NIMISHA SINGHAL's Posts

कलमकार

कलमकार

एक कलमकार ————- जीता है हर किरदार एक कलमकार! जिंदगी की हर कसौटी पर खुद को खुद ही कसता है। उसकी कलम उत्तम लिखे इसीलिए लगातार घिसता है। उसकी लिखी हर कहानी हर गीत श्रोताओं को उसका ही कोई किस्सा लगता है। सौ बार खुद को डुबाता है वो तब कही जाकर खुद की रचनाओं का हिस्सा लगता है। हर किसी को एक कलमकार दिल का मरीज़ एक टूटा हुआ आशिक लगता है किसी गहरे प्रेम से तालुकात रखने वाला बेमुरव्व... »

अच्छे लगते हो तुम मुझको

कमाल हो तुम! कैसे जीते हो तुम? इस जहरीले नशीले अंदाज़ के साथ। कभी आग कभी पानी रोज़ ही लिखते हो एक नई कहानी । पल में तोला पल में माशा मोहब्बत का अक्सर बना देते तमाशा। तीखे तेवरों की पीछे छुपी मघुर मुस्कान, ज्वालामुखी सा गुस्सा अंदर मुलायम सी जान। कभी पकड़ते कभी छोड़ देते हो हाथ, असमंजस सा दिल में आज है कल हो ना हो ये साथ। कितना विरोधाभास है व्यक्तित्व में तुम्हारे??🤔 लगता है हो ! नदी के दो अलग R... »

फिर एक शायर तैयार हो रहा था

वो हंस रही थी मुझ पर मेरा कत्ल हो रहा था। इश्क का जारी फतवा सरेआम हो रहा था। आगोश में जब अपने भर लेना उसको चाहा। वो हर जगह थी दाखिल नज़दीक हो रही थी। अजनबी थी कल जो अज़ीज़ हो रही थी बिना इजाजत दिल के क़रीब हो रही थी। कायल वो कर रही थी घायल वो कर रही थी। निस्बत नहीं कुछ मुझसे फिर भी मदहोश कर रही थी। आजमाइश पे कसा जो खरी उतर रही थी जुस्तजू क्या कर ली! खरीदार बन रही थी। गुमान आ रहा था अरमान छा रहा था... »

बंद किताब

कुरेदने ना देना इस दिल को मेरे। राख तले दबे अरमान, सुलग उठेंगे शोलो की तरह। झांकने ना देना इन आंखों में मेरी। इनमें तुम्हारा अक्स छपा है पहचान लिए जाओगे राधा की आंख में कृष्ण की तरह। पढ़ने ना देना चेहरा मेरा आयते छपी है तेरे मेरे प्यार की चर्चा करेंगे ख्वामखा। खुल जाएंगे सारे राज़ ताजे छपे अखबार की तरह। रहना हमेशा आसपास मेरे खुशबू बनकर वरना झड़ जाएंगे ये फूल बरसो दबी किताब के अचानक खुलने की तरह। स... »

मै और तुम

मै और तुम

तुम भी ना एक राग बन चुके हो जो बजता रहता है …. रेडियो सा मेरे हृदय के सितार से। आनंदित करता रहता है मेरी सात तालों से बंद हृदय कोठरी को। कभी तुम सुगंधित पान से लगते हो जिसका स्वाद ,सुगंध मन को तरोताजा चिरयुवा सा रखता है। और कभी तुम किसी भंवरे के समान महसूस होते हो। जो दिन भर कान में गुनगुन – गुनगुन करके मुझसे अपने हृदय की हर एक बात कहना चाहता है। और कभी तुम सिरफिरे आशिक के सामान लगते ह... »

स्त्री एक शिकार

चिरैया होगी! तुम अपने मां बाबा की। लाडली होगी! तुम अपने भाई और बहन की । समाज के भूखे भेड़ियों के लिए तुम बस एक शिकार हो। इज़्ज़त पर तेरी फिर बन है आई, फिर लड़नी होगी अस्तित्व की लड़ाई। समाज में घूमते हैं हर जगह कसाई, लड़कियां सुरक्षित नहीं मेरे देश की जग हसाई। दरिंदों की बस्ती है इंसानों की तंगी है वहशत बेढंगी है तुझे बनना होगा रणचंडी है। खुद को बना लो तुम अपना हथियार खुद ही को कर हर युद्ध के लिए ... »

