वो गलियाँ
February 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी
उन गलियों से आज भी गुजरती हूँ मैं
जिन गलियों से कभी गुजरता था तू
ठहर जाती है नजर वहीं किसी मोड पर
शायद आ जाये तू मुझको नजर
लौट आओ ना तुम अपने शहर
दिल लगता नही मेरा इधर
इन हवाओं मैं लगती है मुझको कमी
सांसों मे जुलती नही अब खुशबू तेरी
याद है आज भी मुझको शहर का वो चौक
जहां देखा था तुझको पहली दफा
वो रंग आज भी पसंदीदा है मेरा
जो पहना था तूने उस रात को
दीदार को तेरे तरस गई अखियां
दीदार को तेरे तरस गई अखियां
आ जाओ लौट के तुम
फिर से अपनी गलियां।