तेरा सजदा – 51
कोई पल पल तेरे शुक्र में जीता
कोई पल पल शिकायतों में जीता
….. यूई
तेरा सजदा – 51
कोई पल पल तेरे शुक्र में जीता
कोई पल पल शिकायतों में जीता
….. यूई
तेरा सजदा – 50
कोई तेरी ताकत को नमन कर सर झुकाता
कोई अपनी ताकत बढाने को सर झुकाता
….. यूई
तेरा सजदा – 49
कोई जो दिया तूने उसका आभार जताता
कोई जो ना दिया उसकी शिकयात जताता
….. यूई
तेरा सजदा – 48
कोई खुद के लिए तेरे पास है आता
कोई सबके लिए तेरे पास है आता
….. यूई
तेरा सजदा – 47
कोई पल पल तेरा शुकर है मनाता
कोई अगले ही पल तुझे भूल जाता
….. यूई
तेरा सजदा – 46
कोई बोल के तुझको अपने पाप भूलाता
कोई लालच दे तुझे अपने पाप भूलाता
….. यूई
तेरा सजदा – 45
कोई दिल ही दिल में तुझे जपता
कोई बोल बोल मंतर तुझे जपता
….. यूई
तेरा सजदा – 44
कोई तुझे रंग रंग कर धियाता
कोई खुद को रंग कर है धियाता
….. यूई
तेरा सजदा – 43
कोई बाल मुंडवा कर धियाता
कोई बाल बड़ा कर धियाता
….. यूई
तेरा सजदा – 42
कोई तुझे छंदों में धियाता
कोई शब्दों में काम चलाता
….. यूई
तेरा सजदा – 41
कोई पानी में खुद को डूबोता
कोई पानी में तुझको डूबोता
….. यूई
तेरा सजदा – 40
कोई मन्दिर में तुझे सज़ाता
कोई मस्जिद से तुझे बुलाता
….. यूई
तेरा सजदा – 39
कोई घंटी बजा कर तुझे धियाता
कोई ढोल पीट कर तुझे रिझाता
….. यूई
तेरा सजदा – 38
कोई लंबे जीवन के लिए आता
कोई इससे छुटकारा पाने को आता
….. यूई
तेरा सजदा – 37
कोई इस जन्म को तेरे पास है आता
कोई अगले जन्मो के लिए है आता
….. यूई
तेरा सजदा – 36
कोई आशीर्वाद ले कर है धियाता
कोई आशीर्वाद दे कर है धियाता
….. यूई
तेरा सजदा – 35
कोई सफेद कपड़ों में तुझे सज़ाता
कोई बस खुद को ही खूब सज़ाता
….. यूई
तेरा सजदा – 34
कोई अकेले में बैठ तुझे धियाता
कोई भीड़ में नाच तुझे धियाता
….. यूई
तेरा सजदा – 33
कोई सिक्कों से तुझे तुलाता
कोई सिक्कों में खुद तुल जाता
….. यूई
तेरा सजदा – 32
कोई पक्षियों को पूज तुझे धियाता
कोई पक्षियों को मार तुझे रिझाता
….. यूई
तेरा सजदा – 31
कोई ख़ुद को धागे बाँध कर धियाता
कोई तुझको धागों में बाँध धियाता
….. यूई
तेरा सजदा – 30
कोई तुझको सब दे कर खुश होता
कोई तुझसे सब ले कर खुश होता
….. यूई
तेरा सजदा – 29
कोई तरतीब से तुझे धियाता
कोई बिन तरतीब तुझमें समाता
….. यूई
तेरा सजदा – 28
कोई तेरे पास रो कर आता
कोई तेरे से दूर् हो रोता
….. यूई
तेरा सजदा – 27
कोई छप्पन भोग से तुझे रिझाता
कोई अंग अपना काट तुझे चड़ाता
….. यूई
ज़नाब बदल सी गयी है जिन्दगी कुछ यूँ वक्त की दरकार में,
यादों की बहार में, मिलन की दरार में ,और तेरे इन्तजार में,

