किया है खून रिश्तो का , तुम्हे कातिल कहूँ या भ्रम ,
जला कर प्रेम का दीपक , अँधेरा कर दिया कायम .
…atr
किया है खून रिश्तो का , तुम्हे कातिल कहूँ या भ्रम ,
जला कर प्रेम का दीपक , अँधेरा कर दिया कायम .
…atr
न देखोगे मुझे अब तुम , न अब संवाद होगा ..
जो कल था ,आज तक जो था , न इसके बाद होगा ..
…atr
नैनो के सूखे मेघो से मैं आज अगर बरसात करूँ ,
हल करुँ ज़मीन ए दिल में मैं नीर कहाँ से मगर भरूँ?
है सूख चुका अब नेत्र कूप न मन का उहापोह बचा ,
न मेघ रहा न सावन है ,मिट गया जो कुछ था पास बचा .
एक बार हौसला करके मैंने बीज प्रेम के बोये थे ,
न मौसम ने रखवाली की ,सावन ने पात न धोये थे .
अब न मन है , न मौसम है ,न उर्वर क्षमता धरती की ,
न नैनो में अब पानी है ,न दिल में इच्छा खेती की .
रोते है मेघ और कूप सभी ,करता विलाप अब ये मन है ,
फिर भी न आंसू गिरते है ,न नैनो में इतना दम है .
अब बस अंधियारी रातो का यह निपट घना सन्नाटा है ,
दिल रोता है , मैं लिखता हूँ ,जीवन से पल का नाता है .
मैं जाऊँ पर ये गीत मेरे ,फिर किसी जमीन ए बंज़र में ,
मेघ बने ,बरसात करे ,फिर किसी अकालिक मंज़र में …
…atr
लहरा रहा है सामने यादों का समंदर ,
जो डूबना भी चाहूँ तो किस किनारे से..
मेरे इश्क़ की दास्ताँ बस इतनी है,
तलाश हमसफ़र की थी मुकाम तन्हाई का मिला.
…atr
मुद्दत से तेरी आँखों में नमी नहीं देखी,
लगता है तुमने मुझमे कोई कमी नहीं देखी ..
यादों की लहरों पर किया है प्यार का सफर ,
हमें है राब्ता उनसे उन्हें नहीं मेरी खबर..
…atr
आँखों से झरते आंसू ने थमकर पूछा,
आखिर सजा क्यों मिली मुझे ख़ुदकुशी की?
दिल रो पड़ा पुराना जखम फिर हरा हुआ,
कहा, गुनाह उसी ने किया जिस छत से तू गिरा ..
..atr
ज़रा कुछ देर रहमत हो सके तो अच्छा हो ,
ज़रा मन शांत होकर सो सके तो अच्छा हो.
.
ख़तो के ज़ाल में उलझे हुए है मीर हम ,
ज़रा कुछ देर खुद में खो सके तो अच्छा हो .
.
गुज़र गया है मुसाफिर फिर शहर से तेरे ,
तेरा कुछ राब्ता दिल हो सके तो अच्छा हो .
.
न कह पाया जुबा से हाल दिल का अब तलक,
ज़रा अब हर्फ़ मेरे कह सके तो अच्छा हो.
.
सुना है हिज़्र के किस्से ,विरह की दास्ताँ समझी,
ज़रा अपना भी दिल अब रो सके तो अच्छा हो
…atr
बर्बादी किसे दिखेगी हमारी जहाँ में मीर ,
लुटने के बाद ग़म का खज़ाना जो पा लिया ..
मुझको तेरी कमी तो सताती ही है मगर ,
तू दूर जा के खुश है ये सुकून की बात है .
…atr
कल फिर शाम आई और चली गयी ,
कुछ दूर वो झिलमिलाई चली गयी .
नींद से अपना तो कोई वास्ता न था ,
बस आँखों में आई ,मुस्कुराई , चली गयी .
