Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • कविता

    किसी की साँसों में जो घुल कर बोले,, उसका नाम कविता हैं,,
    आत्मा को जो परमात्मा से मिलाये,,  उसका नाम कविता हैं,,
    नवयुवती श्रृंगार हैं करती,, ना जाने किन किन बहानो पर यहाँ,,
    वृधा को जो भावनात्मक परिपूर्ण कर दे,, उसका नाम कविता हैं,,

    रुक्मणी,, जामवंती मिली हजारो एक से बढ़ कर एक यहाँ,,
    पर जो राधा को श्याम से मिलाये,, उसका नाम कविता हैं,,

    हर इंसान है प्यारा मेरा,, सबको मेरी फ़िक्र यहाँ,,
    पर जो किसी भूले की फ़िक्र करा दे,, उसका नाम कविता हैं,,

    गजले सुन-सुन कर सब,, हँसते – नाचते रहते हैं यहाँ,,
    पर मेरी पीड़ा को जो खुद में बसा ले,, उसका नाम कविता हैं,,

  • एक अरसे से

    एक अरसे से उनसे नजर नहीं मिली

    जमाना गुजर गया किसी को देखे हुए

     

  • रश्मि

    रश्मि

    धुंधलेधुंधले कोहरे में छिपती

    रवि से दूर भागती

    एकरश्मि

    अचानक टकरा गयी मुझसे

    आलोक फैल गया भव में ऐसे

    उग गये हो सैकडो रवि नभ मे जैसे

    सतरंगी रश्मियों से

    नभ सतरंगा सा हो गया

    सैकडो इन्द्रधनुष फैल गये नभ में

    पलभर में कोहरा कहीं विलीन हो गया

    विलीन हो गयी वोरश्मिभी

    रवि के फैले आलोक में 

    ढूंढ रहा हूं तब से में

    उसरश्मिको

    जो खो गयी दिन के उजाले में

    जाने कहां गुम हो गयी

    मेरी वोरश्मि

  • होता

    होता

    काश! मेरे चाहने भर से मेरे पास वो होता ।
    खुद से जाग कर के वो मुझी में सो गया होता ।
    दौलतें सारे जहाँ की मैं लुटा देता उसी पर गर,
    ज़रा सा मुस्करा कर उसने मुझको खरीद लिया होता ॥

    निहायती खूबसूरत रूप ना आँखों में बसाया होता ।
    नयन अंकित समर्पित भाव, काश! उसने भी पढ़ा होता ।
    गौर करता वो भी मेरी बाते, मेरी आदते, फरियादें,
    उसने मुझसे तो क्या, खुद से ही प्यार कर लिया होता ॥

    लड़कपन मुझ में भर आया, हुआ तहलका-ए-स्वांग ।
    लता ने कल्प मन भरमाया, हुआ तहलका-ए-स्वांग ।
    सबने खुद को खलनायक माना, पढ़कर किस्सा मुहब्बत का,
    मैं उसी किस्से का नायक बन गया, हुआ तहलका-ए-स्वांग ॥

  • जिंदगी

    जिंदगी

    आख़िरकार थक कर जिन्दगी मुझसे बोल ही पड़ी!!
    यूँ कब तक खुद से भागते रहोगे, जरा सा ठहरो,
    ठंडा-वंडा पानी पी!!

    जरा झांक कर तो देखो अपने अतीत में,
    जरा नजरे तो मिलाओ पुरानी प्रीत से!!

    जब देखा पीछे मुड़ कर वाकई कुछ सुहानी यादे खड़ी थी!!
    आँखों में बसी कोई मूरत बाहें फैलाए सामने खड़ी थी!!
    कही पर ज्येष्ठ के माह में भी बर्फवारी हो रही थी!!
    कही पर रातों को भी सूरज की किरने नहला रही थी!!

    आरज़ू रहती थी दिल में कि, आग में भी ठंडक हो!!
    रेगिस्तान में भी कमल की बरकत ही बरकत हो!!
    आसमान में खिली तारो की हर एक लड़ी,
    हाथों में उनकी किस्मत की हरकत ही हरकत हो!!

    कभी चाँद को देख कर मन का रोम-रोम खिल जाता था!!
    आज ज़िन्दगी सर्कस हैं फिर भी हंसना नहीं आ रहा था!!

    कभी अपने गमो से, कभी दूसरो की खुशी से,
    आँखों से अश्रुओं की लड़ी बह रही थी!!!
    आज मेरी अपनी किस्मत मेरी ही,
    बेबसी पर हँस रही थी!!

