कितनी भी सिढीयां चढ़ लो,
खाने के लिए मेरा है अन्न ।
खुद को महान भले ही समझो,
पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितनी भी सिढीयां चढ़ लो,
खाने के लिए मेरा है अन्न ।
खुद को महान भले ही समझो,
पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा और शिक्षक का नाता है भरा बस्ता,
ज्ञान की बातों में छुपा है कोई रास्ता।
भारी बस्ते से आमदनी है होता,
बचपन के बोझ से उनका नहीं कोई वास्ता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
तन मन की शक्ति आती है योग साधना से,
दिल को चैन आता है भगवान के आराधना से,
योग वेद पुराण का अलौकिक उपहार है,
योग धरा पर ऋषि मुनियों का वरदान है।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
सरकारी बाबू बनकर है बैठे,
गरिब मजदूर से पैसे हैं ऐंठे ।
नमक हलाल से बचाये भगवान,
अफसर के भेष में है दलाल बैठे।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पैसे के लोभ में इंसान खुद को भूल गया,
अफसर के ओहदे में सुख को भूल गया।
चन्द रूपये के लालच में खुद को बेच गया,
नाम बड़ा करने में रिस्तें को तोड़ गया ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
करो योग सुबह और शाम,
रहो निरोग करके व्यायाम।
मन तन की शक्ति परख कर,
जीवन में अपने करो आराम।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पैसे का इमान देता नहीं कभी साथ,
गरिबी अमीरी छोड़ कर मिलाओ हाथ।
अफसर बनकर भगवान तुम नहीं हुए,
सद्भाव गलत कर्मो को माफ करो हे नाथ।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया है,
बादलों के गर्भ में चांद देखो समाया है।
अंधेरे रात में आज चांद रोशनी भूल आया है,
चांद के उजाले को बादल ने अपने आगोश में छिपाया है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
तुम्हारी ये सुनहरी जुल्फें और तुम्हारी याद,
चेहरे की हंसी और दमकता हुआ ये चांद।
मुझे याद बहुत आता है तुम्हारा साथ,
रब से करना मिलने का तुम फरियाद।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
चांद को छिपाकर बादल,
तारों की चमक छिन लिया।
धरा को करके अन्धेरा,
चांद की रोशनी छिन लिया।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
मन तन की शक्ति को पहचान,
भेजो यारों दोस्ती का पैगाम ।
चेहरे की सुंदरता में फंसकर,
ना करो अपना समय बर्बाद।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
चांद को पाना सबके बस की बात नहीं,
चांद को ख्वाब में देखना हसरत की बात है।
चांद का रोशनी रोशन करता है जहां को,
चांद को कैद कर दीदार करना सबके बस की नहीं है।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पैसे का इमान देता नहीं कभी साथ,
गरिबी अमीरी छोड़ कर मिलाओ हाथ।
अफसर बनकर भगवान तुम नहीं हुए,
सद्भाव गलत कर्मो को माफ करो हे नाथ।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
तन मन से करो प्रात: काल योग,
भाग जायेंगे तुम्हारे सारे रोग ।
मन तन दिल खिला खिला रहेगा,
सदियों तक रहोगे तुम निरोग ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
भ्रष्टाचार की पोटली खोल रहें हैं अफसर,
कुछ इमानदारी से कर रहे हैं उजागर।
कुछ टेबल के नीचे से कर रहे हैं पार्सल,
घी रोटी खाकर पेट फुलाये बने पड़े हैं अजगर।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
योग एक अलौकिक छाया है,
दूर करता लोगों का काया है।
रोग दोष को दूर हैं करता,
मन मस्तिष्क को तेज हैं करता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चोर चोर मौसेरे भाई,
नेता अफसर दोनों लिप्त,
एक चुराता एक बचता,
इसी में है दोनों विलुप्त।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता बड़ी निराली,
बच्चों की करती है रखवाली।
एक एक दान चुग कर लाती,