चाँद भी रुक के देखना चाहता था कल रत ,
उसकी माँ आई ,उसे बुलाई , चली गयी .
कल फिर शाम आई , और चली गयी .
फिर ख्वाब में कल रात वो आई , रुलाई चली गयी ,
कल फिर शाम आई ,और चली गयी ..
…atr
fir Mosam brsa,
fir aasman saaf hua..
fir dil dhadka..
fir kuch ehsas hua..
lga jb aisa
tb koi na Pass hua..
Kagaji panno me zinda h ishq mera..
.
wrna tumne to ise marne me koi kasak nhi chodiiii
Kya dusmani rhi h
khuda k imujse
jo muje
usse milne nhi de rha…
Mere se kya dusmani h???
Saaf Saaf btate kyu nhi muje???
Kyu itna roti hu m,
jutha hi shi kuch to izhaar kro.
.intzaar to m jnmo tk kr skti hu.
.par tum Aitbaar to kro..
Mere har bimari ki wgeh jo ho tum,
ilaaj tum hi ho skte ho..
mujse pyaaar to kro..
Khuda b mera ho chuka hota,
agr mne use pukara hota,
tumhari jgeh…
Dard-e- Dariya h bhut bda,
ek muthi raat se iska kya hoga????
Wo shaks jo din bhar muskurati rhi……
aaaj royi bhut Raat bhr Muskurakar…
hui h nafrat is kadar unse
ki
ab to baddua k liye b dua na kru…
यहाँ हर शख्स है तेरा, वहां हर कब्र है मेरी,
जहाँ कैसा बनाया है खुद ने क्या इरादा था?
अब तो हालात भी मुझसे मिचौली आँख करते है,
को सपनो में आता है ,किसी को याद करते है.
मुझे है डर कहीं फिर से किसी हूरों की महफ़िल में,
उड़ाया फिर से न जाये ,ये कुचला जिगर मेरा..
तेरी चाहत में इतना मैं पराया हो गया खुद से ,
कि दिल मेरा है फिर भी बात करता है सदा तेरी..
कभी वो चांदनी मेरी थी, अब पावस की है यह रात,
नहीं दिल में मेरे अब वो, नहीं हाथो में उसका हाथ..
न वो मेरी न मैं उसका तो फिर ये बीच का क्या है,
नहीं देखूंगा अब उसको जो चेहरा चाँद जैसा है…
…atr
मोहब्बत में हारे, क़यामत में हारे
की ये ज़िंदगी हम शराफत में हारे..
न कोई है अपना ,न कोई पराया,
अब जियें किसलिए और किसके सहारे..
न है यामिनी आज जीवन में मेरे ,
मिटे, मिट गए आज हम फिर किनारे..
कभी लए से सांसे जो चलती थी मेरी ,
मगर अब खड़े आज बेबस बेचारे..
मिला भी नहीं कुछ ,बचा भी नहीं कुछ,
जो था पास में सब तुम्हारे पे हारे…
मोहब्बत में हारे ,क़यामत में हारे,
की ये जिंदगी हम शराफत में हारे…
…atr
अगर तुम बन गयी दीपक तुम्हारी लौ बनूँगा मैं,
नदी के शोर में शायद तुम्हारी धुन सुनूंगा मैं.
तुम्हारी याद में अक्सर यहाँ आंसू टपक पड़ते,
ये मोती है मेरे प्रीतम मगर कब तक गिनूंगा मैं…
..atr
वो मंज़र याद है तुमको ,जुदा हम तुम हुए थे जब,
समंदर याद है तुमको जहाँ पत्थर चलाया था..
कभी जब याद आ जाये ,ज़रा हमको भी करना याद ,
किसी के साथ जो तुमने वहां कुछ पल बिताया था.
नहीं दिल से अभी वो शाम जाती है , नहीं होता सवेरा,
की जब से तुम गए हो मीर, मेरा जीवन अँधेरा.