    अब लगता हैं की ये तो सिर्फ एक सपना हैं!!
    एक सपने को सच मान बैठे,
    शायद कसूर सिर्फ और सिर्फ अपना हैं!!
    पर नव वर्ष में इन सबको नहीं दोहराना हैं!!
    पर नव वर्ष में इन सबको नहीं दोहराना हैं!!

  • दिल के ख्वाइश

    दिल  के  ख्वाइशों  को  कौन सम्जा कौन  जाना , तुझ  बिन  था  तनहा  यह  दिल  मेरा , तुझ   बिन  था  सुना  यह  दिल  मेरा , तेरे  बिना  यह  दिल  तरसा , बिलकुल  तनहा ,   दील  के  ख्वाइशों  को  कौन  सम्जा  कौन  जाना

  • Janejana

    [soundcloud url=”https://api.soundcloud.com/tracks/219644248″ params=”auto_play=false&hide_related=false&show_comments=true&show_user=true&show_reposts=false&visual=true” width=”100%” height=”450″ iframe=”true” /]

    oo meri janejana,

    meri bahon main aa na,

    meri sason main aa bhi jana tu,

    mere dil ki jo batain jo main kahan na pau,

    woh batein toh sun ke jana tu,

     

    oo meri janejana,

    meri bahon main aa na,

    meri sason main aa bhi jana tu,

    tere dil ki jo batein jo main sunna na chahu,

    woh batein tu sun ke jana tu,

     

    oo janejana tujh pe hain dewana dil,

    mera dil dewana karti hain teri batain mushkil,

     

    oo janejana mera dil dewana,

    mere dil ki jo batein hain jo main kahna chahu,

    tere dil main jo batein hain jo main sunna chahu,

     

    oo janeja tujh pe hain dewana dil

    tujhe pe hain pagal mastana dil,

     

    oo janejana tujh pe hain dewana dil,

    mera dil dewana karti hain teri batain mushkil,

     

  • Mahi We

    mahi we teri yaad bahut aati hain

    mahi we teri yaad bahut aati hain,

    woh tera muskurana,

    woh tera bachpana,

    tu chod chal sari duniya ko mere sath,

    waha hoga sapno ka jahan,

    waha hogi sari khusiyan,

     

    mahi we teri yaad bahut aati hain

  • Savan

    ghan ghata badal barse,

    man ki gagri bharney ko dil tarse,

    Tu jo na mila toh yeh dil tarse

     

    pyas yeh dil ki bujha ja tu,

    mere es dil main aa bhi ja tu,

     

     

    tujh bin suna jahan lagey hain,

    aye dil bar jahan aa bhi ja,

    mujhe ab na tarsa ke ja

  • Gamzada

     

    Ghamzada hain kyun,humzada nahin hain kya

    ghumshuda hain kyun,humnawa nahin hain kya

    akhir tujhko, kis baat ki,fikar…, mujhe bata

    teri har ak,arzu ko karunga main pura

     

    Umra ke es padaw main akhir kya hain wajah

    Ghamzada tu gamzada akhir kyun hain tu gamzada

     

    kis aur kis mor pe aa gaya tu gamzada

     

    Ghamzada hain kyun,humzada nahin hain kya

    ghumshuda hain kyun,humnawa nahin hain kya

     

  • काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें…….

    काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें

    देखो बता रही हैं, चादर की सलवटें।

    उधड़ेगी किसी रोज सिलाई ये देखना

    यूं इस तरहं जो लेकर अंगडाईयां उट्ठे।

    पहले ही हो रही है, बड़ी जोर की बारिश

    अब आप लगे भीगी जुल्फों को झटकनें।

    तस्वीर मेरी सीने पे रखकर न सोइये

    हर सांस मेरी नींद भी लगती है उचटने।

    एकटक न देख लेना कहीं डूबता सूरज

    मुमकिन है रात भर फिर वो शाम न ढले।

    ……….सतीश कसेरा

  • आंगन तो खुला रहने दो………………….

    झगड़ों में घर के, घर को शर्मसार मत करो

    आंगन तो खुला रहने दो, दीवार मत करो।

    मारे शर्म के आंख उठा भी सकूं न मैं

    अहसानों का इतना भी कर्जदार मत करो।

    हर ओर चल रही हैं, नफरत की आंधियां

    और आप कह रहे हो कि प्यार मत करो।

    लफ्जों की जगह खून गिरे आपके मुंह से

    अपनी जबां को इतनी भी तलवार मत करो।

    हंसती हुई आंखों मेें छलक आये न आंसू

    हर शख्स पे इतना भी तो एतबार मत करो।

    —————–सतीश कसेरा

  • पसीना भी हर इक मजदूर का………….

    कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है

    कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।

    चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं

    पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।

    गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने

    कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।

    यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के

    सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।

    ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर

    नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।

    —————-सतीश कसेरा

  • तूं मेरा आधार है…………..

    है कठिन जीवन बहुत,

    चहुं और हाहाकार है

    बोझ घर का सर पे है,

    हर चीज की दरकार है।

    बहन शादी को है तरसे,

    भाई तक बेकार है

    मात—पिता चुप हैं दोनों,

    थक चुके लाचार हैं।

    मैं अकेला लड रहा हूं,

    तीर ना तलवार है

    खट रहा हूं, बंट रहा हूं,

    घुट रहा घर—बार है।

    हौंसला देता है मुझको,

    एक तेरा प्यार है

    तूं जमीं, तूं आस्मां,बस,

    तूं मेरा आधार है।

    ——-सतीश कसेरा

  • मेरे दर्द को तो नहीं छुआ……..

    अच्छा हुआ या बुरा हुआ

    सब पहले ही से है तय हुआ।

    कोई दूर से रहा ताकता

    कोई पास हो के भी न हुआ।

    मेरे दिल पे हाथ तो रख दिया

    मेरे दर्द को तो नहीं छुआ।

    मेरी बात वो समझा नहीं

    जो कहा था मैने बिन कहा।

    मुझे अब भी उसकी तलाश है

    जो मुझमें है कहीं गुम हुआ।

    ———सतीश कसेरा

  • अब बियाबान मेंं जी लगता है……..

    यहां कोई न भला लगता है

    अब बियाबान मेंं जी लगता है।

    आ के शमशान में है ढ़ेर हुआ

    वो उम्र भर का चला लगता है।

    तुम भी ले आये क्या नकाब नई

    आज चेहरा तो बदला लगता है।

    आप ऐसे न छुआ कीजे मुझे

    मेरे अंदर से कुछ चटकता है।

    गरीबी जब से है जवान हुई

    घर का दरवाजा बंद रहता है।

    छोडिय़े, उसको कहां ढूंढेंगे

    जो कहीं आस्मां में रहता है।

    ………सतीश कसेरा

  • कोई तो दे दो वजह जीने की…..

    कोई तो दे दो वजह जीने की

    वरना मत पूछो वजह पीने की।

    दर्द अब आ गया है सहना तो

    क्या जरुरत है जख्म सीने की।

    मेरी खता नहीं तो कैसी सजा

    बात कुछ तो करो करीने की।

    कोई कह दे कि याद करते हैं

    आग बुझ जाये कुछ तो सीने की।

    न गले लग के अब मिले हमसे

    न फिर आई महक पसीने की।

    ———सतीश कसेरा

     

  • दोस्त, दुश्मन तमाम रखता हूं……

    दोस्त, दुश्मन तमाम रखता हूं

    मैं हथेली पे जान रखता हूं।

    शाम तक जाम क्यूं उदास रहे

    मैं तो अपनी ही शाम रखता हूं।

    कफन खरीद के है रखा हुआ

    आखिरी इन्तजाम रखता हूं।

    जब भी चाहे उजाड़ देना मुझे

    मैं जरा सा सामान रखता हूं।

    मैं किसी काम का नहीं क्यूंकि

    काम से अपने काम रखता हूं।

    मुझे तो इसलिये बदनाम किया

    मैं शहर में जो नाम रखता हूं।

    ……….सतीश कसेरा

  • थकी सोई हुई लहरों को चलकर थपथपाते हैं————————

    थकी सोई हुई लहरों को चलकर थपथपाते हैं

    समंदर में चलो मिलकर नया तूफान लाते हैं।

    न आये पांव में छाले तो मंजिल का मजा कैसा
    सफर को और थोड़ा सा जरा मुश्किल बनाते हैं।

    अंधेरे में बहुत डरती है घर आती हुई लड़की
    अभी सूरज को रुकने का इशारा करके आते हैं।

    गया हो घोंसले से जो परिन्दा फिर नहीं लौटे
    कभी जाकर के देखो पेड़ वो आंसू बहाते हैं।

    हमें मालूम है कागज की कश्ती डूब जायेगी
    मगर ये देखते हैं इससे कितनी दूर जाते हैं।

    उन्हें मालूम है सबका यही अंजाम होना है

    खिलौने तोड़कर बच्चे तभी तो खिलखिलाते हैं।

    ————————————————–सतीश कसेरा

  • सच जो लिक्खा, तो———————

    ‘सच जो लिक्खा, तो ये मुमकिन है

    कि फंस जाओ तुम,

    मुकरना चाहो, तो हर बात

    जुबानी  करना।’

    ………सतीश कसेरा

  • कुछ न था हाथ की लकीरों में……..