अच्छे लगते हो जानम तुम

अच्छे लगते हो मुझको तुम। जब झांकते हो इन आंखों में, गिर पड़ते गहरे सागर में, हम शोखी से भर जाते हैं । अच्छे लगते हो मुझको तुम। जब हंसी ठिठोली करते हो, मुझे देख के आहें भरते हो, आंखों में शरारत भरते हो। अच्छे लगते हो मुझको तुम। जब यूहीं बुद्धू से बन जाते हो, चलते फिरते टकराते हो, नाटक करते घबराने का आहे भर प्यार जताते हो। अच्छे लगते हो मुझको तुम जब पूछते हो मेरा हाथ पकड़, मुझे प्यार करोगी जानेमन? म... »

प्रभु शरण

कृत्रिम सजावट जीने में, आत्मिक सुख तो नहीं ला पाती है। आनंद नाद की प्राप्ति तो प्रभु के चरणों में ही आती है। जब पा जाते खुद में खुद को तब एक कड़ी खुल जाती हैं। सुनो!समझ लो ये तय हैं, प्रभु से मिलने की बारी है। जब नैन तुम्हारे व्याकुल हो! प्रभु मिलन का नीर समाया हो,। तब समझो प्रभु ने बाहें फैला, स्वागत को हाथ बढ़ाया हो। हर चीज में जब मन व्याकुल हो, प्रभु ने खाया कि चिंता हो। तब समझो प्रभु ने जीम लि... »

पूस की रात

पूस की रात ————- कड़कड़ाती सर्दी,सिसकती सी रात ठिठुरन, सिहरन आरंपार। पूस की रात जो हुई बरसात कांप उठी सारी कायनात। ना जाने कब होगी ये प्रातः। ठंड और कोहरे ने गला दिए हाड़ मांस। खून जम चुका है प्रभु से लगी है आस। कांप रहे जन जिनका नहीं है बसेरा कही। शीत से बचने को चिथडो में लिपटे कुछ प्राण है। शीत का प्रकोप जारी ठंड है या कोई महामारी जान पे बनी है कायनात पर पड़ी हैं भारी। एक... »

मित्रता

मित्रता

तुम एक बुत! मैं संभावनाओं से भरा ताबूत। नहीं इरादा तोड़ने का तुमको नहीं इरादा हंसी छीनने का तुम्हारी। बात बस इतनी सी है समझानी मित्र के साथ परम मित्रता है हमें निभानी। तुम समझते हमें , अभिमानी ! बिना हमें जाने ऐसा मन बनाना सरासर नाइंसाफी । आंखों में है नमी ढलक रहा पानी है। तनाव की रेखाएं?? यह तो बेईमानी है। चेहरे पर हंसी लाने की हमने तो ठानी है। कृष्ण सुदामा सी गहरी मित्रता पाने यमुना जी में डूबकि... »

एक स्त्री

एक स्त्री

एक स्त्री! उड़ेल देती है सारा स्नेह खाना बनाने में। सभी की पसंद नापसंद का ध्यान रखते रखते, खुद को क्या पसंद है भूल ही जाती है। एक स्त्री! सबको स्नेह से खिलाने भर से ही तृप्त हो जाती है। एक स्त्री! खाना बनाने में उड़ेलती है प्रेम। सुगंध, स्वाद से भरपूर वह भोज परसने से पहले ही स्नेह की सुगंध से सभी को कर देता है सरोबोर और किसी ना किसी बहाने कुछ खोजते बारी बारी से क्या बना होगा का अंदाज़ा लगाते प्रिय... »

तुम्हारा इन्तज़ार है

तुम्हारा इन्तज़ार है

क्या हुआ? मुड़ क्यू गए? जब आए थे मुझसे मिलने! तो मिले बिना चल क्यों दिए? कुछ खोज रही थी तुम्हारी निगाहे मेरे चेहरे में! बंद आंखों से भी जान लिया मैंने। शायद बिना देखे पहचान लिया मैंने। तुम्हारी रूह से वाकिफ थी मेरी रूह। शायद इसलिए ही पकड़े गए। धड़कनों ने धड़कनों की पहचान कर ली थी। जिस्म जरूर दो थे मगर एक जान कर ली थी। शायद इसीलिए द्रुतगति से चल रही थी सांसे और तुम्हें पता ही नहीं चला कि तुम पकड़े ... »

