याद रहे जन दर्द

सत्ता में जाकर जिसे, याद रहे जन दर्द,
वही मिटा सकता यहाँ, धूल और सब गर्द,
धूल और सब गर्द, पड़ी हो जो विकास में,
पहले वो हो साफ, रिआया इसी आस में,
कहे लेखनी सोई, रैयत बिछा के गत्ता,
नजरे इनायत कर, ले उस ओर ओ सत्ता।

Comments

10 responses to “याद रहे जन दर्द”

  1. बहुत शानदार पंक्तियां, छन्द व भाव उत्तम

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी

  2. Geeta kumari

    धूल और सब गर्द, पड़ी हो जो विकास में,
    पहले वो हो साफ, रिआया इसी आस में,
    **********राजा का धर्म समझाती हुई कवि सतीश जी की बहुत सुन्दर और सटीक रचना । छंद बद्ध शैली के विशेषज्ञ कवि सतीश की उत्कृष्ट रचना ,उम्दा लेखन

  3. अतीव सुन्दर

  4. बहुत शानदार कविता

  5. सुन्दर प्रस्तुतीकरण

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