रात के ख्वाबों में भी उसका सहारा चाहिये, दिन के हर लम्हात में उसका इशारा चाहिये,
हुजूर वो भी इन्सान है शैतान नहीं ,उसकी पलकों को भी तो दरिया का किनारा चाहिये,
मेरा रंग उड़ने लगा है, देखकर ,
रंग बदलना उनका
राजेश’अरमान’
फुर्सत जब से ग़ुम हुई
तन्हाई तब से जुर्म हुई
राजेश’अरमान’
ज़िद कभी न हारने की
वज़ह कभी बनती है हार की
राजेश’अरमान’
इधर आग लगी है बस्तिओं में
उधर जनाब तैर रहे है पानी में
राजेश’अरमान’
दर्द में भी अब मज़ा न रहा
क़ल्ब भी अब पाकीज़ा न रहा
परियों की कहानी पर भी यकीं था,
हक़ीक़त में अब मोज़ेजा न रहा
राजेश’अरमान’
कुछ तो हैरान होगी ज़िंदगी भी
जब हमने अपना मुँह मोड़ लिया
राजेश’अरमान’
कदम रुकने से मंज़िल कुछ और दूर हो जाती है
मुसाफिर की थकन से राह मजबूर हो जाती है
हौसलों की हवा से उड़े है जहाँ के गुब्बारे,
उड़ते गुब्बारों की दुनिया में हस्ती मशहूर हो जाती है
राजेश’अरमान’
कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे ,
वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था
राजेश’अरमान’
डोर रिश्तों की नाज़ुक होती है
कभी फूल ,कभी चाबुक होती है
राजेश’अरमान’
गहरे राज़ छुपे है अपनी ही साँसों में
लो तो ठंडी छोड़ों तो गर्म -गर्म
राजेश’अरमान’
मेरे लफ्ज़ ग़ुलाम बन गए
तेरे लफ़्ज़ों की सरफ़रोशी से
राजेश’अरमान’
तेरे शिकवे कभी न हवा हो सके
मेरे दर्द की तुम कभी न दवा हो सके
कुछ तार बिखरे, कुछ टूट गए
ख्वाब अपने कभी न जवाँ हो सके
राजेश ‘अरमान’
अपनी हर सांस तो बस तेरी चाह में गुजरी
तेरी सारी उम्र जमाने की परवाह में गुजरी
सोचा था कहोगे उदास तुम मेरी खातिर न हो
क्या कहेगा ज़माना ,फिक्र ज़िंदगी की राह में गुजरी
राजेश’अरमान’
पटका तो ,कहीं दूर जा, गिरी ख़ामोशी
अब खामोशियों के टुकड़े चुन रहा हूँ
राजेश’अरमान’
ज़िंदगी की उधेड़बुन
कबूतर गए दाने चुन
राजेश’अरमान’
शरीर आत्मा में लगा कोई दीमक
मन परमात्मा में लगा कोई दीपक
क़र्ज़ सांसों का होता बस शरीर पर
आत्मा बही-खातों में रखा कोई बीजक
राजेश’अरमान’
मर गई आत्मा ,शरीर कहने को ज़िंदा है
पंछी मन का उड़ गया ,आँखों में परिंदा है
राजेश’अरमान’
गम की फसलें सींचता
आँखों की बारिश से
हर ख्वाब ने दम तोडा
अपनी ही गुजारिश से
राजेश’अरमान’
अब मंज़िल मेरे साथ-साथ चलती है
जब से बनाया मंज़िल अपने साये को
राजेश’अरमान’
उसकी नज़रों की तलाशी में
मेरे किरदार बदले से मिले
मैं ढूंढ़ता रहा उसकी आँखों में
चंद कतरे पर जमे से मिलें
राजेश’अरमान’
जरूरत के हिसाब से , खुद से पहचान हुई
कई हिस्से अब भी अजनबी है मेरे अंदर
राजेश’अरमान’
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