सरोगेट मदर

सरोगेट मदर( उधार का मातृत्व) जन्म तो दूंगी तुम्हें सहेजकर लेकिन मजबूर हूं देख नहीं पाऊंगी तुम्हें बेचकर। विप्पनतावश हारी हूं परिस्थितियों के आगे बेचारी हूं। मैं अपनी कोख का सौदा करने के लिए मजबूर एक दुखियारी हूं। आत्मग्लानि मेरी आत्मा को कचोटती रहेगी जीवन पर्यंत। झेलूंगी इस दंश को मरने तलक। कुछ मजबूर दंपतियों के लिए मेरा ऐसा करना परोपकार भी है लेकिन परोपकार के लिए अंगारों पर जलना अब मेरी नियति है।... »

एक कलमकार

एक कलमकार

एक कलमकार ————- जीता है हर किरदार एक कलमकार! जिंदगी की हर कसौटी पर खुद को खुद ही कसता है। उसकी कलम उत्तम लिखे इसीलिए लगातार घिसता है। उसकी लिखी हर कहानी हर गीत श्रोताओं को उसका ही कोई किस्सा लगता है। सौ बार खुद को डुबाता है वो तब कही जाकर खुद की रचनाओं का हिस्सा लगता है। हर किसी को एक कलमकार दिल का मरीज़ एक टूटा हुआ आशिक लगता है किसी गहरे प्रेम से तालुकात रखने वाला बेमुरव्व... »

हृदय नाद

हृदय नाद

हृदय नाद ———– आत्ममुग्ध हो कर खुद से प्रेम करो। हंसो! अपने आप पर। सुनो ! धड़कनों के संगीत को। दिशा भ्रमित होकर संगीत लहरिया कहां बह चली? उन्हे रोको ना पीछा करो बहने दो। अपने ही रसिक बनकर देखो। मोहित हो जाओ अपनी बचकानी हरकतों पर। बांध लो! अपने मोहपाश में उन परछाइयों को जो मंडराती रहती है तुम्हारे आसपास । होंठो से स्पर्श करो! उन शब्दों को जो तैरते रहते हवाओं में तुम्हारे बेहद... »

मरहम बन जाओ तुम

मरहम बन जाओ तुम

मरहम बन जाओ तुम ————————— ज़ख्मों को जलाओ तो कुछ उजाला हो। ख़ाक हो जाए हम किनारा हो। घाव की आह में सिसकियां बाकी, मरहम बन जाओ तो सहारा हो । ये दिल था ही नहीं अपना शायद डी.एन.ए जांच लो शायद कहीं तुम्हारा हो। जानें उल्फत ने उलझाया इस कदर गोया ये दिल, दिल ना हो बेचारा हो। यादों का सिलसिला ना हो गर तो कैसे इस उम्र का गुज़ारा हो। लम्हा लम्हा सजीव लग... »

आदि शक्ति

आदि शक्ति

रोज हजारों अफसाने गढ़े जाते तुम्हारे रोने पर… खिलखिलाने पर… नगमे लिखे जाते, तुम्हारे फूल से होंठों के ….मुस्कुराने पर। तुम्हारे मिलन पर, बिछोह पर, प्रेम पर , बेचारगी पर….। हर पल हर कदम हजारों आंखें पड़ी हैं पीछे , तुम्हारी हर अगली उड़ान पर। पूरी की पूरी सृष्टि को है तुमसे सरोकार। तुम हो पूरी सृष्टि के लिए एक चलता फिरता मसालेदार अखबार। हर पल हर घटना …. लगता है तुम्ही स... »

मुझको बहुत नचाया

मुझको बहुत नचाया

छलक- छलक आंखों ने दिल का हाल जताया। गीले-सूखे जज्बातों को फिर आज जगाया। दिल की धड़कन ने मध्यम -मध्यम राग सुनाया। मैं जिंदा हूं! मुझको ऐसा एहसास कराया। एक कप की प्याली ने… … .. लम्हा याद दिलाया। बुझाता बंद होता दिया…. जरा सा फिर चिरचिराया। खट्टी -मीठी अमिया ने फिर कुछ याद दिलाया। उन्मुक्त हंसी का फिर वह जमाना वापस आया । आंखों में बसी आंखों ने इशारों पर जब नचाया। दिल झूम उठा फिर उस... »

