सांझ हुई,दीपक जलाओ आयंगे प्रियतम तुम्हारे हैं अँधेरे पंथ में जो है वही चांदनी हमारी सांझ हुई दीपक जलाओ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-

है प्रभु विनती हमारी मार्ग दो संसार को है निशा जहाँ जगती पर प्रकाश दो संसार को तुम हो नाथ अनाथ के सानिध्य दो संसार को है प्रभु विनती हमारी सार दो संसार को -विनीता […]

सुना है इश्क की बजार खुली है मेरे शहरो मे, जो जहजे दिल के आदमी है उनके लिए नया आँफर लाया है मेरे शहरो ने। अब मेरे शहरो मे कोई इश्क से बीमार नही मिलेगा […]

✍✍✍काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती , शिर्फ एक इंसायनित की नाम होती,, तो दिल्ली मै बैठे गद्देदार की रोटी नही सिझती। रामायण और कुरान मे भेद बताकर अपनी रोटी सेकते है […]

✍✍ मत करना प्यार आज की युवती से, प्यार नही सौदा करती आज की युवाओ से, पैसा- को महत्व देती वो ना देगी प्यार , वादे तो बहुत होगी पर पैसा लेगी हजार, पैसा- पैसा […]

क्यों तुम शमा-ए-चाहत को बुझाकर चले गये? क्यों तुम मेरी ज़िन्दग़ी में आकर चले गये? हर ग़म को जब तेरे लिए सहता रहा हूँ मैं- क्यों तुम मेरे प्यार को ठुकराकर चले गये? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

मुझे मंजूर नहीं है १६ जुलाई २०१८ जग में अपने अस्तित्व को लेकर मैं हैरान हूँ इस जीवन का उद्देश्य क्या है, मैं अनजान हूँ आखिर मेरा जन्म हुआ क्यों है मैं परेशान हूँ तेरा […]

कुर्सी की चाहत बचपन ऐ दिल में सजाये बैठे हैं, शतरंज के सारे मोहरे अपनी मुट्ठी में दबाये बैठे हैं, इरादे किसी शीशे से साफ़ नज़र आते हैं के हम, ख़्वाबों की एक लम्बी फहरिस्त […]

आजतक सूरज कितने अच्छे बुरे अनदेखे पलों का साक्षी है पर उसकी चाल, उसके कर्म पर कभी कोई फर्क नहीं आया हर सुबह उसी ऊर्जा और, उसी शक्ति के साथ निकलता है बिना किसी भेदभाव, […]

चल जिन्नदगी के पन्ने मे तेरा नाम लिखता हूँ, तुम्हारे साथ जीने मरने का वादा अदालत मे गीता मर हाथ रख कर कहता हूँ।। ज्योति

इतनी खुद्दारी थी मुझमें के भिखारी हो गया, हर रिश्ता जैसे मुझपर ही भारी हो गया, संबंधों की सारी फहरिस्त झूठी निकली, एक जानवर जब मेरे जीवन की सवारी हो गया॥ राही (अंजाना)

पन्ने ज़िन्दगी की किताब में जोड़ने पड़ते हैं, अपने हिस्से के किस्से खुद ही लिखने पड़ते हैं, छोड़कर कई बार रास्तों को सफर में, हाथ किताबों से मिलाकर दोस्त छोड़ने पड़ते हैं।। राही (अंजाना)

मैं अपनी तमन्नाओं पर नकाब रखता हूँ। मैं करवटों में चाहत की किताब रखता हूँ। जब भी क़रीब होती हैं यादें ज़िन्दग़ी की- मैं दर्द तन्हाई का बेहिसाब रखता हूँ। मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

खेल खेलने को बहुत कुछ जुटाते हैं हम, कुछ न कुछ सोंच के कुछ तो बनाते हैं हम, जिंदगी के सागर में नसीब पानी नहीं हमें, तो मजबूर होके कचरे की नाव चलाते हैं हम।। […]