तेरी आँखों से पीनी है, मुझे अब रात भर साकी ,
ज़रा अब फिर पिला दे न , तमन्ना अब भी है बाक़ी.
…atr
तेरी आँखों से पीनी है, मुझे अब रात भर साकी ,
ज़रा अब फिर पिला दे न , तमन्ना अब भी है बाक़ी.
…atr
ख़ुदा ने क्या दिया तुमको, ख़ुदा ने क्या दिया हमको,
की तू है हुस्न की मल्लिका , औ मुझको आशिकी दे दी ..
…atr
भुला सकोगे न तुम कभी भी ,
की तुमको इतना मैं प्यार दूंगा .
जो होगा चुलमन वो होंगी आँखे ,
उसी से तुमको निहार लूंगा .
मगर रहे याद तुम्हे सदा ये,
उसी में नज़रें उतार लूंगा .
तू मेरा साकी मैं रिन्द तेरा,
ये मयकदा ही तेरा बसेरा ,
पिला कभी तो मेरे हमनफ़स ,
तुम्हारे दर पे खड़ा हु बेबश ,
नज़र न फेरो , पिला के जाओ,
कसम है दिल में उतार लूंगा ..
भुला सकोगे न तुम कभी भी,
की तुमको इतना मैं प्यार दूंगा..
…atr
कोई तो रंग मिलाया जाये
दिल का धुंआ भी तो देखा जाये।
बेबसी ये कि रोक भी न सको
और कोई पास से चला जाये।
जहां सेे भूले थे घर का रस्ता
फिर उसी मोड़ पे जाया जाये।
आईने और कितने बदलोगे
अक्स अपना कभी बदला जाये।
जिदंगी की किताब देखें जरा
कोई तो लफ्ज समझ में आये।
वक्त की तरह मिला हूं उनसे
क्या पता लौटकर न हम आये।
…………सतीश कसेरा
कौन किस्मत से भला जीता है……….
ये उसके खेल का तरीका है
कौन किस्मत से भला जीता है।
पहुंच न पाते कभी मंजिल तक
रास्तों को भी साथ खींचा है।
सुबह दिल खूब लहलहायेगा
रात भर अश्क से जो सींचा है।
कोई दुआ या बद्दुआ तो नहीं
कौन करता ये मेरा पीछा है।
सुबह उठ जाये वो ऐसे-कैसे
रात भर बैठ कर तो पीता है।
लकीरें हाथ की न गिर जाएं
कस के मुट्ठी को जरा भींचा है।
………………सतीश कसेरा
खबर मेरी यहाँ पर पूछते क्या हो एहसास ,
जरा एक बार मेरे मकान से गुजरो.
तुम्हे मालूम होगा इश्क़ में क्या क्या लुटाते हैं,
कभी एक बार इस इम्तिहान से गुजरो. .
…atr
किया है प्यार छुप छुप कर खुदाया , दिल्लगी न की ,
जमाना ढोंग कहता है हमारे प्यार को साकी .
…atr
प्रेम होता दिलों से है फंसती नज़र ,
एक तुम्हारी नज़र , एक हमारी नज़र,
जब तुम आई नज़र , जब मैं आया नज़र,
फिर तुम्हारी नज़र और हमारी नज़र,
बन गयी एक नज़र, हो गयी एक नज़र.
ये तुम्हारी नज़र या हमारी नज़र,
ये हमारी नज़र या तुम्हरी नज़र .
बस तुम्हारी नज़र , बस हमारी नज़र,
न तुम्हारी नज़र न हमारी नज़र ,
मैं तुम्हारी नज़र , तुम हमारी नज़र ,
देखता हु जिधर तू ही आये नज़र ,
है ये कैसी नज़र ,है ये जैसी नज़र,
या है मेरी नज़र या तुम्हारी नज़र ,
ये तुम्हारी नज़र में हमारी नज़र ,
ये हमारी नज़र में तुम्हारी नज़र ,
जो है मेरी नज़र , वो है तेरी नज़र ,
जो है तेरी नज़र ,वो है मेरी नज़र,
देख तुम एक नज़र , देखूं मैं एक नज़र,
प्रेम होता दिलों से है फंसती नज़र..
नज़रों का खेल अनोखा है,
फिर भी इसमें धोखा है..
फिर तुम्हारी नज़र न हमारी नज़र …
…atr
वो राह वो बस्ती, वो घर, वो गलियां ,
वो राह के कांटे , वो फूल और कलियाँ ,
मुझे फिर याद आये..