    कुछ न था हाथ की लकीरों में

    वरना होते न क्या अमीरों में।

    भरे जहान में भी कुछ न मिला

    हैं खाली हाथ हम फकीरों से।

    आपके प्यार से तो लगता है

    बंधे हो जैसे कुछ जंजीरों से।

    किसके जाने से जान जाती है

    कौन रहता है वो शरीरों में।

    कोई भटका हुआ ही आएगा

    हम हैं तन्हा खड़े जजीरों सेे।

    ———सतीश कसेरा

  • खुशी तलाश की, तो मिल ही गई……

    खुशी तलाश की, तो मिल ही गई

    दर्द के नीचे दब गई थी कहीं।

    छेड़ बैठे वो अपना ही किस्सा

    बीच में बात मेरी, रह ही गई।

    एक दीवार सी थी दोनों में

    गिराने बैठे, तो फिर गिर भी गई।

    मुद्दतों बाद वो घर आये मेरे

    चलो अपनी दुआ भी, सुन ली गई।

    सारी यादों की खूब कस कर के

    गठरी बांधी थी,मगर खुल ही गई।

    कश्ती तूफां से निकल ही आई

    किसी तरह भी चली, चल ही गई।

    ………..सतीश कसेरा

  • वो नदी सी थी, मैं किनारा सा….

    वो नदी सी थी, मैं किनारा सा

    कुछ ऐसा ही मिलन, हमारा था।

    खुद में बस डूबते, उतरते रहे

    न समन्दर था, न किनारा था।

    उसने शायद, सुना नहीं होगा

    मैने शायद, उसे पुकारा था।

    कसूर ये नहीं कि किसका था

    सवाल ये है, क्या तुम्हारा था।

    बिना देखे, गुजर गए दोनों

    मुड़ के फिर देखना गवारा था।

    ———सतीश कसेरा

  • इश्क किया तूने खुद कान्हा–1

    क्या अजब दिन था वो, क्या गजब था जहाँ,
    मैं था बहती नदी, वो था सागर समां!
    यूं तो इश्क किया तूने खुद कान्हा,
    अब तू ही बता तेरी क्या हैं सलहा!!

    मेरे दिल की यही, तमन्ना रही,
    आँखें कभी भी किसी से, लडे ही नहीं,
    पर जब तुम मिले, नैना तुमसे से भिड़े,
    ऐसे उलझते गए, फिर सुलझ ना सके!
    मन की गंगोत्री से, प्रीत की गंगा ,
    स्वयं ही बहने लगी, मैं रोकता रहा!!
    यूं तो इश्क किया तूने खुद कान्हा,
    अब तू ही बता तेरी क्या हैं सलहा!!

     

    कमलनयन भँवर में मैं फंसने लगा
    बनकर घटा वो मुझ पर बरसने लगा!
    दिल में जो बात थी, हर पल अधूरी रही,
    कभी तुम सुन ना सकी, या मैं कह ना सका!
    दिल का सारा एहसास तू ही तो मेरा हैं,
    उस एहसास को ये एहसास मैं दिलाता रहा,
    व्यर्थ की बात पर, खुद के एहसास पर,
    रूठती तुम रही, मैं मनाता रहा!!
    दूर खुद तुम गयीं, पर जताती रही,
    इन दूरियों का मैं ही तो कारण रहा!!
    यूं तो इश्क किया तूने खुद कान्हा,
    अब तू ही बता तेरी क्या हैं सलहा!!

  • तुम ही हो

    कैसी कशिश हैं तुम्हारी आँखों में, पल में छपा दिल में अक्स तेरा,,
    मुझसे जुदा अगर हो जाएगा तो रब से भी छीन लाऊंगा सदा,,

    Because you are the one,
    Only you are the one,
    My destiny is only you are the one,,
    Tell a way,, I wanna rule your heart,,
    As you seem to be my dream one..

