मेरी ख़ामोशिओं से वाबस्ता नहीं जब रूह तेरी , मेरे लफ़्ज़ों के तो फिर जनाज़े ही निकल जायेंगे राजेश’अरमान’
मेरी ख़ामोशिओं से वाबस्ता नहीं जब रूह तेरी , मेरे लफ़्ज़ों के तो फिर जनाज़े ही निकल जायेंगे राजेश’अरमान’
आयतों की खवाइश में इक मज़ार बन के रह गया दुनिया के कारखाने का बस औज़ार बन के रह गया न किसी मंदिर ,न मस्जिद न हरम के क़ाबील हूँ फूल बनना चाहा था ,बस […]
मंज़िलें कुछ इस कदर हमसे जुदा हो गई है ये हमारे वास्ते तो बस ख़ुदा हो गई है अच्छे दिन आने वाले है बस सुनते रहे या तो नई मुश्किलों की इब्तेदा हो गई है […]
जाने क्यूँ वो छोड़ के मेरा साथ गया तन्हाइयों के पुर्ज़े दे के मेरे हाथ गया हमें तो सुकूँ था वक़्त के सूखों में भी बेवज़ह दे के आँखों को वो बरसात गया सब कुछ […]
मुक्त आकाश में हवाओं ने कब किसी का रास्ता रोका है हम ही तेज हवाओं के भय से रास्ते बदल लेते है रास्तों ने कब किसे रोका है हम ही थक कर रूक जाते है […]
तेज भागती दौड़ती ज़िंदगी कुछ थक सा गया है इंसान अंदर से कुछ -कुछ एक धावक की भी दौड़ने की एक सीमा होती है जहा पहुंचकर वो विजेता होता है पर इस ज़िंदगी की दौड़ […]
अपने शब्दों को कभी सच की , लिबास न ओढ़ा सका घुमते रहे मेरे शब्द झूठ के चिधडे ओढे , फटे फटे से कपड़ों में कितने बेहया से लगते है शब्द ,जब ढंग की लिबास […]
दरीचों से झाकती ये ज़िंदगी सड़को पर भागती ये ज़िंदगी हर तरफ फैली है चिंगारियां, , लम्बे क़दमों से लांघती ये ज़िंदगी राजेश ‘अरमान’
कैनवास मेरा और तस्वीर तेरी रंग मेरा पर रंगों की आराईश तेरी अश्कों के समुन्दर आँखों के मेरे , आँखों में तैरती कश्तियाँ तेरी इस घर पे रखी इक शै सही मैं , इस घर […]
इक असीर सी जीस्त का पनाहगार हूँ मैं जो कभी न मुक्कमल हुआ वो असफ़ार हूँ मैं इख्लास का लिबास कहाँ मेरे नसीब में अपने ही इत्लाफ़ का बस इक क़रार हूँ मैं क़ल्ब कसूर […]
आखरी उड़ान होगी किसे था गुमाँ आसमां में फैलेगा बस धुआं ही धुआं माना वक़्त के आगे बेबस रात दिन कैसे लगी आसमां पे हवाओं की बद्दुआ कितनी आँखें भीगी , हुई जब दर्द की […]
आश्ना कब तेरे शहर में कोई मिलता है जिसको देखो वो अजनबी सा मिलता है हमने देखी है इस जहाँ में ऐसी दरियादिली बिन मांगे ही झोली में गम हज़ार मिलता है तिरी जुस्तजू जन्नत […]
पंछी इक देखा पिंजरे को कुतरता हुआ आज़ादी एक जुनूँ होती है एहसास हुआ बादल ही देते है बारिश और बिज़ली भी इस दुनिया के भी दो रूप का एहसास हुआ दरख्तों की जुबां भी […]
हर जुनूँ की कोई वज़ह होती है हर वज़ह ज़ूनू की सजा होती है हर शख्स सजा-याफ्ता है यहाँ , फर्क सालो का, पर सजा होती है रिन्दों के लिए मैखाने उजाले होते है जिनके […]
‘ उलझे हुए धागे भी सुलझाने से सुलझ जाते है उलझे रिश्तें सुलझाने से और उलझ जाते है / रिश्तों की नाज़ुकी को क़द्र की पनाह दे दो वरना रिश्तें किसी उलझे धागे में उलझ […]
कुछ इस तरह से इक शाम गुजारी है अपने हिस्से के गम से की वफादारी है कुछ टुकड़ो में बाँट के रख दिया ग़मों को अपने साथ हमने की इस तरह फौजदारी है राजेश’अरमान’
पुनर्जन्म क्या मिथ्या है ??? या यथार्थ समझ से परे ? हर नई सुबह भी तो होती है पुरानी सुबह का पुनर्जन्म अपने ही अंदर होता है एक नया जन्म आकार वहीँ स्वरुप वहीँ पर […]
हर जाती सांस ने कहा देख शजर से कोई पत्ता टूटा राजेश ‘अरमान’
इल्म कुछ तो इधर भी होता है ख्वाब बंद आँखों में जगा होता है राजेश ‘अरमान’
कल छोड़ के आया था जिसे अँधेरे में वो तन्हाई आज , फिर मुझे रोशन कर रहीं है राजेश’अरमान’
रुके कदम कुछ कह जाते है देख मुड़ के अपने क़दमों के निशाँ राजेश’अरमान’
वक़्त कटता भी और काटता भी है फितरत इसकी भी है अपनों की तरह राजेश’अरमान’
साये भी अपने कभी छोटे कभी बड़े हो जाते है साये भी रखते है मेरे ग़मों से वास्ता जैसे राजेश’अरमान’
लुप्त होते रहे गर अच्छे इन्सां इसी तरह , इक दिन ये कहीं डाइनासोर न हो जाए राजेश’अरमान’
