Category: ग़ज़ल

  • जो अब न रहा

    ज़िक्र तिरी वफ़ा का मसला था , जो अब न रहा
    मैं कब तिरी आँखों में बसा था, जो अब न रहा

    इक बुतखाने की तिश्नगी से बढ़कर कुछ नहीं
    कभी बुलंद जमाना मैं था ,जो अब न रह

    मेरी आवाज़ह भला क्यों करता ये तेरा शहर
    मैं इक मिसाल हुआ करता था ,जो अब न रहा

    हवाओं के रहमोकरम पर जलता मैं कोई चराग हूँ
    खौफ बुझने का अक्सर होता था, जो अब न रहा

    नब्ज़ भी कुछ तेज थी ,फ़िज़ां भी थी कुछ बीमार
    वो तेरे मौसम का इक ज़ख्म था ,जो अब न रहा

    अपनी दीवानगी के अज़ाब कुछ कम करों ‘अरमान’
    वो पहले का जमाना था दौर ,जो अब न रहा

    राजेश’अरमान’

    आवाज़ह= चर्चा, प्रसिद्धि
    अज़ाब= पीड़ा, सन्ताप, दंड

  • गुज़ारिश गुज़ारिश

    गुज़ारिश गुज़ारिश

    गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है
    मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है

    अब तो हो गए वो रास्ते भी किसी अजनबी से
    जिन रास्तों ने कभी तुमको चलना सिखाया है

    उम्र गुजरी है गैर लोगों को अपना बनाते हुए
    अपने लहू को मगर मैंने ही ठुकराया है

    ताउम्र ढूंढ़ता रहा अक्स अपना अजनबी शहर में
    मैंने खुद अपने हाथों से शहर अपना दफनाया है

    माना ख्वाइशों का जुनूँ हर एहसास पे भारी है
    तेरी खवाइश ने तेरे अपनों को बहुत रुलाया है

    सोच के देख तू ज़िंदगी में , इतना तनहा हुआ कैसे
    न पास अपने माँ का आँचल, न अपनों का साया है

    इक दिन वो भी आएगा होगा तुझे भी महसूस
    इस ज़माने ने कब किसी गैर को अपनाया है

    अपनी मिटटी ,अपनी फ़िज़ाओं पे ऐतबार तो कर
    अपने वास्ते भी ख़ुदा ने सब कुछ वहां बनाया है

    एक दिन कभी . बैठ के करना हिसाब लम्हों का
    तूने ज़िंदगी में कितना खोया ,कितना पाया है

    तालीम लेता है इंसा तरक्की की खातिर लेकिन
    खुद को खोना मगर किताबों ने नहीं सिखाया है

    गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है
    मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है

    राजेश ‘अरमान’

  • जो यादों में बसा है

    जो यादों में बसा है ,उसे वहीँ रहने दो
    मेरी दी हुई हिचकिओं में, उसे रहने दो

    आज साकी तू रुख से पर्दा नहीं नक़ाब उठा
    मैखाने के बातें बस मयखानों तक रहने दो

    किसने देखे है कितने ज़माने हिसाब न कर
    मेरे ज़ख्मों के जमाने बस साथ रहने दो

    कोई पूछे सबब फिर तन्हाई का तो कह देना
    मेरी तन्हाई मेरी दवा है जिसे बस रहने दो

    मुद्दत हुई कोई नया गम न पा सके ‘अरमान’
    अपने ज़ख्मों के खजाने , यूँ न पड़ा रहने दो

    राजेश’अरमान ‘

  • nazm

    कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
    रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक
    कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है
    अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से
    कोई लफ्ज फिर गुमसुम है होठों पर
    फिर कोई सदा टकराई है कानों में
    चौंकते दिन की शक्ल में रात फिरती है
    कई रातें बिखर जाती है छोटी छोटी रातों में
    कहीं कुछ सहमे हुए मैं बिखरे है भीड़ में
    और तलाश है अपने ही किसी टुकड़े की
    हाथ की रेखाओं सा बना कुछ जाल
    अंदर से झाकता हुआ कोई और मुझसा
    लेता हिसाब शामों का, करता कई सवाल
    सिहर के निकलती बस यही आवाज़ दबी
    कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
    राजेश ‘अरमान’

  • तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं

    तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं
    प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं

    क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह
    अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं

    ज़ख्म गीले है अपने कहीं तो निशां रहेंगे लेकिन
    दिल में इक शोर है मगर ऐसी बगावत भी नहीं

    अपने अंदर हूँ खुद किसी अजनबी की तरह
    जान पहचान की मगर कोई फुर्सत भी नहीं

    यूँ तो मिलते है सभी अपने ही सायों की तरह
    हाथ तो बढ़ते है मगर ऐसी कुर्बत भी नहीं

    राजेश ‘अरमान’
    २०-०२-२०१६

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल
    : अनुपम त्रिपाठी

    इक शख्स कभी शहर से ;
    पहुँचा था गाँव में ।
    अब रास्ते सब गाँव के ;
    जाते हैं शहर को ।।

    खेत–फ़सल–मौसम ;
    खलिहान हैं उदास ।
    ग़मगीन चुभे पनघट ;
    हर सूनी नज़र को ।।

    कुम्हलाने लगे ” चाँद” ये;
    घूंघट की ओट में ।
    पायल से पूछें चूडियाँ ;
    कब आयेंगे घर ” वो ” ।।

    बेटा निढाल हो के ;
    हर रोज पूंछे माँ से ।
    क्यूं छोड़ गया बापू ?
    इस गाँव को– घर को ।।

    गाँवों में कम है : सुविधा;
    पर अपनापन महकता ।
    बेहतर है रुखी–सूखी;
    ये अपनी गुज़र को ।।

    सुनते हैं रहती गाँवों में;
    भारत की आत्मा ।
    शहरों में क्या है : जादू ?
    लगे आग शहर को ।।

    डंसती है रात बैरन ;
    झुलसाए मदन तन–मन ।
    कैसे बताऊं साजन ;
    मैं ! पीती ज़हर जो ।।

    हुक्के में डूबा ” बापू ” ;
    अलाव बन गया ।
    किसको दिखाऊं ” अनुपम”
    इस चाक़— जिग़र को ।।
    : अनुपम त्रिपाठी
    **********——-*********
    ‪#‎anupamtripathi‬
    ‪#‎anupamtripathiG‬

  • मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

    मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

    फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से

    आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर

    डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से

    साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा

    दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से

    नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी

    इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से

    कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह

    हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से

    ©® लोकेश नदीश

  • ” कोई निशानी भेज दो “

    मन बहलाने को कोई निशानी भेज दो

    नींद नहीं आती कोई कहानी भेज दो …..