वो दो दिलों की धड़कन ,वो दोपहर का साथ,
वो शाम का मौसम , हाथो में तेरा हाथ ,
मुझे फिर याद आये
वो बचपनों के खेल, वो प्यार में रुसवाई ,
वो हार में भी जीत , अब याद और तन्हाई,
मुझे फिर याद आये.
…atr
कवि कोई गीत सुना ऐसा ये जग दीवाना हो जाए,
कोई बंदा बैरागी बने, कोई मरदाना हो जाए!!
भाईचारे की डोरी से, बंधा हुआ हर गाँव मिले,
धुप में झुलसे मानव को, तरुवर की ठंडी छाँव मिले,
कोई गोकुल सा गाँव लगे, कोई बरसाना हो जाए,
कोई बंदा बैरागी बने, कोई मरदाना हो जाए!!
गीतों से सबको प्यार रहे, गीतों के रंग हज़ार रहे,
रामायण भगवत गीता से, झंकृत जीवन के तार रहे,
मानस में गूंजे गुरुवाणी अंतस ननकाना हो जाये,
कोई बंदा बैरागी बने, कोई मरदाना हो जाए!!
ख्वाबो में भी अकेले होने पर जब बस शब्दों का सहारा होता हैं,, खुद की आधी-अधूरी सुनने पर भी जब मन छठपटा रहा होता हैं,, हालातों से बाहर आते ही जब ख्यालात नजर आ जाते हैं,, ह्रदय हारकर तन बिसराकर खुद वहाँ पहुँच तो जाते हैं,, फिर आसमान को समेटने की चाहत जब हाथ फैलाये रखती हैं,, खुद को महसूस करने खातिर जब स्वतः आँख बंद हो जाती हैं ,, तब हौले से एक कोयलिया स्वर ह्रदय-चीर मन बस जाती हैं,, आँखे खोली, कुछ नहीं पाया, पर दिल की कली-कली खिल जाती हैं,, तब मंद- मुसकाता सा एक चेहरा आँखों में बस जाता हैं,,, पास में ना होकर भी वो बस सामने नजर आ जाता हैं,,, कब होगा वो साथ में मेरे, दिमाग खुद सवालिया रहता हैं, दिल उसको समझाता हैं, झांक के देख वो मुझमे रहता हैं,, उसकी कल्पनाओ से परे तुझे अपने भविष्य की नीव रखनी हैं,, हासिल हो उसे भी मुक्कमल जहाँ,, ऐसी फरियाद तुझको करनी हैं,,
चुपके चुपके ही चाहा है, इज़हार किया न जीवन भर ,
एक डर में एक संशय में, मैं हाल ए दिल कैसे कह पाऊँ.
जीवन के अंतिम क्षण में यदि बात जुबां तक आ जाये,
बस उसी काल मैं तृप्त हुआ ,दुनिया को छोड़ चला जाऊं..
…atr
ये गीत मेरे न पत्थर है, न कांटे ,न अंगारे है,
ये गीत ह्रदय की पीड़ा हैं,वो सब है जो हम हारे हैं.
हर लफ्ज़ में उसकी ख़ुश्बू है, हर मतला उसकी भाषा है,
हर मक़ता उसका पूजन है, बस इसीलिए ये प्यारे है..
…atr

उसके चेहरे से नजर हे कि हटती नहीं
वो जो मिल जाये अगर चहकती कहीं
जिन्दगी मायूस थी आज वो महका गयी
जेसे गुलशन में कोई कली खिलती कहीं
वो जो हंसी जब नजरे मेरी बहकने लगी
मन की मोम आज क्यों पिगलती गयी
महकने लगा समां चांदनी खिलने लगी
छुपने लगा चाँद क्यों आज अम्बर में कहीं
भूल निगाओं की जो आज उनसे टकरा गयी
वो बारिस बनकर मुझ पे बरसती गयी
कुछ बोलना ना चाहते थे मगर ये दिल बोल उठा
धीरे- धीरे मधुमयी महफिल जमती गयी
आँखों का नूर करता मजबूर मेरी निगाहों को
दिल के दर्पण पर उसकी तस्वीर बनती गयी
सदियों से बंद किये बेठे थे इस दिल को
मगर चुपके से वो इस दिल में उतरती गयी
तिल तिल जलता हे दिल मगर धुआं हे कि उठती नहीं
परवाना बनकर बेठे हे शमां हे की जलती नहीं
हो गयी क़यामत वो जो सामने आ गयी
दर्द ऐ दिल से गजल आज क्यों निकलती गयी
थोडा सा शरमाकर, हल्के से मुस्कुराकर झुकी जो नजर
नज़रे-नूर-ओ-रोशनी में मेरी रंगे-रूह हल्के से घुलती गयी

ये कैसा तसव्वुर, कैसा रब्त, कैसा वक्त है
जो कभी होता भी नहीं, कभी गुजरता भी नहीं
रब्तः संबंध

आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे
आप हमारी हकीकत तो बन न सके
ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे
आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे
सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे
जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे

किसी की आह में हम खोए हैं
ना जाने कब वो नज़र आएगी
एक रात की पनाह में सोये हैं
ना जाने कब सुबह आएगी
पूछो तो सासों के सुर बता सकता हूं
ना रूप, ना रंग, ना हाल बता सकता हूं
ना नाम, ना पता बता सकता हूं
मगर पूछो तो धडकन क़ी ताल बता सकता हूं
अहसास का अहसास …!