खुली किताब

खुली किताब

कहा था तुमसे , किताब ना बनो ! पर नहीं माने तुम। शायद! अच्छा लगता होगा तुमको, किसी के द्वारा पढ़ा जाना। चौराहे पर इश्क लड़ाने का शौक है तुम्हे। जब देखो यहां वहां कबूतर बाजी किया करते हो। दिल नहीं घबराता तुम्हारा, प्रेम का तमाशा बनाने में! प्रेमी युगल तो छुप- छुपके मिलते हैं इधर उधर पर शायद लोगों की निगाह में आ ही जाते हैं। उड़ी उड़ी सी रंगत , खोई खोई सी शक्ल, हैरान-परेशान सी हंसी, चेहरे पर उमड़ता न... »

तेरे जाने के बाद

क्यू है राब्ता मुझसे? दूर चले जाने के बाद। आशिकी का नशा करते हो क्या? दिल जलाने के बाद। क्यों आज भी नजरें चुराकर चुपचाप देखते रहते मुझको ! क्या महसूस करना चाहते हो? तुम सही थे या गलत फैसला सुनाने के बाद। जीना किसी के साथ, मरना किसी के साथ। फिर दिल में क्यों एक कसक का दीया जलाये रखते हो हमारे जाने के बाद। क्यों भूलते नहीं फिर याद ना करने के बाद। क्या दिल के किसी कोने में मैं अब भी जिंदा हूं दफनाने ... »

प्रणय निवेदन

प्रणय निवेदन

ये कैसा जहरीला इश्क है तुम्हारा? लहू में गर्म शीशे सा फैल जाता है। सीने में हलचल मचाकर कर भी भला, खामोशी से कोई गीत गुनगुनाता है। गहरी कत्थई आंखों से मुझ में कुछ ढूंढते से नैन तुम्हारे। धड़कनों की तीव्रता पढ़कर … महसूस करते …. वो कटीले नैन तुम्हारे। मुझे एकटक बिना पलक झपकाए नजरें गड़ा कर देखते, वो अतुल्य नैन तुम्हारे। वो कभी ना खत्म होने वाले नशे के जाम से नशीले वो शराबी नैन तुम्हारे। ... »

ठगिया

ठगिया

ठगिया ——— कहा था ना मैंने ! दूर चले जाना मुझसे, फिर नहीं माने तुम! दिन के उजाले और रातों के अंधेरों में विचरण करते रहते हो खाली- पीली यूं ही दिल में मेरे। ईश्वरप्रदत्त बुद्धि के स्वामी हो, बुद्ध के समान शांत चित्त! फिर दूर खड़े तमाशा क्यों देखते हो मेरी बेचैनी का? तुम्हारी सकारात्मकता बेहद निराली है, तुम्हारे चेहरे पर बसी मधुर मुस्कान मुझ में से कुछ चुरा कर ले जाती हैं। क्या बला ... »

मेरे कालिदास

मेरे कालिदास

गुंजन है धड़कनों में! यह किसके पदचापों की आवाज है? क्या यह तुम हो? मेरे कालिदास! जिन्हें बंद आंखें भी पहचानती हैं। क्यों आए अचानक आज इतने चुपचाप? मेरे मन की आंखें और धड़कनों के कान तुम्हारी हर आहट पहचानते है। मेरे कालिदास! कहा था ना मैंने! जा तो रहे हो, शास्त्री जी बन वापस जरूर आओगे विश्वास है मेरा। और अब की बार जब आओ कभी ना वापस जाने के लिए आना। तुम्हारी आहट सुन रही हूं मैं, विश्वास की जीत का नजा... »

वनिता

हे कांता! कौन सी मिट्टी से बनी हो तुम अपनी इच्छाओं का दमन कर कैसे रह पाती हो हंसती मुस्कराती तुम? वाकई बेमिसाल हो तुम। हे स्त्री! कैसे हर परिस्थिति में खुद को ढाल कर सामंजस्य बिठा पाती हो तुम? सच में कमाल हो तुम। हे कामिनी! शारीरिक और मानसिक सौंदर्य से ओतप्रोत रति! अपने प्रियतम के प्राण हो तुम। हे ललना! वात्सल्य रस का झरना चंदन के समान हो तुम। हे रमनी! झकझोरता हे तेरा सेवा भाव, तेरा क्षमाशील व्यवह... »

