अँखियों का रंग अँखियों में जो डाल दिया। फिर क्योंकर हाथ गुलाल लिया
अँखियों का रंग अँखियों में जो डाल दिया। फिर क्योंकर हाथ गुलाल लिया
आशा रख वावरी ! वो आऐंगे। तेरे तन मन को रंग जाऐंगे।।
गुलाबी आँखों से यूँ मत देखो इश्क की फुहार से भीगने मत दो मुझे बहुत सर्दी लगी है आज।
होली के रंग में रंग लो ए रंगरेज़ मीठे- मीठे बोल से मन हर लो ए रंगरेज़ ।
रंगों की बाल्टी और गुलालों की झोली। लेके आऐंगे तेरे घर ,मनाने हम होली।।
तिलक पसन्द होली है अपनी आकर तिलक लगा देना। प्रेम पर्व होली है इसको प्यार से सब मना लेना।।
बाल हत्या का ले के विचार ‘ हो गई अग्नि में होलिका सवार। उड़ गई वरदान की चादर अजर रहा बालक प्रह्लाद जल गई होलिका हो तार तार।।
नफरत भरे मन की होलिका न जलाई। तो तुमने क्या खाक होली मनाई।।
जल गई होलिका धू धू करके कैसे आज चौक में। ऐसे हीं जलते हैं दुष्ट भक्त जलाने के शौक में।।
मुद्दतों बाद वह घर आए हैं दिल तोड़ने के बाद पहली बार शहर आए हैं…….
रंग मोहब्बत का ही चढा मुझ पर जो लगाया था किसी रोज़ तुमने अपने हाँथों से ना उतरा है कभी ना उतरेगा
कल मेरे घर रंग लगाने आओगे? फिर हमसे नज़रे चुराने आओगे? मागा था जो तोहफ़ा मैने तुमसे पहले वो ही प्यार तुम कल लौटाने आओगे?
बारीकियाँ होती हैं बहुत हाल-ए-दिल समझना इतना आसान नहीं कुछ इशारों में समझ जाते हैं किसी को जमाने लग जाते हैं
आसमान की चादर में लिपटे अनगिनत सितारे हैं कौमुदी की आँच पर कई अरमाँ सुलग रहे हैं
गुमनाम ना होने देंगे पहचान को अपनी अब छोड़ दिया शौक तुझसे दिल लगाने का ।
उनकी यादों का पीछा करते-करते हम उन तक तो पहुंच जाएंगे पर ये तो बता ए खुदा! उनके दिल तक कैसे जाएंगे।
लगे हैं वह हमसे नजरें चुराने शायद उन्हें अपनी भूल का एहसास है चलो अच्छा है पता तो चला किसी चीज का तो एहसास है मोहब्बत का ना सही, भूल का ही सही।
दिल की बातें बोलती हैं चिट्ठियां राज कितने खोलती हैं चिट्टियां भावों को जीवंत बनाती हैं, आंखों को भिगोती हैं चिट्ठियां
मुड़ कर ना देखेंगे दोबारा रोज़ यही फैसला किया करते हैं पर जब तुम्हारी याद आती है तो हौसले टूट जाते हैं
गिनतियाँ करते हो मुझे याद कितनी बार करते हो हम तुम्हें कितनी दफ़ा ढूंढते हैं अपने आप में कभी ये भी गिन लिया करो ।
चाँद छत पर से मेरे रोज़ यूं गुजरता है जैसे उसे मालूम हो कि उसी के जैसे मेरा यार दिखता है ।
तू मेरी आरज़ू था आरज़ू है और आरज़ू रहेगा । ये दिल कल भी तेरा था तेरा है और तेरा ही रहेगा ।
तमन्ना थी दिल में तुम्हें पाने की पर अफसोस तमन्ना ही रह गई ।
तुम्हारी शिकायत खुदा से करेंगे मेरी आँखों में तुम हमेशा आँसू बन के आये
कितनी दफा मैनें समझाया तुम्हें मुझें मत ठुकराओ मगर तुम ना समझे तुम ना बदले।