    तू हैं मेरी,, मैं हूँ तेरा,, कुछ भी और हमारा नहीं,,
    ये मेरा दिल भी हैं घर तेरा,, जिसमे गम भी तुम्हारा नहीं,,
    तेरे होठों की हर-एक मुस्कान पर मैं,,हाँ वार दूँ ये सारा जहाँ,,
    क्योंकि तुम ही हो, अब तुम ही हो,,
    मेरी आरज़ू अब तुम ही हो,,
    मेरा यार भी,, ऐतबार भी,,
    मेरा प्यार भी अब तुम ही हो,,

    मेरे दिल में तेरी यादें,,
    ऐसी बसी फरियादे,,
    तेरी यादों में हर पल गुज़ारा,,
    आके तू मिल जा,, मुझको दुबारा,,
    यूं तो इश्क किया तूने खुद कान्हा,,
    अब तेरी क्या हैं सलाह,,

    अब बोल भी दे ,, मुस्करा भी दे,,
    तेरे दिल में हैं वो बता भी दे,,
    यूं ना तू मुझको तडपा,,
    अपने दिल में तू बसा भी ले,,

  • उसे मालूम था मुझको————-

    ‘उसे मालूम था मुझको

    जरुरत है बहुत उसकी,

    इसी खातिर मेरी नाराजगी में भी,

    वो घर आता रहा।’

    …..सतीश कसेरा

  • बाद मुद्दत के मिला तो—–

    ‘बाद मुद्दत के मिला तो लिपट—लिपट के ​मिला, रोज मिलने से तो ये मिलना बडा अच्छा लगा।’ …..सतीश कसेरा

  • ‘मैं दूर तक भी आ गया……….^

    ‘मैं दूर तक भी आ गया, पर वो वहीं पे खडा रहा

    ये उसको कैसे था पता, मैं मुड के देखूंगा जरुर।’

    ……….सतीश कसेरा

  • इतना लंबा तो नहीं होता है चिट्ठी का सफर…………

    हरे-भरे से थे रस्ते पहाड़ होने लगे
    नदी क्या सूखी, इलाके उजाड़ होने लगे।
    कौन से देवता को खुश करें कि बारिश हो
    रोज चौपाल में ये ही सवाल होने लगे।
    लकीरे खिंचने लगी रिश्तों में तलवारों से
    जमीं के टुकड़ों को लेकर बवाल होने लगे।
    इतना लंबा तो नहीं होता है चिट्ठी का सफर
    कि आते-आते महीने से साल होने लगे।
    कमर के साथ लचकती थी और छलकती थी
    प्यासी उस गगरी में मकड़ी के जाल होने लगे।
    नाम तक लेता नहीं है कभी उतरने का
    कर्ज के पंजों में अब जिस्म हाड़ होने लगे।
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा

  • सोचता हूं अभी पाजेब बजी है उसकी………..

    सोचता हूं अभी पाजेब बजी है उसकी………..

    दूर अपने से उसे होने नहीं देता हूं

    मैं ख्यालों में उसके साथ-साथ रहता हूं।

    मैने दीवार पे टांगें हुए हैं फ्रेम कई

    उसको मैं सोच के तस्वीर लगा लेता हूं।

    खोल देता हूं कई बार खिड़कियां सारी

    किसी झोंके में हवा के उसे पा लेता हूं।

    कमरे में आती हुई धूप की चुटकी लेकर

    उसकी तस्वीर पे बिंदिया सी सजा देता हूं।

    सोचता हूं अभी पाजेब बजी है उसकी

    फिर कई चाबियां जमीं पे गिरा देता हूं।

    तार पर उड़ता हुआ उसका ही आंचल होगा

    मैं सभी भीगी सी यादों को सूखा देता हूं।

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा

  • घुल गया उनका अक्स

    घुल गया उनका अक्स

    घुल गया उनका अक्स कुछ इस तरह अक्स में मेरे
    आईने पर भी अब मुझे न एतबार रहा

    हमारी मोहब्बत का असर हुआ उन पर इस कदर
    निखर गयी ताबिश1-ए-हिना, न वो रंग ए रुख़्सार रहा

    हमारी मोहब्बत पर दिखाए मौसम ने ऐसे तेवर
    न वो बहार-ए-बारिश रही, न वो गुल-ए-गुलजार रहा

    भरी बज्म2 में हमने अपना दिल नीलाम कर दिया
    किस्मत थी हमारी कि वहां न कोई खरीददार रहा

    तनहाईयों में अब जीने को जी नहीं करता
    दिल को खामोश धडकनों के रूकने का इंतजार रहा

    sign

    1. ताबिश : चमक
    2. बज़्म= सभा

  • कितनी दूर है

    कितनी दूर हैं अंबर धरती, क्या प्यार कभी कम होता हैं,,
    गर सीने में हो दर्द धरा के, छुप छुप कर आसमां रोता हैं!!
    कभी फव्वारे, कभी फिर पानी, कभी पत्थर दिल होता हैं,
    पाकर नवीन सा सूक्ष्म प्यार, धरा का मन गदगद होता हैं,
    हजारों फ़ोन कॉल्स सुनने पर भी एक नंबर का इंतज़ार होता हैं,
    मेरी नज़र में ओ दीवानों प्यार यही बस होता हैं!!