    संजीदा रहूँ हमेशा तेरी यादों में

     मेहरबान बन कोई मेहरबानी भेज दो….

    भा गया कुछ यूँ दिल को तेरा अपनापन

    दीदार करने तस्वीर कोई पुरानी भेज दो ..

    तड़प रहा हूँ कब से मिलने को

      उम्मीद तुम कोई पहचानी भेज दो …

    जो दिलोँ – जान से हो सिर्फ मेरी

    ख़ुदा ऐसी कोई दानी भेज दो..

    महसूस होती हैं अक्सर दिल को तेरी सिसकिया

    ख़त में मेरी सुखनवरी कोई दीवानी भेज दो….

    हाल – ए – दिल सिर्फ तुम से हो बयां

    मंजूरी अपनी ना सही कोई बेगानी भेज दो …..

    ख़ामोश हैं सागर – ए – दिल – ए – पंकजोम “प्रेम ”


    तुम ख्वाईशें कोई तूफ़ानी भेज दो …

  • पछताओगे तुम, रुसवाईयां करोगे

    पछताओगे तुम, रुसवाईयां करोगे

    गर छोड दिया हमने तेरी गलियों मे आना कभी

     

    तुझसे मुश्ते-मोहब्बत मांगी थी, कोई कोहिनूर नहीं

    बस तेरे दीदार की दरकार थी चश्मेतर को कभी

     

    भर गये पांव आबलो से पुखरारों पर चलकर

    सारे घाव भर जाते ग़र मलहम लगा देते कभी

     

    यूं इकरार ए इश्क मे तू ताखीर न कर

    चले गये जो इकबार, फिर ना आयेंगे कभी

     

    घुल जाये तेरी रोशनी में रंगे-रूह मेरी

    ग़र जल जाये मेरी महफिल में शम्मा ए इश्क कभी

  • इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ

    इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ

    इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ
    कोरे कागज पै स्याही सा बिखर जाता हूँ

    हर्फ़ हालातों में ढलकत कुछ कह देते है
    कोई सुनता है तो मैं संवर जाता हूँ

    कोई साखी है तेरे मैखाने में
    जो पिलाती है तो बहक जाता हूँ

    मकरूज है जिंदगी तेरी मोहब्बत की
    चंद सिक्कों में ही मैं लुट जाता हूँ

    छिड़ी है जंग जज्बातों में आंखो से निकलने को
    बनकर अक्स रूखसारों पै जम जाता हूँ

    रंग ओ रोशनी की चाहत है किसको
    अंधेरों में आहिस्ते अक्सर गुजर जाता हूँ

    क्या छुपा है जो मैं अब कहूँ तुझसे
    नज़्म ए जिंदगी हर रोज लिखे जाता हूँ

  • ” बड़ी फ़ुरसत में मिला मुझ से ख़ुदा है…”

     

     

    मेरी सांसो में तू महकता हैँ
    क़ायनात – ए – ग़ैरों में तू ही अपना लगता हैँ 1 .

    होंठों की ख़ामोशी समझा ना सके
    नैनों में इश्क़ मेरा झलकता हैँ ( 2 )

    भर चुकी हैं सुराही – ए – मोहब्त
    इश्क़ मेरा अब बूंद – बूंद कर रिसता हैं…. ( 3 )

    जितना जाना चाहूँ तुम से दूर
    कारवाँ यादों का उतना ही तेरी और सरकता है…( 4 )

    नैनों से दूर हो तो क्या हुआ
    ये सुख़नवर तेरा हाल – ए – दिल समझता हैं ( 5 )

    धड़कन बन कफ्स हूँ तेरे दिल में
    ये बार – बार तू फ़लक की और क्या देखता है( 6 )

    मेरी महफ़िल – ए – दिल में मुसलसल हैँ दौर – ए – खजालत
    ऐ दीवाने दौड़कर आ कहाँ तू रुकता हैँ ( 7 )

    कट रहे हैं दिन ग़रीबी संग
    इस सुख़नवर का इक – इक अल्फ़ाज़ सस्ता है ( 8 )

    दर्पण में हर रोज़ देख ना समझ सकी
    अक्श मेरा बिलकुल तेरे जैसा है ( 9 )

    इक अरसा बीत गया उन से गुफ़्तगू किये
    आज बड़े दिन बाद नैनों से मिला इक इशारा है ( 10 )

    साँसे कब तक महफूज़ रहे मालूम नहीं
    अंतिम साँस तक साथ निभाने का क्या इरादा है ( 11)

    दिल को अमीर बना भेजा हैँ ख़ुदा ने
    तभी हर रुख़ – ए -रोशन पर इश्क़ लुटाता है ( 12 )

    जब वो दिल से अपना कहते हैँ
    कसम – ए – ख़ुदा क्या जीने का आनन्द आता है ( 13 )

    फिज़ा की महक से महसूस की उनकी मायूसी
    तभी आज इक – इक अल्फ़ाज़ हुआ रुवासा हैँ ( 14 )

    मुझे इत्मीनान से जीने दो मेरा आज
    क्योकि कल तो बस कल कहलाता है ( 15 )

    तू कफ्स रह मेरे जिस्म में रूह बनकर
    आज का इन्सां अंखियो से करता तुझे मैला है ( 16 )

    इक किस्सा बन कर नहीं रहना
    जिंदगी का सफ़र कटा अभी आधा है ( 17 )

    सोया रहता हूँ मुर्दे की तरह
    ख़्वाब हर इक मेरा अधूरा है ( 18 )

    शाम ढ़लते ही घने जुल्मात के कहर में
    इक शोला आज भी जलता हैँ ( 19 )

    उस माहताब का दीदार किये बगैर
    ये आफ़ताब कहा ढलता हैँ ( 20 )

    दुनिया ने बता दिया इश्क़ को गुनाह
    लेकिन दिल मेरा कफ़न बांध चलता है ( 21 )

    तन्हाई में तन्हा कर दे यादें उनकी संजीदा
    फिर नैनों से हर इक आब बारिश बन बरसता है ( 22 )