रास्ते में चलते हुए कुछ पीछे छोड़ देते हैं लोग । पैसे कमाने के लिए रिश्ते तोड़ देते लोग।
तुम कल मेरे घर आना जानम होली है थोड़ा घूंघट करके आना जानम होली है
तुम कल मेरे घर आना जानम होली है थोड़ा घूंघट करके आना जानम होली है
खुशामदीद आपको बहुत व्यस्त हो आप थोड़ा वक्त हमें भी दे दीजिये इतना भी मशरूफ होना अच्छी बात नहीं साहिब
ज़िन्दगी की आरज़ू में मरते जा रहे हैं लोग पैसे के नाम पर क्या क्या गुनाह किये जा रहे हैं लोग
होलिका दहन में हम वैर भाव जाएंगे। कल निर्मल हृदय से होली हम मनाऐंगे।।
रोज मर्रा की जिंदगी में, बहुत कुछ सीखा हैं हमने, दुनिया में ना जाने कितने हैं रंक, जीवन पर लगा यह कैसा अभिशप्त का कलंक, महेश गुप्ता जौनपुरी
जिसे मैं देख गुनगुनाता हूं जिसे मैं देख मुस्कुराता हूं जिसके आगोश में मैं खो जाता हूं उसका हो कर मदहोश हो जाता हूं उसी का दीदार करके मैं खुद में ही खो जाता हूं […]
वक्त कटता जा रहा है दीये की लौ भी धीमी हो गई आंखों में नींद नहीं चैन नहीं हम क्या करें यही सोंचते रहे ओर सुबह हो गई
हम गरीब सही पर इज़्ज़त की खाते हैं तेरी तरह हम सरेआम मुजरा तो नहीं करते हैं ।
तू नही जानता है मेरे दिल पे क्या गुजरी है एक पथ्थर सीने पे लिये घूमती हूँ मैं
कमी कुछ भी नहीं थी मेरी आँखों में बस यार तेरे पीने-पिलाने का अंदाज़ बदल गया।
ऐतबार करने पर आते कर सकते थे मगर तुम्हें तो शौक था हमको रूसवा कर जाने का
अंज़ाम जो भी हो हम तो आगे बढ़ गए हैं तुम्हें जब से छोड़ दिया हमनें ।
कुछ नाखुश लगते हैं वो हमनें यूं ही कह दिया था एक दिन दोस्त बेवफ़ा होते हैं ।
एक दौर वो भी गुज़रा है मेरी बेखयाली का घण्टों रोते थे किसी को याद करके
मैने कहा…. मैने कहा कुछ भी नहीं उसने बहुत कुछ समझ लिया।
इतनी भी रंजिश ना मान मेरे यार कभी तो मै भी तेरे दिल की मेहमान हुआ करती थी याद कर…
तुम इस इन्तज़ार में बैठे हो हम याद करेंगे तो बता दें साहिब अब ना वो प्यार रहा ना कशिश रही ना तेरी वो दिवानी ही रही।
अब तो दौर-ए -नफ़रत भी गुजर गया साहब मोहब्बत का जमाना तो हमे याद भी नहीं………..
ऐसे ना मुझे तुम देखो तेरी ही दिवानी हूँ हर रात सजाती मै अपनी आंखों में पानी हूँ
सुन्दर हैं तेरी आँखों के फसाने….. रोज़ कुछ सुनाते हैं आंखें बंद हो जाती हैं मगर हम देखते ही रह जाते हैं…….
धानी चूनर ओड़ कर ब्रज में होली खेलूँगी मैं तो अपने श्याम संग राधा बनकर डोलूँगी
सदाकत की नुमाइश लगाना जरूरी है क्या मेरी वफ़ा पर यकीन करना इतना भी मुश्किल नहीं
क्या हुआ हम बेईमानों की बस्ती में है हमने अपना ईमान कहां भेजा है अभी तक।
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