आयतों की खवाइश में इक मज़ार बन के रह गया दुनिया के कारखाने का बस औज़ार बन के रह गया न किसी मंदिर ,न मस्जिद न हरम के क़ाबील हूँ फूल बनना चाहा था ,बस […]

मंज़िलें कुछ इस कदर हमसे जुदा हो गई है ये हमारे वास्ते तो बस ख़ुदा हो गई है अच्छे दिन आने वाले है बस सुनते रहे या तो नई मुश्किलों की इब्तेदा हो गई है […]

जाने क्यूँ वो छोड़ के मेरा साथ गया तन्हाइयों के पुर्ज़े दे के मेरे हाथ गया हमें तो सुकूँ था वक़्त के सूखों में भी बेवज़ह दे के आँखों को वो बरसात गया सब कुछ […]

मुक्त आकाश में हवाओं ने कब किसी का रास्ता रोका है हम ही तेज हवाओं के भय से रास्ते बदल लेते है रास्तों ने कब किसे रोका है हम ही थक कर रूक जाते है […]

तेज भागती दौड़ती ज़िंदगी कुछ थक सा गया है इंसान अंदर से कुछ -कुछ एक धावक की भी दौड़ने की एक सीमा होती है जहा पहुंचकर वो विजेता होता है पर इस ज़िंदगी की दौड़ […]

अपने शब्दों को कभी सच की , लिबास न ओढ़ा सका घुमते रहे मेरे शब्द झूठ के चिधडे ओढे , फटे फटे से कपड़ों में कितने बेहया से लगते है शब्द ,जब ढंग की लिबास […]

कैनवास मेरा और तस्वीर तेरी रंग मेरा पर रंगों की आराईश तेरी अश्कों के समुन्दर आँखों के मेरे , आँखों में तैरती कश्तियाँ तेरी इस घर पे रखी इक शै सही मैं , इस घर […]

इक असीर सी जीस्त का पनाहगार हूँ मैं जो कभी न मुक्कमल हुआ वो असफ़ार हूँ मैं इख्लास का लिबास कहाँ मेरे नसीब में अपने ही इत्लाफ़ का बस इक क़रार हूँ मैं क़ल्ब कसूर […]

आखरी उड़ान होगी किसे था गुमाँ आसमां में फैलेगा बस धुआं ही धुआं माना वक़्त के आगे बेबस रात दिन कैसे लगी आसमां पे हवाओं की बद्दुआ कितनी आँखें भीगी , हुई जब दर्द की […]

आश्ना कब तेरे शहर में कोई मिलता है जिसको देखो वो अजनबी सा मिलता है हमने देखी है इस जहाँ में ऐसी दरियादिली बिन मांगे ही झोली में गम हज़ार मिलता है तिरी जुस्तजू जन्नत […]

पंछी इक देखा पिंजरे को कुतरता हुआ आज़ादी एक जुनूँ होती है एहसास हुआ बादल ही देते है बारिश और बिज़ली भी इस दुनिया के भी दो रूप का एहसास हुआ दरख्तों की जुबां भी […]

हर जुनूँ की कोई वज़ह होती है हर वज़ह ज़ूनू की सजा होती है हर शख्स सजा-याफ्ता है यहाँ , फर्क सालो का, पर सजा होती है रिन्दों के लिए मैखाने उजाले होते है जिनके […]

‘ उलझे हुए धागे भी सुलझाने से सुलझ जाते है उलझे रिश्तें सुलझाने से और उलझ जाते है / रिश्तों की नाज़ुकी को क़द्र की पनाह दे दो वरना रिश्तें किसी उलझे धागे में उलझ […]

कुछ इस तरह से इक शाम गुजारी है अपने हिस्से के गम से की वफादारी है कुछ टुकड़ो में बाँट के रख दिया ग़मों को अपने साथ हमने की इस तरह फौजदारी है राजेश’अरमान’

पुनर्जन्म क्या मिथ्या है ??? या यथार्थ समझ से परे ? हर नई सुबह भी तो होती है पुरानी सुबह का पुनर्जन्म अपने ही अंदर होता है एक नया जन्म आकार वहीँ स्वरुप वहीँ पर […]

मुट्ठी में अपने आकाश, भरने का इरादा रखता हूँ तारों को हथेलिओं में ,सजाने का इरादा रखता हूँ किसी गिरी हुई इमारत की बस इक ईट सही , बुलंद इमारत फिर भी ,बनाने का इरादा […]

किसी सेहरा की रेत पे लिखा कोई गीत नहीं हूँ समुन्दर की लहरों पे सजा कोई संगीत नहीं हूँ हर खेल मैंने खेले , अपने ही उसूलों -कायदों से , किसी शतरंज की बाज़ी की […]

होली, रुत पर छा गयी। मस्तों की टोली आ गयी।। लाज़ शरम तुम छोड़ो। आज मुख मत मोड़ो।। दिल को दिल से जोड़ो। झूम कर अब बोलो॥ होली, रुत पर छा गयी है। मस्तों की […]

गिरगिट की सभा नया गुरु चुनने के लिए कई बुजुर्ग गिरगिट , दावेदार बने पर किसी पर न , बन सकी सहमति युवा गिरगिटों की मांग सूची में पहली और आखरी मांग आजकल रंग बदलने […]

इन पत्थरों में तुम न जाने क्या ढूँढ़ते हो दुनिया में रहकर कौन सी दुनिया ढूँढ़ते हो बिक गया हर शख्स अपने ही बाजार में अब बाजार में कौन सी परछाईया ढूँढ़ते हो परिंदे आसमाँ […]

अपने ही लोग फिर शहर में दहशत क्यूँ अपनी ही आँखों में जहर सी वहशत क्यूँ कहीं तो सुनी जाएगी आख़िर फ़रियाद किसी सजदे को ,किसी दुआ की हसरत क्यूँ राजेश’अरमान’

रास्तों का कष्ट उस मुसाफिर को क्या जिस मुसाफिर ने इसे जीवन पथ समझा जिनकी मंज़िल ही उलझी बैठी हो उसने कब जीवन का मतलब समझा रास्ते चाहे सुलझे हो या उलझे कब रास्तों ने […]

कुछ अकेले से एहसास फिरते है दरम्या मेरे कुछ कशिश है उदास फासलों के घने अँधेरे दबे कदम चलती साँसें सहमे कदम आते सबेरे हलकी बारिश का मौसम आँखों में धुँआ के फेरे सोती रात […]

देखा जब भी लहरों को मचलते समुन्दर की गोद में लगता कोई बच्चा मचल रहा है अपनी माँ की गोद में देखा जब भी बादलों को मचलते आसमां की गोद में लगता कोई युवा मचल […]

प्रेम सिर्फ अनुभूति है नहीं, प्रेम अनुभूति से अलग कोई एहसास है जिसे देखा जा सकता है किसी की आँखों में किसी की साँसों में किसी की ख़ामोशी में किसी की सरगमों में किसी की […]

काँपते ख़्वाबों को हक़ीक़त की जुम्बिश न मिली रूठे अल्फ़ाज़ों को किसी प्यार की बंदिश न मिली तिश्नगी लबों तक आकर खामोश हो जाती है कशिश को भी और कोई, फिर कशिश न मिली फ़लसफ़े […]