मुझे अहसास हो रहा है,
कि मेरा दिल, न मेरे काबू में, ना मेरे पास,
भटक रहा है, जाने क्या आस लिए,
तेरे ही आसपास.…….
मुझे अहसास हो रहा है.
कि ये दुनिया कितनी सुंदर और सुनहरी है,
और ये मेरी जिंदगी कितनी प्यारी और हसीन है,
वक्त की भी कुछ कमी नहीं है,
फिर भी मेरे दिल को तड़पने की ही है चाह,
जाने क्या है इसकी कमी,
किसकी है इसको तलाश …..
एक अजब सा अहसास,
मेरे ही अहसास पर,
जो मुझे उलझन मे डाल जाता है,
कि सबकुछ है पास, फिर भी,
हर खुशी है साथ, फिर भी,
ये दिल क्यूँ अक्सर हो जाता , प्यासा प्यासा,
निशब्द और उदास…..
मुझे अहसास हो रहा है,
मानो अब विश्वास ही हो गया है,
कि मेरा दिल, न रहेगा मेरे काबू मे, ना मेरे पास,
भटकता ही रहेगा, जाने क्या आस लिए,
तेरे ही आसपास,
जिसकी न मुझे पहचान है,
न पता भी है पास….
“विश्व नन्द “
ये चली कैसी हवा ….!
सोचा था खरीदार बन,
आया हूँ इस जहाँ मे मैं,
ये चली कैसी हवा, कि बिकता ही चला हूँ मैं…..…. ! .
जाना था मुझको कहाँ, और,
आ गया किस मोड़ पर,
अपनी चाहतों को दूर ही कहीं पे छोड़ कर,
कि अपना कहने को ख़ुद ही को,
ख़ुद से ही डरता हूँ मैं, ये चली कैसी हवा,
कि बिकता ही चला हूँ मैं …..…!. .
पास है सबकुछ मेरे, पर फ़िर भी जाने क्या कमी,
भाग दौड़ के भंवर में, सूझता भी कुछ नहीं,
क्या मुझे पाना है, जिससे बेचता हूँ ख़ुद को मैं…
ये चली कैसी हवा, कि बिकता ही चला हूँ मैं ……..…. ! .
उलझने दिल की न सुलझीं, कोशिशें कितनी थी कीं,
दिल कहीं है और,
ख़ुद को ढूँढता हूँ मैं कहीं, बाट तू मुझको दिखाए,
बाट ही तकता हूँ मैं…..
ये चली कैसी हवा, कि बिकता ही चला हूँ मैं………! .
सोचा था खरीदार बन, आया हूँ इस जहाँ मे मैं ….? .
“ विश्व नन्द ”
सुंदर से इक फूल ने ….!
कल जैसा था वह आज नहीं,
कल कैसा होगा पता नहीं,
है आज अलग इन दोनों से,
हर दिन जैसे नव फूल खिले.
पर दिल अपनी मनमानी मे,
जाने कैसी शैतानी मे,
इस सुंदर आज को छोड़,
यार, कल मे ही है रहता उलझे… (या बीता हुआ कल, या आनेवाला कल)
सुंदर से इक फूल ने उस दिन,
चुपके से मुझे पास बुलाकर,
कुछ मुस्काकर, कहा ये मुझसे…
“ऐसे क्यों मुरझाये हो तुम,
ऐसे क्यों घबराए हो तुम,
ऐसा भी है तुमको क्या गम,
इतनी लम्बी उम्र तुम्हारी,
फिर भी तुमको खुशी नहीं है ! मुझको देखो……
कल मुरझा कर मर जाना है,
आज का दिन जो मेरी जिंदगी,
खुश रहकर और खुशी बाँट कर, सुन्दरता से ही जीना है…..”