    अगर हो तकरार भूमि गगन में, भू भी कहाँ खुश रहती होगी,,
    कहीं पर बंजर, कहीं पर जंगल, कहीं फिर बर्फानी सी होगी!!
    अंबर भी कौन सा ऊपर खुश होकर गाता होगा,,
    धरती को झकझोरने खातिर खुद तूफान लाता होगा!!
    जो ना माने फिर भी पृथ्वी, फिर सूरज संग टकराता होगा,,
    जैसे ही कुछ सुखी धरती, मेघ बन बरस जाता होगा,,
    पाकर पावन प्यार धरा पर, फिर वसंत राज होता हैं,,
    मेरी नज़र में ओ दीवानों प्यार यही बस होता हैं!!

     

  • फिर किताबों की याद आने लगी…..

    जिन्दगी जब जरा घबराने लगी

    फिर किताबों की याद आने लगी।

    कितना जागा हुआ था रातों का

    अब किताबें मुझे सुलाने लगी।

    उसकी तस्वीर अचानक निकली

    तो वो किताब मुस्कराने लगी।

    धूल का रिश्ता था किताबों से

    जब उड़ाई, वहीं मंडराने लगी।

    फूल सूखा हुआ मिला लेकिन

    उसी खुश्बू की महक आने लगी

    कुछ किताबें थी जिंदगी जैसी

    जरा सा खोला तो कराहने लगी।

    थूक से पन्ने कुछ ही पलटे थे

    जुबां लफ्जों को गुनगुनाने लगी।

    मैली जिल्दों सी जिंदगी अपनी

    फटे पन्नों सी याद आने लगी।

    ———सतीश कसेरा

     

  • फूल……, किताब,……. अलमारी…….

    फूल……, किताब,……. अलमारी…….
    तुमने जो फूल 
    मुझे दिया था
    उसे मैने एक
    किताब में रख दिया था
    और किताब
    अलमारी में रख कर
    लगा दिया था ताला।
    अब उस ताले की
    चाबी खो गई मुझसे
    तुम्हारी तरह…।
    क्या कंरु
    समझ नहीं पा रही¡
    ताला तोड़ा गया
    तो अलमारी में
    जोर की थरथराहट होगी
    हो सकता है इससे
    सूख चुके फूल की
    पत्तियां चटक जाएं
    और किताब खोलते ही
    सारी पत्तियां बिखर जायें।
    नहीं……जब तक तुम
    नया फूल लेकर नहीं आते
    मैं अलमारी……..बंद रखूंगी।
    ~~~~~~~~~~~~~सतीश कसेरा

  • उनके लब कांप गए, मेरी आंख भर आई……

    मिले थे फिर से तो, पर बात न होने पाई

    उनके लब कांप गए, मेरी आंख भर आई।

    बुझ गए थे सभी चिराग मगर इक न बुझा

    तो हवा जा के आंधियों को साथ ले आई।

    जंहा से दूर निकल आये थे, वहीं पहुंचे

    मेरे सफर में हर इक बार उसकी राह आई।

    अपने हालात पे खुद रोये और खुद ही हंसे

    हमीं तमाशा थे और हम ही थे तमाशाई।

    मेरे हर दर्द से वाकिफ है आस्मां कितना

    हम न रोये थे तो बरसात भी नहीं आई।

    जिंदगी भर उनकी हर याद संभाले रक्खी

    उम्र भर इस तरह हम उनके रहे कर्जाई।

    ~~~~~~~~सतीश कसेरा

  • जो आँख देख ले उसे

    जो आँख देख ले उसे वो वहीं ठहर जाती है
    देखते देखते उसे शाम ओ सहर बीत जाती है

    फ़लक से चाँद भी उसे देखता रहता है रातभर
    उसकी रूह चाँदनी ए नूर में खिलखिलाती है

    महकते फूल भी उससे आजकल जलते है
    तसव्वुर से उसके फिजा सारी महक जाती है

    मदहोश हो जाता है मोसम लहराए जो आचॅल उसका
    जुल्फें जो खोल दे वो तो घटाऍ बरस जाती है

    तनहाइयों में जब सोचता हूं उनको
    शब्द ओ शायरी खुद ब खुद सज जाती है

    sign

  • ख्वाब मत बुन बावरी…………!

    रिश्ते के स्वेटर के

    प्यार की सलाई से

    ख्वाब मत बुन बावरी!

    शुरु में बड़ी आसान लगेगी

    लेकिन दिल तक आते-आते

    कभी टूटेगी ऊन

    पडऩे लगेंगी गांठे

    टकरायेंगी सलाईयां

    कभी गलत होंगे फंदे

    समझ नहीं पाओगी

    कहां पर गलत हुई?