    मत बिक जब तक ना मिले कोई सच्चा सौदागर
    पगले बाजार – ए – मोहब्त में यूँ ही मोल- भाव चलता है ( 23 )

    दिल की ज़मी पर रखे वो अपने लफ़्जो के कदम
    तब कहि जाकर मुस्कराहट का गुलाब खिलता है ( 24 )

    धड़कन आज भी मदहोश हैँ
    सांसो से उनकी जो रिश्ता गहरा हैँ ( 25 )

    इक मरतबा तुम जाओ मयख़ाने में
    साक़ी के हाथो से जाम पीने का कुछ और मज़ा हैँ ( 26 )

    जो ये कहे दिल से बहुत अमीर हूँ मैं
    सही मायने में वही मोहब्त पर लूटा है ( 27 )

    वो आज भी सोया हैँ बे-फ़िक्र
    और सुलग उठी चिता है ( 28 )

    ख़ामोश आज तक वो ख़ुदा है
    शायद हुई कोई ना होने वाली खता हैँ ( 29 )

    जब से छोड़ दी उसने नजरों से मय पिलानी
    वीरान शहर का हर इक आहता है ( 30 )

    दिल तोड़ने के बाद भी रह लो तुम
    यहाँ खण्डरो में किसका रहना मना हैँ ( 31 )

    कब्र में सोने के बाद जल उठी कंदीले
    जरा ये सोचो मोहब्त में चिराग ये कितना जला है ( 32 )

    कल जो नजारा देखते थे हम फ़लक – ए – उल्फ़त पर
    आज वहीँ दिखाई दिया धुंधला है ( 33 )

    तुम पढ़ना मेरी दिल की किताब ध्यान से
    किसी इक ख़ास पन्ने पर अतीत मेरा छुपा है ( 34)

    मुसलसल है उसे चाहने का सिलसिला
    जब से दिल उनकी धड़कन से मिला है ( 35 )
    और जीने का मन करता है
    जब अल्फ़ाज़ उनका अपना कह बुलाता है ( 36 )

    राह – ए – इश्क़ में बहुत ठोकरे लगी
    पर हर मरतबा दिल सम्भल जाता है ( 37 )

    मेरे मेहरबान मत बना मोहब्त को इतनी बेनज़ीर
    इस जंग में इंसान इंसान से ही हारता है ( 38 )

    तब से रो रही है तन्हाई में दीवारे
    जब से उनके दिल का आशियाना छोड़ा है ( 39 )

    ये मोहब्त सुला देती हैँ गहरी नींद में
    वरना यहाँ मरना कौन चाहता हैँ ( 40 )

    फूलों की चाह दिल में ले चल पड़े
    पता ना था अंगारो पर से गुजरना हैँ ( 41 )

    जख़्म इतने गहरे मिले उस अपने से
    भरने कोई मरहम आज तक ना हुआ संजीदा है ( 42 )

    ना पूंछे वो मेरा हाल – ए – दिल
    हर इक राज़ दिल में दफ़न रहता है ( 43 )

    अगर तेरे नसीब में है तो जरूर मिलेगी
    ए – इंसान क्यों राह – ए – मोहब्त में ख़ुद को खोता है ( 44 )

    काफिले और नसीब हो जायेगे चाहत के
    मुस्कुराता रह क्यों रोता है ( 45 )

    हाल – ए – दिल बताने ख़त उन्हें और कैसे लिखूँ
    बचा मोहब्त की किताब पर इक ही पन्ना है ( 46 )

    पसन्द हैं उन्हें पायल
    बस मुझे घुँगरू बन खनकना है ( 47 )

    रहना हैं अगर उस चाँद के हरदम करीब
    तो और कुछ नहीं इक सितारा बनना है ( 48 )
    दूर से पहचान ले उस गुलाब की खुशबु
    उल्फ़त में बना ये सुख़नवर ऐसा भंवरा है ( 49 )

    जैसे ही वो लगे गले महसूस हुआ ” पंकजोम प्रेम ”
    बड़ी फ़ुरसत में मिला मुझ से ख़ुदा है…(50 )

  • चाहे कितनी नफ़रत कर लो हमसे

    चाहे कितनी नफ़रत कर लो हमसे
    तेरे दिल को अपना बनाकर रहेगें

    बहुत रो चुकी है आंखे हमारी
    तेरी आंखों से आंसू हम गिराकर रहेंगे

    चाहे कितनी भी अंधेरी हो जिंदगी की रातें
    शम्मां महोब्बत की हम जला कर रहेगें

    फासले बना लो चाहे कितना भी हमसे
    ये फ़ासले, हम मिटा कर रहेगें

  • ” मौत करती है रोज़ “

    मौत करती है नए रोज़ बहाने कितने

    ए – अप्सरा ये देख यहाँ तेरे दीवाने कितने

     

    मुलाक़ात का इक भी पल नसीब ना हुआ

    कोई मुझ से पूछे बदले आशियाने कितने

     

    तेरे इंतजार में हुई सुबह से शाम

    ये देख बदले ज़माने कितने

     

    उन्हें भूख थी मुझ से और उल्फ़त पाने की

    लेकिन दिल में मेरे चाहत के दाने कितने

     

    नशीली उन निग़ाहों को देख

    नशा परोसना भूल गए मयख़ाने कितने

     

    रंग जमा देती है मेरी सुखनवरी हर महफ़िल में

    मगर उस रुख़ – ए – रोशन ने अल्फ़ाज़ मेरे पहचाने कितने

     

    यादों में हुए तेरी  कुछ यूं संजीदा

    दिल को तसल्ली देने गाये तराने कितने

     

    उनकी तरकश में था इक तीर – ए – मोहब्त

    मेरे ज़ख्मी दिल पर लगे निशाने कितने

     

    इक मरतबा चले सफ़र – ए – मोहब्त पर

    राह में मिले मुझे उलाहने कितने

     

    वक़्त के साथ थोड़ा हम भी बदल गए

    बेजुबां दिल से अब अल्फ़ाज़ सजाने कितने

     

    तस्वीर कुछ यूं बसी उनकी नैनों में

    दिखे दर्पण में उनके नज़राने कितने

     

    कम से कम ख़्वाबो में तो कर दे इज़हार

    नसीब हो  मुझे लम्हें ये सुहाने कितने

     

    मैँ पूरी तरह लिपट चूका हूँ वसन – ए – मोहब्त में चाहत के रंग मुझे अब छुड़ाने कितने

     

    मुसलसल है जो इश्क़ की आग दिल में

    आये दीवाने इसे बुझाने कितने

     

    इक दफ़ा  ना कर दीदार तो अंखियों में नींद कहा

    वरना आये मुझे ख़्वाब सुलाने कितने

     

    फ़ीके पड़ रहे है दिन – ब – दिन जिंदगी के रंग ” पंकजोम प्रेम ”

    अपनी मोहब्त के रंग में आए रंगाने कितने

  • वो याद आये..