सुंदर से उस फूल ने मुझको सिखलाया है,
अर्थ नया जीवन का अपने….
कितने दिन जीवन मे काटे…
इसका तो कुछ अर्थ नहीं है,
खुश रहकर और खुशी बांटकर,
सुन्दरता से, साथ मे लेकर प्यारे सपने,
निर्भयता से, जितने काटे, उस से ही मतलब है ………
सुंदर से उस फूल ने मुझको सिखलाया है..
सुंदर से उस फूल ने मुझको दिखलाया है….
इसीलिए अय मेरे प्यारों,
फूलों जैसा जियें हर इक दिन,
प्यार करें पल पल से प्यारों,
बचे हुए जीवन के हर दिन.
आओ सब मिल साथ चलें यूं,
हम अपने जीवन मे निशिदिन,
सुन्दरता के बने पुजारी,
सुंदर कर दें जीवन, हर दिन ….…..
“विश्व नन्द”
फूंक देते प्राण मनुज में वो गुरुदेव कहाते है,
जीवात्मा की परमात्मा से वो ही मिलन कराते है.
मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताकर करते है उद्धार गुरु,
निज शिष्यों को ईश्वर से बढ़कर करते है प्यार गुरु.
कभी कभी निज उपदेशो से मानव का कल्याण करें,
कभी धर्म की शिक्षा देकर मनुज जन्म साकार करें.
अहंकार से मुक्त कराकर माया मोह से दूर भगाकर,
परमानन्द की प्राप्ति कराकर, करते है कल्याण गुरु.
गुरुदेव निज चरणो में प्रणाम मेरा स्वीकार करें ,
अंतर्मन में ज्योति ज्ञान की प्रज़्वलित कर उद्धार करें.
सफल हो गया जीवन मेरा ,पाया जो गुरु का आधार ,
गुरु के इस उपकार कर्म का व्यक्त कर रहा मैं आभार..
…atr
written in 2010

बड़ी सिद्दत से चाहा था ख़ुदा के नूर को मैंने ,
मेरी नीयत भी पाकीज़ा थी मगर इकरार ही न हुआ..
…atr

गीत लिखूँ कैसे अब मैं, गीत कहूँ कैसे अब मैं.
सब शब्द तुम्हारे प्रेमी है,हर कविता तेरी दासी है,
हर वाक्य तुम्हारा वर्णन है, हर हर्फ़ तेरा अभिलाषी है,
फिर इन दीवाने लोगो को अब कहु, गढ़ूं कैसे अब मैं,
गीत लिखूँ कैसे अब मैं, गीत कहूँ कैसे अब मैं.
जो सृजन तुम्हारा दीवाना ,है दूर बहुत जाता मुझसे,
उत्पत्ति मुग्ध है अब तुम पर , है नाता तोड़ चुकी मुझसे ,
फिर इन परदेशी लोगो को , सुनूँ , कहूँ कैसे अब मैं.
गीत लिखूँ कैसे अब मैं, गीत कहूँ कैसे अब मैं.
जिन कल्पित भावो से नूतन, नव प्रेम कथा मैं गढ़ता था,
जिन अश्रुधराओं से प्रेरित हो, ग़ज़ल मैं लिखता था,
वो भाव गए सब तेरे संग, कहो , लिखूँ कैसे अब मैं..
गीत लिखूँ कैसे अब मैं, गीत कहूँ कैसे अब मैं.
…atr
चलो अब देर से तुम सो सकोगे ,
हमारी नींद तुमको लग गयी है..
…atr
बढ़ी है तीरगी रूश्वाईयों में ,
ज़रा अपनी नज़र तुम बंद रखना..
…atr
करोगे क़त्ल क्या हमको दरिंदो ,
हमारे हर्फ़ रूहानी, हमारी बात रूहानी..
…atr
कभी मेरी निगाहों को जहाँ दिखता था तुझमे मीर ,
मगर अब दौर ऐसा है , खुदी पुरज़ोर हावी है ..
…atr
कहीं है दफ़्न तुम्हारा ग़म हमारे दिल के कोने में,
हमे भी मीर लाशो को बहुत रखना नहीं आता..
…atr
अभी मुझमे जरा तू है ,जरा मैं हूँ तेरे दिल में ..
मगर अब अपने अपने में जरा सा तू , जरा मैं हूँ ..
…atr
ए जीनेवाले सोच जरा….!
मरने के लिए जीते हैं सब,
फिर भी मर मर कर जीते हैं.
यहाँ कभी न मन की प्यास बुझी,
प्यासे ही सब रह जाते हैं.
