ओ चलने वाले मुसाफिर गल्ती से रुक मत जाना उसके मिलन की चाह में इक पल भी ना गँवाना …… यूई
ओ चलने वाले मुसाफिर गल्ती से रुक मत जाना उसके मिलन की चाह में इक पल भी ना गँवाना …… यूई
कितनी मंजिले पायी है उनकी गिनती याद नही जो सर करनी बाकी है उनकी शक्लें याद सभी …… यूई
जन्मो जन्मो की राह् है दिल में जलती तेरी चाह है सफर में है आराम नही तुझे पाए बिना थाह नही …… यूई
हम तो वोह परवाने है जो शमा का दम भरते है शमा ने महफिल दूर् स्जायी हम इसका कब गम करते है …… यूई
फिर पीछे मुड़ कर देखना हमने कभी सीखा ही नही कदम जो आगे बड़ा लिए उनको कभी खींचा ही नही …… यूई
मुड़ के देखे यह वक्त कहां हम तो सफर के शौदायी है …… यूई
रास्तों की मुश्किलों की हमें परवाह नही जानते नही हम तो मंजिलों के दीवाने है …… यूई
कबसे हूँ मै सफर में मुझको भी अब याद नही रुकना मेरी नीयती नही चलना मेरी रवानी है …… यूई
बेवज़ह इतना कुछ हो गया क्या पागलपन की बीमारी है ख़ुद का तीर, ख़ुद का कमान ख़ुद के मरने की पूरी तैयारी है …… यूई
तुम मेरी बारी के प्यासे हो बच तो तुम भी ना पाओगे मेरी वजह तुम क्या बने हो तुम्हारी वजह की तैयारी है …… यूई
आज नही तो कल आएगी बस तेरी मेरी ही तो बारी है आज बच जाएँ भी तो क्या कल को बस मेरी ही बारी है …… यूई
करता क्रम सब है उसके सब उसके ही तो अधीन है वजह है हर शय में उसकी हर शय उसके अधीन है …… यूई
बेवज़ह चाहे दिखता यहा पे बेवज़ह यहा कुछ भी तो नही …… यूई
ऐसे जाना या वैसे जाना यह तो सब बहांने है …… यूई
यह सब मन की उलझनें है के हम ही सब यहां करते है हम तो कुछ ना करते यहां पे वोही तो सब कुछ करता है …… यूई
तीर चलाने से पहले सोचो ज़ुबान चलाने से पहले सोचो कमान से निल्का हुआ तीर ज़ुबान से निकला हुआ तीर दोनों वापस क्भी नही आते …… यूई
आज आनी है कल आनी है बारी तो सबकी आनी ही है …… यूई
कुछ भी ना होता बेवज़ह हर चीज में उसकी मर्ज़ी है …… यूई
झुका के मन को जीना सिखा जाता ख़ुद जीता और दूसरों को जीवा जाता अकड़ तेरी किस कम की निकली जिसने तेरी सारी हस्ती ही निगली …… यूई
है यह नियम कुदरत का जो भी यहां अकड़ता है छोटे से झोंके सह ना पाता टूटता वोह सबसे पहले है …… यूई
झुकना है दरबार में जाके फिर क्यों इतनी हांके तू उसको जो पसंद है बंदिया उसको क्यों ना जाने तू …… यूई
तू तुच्छ सा जीव ओ बंदिया किस बात पे इतना अकड़ता तू पल भर की तेरी हस्ती नही है किस बात पे इतना इतरता तू …… यूई
झुकना है निशानी मन निमाने की निम्न मन ही तो सबको अपना पता निम्न मन ही तो सब सच जान पता निम्न मन ही तो असल में जी पाता …… यूई
प्यार जब दिल में भर जाएगा झुकना ख़ुद ही सीख जाएगा …… यूई
अकड़ तेरे मन की काली छाया इसको कर बड़ा क्या तू पाएगा ख़ुद अंधेरों से निकाल ना पाएगा किसी को क्या तू राह् दिखाएगा …… यूई