    कुछ अश्कों की महफिल जमी और वो याद आये
    रुखसार कुछ नम से हुए और वो याद आये

    एक जमाने की मोहब्बत वो चंद लम्हो में भुला बैठे
    हम भूलकर भी उन्हे भूला ना पाये और वो याद आये

    चांद और उनका क्या रिश्ता है, हमें नहीं मालूम
    फ़लक पे चांद उतरा और वो याद आये

    तरन्नुम ए इश्क गाते रहे तमाम उम्र हम
    कोई नगमा कहीं गुंजा और वो याद आये

    sign

  • ” नया साल आ रहा हैँ “

    रह – रह कर ज़ेहन में बस यही ख्याल आ रहा हैं

    मुझे तनिक बदलने दो , नया साल आ रहा हैं …..

     

    बेचैन धड़कन हो गयी है

    शायद संग अपने ख़ुशियां बे-मिसाल ला रहा हैं ….

     

    जल उठी दिल में कंदीले – ए – इश्क़

    ये बे-जुबां भी ग़ज़ले गा रहा हैँ..

     

    सिर्फ साल बदला हैं , इंसान नहीं

    कुछ तो ख़ामोश रहकर समझा रहा हैं….

     

    वो तो कब का कह चुके हक़ीक़त में  अलविदा

    फिर क्यों ख़्वाबो में उनका अक्श दिखा रहा हैं……

     

    अस्त हो गया मेरी चाहत का आफ़ताब

    ये फ़लक – ए – दिल कौन सा माहताब चमका रहा हैं….

     

    जो रुसवा हैं मना ले उन्हें पंकजोम ” प्रेम ”

    साँसों का कारवाँ जिस्म से दूर होता जा रहा हैं…..

  • ” कसक मुसलसल है “

    चलो आज बात करे गुज़रे जमाने की

    मैंने जरूरत समझी आप सबको बताने की …..

     

    संग उसके मुस्कुराकर समझते थे

    क्या बेनज़ीर रौनक है मेरे काशाने की ….

     

    इक मरतबा भुला ही दिया ख़ुदा को

    बड़ी ख़ुशनसीब जिंदगी थी इस दीवाने की …

     

    बेसूद हुआ एक एक अल्फ़ाज़ मेरा

    जब कोई राह ना दिखी उसे मुझे चाहने की…..

     

    वो इस क़दर रुसवा हुए मुझ से

    की इक बार भी ज़रूरत ना समझी लौट आने की …

     

    वो दिल से एक दफ़ा अपना कह देते

    तो आज ग़ैरों से जरूरत न होती कहलवाने की…..

     

    कल मोहब्त भरी निग़ाहों से तराश लेते हमें

    तो आज ज़रूरत ना होती नज़रे चुराने की….

     

     

    1. ये  दौर – ए – इखलास सदा क़ायम रहेगा ” पंकजोम ” प्रेम

    बस कसक मुसलसल हैँ इंसान बदल जाने की……

     

    पंकजोम ” प्रेम “

  • बस दर्द के शार्गिद में अब नज्में-ए-गम लिखा करते है

    वो पूछते है हमसे कि आजकल हम क्या करते है
    क्या बताएं कि उनके इंतजार में किस कदर मरते है

    अपने अहसास, अपनी आरजू दिल में दबाए रखे है
    वो कहते है कि आजकल हम कुछ चुप से रहा करते है

    कहते है वो आज से हम बाते नहीं करेंगे आपसे
    उनके लफ्जों के सहारे ही लम्हे गुजरा करते है

    जाते जाते वो आज जो हमसे खफ़ा हो गये
    बस दर्द के शार्गिद में अब नज्में-ए-गम लिखा करते है

  • kya bataye…

    kya bataye kese din maan chalte h

    mere..

    bahut hi kharab haalat par har pal

    machalte h mere.

    mein jhuti hasi hasu toh bhi mera hi

    kasoor…

    ke dusman to dusman dost bhi jalte h

    mere….

    pahle jin aankhon me sapne the aaj

    wo banjar h.

    sapne dekhne ke liye bhi sapne taraste

    h mere..

    sochta hu pyar chahiye to kisi ko dil

    dedu.

    par hoshle fir vahi galti karne se darte

    h mere..

    bachpan me bahaya aansu aaj bhi

    yaad h.

    khuch lamhe jo jiye sadiyo jese gujarte

    h mere..

    ek to dil nazuk aur har khusi me avsad.

    ke bat bat pr aankho se barf ke parvat

    pighalte h mere….

    by kavi ”MAN”

  • ” राह – ए – माबूद “

    थोड़ा रंज में , थोड़ी ख़ुशी में , साल ये बीता ….

    ख़ुद की मोहब्त को हारा , लेकिन फिर भी जीता ……

     

    मुसलसल हैं आज भी यादों का कारवाँ ….

    थोड़ा तन्हा , थोड़ा मुस्कुराकर हूँ लिखता …

     

    मुसाफ़िर हूँ यारों  , मंज़िल का पता नहीं ..

    इक टक लगायें राह – ए – माबूद हूँ देखता …

     

    जाने वाले चले गए अपना बना कर ….

    आख़िर कोई क्यों नहीं , जाने वालों को रोकता ….

     

    कल मेरी मोहब्त किसी और की हो गयी ….

    मैं समझा , ना जाने क्यों ये दिल नहीं समझता ….

     

    और भी है रंग जमाने को अपने ” पंकजोम ” प्रेम ….

    लेकिन उस रंग के बग़ैर , कोई और रंग नहीं जमता ….

     

     

    मुसलसल – निरन्तर 

    माबूद – ईश्वर

  • “वक़्त तो लगता है !!”