अपने बच्चों को खिलाती।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
सरकार बेचारी फिसड्डी हो गयी,
जनता अब मारी मारी है फिरती।
लगकर लाईन में उम्मीद लगाएं,
कोरोना का प्रकोप इन्हें है डसती।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता पिता का दुलार,
दिखता है पशु पक्षी में भी ।
दाने चुग कर लाती है मां,
भरण पोषण करती बच्चों का भी।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस पर आरोप लगाते,
अपने दुःख दर्द को किसे दिखाते ।
सरकार फिसड्डी बरसों से है,
कब तक हम आवाज उठाते।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
अपनी गलती कब तक हम ठेलेंगे,
विज्ञान के आड़ में कब तक बम फोड़ेंगे।
चुनौतियों से पिछा छुड़ा कर,
अपनी नाकामी से कब तक हम भागेंगे।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितनी भी सिढीयां चढ़ लो,
खाने के लिए मेरा है अन्न ।
खुद को महान भले ही समझो,
पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा और शिक्षक का नाता है भरा बस्ता,
ज्ञान की बातों में छुपा है कोई रास्ता।
भारी बस्ते से आमदनी है होता,
बचपन के बोझ से उनका नहीं कोई वास्ता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
रोटी के निवाले के लिए बचपन अपना खो दिया,
भूख की तड़प से मासूम बेचारा रो दिया।
दिन रात एक करके लगा है देखो पैसा कमाने,
अपने बचपन की सारी खुशियां हंसकर लुटा दिया।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे की लत ने बर्बाद है किया,
हंसते खेलते घर को बर्बाद है किया।
खुशियों का गला घोंटकर देखो,
अपनी मंजिल को ही नजर अंदाज है किया।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे की लत में डूब गया देखो इंसान,
धुम्रपान के चक्कर में हुआ बर्बाद,
एक एक पैसे के लिए हुआ परेशान,
जीवन अपना नशे में किया आजाद।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पेट की भूख छुड़ा दिया,
कापी पेंसिल और चाक।
कारखाने में जिंदगी बीता रहा,
किया उम्र अपना अब राख।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीदों पर बसा है यह संसार,
नशे को देगा हालात सुधार ।
उम्मीद कभी तुम ना हारना,
लौट आयेगा एक दिन भटका यार ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
जन्नत के आश में लगाते है कस,
धुम्रपान करके पाते है नर्क ।
इतना ही समझ होता तो,
क्या रह जाता इनमें और मुझमें फर्क।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बालश्रम के कलंक को,
चलो मिटाये मिलकर हम।
देकर छोटू को विद्या उपहार,
सारे कसक को मिटाये हम।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नशे का व्यापार जो करते है,
लिप्त होता उनका परिवार।
चंद खुशियों के चक्कर में,
बर्बाद हो जाता पुरा परिवार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बच्चें को बचपन तपाना मंजूर था,
मेहनत मजदूरी की रोटी कुबूल था।
शान से जीना शान से मरना मां ने सिखाया था,
इसलिए आत्मसम्मान में रोटी कमाना आसान था।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस से उम्मीद लगा बैठेंगे,
चारों तरफ नशे का जंजाल है।
गली मोहल्ले चौराहों पर,
दुध से ज्यादा नशे का व्यपार है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
उम्मीद और प्रेरणा का हम करते हैं सम्मान,
बाल बचपन का हम करते हैं सम्मान।
भूखे को रोटी खिलाना है मेरा अधिकार,
बचपन को संवारना है मेरा अधिकार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां भारती वीणावादनी ये घाव कैसा है,
शब्दों की झुंझलाहट में फटकार कैसा है।
कण्ड से निकलते झूठ का ये भाव कैसा है,
ज्ञान की देवी मनुष्य का दुर्भाव ये कैसा है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
नारी तुम हो बड़ी बलशाली,