ख़ुदा कैसी तमन्ना है,की मैं अब भी तरसता हूँ,
पता मुझको , यकीं मुझको, मगर फिर भी मचलता हूँ…
…atr
छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ?
वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या?
कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,
न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात..
जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या?
वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को,
वो नदियां है क्यों प्यासी सी, बुलाती है बुलाने को,
उन्ही नदियों की रहो में रुकावट आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
…atr
आज हम भी है मेहमान तेरे शहर में,
दिखता नहीं मकान तेरे शहर में.
ग़ुम हो गयी है शाम की मस्ती भी अब यहाँ,
ग़ुम हो गया करार तेरे शहर में..
आते राहों में मिल गया तेरा आशिक,
कहने लगा न जाओ तेरे शहर में.
जब से तुमने छोड़ा है दस्त ए गुलाब को,
वन हो गया वीरान ,तेरे शहर में.
बन्दों का हाल ऐसा मैं कह न सकता मीर,
पागल हुए जवान तेरे शहर में.
दिन भर उठी है धूल,पैरों में आ लगी,
मैंने कहा सलाम है,तेरे शहर में.
हर दिन यहाँ पर तेरी यादो का तमाशा,
बिकता है हर मकान तेरे शहर में.
जो गुल था ,गुलदान था,गुलशन ,ग़ुलाब था,
अब आंधी है ,और तूफ़ान तेरे शहर में..
…atr
मोहब्बत का वह दौर था ,
दिखता नहीं कुछ और था ..
बस हमारे प्यार का सारे जहां में शोर था,
उसने चुराया दिल मेरा ,मन भी मेरा चित चोर था ..
आश्ना हम भी थे, आशिकी उनको भी थी ,
अब जहाँ कुछ और है,पहले यहाँ कुछ और था ..
नाम होता था जुबान पर दूसरा वह दौर था,
एक ही आवाज थी ,हर शै में जो भर आई थी ,
आज जो घुट सा रहा है ,कल वही बेजोड़ था ..
.atr
कर्मयोगी
अपने कामुक सुखों को कर दमन ,
अपने गुस्से को दया मेँ कर बदल ,
अपने लालच को दान की राह कर चलन ,
अपने स्वधर्म को अंतर्मन से कर मनन ,
अपने कार्यों को भक्ति भाव से कर भरन ,
ले विजय अब कर्म योग मेँ तूं जन्म I
अब उसकी राह पकड़ , निश्काम कर्म की राह तूँ जाएगा ,
हर कर्म कर उसे समर्पण , निष्फल अब तूँ रह पाएगा ,
अपना हर धर्म निभा , फल की चाह छोड़ तूँ पाएगा ,
अब निभा हर कर्म को भी , अकर्मी तूँ रह पाएगा ,
अब सब करके भी, मैं तुझको ना छू पाएगी I
कर्मों के बंधन को तोड़ , सब कर्मो को उससे जोड़ ,
ख़ुद मेँ उसका रुप जो पाएगा , फिर ख़ुद का कुछ ना भाएगा ,
उस चेतना को ख़ुद मेँ जगा, बस उसके ही कर्म निभायेगा ,
सब उसका खेल रचाया है , उसकी ही यह माया है ,
वोह निर्धारित कर्तव्यों को, ख़ुद तुझसे ही करवाएगा I
…… यूई विजय शर्मा
आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे
आप हमारी हकीकत तो बन न सके
ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे
आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे
सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे
जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे

muje tum jaisa sa hi bnna h
taki tumhe hi chod du,
hste hste…
Behrupiya bna lo na is dil ko,
taki
har kisi k pehchan me na aaye,,
phuloo ki patiyo ki trh
har khushi chutt rhi h
is jeewan se..