    खींचतान कर गले तक पहुंचोगी

    तो कई सलाई और आ जायेंगी

    सारे फंदे खींच जायेंगे

    सलाईयां आपस में टकरायेंगी

    तुम बेबस होकर देखोगी

    कि इसी बीच

    कोई जाता हुआ लम्हा

    रिश्ते के स्वेटर की ऊन का

    एक सिरा खींच कर ले जायेगा

    और ख्वाबों की बुनाई

    सर्र….से खुलती चली जायेगी

    रह जायेगा बस

    यादों का एक उलझा हुआ गुच्छा।

    जिसका भी उलझा

    आज तक न सुलझा।

    ———————सतीश कसेरा

  • कौन न छला गया……….

    किस लिये रो रही हो

    नूर अपना खो रही हो

    एक ऐसे के लिये जो

    छोड़कर चला गया……….

    वो था धोखा

    पा के मौका

    आके तेरे दिल में जो

    आग सी लगा गया……….

    प्यार कैसा प्रीत कैसी

    बन गई है रीत ऐसी

    देख इसको, देख उसको

    कौन न छला गया……….

    ————–सतीश कसेरा

  • वरना कौन अपनी नाव देता है………………

    पत्ता-पत्ता हिसाब लेता है

    तब कहीं पेड़ छांव देता है।

    भीड़ में शहर की न खो जाना
    ये दुआ सबका गांव देता है।

    हम भी तो डूबने ही निकले थे
    वरना कौन अपनी नाव देता है।

    किसी उंगली में जख्म देकर ही
    कोई कांटा गुलाब देता है।

    जहां बिकेगा बेच देंगे ईमां
    कौन मुहमांगा भाव देता है।

    जान देने का हौंसला हो अगर
    फिर समंदर भी राह देता है।

    जिंदगी दे के ले के आया हूं
    कौन यूं ही शराब देता है।

    प्यार खिलता है बाद में जाकर
    पहले तो गहरा घाव देता है।
    ~~~~~~~~~~~~~~–सतीश कसेरा

  • कौन सा दर्द सुनाया जाए……….

    कौन सा दर्द सुनाया जाए……….

    नींद को ढूंढ के लाया जाए

    चलो कुछ देर तो सोया जाए।

    जल गई इंतजार में आंखें

    अब जरा अश्क बहाया जाए।

    आ के फिर बैठ गईं हैं यादें

    कौन सा दर्द सुनाया जाए।

    हमने जाना है दर्द जलने का

    इन चरागों को बुझाया जाए।

    रात को टूटेंगे कितने तारे

    ये जमीं को भी बताया जाए।

    अपनी तकदीर में रोना है अगर

    सबको हंस-हंस के बताया जाए।

    ~~~~~~~~~~~सतीश कसेरा

  • ऐसे महसूस हम इक दूसरे को करते रहे………

    वो जमीं आसमां भी दूर रह के मिलते रहे

    हम अपने फासिलों में रहके बस तड़पते रहे।

    हमारे बीच खामोशी की नदी बहती रही

    हम किनारों की तरह वैसे साथ चलते रहे।

    जरा सा जिक्र ही छेड़ा था उनके वादों का

    वो सर झुका के बेबसी से हाथ मलते रहे।

    लबों तक आ के बर्फ हो गई कितनी बातें

    लफ्ज अंगारे से बनकर जुबां पे जलते रहे।

    हवा हम दोनों के जिस्मों की छुअन लाती रही

    ऐसे महसूस हम इक दूसरे को करते रहे।

    उदास नजरों से उठकर चले गए वो तो

    उनके कदमों के निशां देर तक सिसकते रहे।

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~सतीश कसेरा

  • दूर से कब वो समझ आता है……..

    कुछ तो होता जरुर नाता है

    ऐसे कोई नहीं मिल जाता है।

    उसी के सामने दिल को खोलें

    जिसे कुछ हाल पढऩा आता है।

    फिर कोई भीड़ ही नहीं लगती

    भीड़ में जब वो नजर आता है।

    किसको रख लें, किसे गिरा दें वो

    ये तो नजरों को खूब आता है।

    साथ चलती रहे दुनिया सारी

    साथ कोई एक ही निभाता है।

    उसके दिल में उतर के देखेंगे

    दूर से कब वो समझ आता है।

    साथ उनका तो बस बहाना था

    रास्ता तो हमें भी आता है।

    ………….सतीश कसेरा

  • कहीं बेघर ने इक छत का सहारा कर लिया होता…….