झुके हुए सर को मिलता गुरु का प्यार है अकड़े हुए सर को मिलता गुरु का दुत्कार है …… यूई
जिस ने पाया झुक के पाया अकड़ के कुछ ना मिलता है झुकना यह है जीवन की माया झुक के ही सब मिलता है …… यूई
मेरा मेरा बस रटता रह्ता सब तेरे मन के भ्रान्ति है वक्त रहते संभल जा बंदिया अभी भी कुछ ना खोया है …… यूई
अकड़ तेरी सब झूठी बंदिया है कुछ ना तेरे हाथ में बंदिया …… यूई
झुके हुए सरो ने ही सोच के शांत मन से झुकाया कितनी शमशीरों को बचाया है कितनी तक़दीरों को …… यूई
झुका के सर अपना तू दिलों को सर कर पाएगा झुका के मन अपना तू सबको अपना बना जाएगा …… यूई
झुके हुए सर निशानी है इंसानो की अकड़े हुए सर निशानी है हैवानो की …… यूई
अकड़ अकड़ में मिट जाएगा कुछ ना तुझको मिल पाएगा सबसे मिलना सीख ले बंदिया झुक के जीना सीख ले बंदिया …… यूई
अकड़ अकड़ करता है बन्दे जब तू पूरा अकड़ा जाएगा इक पल ना फिर बच पाएगा तपती आग में सेका जाएगा …… यूई
झुकना तेरी कमजोरी नही ना झुकना तेरी कमजोरी है …… यूई
झुक के सब मिल जाता है अकड़ के कुछ ना पाता है …… यूई
जो झुका वोही तो फलता है जो अकड़ा वोही तो कटता है …… यूई
झुकना ही तो नम्रता है अकड़ा वो तो मुर्दा है …… यूई
अत्याचार दिन ब दिन बढ़ रहे हैं भारत की बेटी पर। रो-रो कर चढ़ रही बिचारी एक-एक करके वेदी पर ।। भिलाई से लेकर दिल्ली तक प्रतिदिन नई कहानी है। किसने पाप किया है ये, […]
Der se hi sahi ; Mujhko is baat ka ehsaas hua; ke mujhe chod kar koi or nahi is dil ke pass hua ; Dusron ke lie jeena chodo yaaro kyuki is zindagi ke baad […]
. ღღ__ना कोई उम्मीद, ना तड़प, ना ही इंतज़ार किसी का; . कितना अच्छा होगा वो जहाँ, जहाँ मोहब्बत नहीं होगी !!….अक्स .
मिलती है आशीष झुकने से इंसा फिर अकड़ता क्यों है राजेश’अरमान’
कोई तीर निकला कमान से बेवज़ह न जाने किसकी बारी आई बेवज़ह राजेश’अरमान’
सुना है बहुत दूर की सोचते है वो हमें वो सोचे इसके वास्ते शायद दूर जाना पड़ेगा राजेश’अरमान’
कितने मुश्किल सफर तय किये है मुड़ के तो देख अब रूक क्यों गया है फिर चल के तो देख राजेश’अरमान’
लुप्त होते रहे गर अच्छे इन्सां इसी तरह , इक दिन ये कहीं डाइनासोर न हो जाए राजेश’अरमान’
कल छोड़ के आया था जिसे अँधेरे में वो तन्हाई आज , फिर मुझे रोशन कर रहीं है राजेश’अरमान’
न तख्तो पे न ताज़ों पे नज़र रखता हूँ न कोई जलवा न रिवाज़ों पे नज़र रखता हूँ जो देखने का मुझे बंद आँखों से जुनूँ रखते है बंद आँखों से , उन बंद आँखों […]
फ्रेंडशिप डे पर फेस बुक के सभी दोस्तों के लिए रस्म कुछ फेस बुक में हम इस तरह निभाते है बिन मिले कभी हम दोस्ती का फ़र्ज़ निभाते है हर वक़्त आँखें गड़ी रहती दोस्तों […]
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