हम आंखों में बस देखेंगे

चलो चांद पर चलकर बैठेंगे, कुछ नैन मटक्का खेलेंगे। क्या दिल में है अरमान तेरे! क्या दिल में है अरमान मेरे! तारों की छैयां बैठेंगे, हम आंखों में बस देखेंगे। तुम भी पढ़ना मैं भी देखूं आखिर मेरी क्या चाहत है? तुम खो जाना, तब मैं ढूंढूं ! तुम्हें मेरी कितनी जरूरत है। सिर्फ खेल नहीं, यह जीवन है। इप्पी- दुप्पी तुम समझो ना। शतरंज नहीं ना चौपड़ है, चालो पे चाले चलना ना। दिल को मेरे जो जाती है, वह सीधी सादी... »

वह सांवली सी लड़की

गिट्टू सी लड़की सांवली सी सूरत। लिए घूमती थी ढेर बच्चों की पंगत। कुछ लिए ढपली, कुछ गाते राग। मुंह और हाथों से बजाते थे वो साज। भूखा पेट रोटी की तड़प आवाज थी उनकी दमदार कड़क। गाते ना थकते वह गुदड़ी के लाल। सोचना था काम कैसे होगा? दो वक्त की रोटी का इंतजाम। पटरी पर सोते ये बचपन ये इंसान काश इनका भी जीवन कुछ होता आसान। निमिषा सिंघल »

शिकायतें

आना मिलने बादलों के पार, शिकायतों का पुलिंदा भरा है दिल में मेरे। पिछले और उससे भी पिछले कई जन्मों में जो तुमने कुछ दर्द दिए थे! और मेरे आंसू निकल पड़े थे। उन सब का हिसाब करना है तुमसे। मेरे साथ चलते चलते पीछे मुड़ मुड़ कर खूबसूरत बालाओं को जो तुम चोरी चोरी देखा करते थे और मेरे दिल में एक कसक सी उठती थी। उन सब का हिसाब भी तो करना है तुमसे मुझे। मेरे कुछ लम्हे कुछ खत जो मैंने खर्च किए थे तुम पर! वह... »

देवदास

आधा चांद खिला होगा जिस दिन उस दिन मिलने आऊंगा। अपनी नीलकमल सी आंखों में मेरा इंतजार रखना। मैं चंद्रकांता का वीरेंद्र बनकर आऊंगा। महुआ के पेड़ से पक कर झड़े फूल से तैयार ताजी ताड़ी सी तुम। और मैं पारो के देवदास सा तुम्हारा दास! तुम मेरे लिए पारिजात के फूलों के समान मानसिक सुकून देने वाली औषधि हो। चंपा के समान सुगंधित तुम्हारी देह मेरे मृतप्राय मन में नए प्राण फूकती है। रातरानी के फूल के समान तुम्हा... »

अमोली

कानों में ठूठे लगाए, बहर भट्ट सी! ज्ञान के प्रभाव से आत्मचित्त, मोहक सुवर्णा सी। चेहरे पर कठोर भाव, प्रेम में टूटी शहतीर सी। तापसी! बिन प्राणों के शवास सी। स्वरागिनी! खुद में डूबी आत्ममुग्ध ,स्वप्नली सी। नाकाम थी सारी कोशिशें, उसके आकर्षण से छूट जाने की। शुष्क चेहरा, तीखी निगाहें पता नहीं कहां सीखी थी? ऐसी अदाएं दिल जलाने की। उसकी सुंदरता में डूबते ही उसका व्यक्तित्व उतर जाता था दिल की गहराइयों मे... »

वो मै है थी

एक लम्हा गुजरा मेरे पास से, गुजर गई एक पल में मैं तुम्हारे आसपास से। और तुम जान भी न सके, कि हवा जो तुमको छू कर गई थी! वह मैं ही थी। सिहर उठे थे तुम, और वह सिहरन में ही थी । निमिषा सिंघल »