    कहीं बेघर ने इक छत का सहारा कर लिया होता

    तो फिर हर हाल में उसने गुजारा कर लिया होता।

    मुसाफिर का सफर थोड़ा जरा आसान हो जाता

    अगर रस्तों ने मंजिल का इशारा कर दिया होता

    किनारे पर ही आकर के अगर हर बार डूबेगी

    तो तूफां में ही कश्ती ने किनारा कर लिया होता।

    अभी बाकी तुम्हारी दास्तां थी, क्या पता उनको

    वो रुक करके चले जाते, इशारा कर दिया होता।

    तेरी रंगीन दुनियां देखने को वो भी तरसे हैं

    जो आंसू सूख पाते तो नजारा कर लिया होता।

    वो पहली चोट भारी न पड़ी होती अगर दिल पर

    तो हमने इश्क भी यारो दोबारा कर लिया होता।

    ………….सतीश कसेरा

     

  • चांद पे चरखा चलाती रही……..

    चांद पे चरखा चलाती रही……..

    खुदा की दुनिया है, इसमें तो क्या कमी होगी

    हमारी आंख ही में ठहरी कुछ नमी होगी।

    जितना जीने के लिये चाहिये वो सब कुछ है

    नहीं लगता है कि ऐसी कहीं जमीं होगी।

    फिर से कोई सुना के हो सके तो बहला दे

    वो सब कहानियां बचपन में जो सुनी होंगी।

    चांद पे चरखा चलाती रही बुढिया कब से

    इतना काता है तो कुछ चीज भी बुनी होगी।

    आईना बन के चमकती है आस्मां के लिये

    वो बर्फ आज भी पहाड़ पर जमी होगी।

    ………………सतीश कसेरा

     

  • लूटा है

    झील सा जिस्म ओढ़ कर तुमने मुझको लूटा हैं,
    ईश्क से बुखार कर देने वाली बातो ने मुझको लूटा हैं,
    शौक नहीं था मुझे मर मिटने का मगर,
    आपकी नशीली निगाहों ने मुझको लूटा हैं!!

    बिखरी हैं खुशबु हर जगह आपकी साँसों की,
    मुझे तो इस कातिल हवा ने लूटा हैं!!

    बहुत खूब हैं आपके हुस्न की हर एक अदा,
    आपने तो चाँदनी को भी चाँद से लूटा हैं!!!

  • कि दिल का हाल चेहरे से कुछ ब्यां न हो…

    वो जब गली से गुजरें तो, कोई वहां न हो

    घर के सिवाय मेरे कोई, घर खुला न हो।

    बेहतर है कि दीवारों से, कुछ दूर ही मिलें

    दीवारों के भी कान कहीं दरम्यां न हों।

    मुमकिन है मिल रहीं हों, हाथों की लकीरें

    पर बीच में तो कोई बुरा, ग्रह पड़ा न हो।

    अब ये भी अदाकारियां, देता है इश्क ही

    कि दिल का हाल चेहरे से कुछ ब्यां न हो।

    ये डर भी साथ हो कि मोहब्बत की राह में

    खाई तो पार कर लें, आगे कुआं न हो।

    कितने ही दर्द इश्क के आंखों से बहेंगे

    बस दिल जले तो ऐसे जले कि धुंआ न हो।

    …………..सतीश कसेरा

  • कोई खिड़की नहीं, झरोखा नहीं….

    उसने जब उठते हुए रोका नहीं

    मैने भी चलते हुए सोचा नहीं।

    सामने सबके गले लग के मिले

    कभी तन्हाई में तो पूछा नहीं।

    इतना हंसना, ये मुस्कराना तेरा

    कहीं जमाने से तो धोखा नहीं।

    कैसे आऊं बता तेरे दिल में

    कोई खिड़की नहीं, झरोखा नहीं।

    नींद आ जाए, अश्क बहते रहें

    वैसे इस तरह कोई सोता नहीं।

    आप हीं बदलें खुद अपना चेहरा

    आईने में तो हुनर होता नहीं।

    …….सतीश कसेरा

  • शागिर्द ए शाम

    जब शागिर्द ए शाम तुम हो तो खल्क का ख्याल क्या करें
    जुस्तजु ही नहीं किसी जबाब की तो सवाल क्या करें

    sign

  • मुक्तक 29

    ढूंढा जिसे गली में, शहरा में शाम में ,

    दीदार उसका हो गया बस एक ज़ाम में.

    …atr

  • मुक्तक 27

    तमाम गुलाबो की खुश्बू है तेरे इकरार में साकी ,

    कही ऐसा न हो मैं खुश्बुओं की चाह ही रख लू..

    …atr

New Report

Close