    मोहब्बत से नफरत तक आने में, वक़्त तो लगता है;
    जागती आँखों को सुलाने में वक़्त तो लगता है!!
    .
    इतनी जल्दी कहाँ से सीखा, तुमने रक़ीबों-सा हुनर;
    अपने महबूब को रुलाने में, वक़्त तो लगता है !!
    .
    अब ऐसी भी क्या जल्दी थी, हमसे दूर जाने की;
    और जा ही चुके हो, तो भुलाने में वक़्त तो लगता है!!
    .
    हम भी वक़्त दे रहे हैं सबको, आस्तीनों से निकलने का;
    अभी तो ख़ुद से रूठे हैं, मनाने में वक़्त तोलगता है!!………‪#‎अक्स‬

  • ” सम्भाल ले ऐ – ख़ुदा “

    सम्भाल ले ऐ – ख़ुदा , एक लम्हे के लिए मुझे….

    अब  मैं हार रहा हूँ …..

    तू ही बता मेरे साहिब , मैं क्यों ये जिंदगी तन्हा गुजार रहा हूँ …

     

    तूने साज़ किया चेहरे पर , मुस्कराहट का ….

    लेकिन मैं क्यों , मायूसी स्वीकार रहा हूँ …..

     

    जिल्ले – सुभानी कहता हैँ ये जग मुझे , अल्फाज़ो का ….।

    फिर मैं क्यों ख़ुद को ख़ामोशी में उतार रहा हूँ ….

     

     

    इक रोज़ मालूम हुआ , मयख़ाने में मय बाँट लेती है रंज….

    मैं , ये कड़वा सच भी नकार रहा हूँ …..

     

    जब देखता हूँ माँ – बाप की नजरों में , तू दिखाई दे ….

    लेकिन कुछ रोज़ से , बनता जा काफ़िर रहा हूँ …

     

    अब तो कुछ और आब बढ़ा दे चेहरे की रौनक …

    क्योंकि हर दफ़ा महफ़िल – ए – रंज में , मैं उजागर रहा हूँ …

     

    अधूरी साँसे हैं , ख्वाईश एक रुख़ – ए – रोशन से बेइंतहा इश्क़ पाने की….

    लेकिन मैं क्यों , मन ही मन , मन को मार रहा हूँ ….

     

    उठ चूका हैं ,  नहीं उठना था , जो  सैलाब दिल में  ” पंकजोम प्रेम “….

    क्योंकि लहर – ए – उल्फ़त पर एक मरतबा फिर मैँ लहर रहा हूँ…

  • रशमें – ए – इश्क़

    जब महफ़िल – ए – इश्क़ में , निग़ाह से निग़ाह टकराई …

    दिल की बात चेहरे पर उभर आई ….

     

    अँधेरे में डूबे मेरे एक एक लम्हे को रोशन करने ….

    उसने क्या ख़ूब कंदीले – ए – मुस्कराहट जलाई ….

     

    ख़ामोश थी उसकी जुबां , ख़ामोश एक एक अल्फ़ाज़ ….

    मुझे अपने दिल की और ले जाने ,  स्वागत में उसने पलके बिछाई…

     

    मैं तो वाकिफ़ था नशा – ए – उल्फ़त से …..

    वो एक मरतबा फिर ज़ाम – ए – चाहत बना लाई …

     

    बिखरें इस सुख़नवर को , क्या खूब मोहब्त से समेटा उसने …

    एक अलग अंदाज़ में रशमें – ए – इश्क़ निभाई ….

     

    इश्क़ के वसन में कुछ यूं लपेटा उसने  ख़ुद को ….

    मेरे साथ रहने , बन गयी मेरी परछाई …

     

    ख़ुशी हुई मिलकर उस से इस क़दर  , पंकजोम ” प्रेम ”

    की दूर हो गयी बरसों पुरानी तन्हाई …..

  • उसके चेहरे से नजर हे कि हटती नहीं..

    उसके चेहरे से नजर हे कि हटती नहीं

    वो जो मिल जाये अगर चहकती कहीं

     

    जिन्दगी मायूस थी आज वो महका गयी

    जेसे गुलशन में कोई कली खिलती कहीं

     

    वो जो हंसी जब नजरे मेरी बहकने लगी

    मन की मोम आज क्यों पिगलती गयी

     

    महकने लगा समां चांदनी खिलने लगी

    छुपने लगा चाँद क्यों आज अम्बर में कहीं

     

    भूल निगाओं की जो आज उनसे टकरा गयी

    वो बारिस बनकर मुझ पे बरसती गयी

     

    कुछ बोलना ना चाहते थे मगर ये दिल बोल उठा

    धीरे- धीरे मधुमयी महफिल जमती गयी

     

    आँखों का नूर करता मजबूर मेरी निगाहों को

    दिल के दर्पण पर उसकी तस्वीर बनती गयी

     

    सदियों से बंद किये बेठे थे इस दिल को

    मगर चुपके से वो इस दिल में उतरती गयी

     

    तिल तिल जलता हे दिल मगर दुंहा हे कि उठती नहीं

    परवाना बनकर बेठे हे शमां हे की जलती नहीं

     

    हो गयी क़यामत वो जो सामने आ गयी

    दर्द ऐ दिल से गजल आज क्यों निकलती गयी

     

    थोडा सा शरमाकर, हल्के से मुस्कुराकर झुकी जो नजर

    नज़रे-नूर-ओ-रोशनी में मेरी रंगे-रूह हल्के से घुलती गयी

  • घुल गया उनका अक्स कुछ इस तरह अक्स में मेरे..

     

    घुल गया उनका अक्स कुछ इस तरह अक्स में मेरे

    आईने पर भी अब मुझे न एतबार रहा

     

    हमारी मोहब्बत का असर हुआ उन पर इस कदर

    निखर गयी ताबिश1-ए-हिना, न वो रंग ए रुख़्सार रहा

     

    हमारी मोहब्बत पर दिखाए मौसम ने ऐसे तेवर

    न वो बहार-ए-बारिश रही, न वो गुल-ए-गुलजार रहा

     

    भरी बज्म2 में हमने अपना दिल नीलाम कर दिया

    किस्मत थी हमारी कि वहां न कोई खरीददार रहा

     

    तनहाईयों में अब जीने को जी नहीं करता

    दिल को खामोश धडकनों के रूकने का इंतजार रहा

    1. ताबिश : चमक
    2. बज़्म= सभा
  • घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं….

    घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं…..

    घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं
    बहुत से काम उजाले में नहीं होते हैं।

    उडऩा चाहेंगे जो पत्ते, वे झड़ ही जायेंगे
    वे आंधियों के तो मोहताज नहीं होते हैं।

    कूदती-फांदती लड़की को सीढिय़ां तरसें
    छत पे जब कपड़े नहीं सूख रहे होते हैं।

    डूबती कश्तियों को देख कर भी हंस देंगे
    बच्चे कागज से यूं ही खेल रहे होते हैं।

    हादसा, जैसे सड़क पर कोई तमाशा हो
    लोग बस रुक के जरा देख रहे होते हैं।

    उसके जलने की सी उम्मीद लिये आंखों में
    बच्चे चूल्हे के आसपास पड़े रहते हैं।

    ऐसे आकर के नहीं घौंसला बना लेते
    परिन्दे उड़ते में घर देख रहे होते हैं।

    वो अपने जिस्म से हर रात निकल जाती है
    जानवर लाश को बस नौच रहे होते हैं।
     …सतीश कसेरा

  • बिछडने के ख्याल से हम आपसे मिलने से डरते है

    बिछडने के ख्याल से हम आपसे मिलने से डरते है

    मगर कैसे बताएं हम किस कदर तनहा मरते है

     

    देख न ले वो हमें, कहीं पुकार न ले

    उनकी गलियों से यूं गुज़रने से डरते है

     

    ताउम्र उन्हे चाहने के सिवा क्या किया है हमने

    अब मगर यूं बेहिसाब चाहने से डरते है

     

    कभी बारिश का इंतजार रहता था हमें सालभर

    मगर अब भीग जाने के ख्याल से ही डरते है

     

    दर्द को लिखना चाहते है मगर लफ़्ज साथ ही नही देते

    दिल ए दरिया से बाहर आने से आजकल वो मुखरते है

  • फूलों से कह दो चमन में

    फूलों से कह दो चमन में अब न यूँ महका करें ।
    खौफ से कांटों के अब सब काँटों का सिजदा करें ।

    चाँद किस से जाके अपनी दास्ताँ ए दिल कहे ,
    जब उजालों के ही आशिक चांदनी रुसवा करें ।

    प्यार देने वाले भी तो खा रहे धोखे यहाँ ,
    आदमी की जात का अब हम “भरोसा” क्या करें ।

    अपने दिल की रहगुज़र पर जो अकेले ही चले ,
    क्यूँ जमाने वाले उनके प्यार पर पहरा करें ।

    इतना ही काफी है “नीरज” दिल के रिश्तों के लिए,
    तुम हमें समझा करो और हम तुम्हे समझा करें ।

    नीरज मिश्रा

  • सबकी कदर कर ले

    बरस ना जाये फिर नैना , तू दिल मे कैद कही वो अब्र कर ले..

    तो क्या हुआ , अगर कुछ ख्वाईसे पूरी ना हुई तेरी ….

    तू अधूरी ख्वाईसों संग पूरा ये सफ़र कर ले…

     

    रिश्तो की रस्में दिल से निभा .

    शामिल उनकी हर ख़बर में , अपनी ख़बर कर ले…

     

    जीते ज़ी का हैं सब झमेला …

    तू क़दरदान बन , सबकी कदर कर ले…..

     

    खामोश लफ्ज़ो में छिपी हैँ एक ख़ुशी …..

    तू वो ख़ुशी महसूस करने , थोड़ा सब्र कर ले…

     

    आगे का सफ़र थोड़ा तन्हा कटेगा…

    इत्मीनान से कटे , तो थोड़ी फ़िक्र कर ले…..

     

    पता हैं क़ायनात को तेरे साग़र – ए – इश्क़ का …..

    तू इज़हार करने , बेताब दिल की  एक – एक लहर कर ले….

     

     

    अकेलेपन की चिंगारी दे रही है दस्तक ” पंकजोम प्रेम “….

    इसके आग बनने से पहले ,  महफूज़  उसके साथ का नगर कर ले .

  • मायूस है चेहरे को रौनक

    कल खो दिया मैंने वो नायाब रत्न …
    जिसे पाने को हर इंसान करता है , ना जाने कितने प्रयत्न …..
    This Gajal Dedicate to my grandfather …..

    रंज की बार – बार दरवाज़े – ए – दिल पर हुई दस्तक हैँ …..
    नैना भीग गए , और मायूस चेहरे की रौनक है….

    एक पल में तबाह हो गयी , ख़ुशी – ए – जिंदगी…..
    अंखियों के पर्दो पर , सिलसिलेवार आपकी झलक है…….

    आपका यूँ चुपचाप जग को अलविदा कह जाना …..
    दिल में हमेशा के लिए रम चुकी , ये कसक है….

    विश्वास नहीं हो रहा किसी के भी दिल को….
    सबके गले नीचे नहीं उतरता , दाना – ए – कनक हैं…

    आपके हाथों को नन्ही उंगलियों से थामा…..
    काँधे पर बैठ सीखे दुनियादारी के सबक हैँ…

    एक एक आब सुख गया , पंकजोम ” प्रेम “….
    यहीँ थी मर्जी – ए – ख़ुदा , सबके होंठो को छू निकलने वाले शब्द ये दो टूक हैं…

  • जब भरोसा उठ जाए, तो खुद के पास खुदा रखना

    तुम अपने गिर्द हिसारों का सिलसिला रखना
    मगर हमारे लिये कोई रास्ता रखना

    ज्यादा देर तक जुल्म नहीं सह सकता मैं
    अब अगर आयें कडे दिन तो दिल कडा रखना

    तुम्हारे साथ सदा रह सकें जरूरी नहीं
    अकेलेपन में कोई दोस्त दूसरा रखना

    वो कहते हैं न कि जिसका कोई नहीं खुदा होता है
    जब भरोसा उठ जाए, तो खुद के पास खुदा रखना

  • कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैं

    हादसा ऐसा भी उस कूचे में कर जाऊं मैं
    कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैं

    सुबह होते ही नया एक जजीरा लिख दूं
    आज की रात अगर तह में उतर जाऊं मैं

    मुन्तजिर कब से हूं इक दश्ते करामाती का
    वह अगर शाख हिला दे तो बिखर जाऊं मैं

    जी में आता है कि उस दश्ते सदा से गुजरूं
    कोई आवाज ना आये तो किधर जाऊं मैं

    सारे दरवाजों पे आईने लटकते देखूं
    हाथ में संग लिये कौन से घर जाऊं मैं

  • दीदार – ए – रुख़ – ए – रोशन

    उसकी यादों की बारिश से , एक एक पल है यूँ भीगा……
    किया है जब से दीदार – ए – रुख़ – ए – रोशन हो गए संजीदा…..