अद्भुत तुम

तानाशाह से तुम! क्रोध की तीव्रता में कर देते…. सब कुछ हवन। बचपन में झेली गई मानसिक प्रताड़ना, ने बना दिया तुम्हे शिला, ज्यो थीअंदर से नरम। प्यार भी आंखें दिखा- दिखा करते हो, हंसी आती है तुम्हारी इस बनावटी शक्ल और बच्चों सी अक्ल पर। अद्भुत हो तुम अपने आप में, तुम सा बिरला ही कोई होगा इस पूरे ब्रह्मांड में। निमिषा सिंघल »

बैचैन दिल

वह घड़ी बड़ी अजीब थी! आजिज था मन खुद अपने आप से। क्या ना कहा ! क्या ना सुना! अपने आप से। बेचैन था दिल दूर जा रही पदचाप से। धुंधला रहा था वजूद ….. आंसुओं की भाप से। निगाहें थी … कि हट ही नहीं रही थी। भयभीत था दिल एकाकीपन के श्राप से। सीने में थी जलन, आंखों में थे हजारों सवाल, जिन का हल पूछ रही थी मैं अपने आप से। निमिषा सिंघल »

हमें तुम याद आते हैं।

बसावट मेरे दिल में अजनबी तुम क्यों बसाते हो? चलो छोड़ो! बहुत अब हो चुका मिलना, मेरे दिल को अभी भी तुम ठिकाना क्यों बनाते हो? दूर बैठे हो तुम कितने! कि मुझ से मिल नहीं सकते वहीं बैठे निगाहों को निशाना क्यों बनाते हो? समय जब है नहीं तुमको कि आके मिल भी लो एक पल! तो अपनी रूह का पिंजरा नहीं तुम क्यों बनाते हो? क्यों आ जाते बिना मेरी इजाजत रोज मिलने को???? कि दिन ढलता नहीं और हिचकी बन गले पड़ ही जाते ह... »

हमें तुम याद आते हो।

बसावट मेरे दिल में अजनबी तुम क्यों बसाते हो? चलो छोड़ो! बहुत अब हो चुका मिलना, मेरे दिल को अभी भी तुम ठिकाना क्यों बनाते हो? दूर बैठे हो तुम कितने! कि मुझ से मिल नहीं सकते वहीं बैठे निगाहों को निशाना क्यों बनाते हो? समय जब है नहीं तुमको कि आके मिल भी लो एक पल! तो अपनी रूह का पिंजरा नहीं तुम क्यों बनाते हो? क्यों आ जाते बिना मेरी इजाजत रोज मिलने को???? कि दिन ढलता नहीं और हिचकी बन गले पड़ ही जाते ह... »

हमें तुम याद आते हो

बसावट मेरे दिल में अजनबी तुम क्यों बसाते हो? चलो छोड़ो! बहुत अब हो चुका मिलना, मेरे दिल को अभी भी तुम ठिकाना क्यों बनाते हो? दूर बैठे हो तुम कितने! कि मुझ से मिल नहीं सकते वहीं बैठे निगाहों को निशाना क्यों बनाते हो? समय जब है नहीं तुमको कि आके मिल भी लो एक पल! तो अपनी रूह का पिंजरा नहीं तुम क्यों बनाते हो? क्यों आ जाते बिना मेरी इजाजत रोज मिलने को???? कि दिन ढलता नहीं और हिचकी बन गले पड़ ही जाते ह... »

हसीना

सूर्योदय सी केसरी सुनहरी, रश्मिया तुम्हारी सखी सहेली। मोतियों सी जगमग हंसी तुम्हारी, सहस्त्र फूलों के इत्र सी महक तुम्हारी। दिलकश निगाहें होंठ अंगारे, घनघोर घटा सी जुल्फें तुम्हारे। चाल बड़ी मदमस्त नशीली सुंदरता की तुम पैमाइश, मेरे दिल की तुम ही हो फरमाइश। मुझ में तुम क्यों घुलती जा रही हो रूह में मेरी समाती जा रही हो, होश क्यों मेरे गुम हो रहे हैं जेहन पर मेरे तुम छा रही हो। डूबता जा रहा हूं मैं ... »