ए जीनेवाले सोच जरा,
ऐसा जीना क्या जीना है,
गर मर मर कर यूं जीना है,
तो जीकर भी क्या करना है.
जग जीवन के जन्जालों मे,
ना समझ सका ख़ुद को मानव,
चिंताओं व्यर्थ व्यथाओं की,
गाथाओं मे खोया मानव.
कुछ ऐसे दीवानेपन में,
मेरे भी जीवन मे इक दिन,
जागा जीवन का अर्थ नया,
जब किस्मत से अनजाने मे,
‘ ख़ुद ’ को खोया,
सबकुछ पाया……….!
विश्व नन्द.
दिल क्यूँ मांगो “More” ….!
दिल तुम्हरी नहीं मानेगे हम, क्यूँ तुम मांगो “More”
“More” “More” ही दुःख का कारण, सुख ले जावे चोर…..!
इतना सारा पास जो अपने, देख तो उसकी ओर,
जो कुछ है, इसमे ही समाया समाधान संतोष….. !
भगवत्प्रेम और भक्तिभाव में होकर मन मदहोश,
सुख है, जो है, उसका करना परिपूर्ण उपभोग,
सुख है, जो है, उसका करना प्यार से सद्उपयोग …..!
ये जीवन है प्रभु की पूजा, ठान ले तू हररोज,
प्रभु का ही हर काम समझ, हर काम में आए जोश….!
चीजों के इस “More” का चक्कर लेता सबको मोह,
इस चक्कर में ना पड़ने, कर बुद्धि का उपयोग ….!
अंतर्मन सुविचार उभरते, नामस्मरण से रोज,
सतज्ञान सुख की अनुभूति का अनुभव हो रोज…..!
दिल प्यारे अब होश में आओ, और ना मांगो “More”
जपो प्रभू का नाम प्यार से, जपना छोडो “More”….!
” विश्व नन्द “
शायद इस पहली बारिश में कल वो भी मेरी तरह नहाया होगा,,
कामकाजी दौर में धुंधला चुकी कुछ यादो को यादकर वो भी मुसकराया होगा।।
हम उस वक्त बस ऐसे ही घास पर लेटे हुए थे,,
ख़ामोश पड़े उस मंजर में नजरो से बोल रहे थे!!
अचानक शरारती बादल गरजकर बरसने लग गए थे,,
सिर्फ भीगने से बचने खातिर हम भाग खड़े हुए थे!!
भागते भागते जब तुम्हारा पैर अचानक मुड गया था,,
तब तुम्हे थामते- थामते मैं खुद नीचे गिर गया था!!
तुम उस वक़्त कितनी खिल- खिलाकर हँस पड़ी थी,,
I’m sorry– I’m sorry बोलते-बोलते बार-बार हँसे जा रही थी!!
मालूम नहीं हँसते-हँसते कब तुमने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया था!!
मेरा तुम्हारा पहला स्पर्श,, हाए!! कितना कोमल और नरम हाथ था!!
फिर हम ऐसे ही हाथो में हाथ डाले उस बारिश में धीरे धीरे चल दिए थे,,
बातो ही बातो में ना जाने कब मैं बाबू और तुम बेबी ना जाने कब बन गए थे!!
हमने उस बारिश को पहली बार बांहे फैलाए महसूस किया था,,
पहली बारिश में ऐसे पहली बार भीगना मन को बहुत भा रहा था!!
सावन तो हर बार ऐसे ही बरसता था,,
मगर इस तरह पहली बार बरसा था!!
भीगकर उन भीगे हुए हसीं लम्हों में खुद को फिर उसने खुद की ही साँसों से सुखाया होगा,,
कामकाजी दौर में धुंधला चुकी उन यादो को यादकर वो भी मुसकराया होगा।।
पराये जज्बातों को अपना बनाने की चाहत होती है
किसी की आहों में डूब जाने की चाहत होती है
उम्र भर चलते रहे तनहाईयों के साथ हम
उनके साथ चंद कदम चलने की चाहत होती है

यूं इकरार ए इश्क मे तू ताखीर न कर
चले गये जो इकबार, फिर ना आयेंगे कभी
मेरी कविता प्यारी मुझको…….!
मेरी कविता प्यारी मुझको,
औरों को ये सरदर्द है,
समझ के भी आदत ना छूटे,
जाने कैसा ये मर्ज है…….!
फिर भी अर्ज है…!
मेरी कविता प्यारी मुझको, औरों को ये सरदर्द है…..!