    क़दम रखा जैसे ही उसने दिल के आशियाने में….
    एक – एक गम का लम्हा हो गया अलविदा ….

    शुक्रिया अदा करते करते नहीं थकते मेरे अल्फ़ाज़ ….
    मेरी क़िस्मत को क्या ख़ूब ख़ुदा ने हैं लिखा…..

    वो मुस्कराहट की मल्लिका , जिंदगी में ले आई खुशियों की सौगात….
    खुल कर मुस्कुराना भी मैंने उस अप्सरा से है सीखा….

    जिंदगी के सफ़र में वो हमसफ़र ना बन सकी….
    शायद किसी मज़बूरी ने उसे अपनी और था खींचा….

    एक मुलाक़ात के लिए तड़प जाती थी रूह…..
    ऐतबार है , नहीं हुआ ख़ुदा से कोई जफ़ा….

    बहुत गहरे रंज दिए किसी अपने ने…..
    लेकिन दिल उसे मान बैठा , हर रंज की दवा….

    ख्वाईश थी , राह – ए – मोहब्त में उसका हाथ थाम चलने की..
    लेकिन दर – ए – मोहब्त पर ” पंकज ” अकेला जा पहुँचा…

    Pankaj ” prem “

  • दुनियाँ बदल रही है !!

    ये दुनियाँ बदल रही है, या बस हम बदल रहे हैं ;
    दौड़ बची है पैसों की, सब, सबसे आगे निकल रहे हैं !

    यारियाँ है मतलब की, फर्ज अब हक़ में बदल रहे हैं ;
    रिश्तों में विश्वाश अब कहाँ, यक़ीन अब शक़ में बदल रहे हैं !

    माँ, बहनें महफूज़ नहीं, रक्षक अब भक्षक में बदल रहे हैं ;
    जिनके कदमो में हैं राम-ओ-रहीम, उनको पैरों से कुचल रहे हैं !

    हर चेहरे पर इक नकाब है ‘अक्स’, और लफ्जों में सियासत;
    हर शख्स खुदी में ख़ुदा है, इंसान मजहब में बदल रहे हैं !………#अक्स

  • पर्व सबका ये दीपावली का रहे

    घर अँधेरे में अब ना किसी का रहे ।
    चार सू रंग यूँ रौशनी का रहे ।

    जगमगायें यहाँ सब महल झोपड़ी
    पर्व सबका ये दीपावली का रहे ।

     

    घर ,मुहल्ले ,शहर खिल उठें प्यार से ,
    हर तरफ सिलसिला दोस्ती का रहे ।

    आओ दें एक दूजे को शुभकामना ,
    दौर सबके लिए उन्नती का रहे ।

    ऐसी दीवाली हो अब दुआ कीजिये ,
    सबके दिल में तसव्वुर ख़ुशी का रहे ।

    नीरज मिश्रा

  • मैं पानी का आईना हूं

    टूटता हूं फिर से जुड जाता हूं
    मैं पानी का आईना हूं

    घर से लिये हूं रात का सूरज
    कहने को मिट्टी का दीया हूं

    गले गले है पानी लेकिन
    धान की सूरत लहराता हूं

    रस की सोत बनेगी दुश्मन
    गन्ने सा चुप सोच रहा हूं

  • सोचा नहीं था

    चले जाओगे तुम ये सोच नहीं था
    हो जाएगें तनहा हम ये सोचा नहीं था

    हंसते हंसते बितायी थी जिंदगी हमने
    गम में ढ़ल जाएगी जिंदगी ये सोचा नहीं था

    तेरी आंखो के नशे मे डूबे रहे हम जिंदगी भर
    मय बन जाएगा मुकद्दर ये सोचा नहीं था

    जिंदगी क्या थी हमारी बस तुम्हारा अहसास था
    अहसास भी साथ न रहेगा ये सोचा नहीं था

    दिल ए आईने में उतार ली थी तस्वीर तुम्हारी
    वो आईना टूट जाएगा ये सोचा नहीं था

    हर शाम साथ साथ हुई थी बसर हमारी
    तमाम शब जगेंगे तनहा ये सोचा नहीं था

    मिले थे जब उनसे मिट गयी थी दूरियां
    दूरियां हो जाएगीं दरम्यां ये सोचा नहीं था

    जिने जानते थे हम अपनी जिंदगी से ज्यादा
    वो हो जाएंगे अजनबी ये सोचा नहीं था

    sign

  • गजल

    2122 1212 22

    कुछ दिनों से खफा-खफा सा है ।

    चाँद मेरा छुपा-छुपा सा है ।।

     

    कुछ तो जिन्दा है जिस्म के अंदर ;

    और कुछ तो जुदा-जुदा सा है ।

     

    जब से’ उतरा हूँ’ होश की तह में  ;

    होश तब से हवा-हवा सा है ।

     

    सादगी से बदल गयी रंगत  ;

    ये असर भी नया-नया सा है ।

     

    उसकी’ सांसों ने’ छू लिया था कल ;

    जिस्म से रूह तक छुआ सा है ।

     

    उसने’ भी आग को हवा दी थी ;

    हर तरफ जो धुँआ-धुँआ सा है ।

    राहुल द्विवेदी ‘स्मित’

  • गायब हर मंजर मेरा

    गायब हर मंजर मेरा
    ढूढ़े परिंदा घर मेरा

    जंगल में गुम फ़स्ल मेरी
    नदी में गुम पत्थर मेरा

    दुआ मेरी गुम सर सर में
    भंवर में गुम महवर मेरा

    नाफ़ में गुम सब ख्वाब मेरे
    रेत में गुम बिस्तर मेरा

    सब बेनूर क्यास मेरे
    गुम सार दफ़्तर मेरा

    कभी कभी सब कुछ गायब
    नाम कि गुम अक्सर मेरा

    मैं अपने अंदर की बहार
    बानी क्या बाहर मेरा

  • तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे

    तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे
    तेरे लहू के समंदर जरा पुकार मुझे

    मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ के क्या देखूं
    उरूजे फन! मेरी देहलीज पर उतार मुझे

    उबलते देखी है सूरज से मैनें तारीकी
    न रास आएगी यह सुबह जरनिगार मुझे

    कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पॉव चूमूंगा
    जमान लाख करे आके संगसार मुझे

    वह फ़ाका मस्त हूं जिस राह से गुजरता हूं
    सलाम करता है आशोब रोजगार मुझे

  • चाँद के शौक मे

    चाँद के शौक मे तुम छत पे चले मत जाना
    शहर में ईद की तारीख बदल जाएगी

  • गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….

    गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….
    गमछे रखकर के अपने कन्धों पर
    बच्चे निकले हैं अपने धन्धों पर।

    हर जगह पैसे की खातिर है गिरें
    क्या तरस खाएं ऐसे अन्धों पर।

    सारा दिन नेतागिरी खूब करी
    और घर चलता रहा चन्दों पर।

    अपना ईमान तक उतार आये
    शर्म आती है ऐसे नंगों पर।

    जितने अच्छे थे वो बुरे निकले
    कैसे उंगली उठाएं गन्दों पर।

    जिन्दगी कटती रही, छिलती रही
    अपनी मजबूरियों के रन्दों पर।
    ……..सतीश कसेरा

  • एक मुलाकात की तमन्ना मे…

    एक मुलाकात की तमन्ना मे…

    आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
    एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे

    आप हमारी हकीकत तो बन न सके
    ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे

    आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
    बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे

    सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
    हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे

    जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
    एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे

    sign

  • तुम्हारा अक्स

    तुम्हारा अक्स

    तुम्हारे अक्स से दुनिया है रोशन ,

    सुना है चाँद की तू चांदनी है .

    सलीका प्रेम में अब क्या करेगा ,

    नज़र को अब के माफ़ी मिल चुकी है .

    ज़रा अब दर्द से नहला दो मुझको,

    वफ़ा की धूल काफी चढ़ चुकी है .

    समंदर अब के पानी मांगता है , 

    सुना है प्यास उसकी बढ़ चुकी है .

    कहीं पर मीर ने देखा है तुझको ,

    चमक चेहरे के उसकी बढ़ चुकी है.

    …atr

  • मेरे साकी

    मेरे साकी

    तुम्हारी चाह ही मंज़िल हमारी ए मेरे साकी,
    ज़रा अब तो पिला दे न , तमन्ना अब भी है बाक़ी.
    मेरे साकी तेरे आँखों की मदिरा क्या बताऊँ मैं,
    फ़क़त आँखों से चढ़ती है ,मगर दिल तक उतरती है ,
    उतरना फिर भी वाज़िब था मगर अब ये लगा है कि,
    उतरकर भी ये चढ़ती है , और चढ़ के फिर उतरती है .

     

    …atrGlasses-of-wine-002

  • आज की शाम

    आज की शाम

    आज की शाम शमा से बाते कर लूं
    उससे चेहरे को अपनी आखों में भर लूं

    फासले है क्यों उसके मेरे दरम्या
    चलकर कुछ कदम कम ये फासले कर लूं

    प्यार करना उनसे मेरी भूल थी अगर
    तो ये भूल एक बार फिर से कर लूं

    उसके संग चला था जिंदगी की राहों में
    बिना उसके जिंदगी कैसे बसर कर लूं

    परवाने को जलते देखा तो ख्याल आया
    आज की शाम शमा से बाते कर लूं

    sign

  • छुपा है चाँद बदली में…

    छुपा है चाँद बदली में…

    छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या?
    नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
    मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ?
    वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
    अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या?

    कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,
     न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात..
    जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या?

    वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को,
    वो नदियां है क्यों प्यासी सी, बुलाती है बुलाने को,
    उन्ही नदियों की रहो में रुकावट आ गयी है क्या?

    नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
        …atr

  • तेरी आवाज में हम डूब जाते है

    तेरी आवाज में हम डूब जाते है

    तेरी आवाज में हम डूब जाते है
    तुझसे हम कुछ कह नहीं पाते है

    हाल ए दिल कैसे करें बयां अपना
    दिल की हर धडकन में तुझे सजाते है

    गालिब बना दिया हमें तेरी मोहब्बत ने
    तनहाइयों में भी बस तुझे गाते है

    यकीन है एक दिन मिलेगीं नजरें तुझसे
    हर लम्हा यही सोचकर बिताते है

    शम्मा से बस एक मुलाकात की खातिर
    परवाने पागल शम्मा मे जल जाते है

    sign

  • उस अफ़साने की बात करते हो

    उस अफ़साने की बात करते हो

    सिमट गया जो चंद अल्फ़ाजों में, उस अफ़साने की बात करते हो

    खुद को हमारी जिंदगी बनाकर, छोड जाने की बात करते हो |

     

    नहीं है कोई अंजाम इस अफ़साने का, मालूम था हमें

    जला रखा था इक उम्मीद का चिराग़, उसे बुझाने की बात करते हो |

     

    पहले से दफ़न है कई अहसास मेरे दिल की दरख्तों में

    कत्ल करके इक और अहसास का, दफ़नाने की बात करते हो |

     

    गये है तेरे दर पर हम, अपना सबकुछ छोडकर

    अब खुद को छोडकर, लोट जाने क़ी बात करते हो

  • मेरी याद आएगी

    मेरी याद आएगी

    क़भी जब गिर के सम्भ्लोंगे  तो मेरी याद आएगी ,

    कभी जब फिर से बहकोगे  तो मेरी याद आएगी।

    वो गलियां , वो बगीचे ,वो शहर ,वो घर ,

    कभी गुजरोगे जब उनसे तो मेरी याद आयेगी।

    वो कन्धा मीर का तकिया तुम्हारा वस्ल में जो था,

    कभी जब नींद में होगे तो मेरी याद  आएगी।

    मुझे है याद वो पत्थर कि जिनसे घर बनाया था ,

    आँखों ही आँखों से जहाँ सपना सजाया था ,

    मुझे है याद वो आँखे, वो बातें और वो सपना,

    कभी उस घर से गुजरोगे तो मेरी याद आएगी।

    क़भी जब गिर के सम्भ्लोंगे तो मेरी याद आएगी।

    कभी जब फिर से बहकोगे तो मेरी याद आएगी।

    …atr

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