकलती है
    जब तेरी बेरुखी को सजाया था अपनी आदत पे

    लो फिर छेड़ दी दास्ताने-हिज़्र तुमने ‘अरमान’
    क्या हो जाता है हासिल तुझे खुद की उक़ूबत पे

    वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
    जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

    राजेश ‘अरमान’
    उक़ूबत= दंड, सजा, उत्पीड़न, यातना
    आक़िबत= अन्त, परिणाम, भविष्य
    निस्बत= सम्बन्ध, स्मोह, सम्बन्ध लगाना,

  • दर्द के चरागों को बुझने का

    दर्द के चरागों को बुझने का

    दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो
    ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो

    इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है
    इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो

    न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
    अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो

    छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
    एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो

    निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
    हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पहरा दे दो

    चीखें सुनकर भी वो खामोश से बैठे है
    काश मुझे साथी कोई बहरा दे दो

    समुन्दर न मिला कोई बात नहीं
    दिल बहलाने को कोई सेहरा दे दो

    हर तरफ बदलने का गर्म बाजार ‘अरमान’
    ले के पुराना कोई नया गम ठहरा दे दो
    राजेश ‘अरमान’

  • दर्द के चरागों को

    दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो
    ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो

    इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है
    इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो

    न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
    अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो

    छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
    एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो

    निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
    हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पर्दा दे दो

    हर तरफ बदलने का गर्म है बाजार ‘अरमान’
    ले के पुराना मुझे कोई नया गम दे दो
    राजेश ‘अरमान’

  • है तो इंसा ही हम

    है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है,
    गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है

    गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे
    पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है

    यूँ तो रखते है हम भी बेइंतेहा पाक नज़र
    पर वज़ूद खाक है ,किसी मस्जिद की चौखट नहीं है

    सरफ़रोश हो भी जाते गर गमजदा न होते
    पर तुझ पे मिटना भी सरफ़रोशी से कम नहीं है

    गर्दिश-ऐ -मुदाम से हम हो गए इतने आज़र्दाह
    आब-ए-आईना हूँ ,पर अपनी ही सूरत नहीं है

    हमने ढोये है जिनके इलज़ाम अपने सिर पर
    अब उनके किस्सों में मेरा नाम तक नहीं है

    कल जो गुजरी वो रात बहुत लम्बी थी
    बात तन्हाई की है , एक रात की नहीं है

    अबद से टूटे कई शीशे ज़माने के पत्थरों से
    हम खुद हो गए पत्थर अब कोई शीशा नहीं है

    ले के बैठे रहे ताउम्र वसीयत में वफादारी ‘अरमान’
    लोग कहते के, ये इस ज़माने का आदमी नहीं है

    राजेश’अरमान’
    अबद=अनन्तकाल
    आब-ए-आईना= दर्पण की चमक
    आज़र्दाह= उदास, दु:खित, खीजा हुआ, व्याकुल,बेचैन

  • सहारे बदल गए

    हम भी है तुम भी हो ,पर ये सहारे बदल गए
    लहरें तो वही है मगर ये किनारे बदल गए

    लोग पत्थर के बन गए है , ,दिल हमारे है आईने
    हम तो अब भी वही मगर ये हमारे बदल गए

    कल तक महका करती थी बगियाँ ये फूलों से ,
    माली तो वहीँ मगर चमन के नज़ारे बदल गए

    इस ईमारत की बुनियाद तो अब भी है बुलंद
    बस रहने वालों के हाथों के इशारे बदल गए

    यादों के दिए आखिर कब तक जलाये ‘अरमान’
    अफ़सोस तेरे बदलने का यूँ तो सारे बदल गए

    राजेश’अरमान’
    २७/०७/१९९०

  • मेरे ज़ख्मों का खाता

    मेरे ज़ख्मों का खाता इक दिन नीलाम हो गया
    दुश्मनों को मिला न हिसाब और इन्तेक़ाम हो गया

    वाबस्ता थे जिन चेहरों से ,जो थे मेरे रात दिन
    उनके चेहरों का रंग सारे शहर में सरे-आम हो गया

    कब तलक छुपती है किसी चेहरे पे पड़ी नक़ाब
    मेरे क़ातिल का खुद-ब-खुद क़त्ल -ऐ -आम हो गया

    उसकी गैरत से कब भला मेरा वास्ता न था ,
    उसकी निगाहों में मेरा और कोई इंतज़ाम हो गया

    सुर्खिआं अखबार की बन जाओगे क़त्ल कर भी ‘अरमान’
    तिरी नादानिओं का देख कैसा बद अन्जाम हो गया

    राजेश ‘अरमान’

  • टूटे अल्फ़ाज़ों को

    टूटे अल्फ़ाज़ों को

    टूटे अल्फ़ाज़ों को  नसीहत की जरूरत क्या
     बिखरे ख्वाबों को किस्मत की जरूरत क्या