कभी जो लब पर ये आ जाती,
और कुछ पंक्ति मै लिख पाता,
फिर जो कोई पास हो मेरे,
पकड़ सुनाने उसको लगता,
मचले मेरा दिल तब ऐसे,
जैसे मेरा यही फर्ज है,
मेरी कविता प्यारी मुझको,औरों को ये सरदर्द है,
समझ के भी आदत ना छूटे, जाने कैसा ये मर्ज है…….!
जाने कविता या हो विन्मुख,
इससे न कुछ फर्क है पड़ता
दोस्त भी भागें दूर हैं मुझसे,
जब चढ़ता ये जोश कवि का
बात यही बीवी बच्चों की,
इससे न कुछ उन्हें अर्थ है
मेरी कविता प्यारी मुझको, औरों को ये सरदर्द है,
समझ के भी आदत ना छूटे, जाने कैसा ये मर्ज है…….!
माँ जैसे अपने बच्चोंसे प्यार है करती,
जैसे भी हों.
मेरा प्यार भी ऐसा ही है,
मेरी कविता जैसी भी हो.
पर लोगों को इसका क्या है,
उनको तो ये समय व्यर्थ है.
सुना रहा पर मैं कवितायें, जैसे मैंने लिया कर्ज है…..!
मेरी कविता प्यारी मुझको, औरों को ये सरदर्द है,
समझ के भी आदत ना छूटे, जाने कैसा ये मर्ज है…….!
“ विश्व नन्द ”
कल उसने दिल को कुछ ऐसे छुआ कि साँसे तो थम गई पर धडकनें दौड़ने लगी !!!!
तुम्हे मालूम हो …
कुछ बाकी सा रह गया है तुम्हारे – मेरे दरम्यान…
जिसे मैं बहुत कोशिश करने पर भी शब्द नहीं दे पाता,
बस यूँही कभी महसूस कर लिया करता हूँ अकेले में,
गोयाकि,
कुछ फुसफुसाहटें,
कुछ पहली बारिशें,
कुछ अधपके से तुम्हरे साथ देखे ख्वाब,
कुछ तुम्हारी सी छुअन,
कुछ चुम्बन,
कुछ अकेली-अकेली सी ढीठ शामें,
कुछ आँखों-आँखों में काटी लम्बी रातें,
कुछ करीने से सहेजे हुए तुम्हारे लैटर,
और कुछ जिंदगी की भाग-दौड़ में भुला दी गयी यादें,
कुछ-कुछ मासूमियत, कुछ-कुछ मुस्कुराहटें,
कुछ-कुछ सावन, कुछ-कुछ चंदा !
कौन कहता है मुहब्बत की ज़ुबाँ होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है
वो न आये तो सताती है ख़लिश सी दिल को
वो जो आये तो ख़लिश और जवाँ होती है
(ख़लिश = चुभन, वेदना)
रूह को शाद करे, दिल को जो पुरनूर करे
हर नज़ारे में ये तनवीर कहाँ होती है
(शाद = प्रसन्न), (पुरनूर = प्रकाशमान, ज्योतिर्मय), (तनवीर = रौशनी, प्रकाश)
ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मुहब्बत को कहाँ तक रोकें
दिल में जो बात हो आँखों से अयाँ होती है
(ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मुहब्बत = मुहब्बत की बाढ़ की सहनशीलता), (अयाँ = साफ़ दिखाई पड़ने वाला, स्पष्ट, ज़ाहिर)
ज़िन्दग़ी एक सुलगती-सी चिता है ‘साहिर’
शोला बनती है न ये बुझ के धुआँ होती है
-साहिर होशियारपुरी
ज़िन्दगी अब मेरी
बिखर के ना रह जाये
रोती हैे मेरी आँखे
कोई सवाल ना कर जाये
लबो पे है
जाने कैसी हँसी
जुबां तो ख़ामोश है
ख़ामोश नज़रें ना सब कुछ कह जाये
रुक जा ज़रा
मेरे हमसफ़र
कोई राहों में
तुझसे कही छूट ना जाये..
नेहा
हरदम कौन ये मेरे दिल में…..
हरदम कौन ये मेरे दिल में, सुख में,
दुःख में, हर मुश्किल में,
हर्ष में मेरे, या अश्कों में, गीत मजे से गाता है,
शब्द कहाँ से लाता है,
धुन भी लेकर आता है …….
हरदम कौन ये मेरे दिल में, गीत मजे से गाता है……..
कभी न समझा, न समझूंगा, कौन है ये,
क्या नाता है,
क्यूँ इसने इस मेरे दिल को अपना ही घर माना है,
इसकी क्या उम्मीद है मुझसे,
मुझमे क्या ये पाता है,
जो अनजाने में अर्पित सा हर गीत उमड़ कर आता है,
शब्द कहाँ से लाता है, धुन भी लेकर आता है…….