अजनबी

दिलकशी से तुम मिले!!! निगाहों में अक्स तुम्हारा रोशन क्या हुआ! हजारों चिराग इस दिल में जल उठे। सर चढ़ रहे हो अजनबी हालत क्या बयां करूं हलचल सी मची दिल में तूफान में घिरा हूं खुशबू बिखर रही है रू ह घुल रही है तुम हो या कि मैं? हस्ती पे छा रही हो। निमिषा सिंघल »

जीवन का सच

जीवन मृत्यु सच जीवन का इनसे ना कोई बच पाया है। सब जानते हैं जाना है वहां! जहां परमात्मा का साया है। फिर भी भटके भटके रहते, लालच में हम अटके रहते। नहीं जान सके कि सच क्या है! बस झूठ में हम लटके रहते। जान लो सच इस जीवन का, पहचान लो क्या यह खेल रचा। हम तो कठपुतली भर ही हैं, प्रभु के हाथों में धागा लगा। शतरंज बिछाए बैठे हैं, प्रभु खेल जमाए बैठे हैं, मोहरे है सभी प्राणी जग के, प्रभु हमें नचाए बैठे हैं।... »

आंखों से बरसता नेह

काली कजरारी आंखों से जब मेघ बरसता है आंसू में बह कर वह नेह निकलता है खूबसूरत लगती हो तुम जब पौछती जाती हो दुपट्टे के कोने से उन आंसुओं की धारा बहता सा काजल उजला सा चेहरा कुछ यूं चमकता है जैसे काले बादलों से चांद निकल आया तुम्हें देख कर लगता है मुझे सावन की उजली खिली खिली धूप का तुम साया। निमिषा सिंघल »

फितरत

फितरत किसी इंसान की बदलती नहीं जनाब। चाहे जिंदगी में आ पड़े कितने भी अजाब। बचपन की आदतें समाई होती हैं इस कदर, बदला यदि खुद को तो नया इंसान ले जन्म। बचपन सुधारा जिसने वही इंसान बन पाया, वरना संसार में जीना तो कीड़े मकोड़ों ने भी पाया। निमिषा सिंघल »

किताबें

किताबें दोस्त थी मेरी, दुख सुख की साथी, अकेलेपन में किसी की कमी ना खलने देने वाली, हंसती मुस्कुराती। मुझे जहां भी कोई किताब मिल जाती मेरे पुस्तकालय में सुशोभित हो जाती। इंटरनेट ने तो कहीं का ना छोड़ा लोगों ने किसानों से नाता ही तोड़ा। सूनी पड़ी रहती पुस्तकालय एक बटन दबाते ही फोन में सब कुछ आ जाता। पर किताबें हमसे बहुत कुछ कहती हैं जो यह फोन नहीं कह पाता। निमिषा सिंघल »

आत्मा का परमात्मा से मिलन

पार्थिव शरीर विह्वल हुए लोग शांत चेहरों में वेदना समाई है हसती खेलती कोई पुण्यात्मा परमात्मा से मिलने को आज अकुलाई है चार दिन का साथ छोड़ आज ऐसे जा रही मुसाफिर खाने से छूटकर मायके को जा रही बिलखते हैं भाई बंधु रोते परिवार हैं रोकने पर जोर नहीं दुख आर पार है बात बात पर तुम्हें याद किया जाएगा अच्छाइयों की बात हो तो तुम्हें पुकारा जाएगा जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति को यही आस्था मोक्ष की हो प्राप्ति ... »

सुरूर

आंखों के सामने छा जाता है तुम्हारा सुरूर मुझे खुद पर ही होने लगता है गुरूर नींद भी अपना रास्ता भूल जाती है जब याद मुझे तुम्हारी इस कदर आती है कुछ यादें कुछ मीठी बाते अठखेलियां करने निकल पड़ती हैं जब ख्वाबों में तुम गलबईया डाले मुस्कुराते हो। निमिषा सिंघल »

अद्भुत एहसास

मेरा मन विचलित था विह्वल था, कान्हा ने मुझे उबार लिया। अपना अद्भुत सा साथ दिया, भटकन को मेरी वही थाम लिया। मेरे अंतःकरण की शुद्धि की, मुझे बीच भंवर से निकाल लिया। कैसा अद्भुत था कान्हा से मिलन, मुझे खुद से ही हो उठी जलन हो कृष्ण मगन मैं नाचू रे जहां भी देखूं वहां कान्हा हैं मैं तो पी की बतियां बाचू रे! निमिषा सिंघल »

