गांव याद आये

“गाँव याद आये”
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हमें क्या पता आज,ये दिन देखना पड़ेगा |
न जाने कैसी मजाक,आज तूने किया है ||

हँसते हुए निकले घर से,भूख मिटाने सभी |
गाँव घर ये आँगन,छोड़ चार पैसा कमाने ||

दूर तलक परदेश,सभी हर कोने-कोने गए |
खेत खलिहान ले याद,बूढ़ी अम्मा की प्यार |

काम की धुन काम करता,कोई चलता गया |
मजबूरी मे हमें आज,मजदूरी दूर करना पड़ा ||

घोर अंधियारा छाए,ये काली रात आज कैसी |
पसंद न आए तुझे हम,मजदूरों की ये मजबूरी ||

बच्चे बिलखतेअम्मा,बोझा लिए नंगे पाँव चली |
बाबुल भूख से कुम्हलाए,जिम्मेदारी लिए हुए ||

पैरो में छाले पड़े है,डगर आज चलते चलते |
नीर को तरसे ये,रोटी बिखरे हुए पथ में पड़ी ||

प्राण गवांते हम पथ में,मंजिल तलाश करते |
रहम कर परवरदिगार,गाँव अब याद आया है ||


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6 Comments

  1. Pragya Shukla - May 19, 2020, 9:40 am

    👏👏

  2. Antariksha Saha - May 19, 2020, 10:10 am

    बहुत खूब भाई

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - May 19, 2020, 10:51 am

    Nice

  4. Panna - May 19, 2020, 1:03 pm

    तत्कालीन परिस्थिति पर बहुत सुंदर कविता

  5. Abhishek kumar - May 19, 2020, 3:14 pm

    👏

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