हरदम कौन ये मेरे दिल में, गीत मजे से गाता है……..
कहते लोग ये गीत मेरे हैं, ये सच यारों बात नहीं,
चाहे हो ये लेखन मेरा, शब्द्सुधा ये मेरी नहीं,
मुख मेरे आयी हो कविता,
पर ये गुंजन मेरा नहीं है,
मुझमे ही रहकर जो मुझसे अलग अलग सा रहता है,
वो ही सबकुछ करता है,
शब्द कहाँ से लाता है,
धुन भी लेकर आता है…….
हरदम कौन ये मेरे दिल में, गीत मजे से गाता है ……..
” विश्व नन्द ”
तेरे हर-एक लफ्ज़ के मुताबिक़ हमको इक रोज बिछड़ना हैं,,
तेरा हाल तो तू ही जाने, हमे तो उठ-उठकर रोज मरना हैं,,
मगर तेरी अनचाही फ़िक्र के दरमियाँ, मेरे निक्कमे वजूद का जिक्र होगा इतना,,
भरकर रोज इन आँखों में,, फिर तुझे मेरी चाहतो का जुर्माना अता करना है!!!
तुमने तो अक्सर मुझको अपनी नजरो से नीचे उतारा हैं,,
मालूम तुझको तो होगा ही,, उधर बसता दिल तुम्हारा हैं!!
कल तक तो तुझको मेरे देखने भर से भी दिक्कत थी,,
तब ही तुझको तलब होगी,, इस चाहत में कितनी सिद्दत थी!!!
जब जब नजर भरकर तु,, खुद को दर्पण में निहारेगी,,
याद कर लम्हाती बातो को, कभी इठलायेगी फिर शर्माएगी!!
तब वजन होगा मेरी हर बात में इतना कि पलके खुद ही झुक जायेंगी,,
याद कर मेरा रुक जाना,, फिर तुमको संवारना, तू भी वही रुक जाएगी!!
हाए!! अब कोई तो देखे मुझे उसकी नजर से, यही सोचकर खुद से उठना है,,
भरकर रोज इन आँखों में,, फिर तुझे मेरी चाहतो का जुर्माना अता करना है!!!
मेरी सुस्ती को अगर तेरी हस्ती की थोड़ी सी भी चुस्ती मिल जाती,,
सच कहता हूँ राधा मेरी,, जन्नत भरी मस्ती इन हस्तो में खिल जाती!!
कल तक जो नजरे तेरे नयन प्रकाश संग जागना चाहती थी,,
हर एक साँस तेरा अमृत सा साथ पाकर आगे बढ़ना चाहती थी!!
मगर आज वही भौर तेरी शोर मचाती नजरो से डरती हैं,,
आज वही राह तेरी आहो की आंधी तले पिछड़ती रहती हैं!!
देख कितना बदला है मेरी नजरो का मंजर तेरे हर सितम के बाद ,,
कल तक जो ओझल होने से डरती थी,,, आज तेरे दर्शन से डरती है!!
मगर इन नजरो में फैला कर अँधेरा,, तेरे इन्तजार का प्रकाश भरना हैं
भरकर रोज इन आँखों में,, फिर तुझे मेरी चाहतो का जुर्माना अता करना है
कहने को तो बस
मेरे दिल ने , तेरे दिल पे
कुछ भरोसे ही तो किए थे
शिकायत भी किस कचहरी करूँ
तेरे आस्मानी वादों की रसीदी टिकट पे
अरमानो के लहू से दस्तखत जो नही किए थे
…… यूई विजय शर्मा
खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन——————-
पता करो कि कहां, किसने जाल फैलाया
सुबह गया था परिन्दा वो घर नहीं आया।
रोशनी में ही चलेगा वो साथ—साथ मेरे
कितना डरता है अंधेरों से ये मेरा साया।
मेरी आहट को सुनके बंद रही जब खिडकी
बडी खामोशी से मैं उसकी गली छोड आया।
धूप में जलते हुए उससे ही देखा न गया
पेड मेरे लिये कुछ नीचे तलक झुक आया।
मुझे पता था कि तूफान यूं न मानेगा
मैं अपनी कश्ती डूबो करके घर चला आया।
खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन
कि डूबा जैसे ही सूरज, तो चांद उग आया।
.———————————————सतीश कसेरा

जिंदगी मेरी जिंदगी से परेशान है
बात इतनी है कि लिबास मेरे रूह से अनजान है
तारीकी है मगर, दिया भी नहीं जला सकते है