कितने मुश्किल सफर तय किये है मुड़ के तो देख अब रूक क्यों गया है फिर चल के तो देख राजेश’अरमान’
मुट्ठी में अपने आकाश, भरने का इरादा रखता हूँ तारों को हथेलिओं में ,सजाने का इरादा रखता हूँ किसी गिरी हुई इमारत की बस इक ईट सही , बुलंद इमारत फिर भी ,बनाने का इरादा […]
किसी सेहरा की रेत पे लिखा कोई गीत नहीं हूँ समुन्दर की लहरों पे सजा कोई संगीत नहीं हूँ हर खेल मैंने खेले , अपने ही उसूलों -कायदों से , किसी शतरंज की बाज़ी की […]
होली, रुत पर छा गयी। मस्तों की टोली आ गयी।। लाज़ शरम तुम छोड़ो। आज मुख मत मोड़ो।। दिल को दिल से जोड़ो। झूम कर अब बोलो॥ होली, रुत पर छा गयी है। मस्तों की […]
कुछ ख्वाब के पत्थर सिर पे लगे है, खून रिसता नहीं बस जम सा गया है हर लम्हा जैसे बस थम सा गया है राजेश ‘अरमान ‘
इन रास्तों पे कोई कितना यकीं करें इन रास्तों के भी कितने मोड़ होते है राजेश’अरमान’
डूबती कश्तियों को किनारा मिल भी जाएँ , नाखुदा की नीयत भी कुछ मायने रखती है राजेश’अरमान ‘
कभी ख़ामोशी बंद संदूक की देखना सामान सब भरा पर फिर भी गुमसुम राजेश’अरमान’
ग़ुम हुए इंसा की तलाश क्या ग़ुम ही रहेगा जहाँ रहेगा राजेश’अरमान’
गिरगिट की सभा नया गुरु चुनने के लिए कई बुजुर्ग गिरगिट , दावेदार बने पर किसी पर न , बन सकी सहमति युवा गिरगिटों की मांग सूची में पहली और आखरी मांग आजकल रंग बदलने […]
काफिलों के साथ साथ चलते रहे दुनिया के रंग में बस ढलते रहे राजेश’अरमान’
पतंग आसमाँ में उड़ती भी है और आसमाँ में कटती भी है राजेश’अरमान’
खामख्वाह वो अपने अंदाज़ सितम के बदलते है पुराने अंदाज़ भी सितम के कम लाज़वाब न थे राजेश’अरमान’
वो पढ़ना भी चाहते है मुझे पूरा , और आँखों में मेरी किताब भी नहीं राजेश’अरमान’
इन पत्थरों में तुम न जाने क्या ढूँढ़ते हो दुनिया में रहकर कौन सी दुनिया ढूँढ़ते हो बिक गया हर शख्स अपने ही बाजार में अब बाजार में कौन सी परछाईया ढूँढ़ते हो परिंदे आसमाँ […]
अपने ही लोग फिर शहर में दहशत क्यूँ अपनी ही आँखों में जहर सी वहशत क्यूँ कहीं तो सुनी जाएगी आख़िर फ़रियाद किसी सजदे को ,किसी दुआ की हसरत क्यूँ राजेश’अरमान’
रास्तों का कष्ट उस मुसाफिर को क्या जिस मुसाफिर ने इसे जीवन पथ समझा जिनकी मंज़िल ही उलझी बैठी हो उसने कब जीवन का मतलब समझा रास्ते चाहे सुलझे हो या उलझे कब रास्तों ने […]
कुछ अकेले से एहसास फिरते है दरम्या मेरे कुछ कशिश है उदास फासलों के घने अँधेरे दबे कदम चलती साँसें सहमे कदम आते सबेरे हलकी बारिश का मौसम आँखों में धुँआ के फेरे सोती रात […]
खुद को बदलने से जरूरी है खुद का किरदार बदलना आदमी दुनिया में पहचाना जाता है किरदारों से राजेश’अरमान”
मेरे खत चाहो जब जला दो पर उसकी राख मुझे दे दो / इस रूह से लिखा था जिसे , रूह को राख की अमानत दे दो / राजेश’अरमान’
देखा जब भी लहरों को मचलते समुन्दर की गोद में लगता कोई बच्चा मचल रहा है अपनी माँ की गोद में देखा जब भी बादलों को मचलते आसमां की गोद में लगता कोई युवा मचल […]
प्रेम सिर्फ अनुभूति है नहीं, प्रेम अनुभूति से अलग कोई एहसास है जिसे देखा जा सकता है किसी की आँखों में किसी की साँसों में किसी की ख़ामोशी में किसी की सरगमों में किसी की […]
जहाँ में दिल टूटने का यूँ न हादसा होता वफ़ा की तालीम का गर कोई मदरसा होता राजेश’अरमान’
काँपते ख़्वाबों को हक़ीक़त की जुम्बिश न मिली रूठे अल्फ़ाज़ों को किसी प्यार की बंदिश न मिली तिश्नगी लबों तक आकर खामोश हो जाती है कशिश को भी और कोई, फिर कशिश न मिली फ़लसफ़े […]
चुनिंदा लम्हें घूम गए आँखों में जो लिपटे न थे दर्द की चाश्नी में कुछ तेरे साथ के वो पल जो शिकवा से न लिपटे थे कुछ तेरे साथ के वो पल जो लिपटे थे […]
झूठ के पैर बहुत लम्बे होते है और सच के हाथ राजेश’अरमान’
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