      जो बिक गया खुद ही  सरेआम बाज़ारों में
     फिर   इंसान की कीमत की जरूरत क्या

      हर इक शै का मुक़द्दर जब मुक़र्रर है
      लहूँ में लिपटी वसीयत की जरूरत क्या

     मैंने खुद ही जो इलज़ाम उठा रखे थे
    फिर ज़माने को  हक़ीक़त की जरूरत क्या

                                     राजेश’अरमान’

  • उठे जब भी सवाल

    उठे जब भी सवाल

    उठे जब भी सवाल ज़िंदगी की तरफ
    उठे है हाथ मेरे तेरी बंदगी की तरफ
    महज इत्तफ़ाक़ था या और कुछ
    मेरा इशारा है दिल्लगी की तरफ
    वो हर जगह जो मोज़ू था मगर
    नज़र पड़ी बस आवारगी की तरफ
    उन किताबों से हासिल भला क्या
    बढते है कदम किस तिश्नगी की तरफ
    इन्तहा हुई हिस्सों में बटते बटते
    अब चलें किसी पाकीज़गी की तरफ
    राजेश’अरमान’

  • नहीं जाता

    हर मुसीबत को न्योता दिया नहीं जाता ,,
    जरुरत न पड़े तब तक सर ओखली में नहीं जाता …..!!

    सम्मान लौटा रहे हो तो वो पूछेंगे नहीं ,,जिनसे
    नेताओं के बदजुबानी का सवाल पुछा नहीं जाता …..!!

    विशेष राज्य का दर्जा चुनावी मुद्दा कहाँ है ??
    मियां बाहर का कूड़ा घर के अन्दर लाया नहीं जाता …….!!
    माँ का अंचल मेरे लिए घर जैसा है ,,
    जहाँ महफूज़ हूँ जबतक कोई खींच के ले नहीं जाता …..!!

    इंसानी फितरत है दगाबाजों से बचो ,,
    मुसीबत नहीं आती जबतक पाव चादर के बाहर नहीं जाता ……..!!

    मुकम्मल जहाँ के तलाश में लोग जन्नत तक पहुचे ,,
    इंसानी होड़ है वरना चाँद और मंगल तक कौन जाता ……..!!

    आजकल हर जगह दौड़ है आखिर चले किधर ,,
    जिनकी इंसानी चमड़ी से गिरगिट का रंग नहीं जाता …….!!

    ……………………………………………………………………..~~**#चंद्रहास**~~

  • मेरे जज्बात

    मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है
    अब फूलों की बातें पहरों में सिसक रही है
    अब लहरें समुन्दर की सांसें बन गई है
    अब हवाओं में फैल गए है नग्मे दर्द भरे
    अब जमाने से खत्म हो गईं यारी अपनी
    अब किताबों से गुम हो गए मेरे पन्ने
    अब न कोई पिंजरा न कोई आसमान
    अब न कोई शाम उदास ,न रातें तन्हा
    अब खौफ खुद बन गया है हादसा
    अब ख्वाब खुद हो गए है खवाइश
    अब अलफ़ाज़ मेरे खुद हो गए बंदी
    अब किसी ईमारत में जड जाना चाहता हूँ
    मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है
    राजेश’अरमान’

  • जिधर का रुख

    जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना
    इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना

    वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का
    कभी हाथों में तुम एक टूटा आईना रख लेना

    ज़िंदगी के खेल में कभी शह मिली कभी मात हुई
    इन हिसाबों को दबाकर तुम किताबों में रख लेना

    अपना सा लगता है कोई आसमा से टूटा हुआ तारा
    अपने आगोश में तुम बचपन के टूटे खिलोने रख लेना

    ज़ंग मैदान की हो या अपने अंदर ,बस बुरी होती है
    अपने अंदर ही तुम सुकून की कोई दवा रख लेना

    बेसबब बात भी निकल जाती है हलकों से ‘अरमान’
    क्या ज़रूरी है हर बात को अपने दिल में रख लेना
    राजेश’अरमान’

  • खौफ आईने का

    खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है

    हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है
    कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है
    आईने को तोड़ के देखा शक्लों में शक्ल बस नज़र आती है

    सच के पीछे का सच, झूठ की ईमारत का खंडहर है
    हर झूठ अपना ही बुना कोई आडम्बर है
    चुभता आईना अपने ही अंदर का कोई घर है

    चिंतन पे लगे है दरवाज़े पर खुलते नहीं
    जेहन में आते है सब पर मन मिलते नहीं
    सहमे से सच दम तोड़ते पर चीखते नहीं

    खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है

    राजेश’अरमान’

  • मुसाफिर अपनी राह

    मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है
    मृग जाने किस चाह से भटक रहा है

    रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं
    दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है

    किस सत्य की खोज में मन व्याकुल
    कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा है

    अदृश्य विलक्षण तरंगे घूमती तेरे अंदर
    मानव फिर किस चाह से भटक रहा है

    मोह तेरा कवच के चक्रव्यूह में फंसा
    मन कवच की दाह से भटक रहा है

    राजेश’अरमान’

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