रात के ख्वाब सुलाते हैं दिन के ख्वाब रुलाते हैँ मंज़िर वोह खुली आँखों के अन्दर से काट काट कर जाते हैँ …… यूई
रात के ख्वाब सुलाते हैं दिन के ख्वाब रुलाते हैँ मंज़िर वोह खुली आँखों के अन्दर से काट काट कर जाते हैँ …… यूई
रात के ख्वाब ना दिन में कभी मुझे सताते हैं दिन के ख्वाब क्यों रातों को बेकरार कर जाते हैं …… यूई
ए ज़िन्दगी ए ज़िन्दगी तुझे हर हाल में चाहने की कसम हमने खाई है …… यूई
मोहब्बत कहां लफ़्जों में बयां होती है नज़रों का निशाने कहां अल्फ़ाज खिंच पाते है
किसी ने सूद से भरी पुरवाइयां चुनी किसी ने दर्द भरी शहनाइयां चुनी हमें कुछ चुनने का हुनर न आता था सो गम से लिपटी तन्हाईयाँ चुनी राजेश’अरमान’
गर समझ न सके मेरे मौन को शब्दों को क्या समझ पाओगे पास आकर भी तुम मन के हाशिये से दूर ही रह जाओगे सब जायज है जुबान से निकले हुए तल्ख़ चिंगारी वास्ते तेरे […]
तुम कहाँ रहते हो? मैं अपनी आत्मा की परछाई में रहता हूँ तुम क्या करतेहो ? मैं चुपचाप सब कुछ सहता हूँ तुम क्या देखते हो ? हर तरफ आंसूं जो आँखों से बहते रहता […]
कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ माना की शब की जीस्त दुआओं से है भरी हो असर ऐसा ख़्वाबों को सहर कर दिया […]
कोई आहट नहीं कोई आवाज़ नहीं टूटा पत्ता हूँ कोई शाख नहीं अपने हाथों से किया क़ैद खुद को पंख तो हूँ मगर परवाज़ नहीं कैसे खुद को बना दिया क़ाफ़िर ज़िंदगी तुझसे मगर नाराज़ […]
एक जरूरी दस्तावेज ही तो है जीवन न कागज़ अपना न स्याही अपनी फिर भी भ्रम अपना कहने का अपनी सासें अपनी धड़कन से विवाद करती कभी तालमेल नहीं मन से मन का फिर भी […]
ज़िंदगी क्या है एक अदाकारी है न तुम्हारी है न हमारी है ख्वाब आये भी तो रात के पिछले पहर क्या कहे कैसे बाकी रात गुजारी है मुझसे मत पूछ वफ़ा क्या होती है ये […]
हाथ की रेखाएं न बदनाम कर डालो कुछ नज़र अपने करम पर भी डालो तेरा वज़ूद खड़ा एक गुनहगार सा क्या हर्ज़ खुद को कातिल समझ डालो तीर तरकश से निकल कब लौटे है अब […]
हर सांस है मुजरिम न जाने किस गुनाह में हर ख्वाईश है क़ैद न जाने किस गुनाह में न कुछ बस में तेरे न कोई डोर हाथ में जाएँ तो ज़िंदगी किन क़दमों की पनाह […]
हर चेहरे अपने पर कोई आश्ना न मिला गिला खुद से मगर कोई आईना न मिला अपनी तक़दीर-बुलंदी का क्या कहना बर्क़ को जब कोई आशियाँ न मिला फ़िज़ां मिली तो मगर खुशगवार न थी […]
कहाँ से फिर निकला आरजुओं का सैलाब चंद कागज़ लपेट ,जिंदगी बन गई है किताब / कभी लगता पहन ल़ू ,लगता कभी ओढ़े बैठा हूँ नज़र क्यों आती है ,हर चेहरे पे नकाब/ तेरे सवालों […]
बेज़ुबान दर्द सो गया ,करवट न ले सकी नींद हमारी लम्हे रुके रुके से रहे , थक के सो गयी किस्मत हमारी क्या रखा था सिरहाने मेरे अपने कापते हाथों से कमबख्त हरसूँ छोड़ गयी […]
एक आहट सी सुनी है तेरे जाने के बाद कोई समझाए क्या बारहा समझाने के बाद डूबा बैठा हूँ न जाने किस सोच के समुन्दर में हर लहर लौट आ जाती एक लहर जाने के […]
सिर्फ एहसास है वफ़ा फिर छूने को जी करता है यह कौन देता है सदा सुनने को जी करता है हर शख्स का वज़ूद जुदा फितरत भी जुदा फिर भी उम्मीद वो खुद के वज़ूद […]
वक़्त की स्याही ज़िंदगी के कोरे कागज़ पर न जाने क्या लिख जाती है कभी ये कागज़ किताब बन जाते ,कभी ये महज पन्नें बन बिखर जाती है राजेश ‘अरमान’
कतरा कतरा लहूँ का जिस्म में सहम गया चलो इसी बहाने रगों में बहने का वहम गया वो कोई हिस्सा था मेरे ही जिस्म का जुदा हुआ वो तोड़ कोई कसम गया मेरे मिटने की […]
कतरा कतरा लहूँ का जिस्म में सहम गया चलो इसी बहाने रगों में बहने का वहम गया
उसने खौफ से कभी आइना साफ़ न किया आ जाएँ न नज़र कहीं तस्वीर साफ़ उसकी राजेश ‘अरमान’