Sukun wale pal tumhare sath hi to the
m Dariya hi shi,tum b boond se km nhii..
baris ki boond c hi ho tum
is dariya ki pyas tumse mil k hi puri hogi..
m to chlti rhugi..behti rhugi
tumse milne ki aas me..
dhund lena muje apne pass me…
Nhi smj aata ki
Uski yaado ko dil me dafan hone du
Ya likh kr sbdo me zinda kr lu..
Nhi smj aata ki..
Use fir apne pass bula lu or yaade bsa lu
Ya beeti yadon k shaare hi dunia bsa lu..
Nhii aata kuch smj ki
Ki har baat..bebaak ..bepaak trike se tumhe suna du
Ya fir yu hi til til kr ansu bhaa lu..
Nhi aata smj ki
Tere dil ko ab ajaad kr hawao me uda du
Ya fir kaid kr..umar bhr ki sja suna du..
Nhi aata ab kuch b smj..
To tuje kaise b krke smja lu
Nasamaj bn ja tu b kisi trh
Anjan bnu m b kisi trh
Fir lgenge hum ek dusre ko smjne
Kisi na kisi trh..
Ek muddat k baad
tumse aajadi mili h.
ab bs muskura lene do,
ro to pehle b chuki bhut…
Brso pehle ek khat likha tha tumhe,,
jo tumhe mila hi nhi kbhi..
kuki humne bheja hi nhi kbhi..
kyu juda kru m ek khat ko b khudse
jisme naam tumhara h jbse…
har ek baat ko
har ek yaad ko
ek ek aansu ko
smbhal k rkha h mne..
kuki unme tum hi ho khin na khin
उफ़! ये हमारे,
अजीब से सितारे
आज छत पे आये
तो छुप गए हैं सारे
ए मालिक क्यों ना कुछ कमाल हो जाए ,
ऐसा अपनी दुनिया में ध्माल हो जाए ,
हर शैतान इंसानीयत का कायल हो जाए I
द्वैत की उलझन सलट, सब अद्वैत हो जाए ,
यह दुआ जो विजय की कबूल हो जाए ,
तो हर नर तुझ्सा नारायण हो जाए I
…… यूई विजय शर्मा
तुम विष हो , अनश्वर
तुम से मिलकर जाना ..
कि साधना सिर्फ अमृत की बूँद के लिए ही नहीं ,
मृत्यु के बाहुपाश के लिए भी की जाती है .
तुम्हारा वरन करने के लिए बनाई है आंक के फूलों की माला
देखो , मेरी ओर क्रोध से देखो और भस्म कर दो मुझे ,
फिर इस गहरे लाल भस्म को अपने अंग अंग में लपेटो .
होली है !!
यूँ तो है बेताब और भी कई, आशिक कई, तन्हा कई,
पर दिल आज भी सिर्फ उसी के लिए बेकरार है, तो है |
बहुत लिखा गया, बहुत पढ़ा गया, कुछ किया भी गया,
प्यार, मुहब्बत, इश्क, जवानी सब लफ्फाज़ी है, तो है |
वो 8 सालों से गाँव में अकेली रहती है, कभी न कोई ख़त न कोई तार,
पर बूढी आँखों में बेटे से मिलने की आस, आज भी है, तो है |
उसके सपने बांधे गए चांदी की जंजीरों से, सिसकियाँ दबा दी शहनाई की आवाज़ से,
अब बाप के कंधो पर बेटियों का बोझ है, तो है |
यहाँ कुछ जानें रोज जाती है, कुछ जिस्म रोज नोचे जाते हैं,
पर इस शहर में सब अपनी धुन में मगन है, तो है |
कुछ टूटे सपने, कुछ अनुभव खट्टे-मीठे,
कुछ कसमें सच्ची, कुछ वादे झूठे,
कुछ अनुत्तरित सवाल, कुछ मचे हुए बवाल
अब इसी का नाम जिंदगी है, तो है |