क्या करे घर में सब लाक के सामान है
ऐसा नहीं कि कोई नहीं जहान में हमारा यहां
दोस्त है कई मगर, क्या करें नादान है
कोई कुछ जानता नहीं, समझता नहीं कोई यहां
जो लोग करीब है मेरे, दूरियों से अनजान है
घर छोड बैठ गये हैं मैखाने में आकर
कुछ नहीं तो मय के मिलने का इमकान है
ढूढ रहा हूं खुद को, कहीं कभी मिलता नहीं
चेहरे की तो नहीं, मुझे उसके दिल की पहचान है
गुजर जायेगी जिंदगी अब जिंदगी से क्या डरना
जो अब बस पल दो पल की मेहमान है
हम सबकी तरफ से हर-एक अध्यापक-गुरुजन को सादर नमन
हैं पावन दिवस आज, करते हैं हम उनको प्रणाम,
जो ज्ञान की लौ जला कर मन अलौकिक करते रहते।
जन्म दिया माँ–बाप ने और राह दिखलाई हैं सबने,
सबके आशीर्वाद से ही हम हैं आगे बढ़ते रहते॥
जिन्दा रहने का असल अंदाज सिखलाया इन्होने।
ज़िन्दगी हैं ज़िन्दगी के बाद बतलाया इन्होने।
खुद तो तप की अग्नि में जल कर हैं बनते रहते कोयला,
पर जहाँ को कोहिनूर मिला सदा इनकी खानों से ॥
हमने तो माँगा था फल पर दी सदा इन्होंने ‘गुठली’,
अपमान सा हमको लगा पर हो अंकुरित ‘कल्प’ निकली।
उसी वृक्ष की छांव में हम नित्य बनाते बसेरे,
पर उसे ही भूल जाते जो जड़ो में हैं समेटे॥
जन्म दिया माँ बाप ……….
हैं पावन दिवस……….
आज जब देखा खुद को ज्ञान की गलियों में “अंकित”।
विचित्र सी तबीयत खिली पर ख्वाब दिल में पनपे शंकित।
शिक्षा जो पानी की भांति होनी थी सब के लिए पर,
आवश्यक तत्व होने पर भी प्रतिरूप पानी बनाना काल्पनिक॥
शिक्षा बनी व्यापार केंद्र, इसे बेचने सब आपाधाप निकले।
औरो से क्या अरमां रखे जब सरकारी सब के बाप निकले।
आश है, विश्वास हैं, अब आकुल सुंदर-सौरभित सुरभि पर,
तम में ज्ञान-दीप जला कर कमनीय-कीर्ति गौरव गिरिवर निकले॥
जन्म दिया माँ बाप ……….
हैं पवन दिवस……….
सस्वर पाठ:
तो हैं नमन उनको की जो यशकाय को अमृत्व दे कर,
इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गए हैं।
तो हैं नमन उनको जिनके सामने बौना हिमालय,
जो धरा पर रह कर भी आसमानी हो गए हैं।
चला जाता है कोई दूर ,दिल के पास रहता है ,
वही यादें ,वही खुशबू ,वही एहसास रहता है .
फ़कत इतना फरक है प्रेम के इन दो मिलापो में ,
की जब वो दूर होते है तो ग़म ये साथ रहता है ..
…atr
खत को मेरे संभाल के रखा जो होता मीर,
हर हर्फ़ मेरे प्यार की दास्ताँ कहते .
करे अब किस जगह रोशन गुलिश्ता ए जिगर को यार ,
यहाँ तो आशियाँ ही लुट गया है मीर तूफां में .
…atr
मोहब्बत करके पछताने की खुद को यूं सजा दूंगा
तुम्हें यादों में रक्खूंगा मगर दिल से भूला दूंगा।
रहो बेफ्रिक तूफानों तुम्हारा दम भी रखना है
किनारा आने से पहले मैं कश्ती को डूबा दूंगा।
ऐ लंबी और अकेली रातों इतना मत सताओ तुम
मैं सूरज को किसी दिन वक्त से पहले उगा दूंगा।
यूं ही घुट—घुट के रोने की मुझे आदत नहीं यारो
किसी दिन टूट कर बरसूंगा, सब आंसू बहा दूंगा।
कहानी कहने में भी हुनर की होेती जरुरत है
यूं अपना गम सुनाउंगा कि तुम सबको हंसा दूंगा।
जहर मत घोलना नफरत का, तुमको आग से मतलब
मुझे पहले बता देना,मैं अपना घर जला दूंगा।
…………………सतीश कसेरा
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