आंधियो मेहमां बन जब जी चाहे तुम आया करो अर्ज़ बस इतनी तुम दरख्तो को न गिराया करो तूफा तो हर तरफ हर जगह आते रहते है अर्ज़ बस इतनी तुम कश्तियों को न डुबाया […]
इक गुमशुदा की तलाश में तमाम उम्र गुजर गई काश हम कुछ जान -पहचान खुद से पहले ही कर लेते राजेश’अरमान’
आंसुओं का क्या है निकलते है फिर कुछ बह जाते ,कुछ सूख जाते है लफ्जों के जहर ही तकलीफ दे जाते है लहूँ में घुल नसों में मुझसे तेज दौड़ जाते है काश लम्हों की […]
जीवन सिर्फ जीवकोपार्जन के लिए किया प्रयास नहीं है जी सभी रहे है लेकिन जीने का एहसास नहीं है सदियाँ बीती हवाओं की भी इस ज़माने की हवा लग गई है दीपक हौसलों के बस […]
इक बार मेरी सिसकती कलम ने कोरे कागज़ पर लकीरें खीच दी मैं सारी उम्र उसे जीवन रेखा ही समझता रह गया इक बार मेरा हाथ उन लकीरों में पड़ गया लगा सारी हाथ की […]
फासलों का मंजर देख कुछ याद आया किसी अजनबी शहर सा बस ख्याल आया कोई शोर नहीं किया आईने ने उस वक़्त जब देख चेहरा अपने कोई सवाल आया परदे ही परदे में रह गए […]
छोड़ आया थी अपनी तन्हाई को भींड में लुत्फ़ अब ले रहां हूँ तन्हाई की भीड़ में राजेश ‘अरमान’
अजनबी सांसें हो गई जब अपनी ही ज़ीस्त की लोग कहते सबसे खुल के मिला करों राजेश ‘अरमान
गैरों के हम तो गुनाहगार हो गए , जब उनके नाम का कोई सितम न मिला राजेश’अरमान’
उम्मीद से माना ये दुनिया चल रही है पर उम्मीद का चलते रहना भी ज़रूरी है राजेश’अरमान’
समुन्दर में एक क़तरा न डाल अपने वज़ूद का खुद को चाहे तो एक क़तरा ही रहने दे राजेश ‘अरमान’
उसके फैसलों पे कैसे होता ऐतबार मुझे ज़ख्म भी मेरे ,गुनाहगार भी मैं राजेश’अरमान’
ज़िंदगी का खेल साँप-सीढी से है जुदा यहाँ तो हर अंक पे साँप बैठे है राजेश’अरमान’
गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती गर न तेरे शिकवे […]
तेरा सादा-दिली से ज़ख्म देना लाजमी है बेरुखी से तो हम मुस्तैद हो जाते राजेश’अरमान’
उसने माँगा उसकी वादा-खिलाफी का हिसाब तब से ज़िंदगी बस इसी काम में लगी है राजेश’अरमान’
तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ ये अलग बात है खुद को सबसे अमीर अब भी समझता हूँ राजेश’अरमान’
वो जब हमसफ़र थे तब भी अच्छे लगते थे आज दूर से हाथ हिलाते हुए भी अच्छे लगते है क़ुर्बतों की दास्ताँ भी फ़क़त चंद किस्सों का जमावड़ा है साथ रहें तो भी अच्छे ,न […]
वो बस मुझे ढूंढ़ता रहा हाथ की लकीरों में कमबख्त एक बार हाथ तो बढ़ाता राजेश’अरमान’
इतनी गुजरी है ज़िंदगी , आगे भी गुजर जाएगी किसकी ठहरी है ज़िंदगी , जो मेरी ठहर जाएगी बस दौड़ते पकड़ते फिरे, चुनते फिरे गिरे हुए लम्हे तेरे हाथों में रखे लम्हों पर क्या तेरी […]
बंदगी तेरी यूँ मेरे काम आ गई अब किसी दुआ की जुस्तजू न रही राजेश’अरमान’
वो बारिश का मौसम वो गरम गरम जलेबी वो धुआं छोड़ती चाय छतों से टपकता पानी छातों का साफ़ कर घर से निकलना पानी से छप छप करते खेलना जान बुछकर भीगना ओटली पर कतार […]
एक ढहती हुई ईमारत की ईट से बढ़कर न सही लेकिन ईमारत की नीव भी कभी इसी ईट ने ही रखी थी राजेश’अरमान’
हर बार गिरे ,फिर सम्भले सिलसिला ये बरक़रार रखते है हम वो गुलिस्ता है जो फूलों से नहीं काटों से प्यार रखते है तिरी समुन्दर सी आँखों में झाँककर यूँ तो डूबे दीवाने कई […]
सब तो लिख गए दर्द ,मीर,मोमिन,फैज़ , दाग,साहिर ग़ालिब ,फ़राज़ हम तो खाक है बस ,कलम की रोशनाई कागज़ों पे घिस रहें है राजेश’अरमान’
हर मौसम में बदल जाती है , अपने ही अंदर की अपनी तस्वीर राज़ ये गहरा है जिसे कोई समझ पाया नहीं गम की चाह करता हूँ सदा ताकि पा सकूँ दो पल की ख़ुशी […]
इन बहकते बादलों को कोई राह तो दिखलाये बरसना था खेतों पे ,किसान की आँखों में बरस रही है टकटकी फिर भी लगी आसमान की तरफ उम्मीद से बारिशों की बूंदों को खेतों में देखने […]
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