Kal haal poocha maine anath bachhon se jaakar……
unhone kaha sab theek hai,
bas hasratein dum tod deti hain,
zuban ki dehleez tak aakar
रौनक-ए-गुलशन की ख़ातिर अज़ल लिख रहा हूँ
ख्वाईश इन्किलाब की है मुसलसल लिख रहा हूँ।
सब कुछ लूट चुका था बस्तियां वीराँ थी
बेमतलब हुआ क्यूँ फिर दखल लिख रहा हूँ।
आवाजों के भीड़ में मेरी आवाज़ गुम है
अल्फाजों को मैं अपने बदल लिख रहा हूँ।
बेबस आँखों में शोले से उफनते हैं
अंधेरे में हो रही हलचल लिख रहा हूँ।
उम्मीद इस दिल को फिर से तेरा दीदार हो
ख्यालों में तेरे खोया हरपल लिख रहा हूँ।
बेहद खौफ़नाक मंज़र है और क्या बयां करूँ
खामोश जुबां से इक ग़ज़ल लिख रहा हूँ।
अज़ल = beginning
मुसलसल = बार-बार, निरंतर
हर विभाग आज सुस्त और बेहाल है
काम कुछ नही सिर्फ़ हड़ताल है ।
भ्रष्ट्राचार का तिलक सबके भाल है
भेड़िये ओढे भेड़ की खाल है।
उपरवाले तो तर मालामाल है
हमारे खाते में आश्वासनों का जाल है।
घोटालो से त्रस्त देश कंगाल है
नेता बजा रहें सिर्फ़ गाल है।
लोकतंत्र की बिगड़ी ऐसी चाल है
ईमानदार मेहनती जनता फटेहाल है।
चोर पुलिस नेता की तिकरी कमाल है
राजनीति जैसे लुटेरों का मायाजाल है।
बचपन में हम उन दिनों
बहुत ज्यादा शरमाते थे.
कविता के दो लाइन भी
खुलकर नही बोल पाते थे.
दूरदर्शन के आगे बैठ
जंगल- जिंगल गाते थे.
पापा घर में आ जाये तब
डर से उनके घबराते थे.
स्कूल में हम परीक्षाओं में
अंक बहुत अच्छे पाते थे.
लालटेन की मंद रौशनी में
पढ़ते-पढ़ते सो जाते थे.
मुहल्ले के साथियों को
कहानियाँ खूब सुनाते थे.
एक रूपये का नोट छुपाकर
किताबों में, हम इतराते थे.
जाड़े की धूप में छत पे बैठ
हम आधे बाल्टी नहाते थे.
माँ से थप्पर खा कर ही
फिर दिन में सो पाते थे.
मेहमाँ जो घर में आये कोई
देख मिठाइयाँ ललचाते थे.
शीशी, गत्ते, कबाड़ बेच के
मलाई बर्फ हम खाते थे.
अखबारों के पतंग बना
जैसे तैसे उड़ाते थे.
दादाजी के पाँव दबा
चार आने हथियाते थे.
रात आती है तेरी याद लिए आती है
यादों की रंगीन बरात लिए आती है
यह मुश्किल है कि तेरी याद ना आये
कैसे भूलूं वो मुलाक़ात लिए आती है ।
यादों के भंवर मे किनारा नही मिलता
आसमा मे दुसरा सितारा नही मिलता
तनहा दिल है मेरा तेरे इंतज़ार मे
जीने का और सहारा नही मिलता।
कोशिश तुम्हारे पास आने की है
प्यार भरे दिल मे समाने की है
ये दूरियां कब ख़त्म होगी
एहसास जवा तुम्हे पाने की है।
और इंतज़ार बेक़रार किये जाती है
नींद भी मुझसे इनकार किये जाती है
आँखों मे सिर्फ तेरे ख्वाब लिए आती है
रात आती है और तेरी याद लिए आती है।
Please confirm you want to block this member.
You will no longer be able to:
Please note: This action will also remove this member from your connections and send a report to the site admin. Please allow a few minutes for this process to complete.