आधुनिक मधुबाला

आधुनिक मधुबाला

चिंतामणि सी अकुलाती हो मुझ में क्या अद्भुत पाती हो? चंचल मृगनयनी सी आंखों से क्या मुझ में ढूंढा करती हो? चंद्रमुखी सी हंसी हंस-हंसकर अंतरात्मा को चहकाती हो। नहीं भान जरा नहीं मान जरा मदिरा का छलका प्याला हो हो सभी कलाओं में परिपूर्ण, तुम आधुनिक मधुबाला हो। मैं एकटक देखें जाता हूं नैनो को हिला भी ना पाता हूं। है रूप तेरा कुछ ऐसा कि मैं तुझ में डूबा जाता हूं निमिषा सिंघल »

अजनबी हसीना

कुछ अलग सी पगली हो तुम! नैन लड़ाती हो कुछ कहना भी चाहती हो बस मुस्कुरा कर ही रह जाती हो। मेरे इशारों में उलझ कर घबरा जाती हो जैसे गिर ही पड़ोगी मेरे जरा सुनिए ! कहते ही तुम्हारा हृदय साज सा बज उठा ऐसा महसूस हुआ मुझे। जैसे कोई तार जोर से खींचो तो झनझना उठता है। तुम्हारी उखड़ती सांसे लड़खड़ाते कदम कुछ ना कहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं। और पैर मुड़ जाने पर लंगड़ाती सी तुम मुझसे दूर भाग जाना चाहती हो। द... »

कद्र करो मां बाप की

तिनका तिनका जोड़ -जोड़ कर, चिड़िया नीड़ बनाती है। छोटे-छोटे बच्चों को ऊंची उड़ान सिखाती है। एक दिन नीड छोड़कर बच्चे दूर गगन उड़ जाते हैं, मां-बाप का कलेजा क टता है वह याद बहुत ही आते हैं। वैसे ही इंसान यहां बच्चों का पालन करता है। छोटी-छोटी जिद भी पूरी करने की कोशिश करता है। लाड प्यार से पाल पोस कर सही दिशा दिखलाता है। ऊंची उड़ान सीखते ही हर बच्चा फिर उड़ जाता है। सूनी अखियां राह निहारे, आ जाओ बूढ... »

अद्भुत कृष्णा

श्याम रंग विराट ललाट, लाल तिलक सोहे मुख भाल। तिरछी नजर कान्हा जब डालें, गोपियों के दिल भये मतवाले। कान्हा कान्हा रटते रटते, गोपियों ने सुध बिसराई थी। कान्हा के संग रास रचाने, सभी गोपियां रोई थी। भावों से वो विह्ववल थी, कृष्ण के रंग में डूबी थी। कृष्णा सब के संग नाच रहे, नृत्य से समां सब बांध रहे। मतवाली होकर गोपियां सभी, मोक्ष मार्ग पर नाच रही। कैसी अद्भुत यह लीला थी कैसा था इनका मधुर मिलन, सब कान... »

कालचक्र

समय कभी ना ठहरा था ना ठहरा है ना ठहरेगा। वह तो कालचक्र का पहिया है, दिन-रात धुरी पर घूमेगा। समय के साथ चलकर ही इंसान उन्नति पाता है। जो समय के साथ नहीं चलता, वह बाद में फिर पछताता है। समय बड़ा बलवान हर घाव को भरता जाता है। परिवर्तन ही सृष्टि का नियम, उससे आगे ना कोई जाता है। निमिषा सिंघल »

संस्कार हीन इंसान नहीं

अनपढ़ हैं वह सब पढ़े लिखे, पढ़नेका मर्म जो जाने नहीं। जो अभिमानी है दंभी हैं, वे निपट गवार अज्ञानी है। कर्मों में यदि सुधार नहीं, तो कैसा तुम्हारा पढ़ना था। संस्कार हीन इंसान नहीं जीवन को करो ना बेकार यूं ही तुमसे बेहतर वो पक्षी है क्रमवार कहीं भी उड़ते हैं। मनुष्य लगा आपाधापी में, जानवर भी क्रम में चलते हैं। भगवान ने दी है बुद्धि बहुत, करो उसका इस्तेमाल सही। कुछ अच्छे कर्म करो जग में कुछ तो बने प... »

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