हारना नहीं तुम कभी हालातों से।
लड़ते रहना खुद को साबित करना,
मात ना खाना तुम कभी अपने बातों से।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कौन किया हालात तुम्हारा हे मां वीणावादनी,
शिक्षा के धरोहर ही लगा दिए है दाग मां वीणावादनी।
दृष्ट के कण्ठ,ज्ञान के भण्डार को छीन लो मां भारती,
कमल आसान छोड़कर पापी को सजा दो मां वीणावादनी।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा के आंगन में सौदेबाजी हो रहा,
शिक्षक ही शिक्षा का बोली बखुबी लगा रहा।
मां सरस्वती को तांक पर रखकर,
शिक्षक दिन रात ज्ञान को नीचा दिखा रहा।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
धरा पर जब जब बढ़ता अत्याचार,
नारी धारण करती रूप विकराल।
खुद से करके नारी सोच विचार,
पाप के अन्त के लिए उठाती भाल।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
ज्ञान की दो चार बातें सीखकर इंसान,
मां वीणावादनी का करता दुत्कार ।
सीख पढ़कर शब्दों का वर्ण संसार,
अपने ज्ञान को समझता इंसा महान ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितना भी बना लो शिक्षा को व्यापार,
मां वीणावादनी करेंगी अपने बच्चों पर उपकार।
शीश आशीष ज्ञान का भण्डार मन मस्तिष्क में भरकर,
करती रहेंगी सदैव दृष्ट पापीयों का संहार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा को शिक्षा ही रहने दो,
मां सरस्वती मुझे वर दो ।
सौदेबाज शिक्षकों को दण्डित कर,
हे हंसवाहनी मेरे उर का तम हर दो।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
झूठ फरेब की कलंक से कलंकित होती मां,
कण्ड ज्ञान का भण्डार देकर खाती अब मात।
हिंद के सिपाही थाम लिए अंग्रेजी का हाथ,
दाग लगाकर सरस्वती पर मिट्ठू बनके गाते गान।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
ज्ञान कि देवी सुर कण्ठ वरदायनी,
शत् शत् नमन तुम्हें करें हम सब ।
जीह्वा पर हम सबके करती हो वास,
हे वीणावादनी नमन करें हम सब।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शत् शत् नमन करेंगे गुरूवर,
शिक्षा का वरदान दे दो ।
मां सरस्वती को प्रणाम करके,
विद्या दान का संकल्प हमें दे दो।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
सफलता
सफलता नहीं है कोई वस्तु
सफलता है दृढ संकल्प की अग्नि
सफलता को अगर पाना है तो
सफलता के पीछे दौड़ लगाओ
कमर कसकर समय के संग बढ़ना होगा
आगे ही आगे बस आगे ही बढ़ना होगा
खून पसीने को एक करके
नंगे पांव ही चलना होगा
लक्ष्य को अपने साध कर
बांधाओ को लांघ कर
किस्मत और लकिरों को भूल
मेहनत करके बढ़ना होगा
सफलता अगर पाना है तो
बाधाओं से नहीं घबराना होगा
हार को अपने स्विकार कर
लक्ष्य पर निशाना साधना होगा
संयम रखकर अपने ऊपर
मुश्किल राह को चूमना होगा
दिन रात के परछाई को
उखाड़ दिमाक से फेंकना होगा
निरन्तर करके प्रयास धरा पर
सफलता को कैद करना होगा
आंधी तूफान संग जो बहते
चूमती सफलता कदम है उनकी
©️ महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की लोरी बड़ी सुहाती,
मां की ममता याद दिलाती।
मां अपनी सर्वस्व अर्पण करती,
मां अपने हिस्से की निवाला खिलाती।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता बड़ी सुहानी लगती है सबसे न्यारी ।
बचपन को मेरे सिंच रहीं है बनाकर फूलों की क्यारी,
दुध पिलाकर गले लगाकर पलकों पर है रखती,
गुणगान करें हम कितना धरा पर मां है सबसे प्यारी।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कांप उठे दुश्मन सुनकर नाम महाराणा का,
थर थर कांप उठे देख वीरता महाराणा का।
देश के लिए समर्पित प्राणों का दिया आहुति,
जयकारा लगाओ वीर धरती पुत्र महाराणा का।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
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