गैरों से क्या करें शिकायत अपनों से ही मिली तिज़ारत रूसवाइयां तेरी साथ लेकर कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत राजेश ‘अरमान’…
गैरों से क्या करें शिकायत अपनों से ही मिली तिज़ारत रूसवाइयां तेरी साथ लेकर कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत राजेश ‘अरमान’…
समझते सब है पर मानता कोई नहीं पहचान सब से है पर जानता कोई नहीं यूँ तो पड़ा हूँ खुली किताब की तरह पढ़े लिखे सब है पर बांचता कोई नहीं […]
हर शख्स बस अपने ही ख्याल बुनता है जिसका जवाब नहीं वही सवाल चुनता है कोई कैसे कहे वो गुमसुम सा क्यों है जिसे भी देखिये अपने ही जाल बुनता है राजेश’अरमान’
चंद मुट्ठी भर तुफान से लड़ेंगे , शायद अंदाज़ा नहीं ,, इन्हें ताकत मोमबत्तियां लिए हजारों हाथ की ….!! …………….~~**#चंद्रहास**~~
हम मर्दों की ख़ास निशानी होती है ,, हसीं चेहरा देखा नहीं की नियत फिसल जानी होती है …………..!! चलते चलते निगाहों में बात बन जाती है ,, कमबख्त ये गलतफ़हमीयां दूर होते ही […]
अहिंसक हो मेरे चित् , अहिंसक हो अनैतिक भाव , क्भी नहीं निर्जीव पे वार , क्भी नहीं
अहिंसक हो मेरे चित् , अहिंसक हो जीव हत्या , क्भी नहीं वनस्पति अपमान , क्भी नहीं
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो सच में तो हैं सब अकेले , फिर भी करते मेले – मेले
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो नही है कोई यहाँ किसी का, ना ही हो तुम भी किसी के
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो ना कोई आने की राह का साथी, ना जाने की राह का कोई नाती
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है तेरे अंतर्मन अपनी जगह बनायी है
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है खुदी ख़ुद में घोल ख़ुद को ही पिलायी है
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है कैद–ए–खुदाई में ना कुंडी है ना पहरा है
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है ख़ुद को ख़ुद में ख़ुद ही क़ैद दिलाई है
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है लाज–शर्म–हया–तेह्ज़ीब इसने भुलाई है
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है जग की बेजड़–सोचें इसने छोडा़ई हैं
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है मन डोर झूम के यूँ तुझमें बंधायी है
माना के यह राह् है कुछ जटिल समाने का मुझमें है इरादा गर अटल तो मुश्क़िल हर पार तूँ कर जाएगा काँटों पे चल समा मुझमें जाएगा
दहक रही है जो आग तुझमें मिलेगा सकून उसे मिल मुझमें सिमटने की मुझमें तेरी बेकरारी है मुझे अपनी ख़ुदाई से भी प्यारी
हूँ मैं जो रौशनी है तूँ भी वही रौशनी हूँ तूँ जो रौशनी है मैं भी वही रौशनी
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी यूई के बुलंद हौंसलों पे दुश्मन भी इतराते हैं
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी सामने मेरे आने से अब तूफान भी घभराते हैं
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी लिया है सीख रुख पलट बाधाओं के हर हाल में जीना हमने
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी लिया है सीख अवरोधों को सर करना हमनें
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी आस्मानी अरमानो के ना थे पंख हमारे, जैसे तुम्हारे
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी आँखों में ना थे सपने रंगीन हमारे, जैसे तुम्हारे
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी बाज़ूओं को ना था कोई सहांरा, जैसा तुम्हारा
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी बचपन ना था बचपन हमारा, जैसा तुम्हारा
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी मजबूरियाँ थी अजब सबकी हमारी, ना जैसी तुम्हारी
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी दीवारें थी कच्ची कमजोर हमारी, ना जैसी तुम्हारी
ज़िन्दगी ना थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी पक्की छत ना थी सर पे हमारी, जैसी तुम्हारी
जो हूँ मैं वह जिंदा रंगों-छंदों मैँ, जो नहीं मैं वह दुनियावी धंधो में
जो हूँ मैं वह हर पल शिल्पकार है, जो नहीं मैं वह मुर्दा बेकार है
जो हूँ मैं वह अन्दर से हूँ सुंदर, जो नहीं मैं वह बाहर हूँ आडंबर
जो हूँ मैं वह है सबका सदा, जो नहीं मैं वह ना किसी का सगा
जो हूँ मैं वह पूर्ण एह्सास हूँ, जो नहीं मैं वह शून्य का वास हूँ
जो हूँ मैं वह तो है मेरे सुकर्म, जो नहीं मैं वह थे मेरे दुष्कर्म जो हूँ मैं वह सबका मीत है, जो नहीं मैं वह ख़ुद का गीत है
जो हूँ मैं वह हूँ हवाओ में, जो नहीं था मैं वह है चिताओ में जो हूँ मैं वह है सब जगह, जो नहीं मैं उसकी ना कोई जगह
जो हूँ मैं वह है स्दीवि यहीं, जो नहीं मैं वह था कभी नहीं जो हूँ मैं बचा वह तो है असल, जो नहीं बचा वह था नकल
पल – पल बदलती–रचती–घटती इस दुनिया मॆं , मन कैसे कहे , तुझे पा ही लिया , है यूई जानता अब , था जो कल , है वोह आज नहीं , है जो आज , […]
पल – पल घटता बहुत कुछ यहां , जो रिश्ते कल बुने , देखा उनका अंत आज यहीं , ख्वाब नये जो देख रहा , होगा उनका भी अंत यहीं
पल – पल रचता यहां कुछ नया , जो था कल तक सच , जिंदा वोह आज नहीं , है लगता जो आज सच , मौत उसकी कल यहीं
पल – पल बदलता सब कुछ यहां , जो कल था तूं , है वोह आज नहीं , है जो आज तूं , होगा वोह कल नहीं
कोई कोना जिस्म का उड़ के बैठा किसी कोने में अब सफर साँसों का गुजरता है कभी जिस्म में कभी, किसी कोने में राजेश’अरमान’
कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे , वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था राजेश’अरमान’
कभी मन करता है फिर से दुनिया को औरों की नज़र से देखूँ शायद मेरी नज़र में कोई भ्रान्ति दोष हो एक बार देखा जब दुनिया को दूसरी नज़र से लगा आँखों पे कोई चाबुक […]
गहरे राज़ छुपे है अपनी ही साँसों में लो तो ठंडी छोड़ों तो गर्म -गर्म राजेश’अरमान’
आँखें तो बस देखती रही ज़िंदगी के आवागमन को राजेश’अरमान’
कोई पुल ऐसा भी होता जिस पर चलते सिर्फ तुम राजेश’अरमान’
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