Author: Ramesh Singh

  • ख़ुद पर यक़ीन नहीं रहा आज से।

    ख़ुद पर यक़ीन नहीं रहा आज से।
    अब धोख़ा ही मिला इस अंदाज़ से।।
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  • सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं”

    सच है की इक उम्र से चल रहा हूँ मैं।
    पता नहीं कब से यूँ ही जल रहा हूँ मैं।।
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    तुमसे मिलने की ख्वाहिशें दम तोड़ चुकी।
    फिर भी हर दिन घर से निकल रहा हूँ मैं।।
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    मौसम मिज़ाजी हवाओ सी फितरत वाले।
    तुमने कहा भी कैसे की बदल रहा हूँ मैं।।
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    ऐतबार करने का सिला ही हमको मिला है।
    ऐसी चोट लगी आज तक संभल रहा हूँ मैं।।
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    दरिया समंदर तूफान क्या क्या नहीं देखा।
    एक हौसले की कश्ती थी जो चल रहा हूँ मैं।।
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    साहिल उम्र भर किया है कैसा सफ़र हमने।
    मौत आई फिर से सफ़र पे निकल रहा हूँ मैं।।
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  • मेरी ज़िंदगी का मैं ही हिस्सा नहीं था

    मेरी ज़िंदगी का मैं ही हिस्सा नहीं था।
    मुझे भूल जाओ मैं कोई किस्सा नहीं था।।
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    मुझ पर इलजाम लगाकर के जाने वाला।
    क्या कहूँ शख्स वो भी मुझ सा नही था।।
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    क़िस्मत के आगें कौन क्या कर सकता था।
    मिला हैं वो किसको की जिसका नहीं था।।
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    इस तन्हाई की वज़ह ये भी हो सकती है की।
    मिले बहुत लोग मगर कोई तुझसा नहीं था।।
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    कल अचानक मुलाक़ात हो गई थी राहों में।
    शख़्स कुछ बोला नहीं पर चुप सा नहीं था।।
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    ताउम्र कहते रहें की पढ़ लेते है चेहरे हम भी।
    पर जैसा पढ़ा था चेहरा साहिल वैसा नहीं था।।
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  • जिंदगी हौंसला जब टूटकर चूर हो जाए

    जिंदगी हौंसला जब टूटकर चूर हो जाए।
    शख़्स कैसे न यहाँ कोई मजबूर हो जाए।।

    जिंदा रहूँगा आखिर कब तक इस दुनिया में।
    जब दिलो की धड़कन ही दिलो से दूर हो जाए।।
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    और सच का मुखौटा पहनकर झूठ बोलतें हो।
    ख़ामोश ही रहना जब मय का सुरूर हो जाए।।

    फ़रेब करने की अपनी फ़ितरत बदल डालो।
    वरना कही ज़माने भर का न ये दस्तूर हो जाए।।
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    रंज नहीं की कौन खतावार था सजा किसको।
    अफ़सोस की सच बोलना जब कसूर हो जाए।।

    वफ़ा का सिला कुछ इस क़द्र मिला की क्या कहे।
    साहिल कोई दौलत के नशे में जब मगरूर हो जाए।।
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  • वक्त आया तो तुमको भी जान लिया मैंने।

    वक्त आया तो तुमको भी जान लिया मैंने।
    झूठ पे झूठ झूठ पे झूठ चलो मान लिया मैंने।।
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  • जो रूठा ही नहीं है उसे मनाये कैसे।

    जो रूठा ही नहीं है उसे मनाये कैसे।
    तुम्हें जिंदगी लिखा था मिटाए कैसे।।
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  • आँखों से छलक जाएं वो आँसू नही है हम

    आँखों से छलक जाएं वो आँसू नही है हम।
    मगर ऐसा भी नहीं है की रोएँ नहीं है हम।।
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  • दरिया को हमेशा समंदर की चाहत है।

    दरिया को हमेशा समंदर की चाहत है।
    नर्म लहज़ा नर्म बातें समझों सियासत है।
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    मेरी जिंदगी की दुआ करने वालों शक्रिया।
    मुझे तो हर रोज़ मर जाने की आदत है।।
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    ख़तावार ही सीखा गए सलीका ए जिंदगी।
    सुने की पास उनके अभी नई नई ताक़त है।।
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    सच की जुबान मीठी लगें तो हामी भर दो।
    वरना जो भी कहूँगा कहोंगे सब खिलाफत है।।
    ,
    हर जिंदगी हर जिंदगी से रूबरू नहीं होती।
    अब कहाँ रियायत है और कहाँ शराफत है।।
    ,
    अबके जो मिलना तो बहुत सोंच समझकर।
    साहिल हम पर भी बहुतों की नज़रे इनायत है।।
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  • “जिंदगी जिंदगी जिंदगी जिंदगी”

    जिंदगी जिंदगी जिंदगी जिंदगी।
    बेबसी बेबसी बेबसी बेबसी।।
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    ख्वाहिशे ख्वाहिशें ख्वाहिशे ख्वाहिशे।
    कुछ नहीं कुछ नहीं कुछ नहीं कुछ नहीं।।
    ,
    काफिले काफिले काफिले काफिले।
    हम नहीं हम नहीं हम नहीं हम नहीं।।
    ,
    मंजिलो से फासले मंजिलोे से फासले।
    गम नहीं गम नहीं गम नहीं गम नहीं।।
    ,
    ख्वाब ही ख्वाब है ख्वाब ही ख्वाब है।
    हर जगह हर पहर हर घडी हर घडी।।
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    रातो में काँपना काँपना जागना जागना।
    थी भूख भी ठंड भी मुफलिसी मुफलिसी।।
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    क्या तुम्हे सोचना सोचना सोचना सोचना।
    अजनबी अजनबी हम तो थे अजनबी।।
    ,
    क्यों बारिशें बारिशें बारिशें हर जगह।
    तुमको पानी लगा अश्को की है नदी।।
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    थक गई है कलम थक गई है कलम।
    सिलसिला है लफ्ज का आखिरी आखिरी।।
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  • आखिर आग से खेलकर अंजाम क्या हुआ।

    आखिर आग से खेलकर अंजाम क्या हुआ।
    हम तो जले है पर तुम्हारा मकान क्या हुआ।।
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  • सजायाफ्ता हूँ मैं उस जुर्म का साहिल। जिसे किया किसी ने और जिया किसी ने।।

    सजायाफ्ता हूँ मैं उस जुर्म का साहिल।
    जिसे किया किसी ने और जिया किसी ने।।

  • “इक दास्ताँ अधूरी तुमको सुनाए कैसे”

    इक दास्ताँ अधूरी तुमको सुनायें कैसे।
    गिरती हुई दीवारे फिर से उठाए कैसे।।
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    जैसे पढ़ी थी दुनिया वैसी नहीं हक़ीक़त।
    सच जो है मैंने जाना खुद को बताएँ कैसे।।
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    हर हर्फ़ में हमारी क्यूँ तेरी यादें बह रही है।
    हम छिप रहें है खुद से तुमको बुलाएं कैसे।।
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    ऐतबार करना मुश्किल है मौसमी अदा का।
    कट जाती है पतंगे हम उनको उड़ाए कैसे।।
    ,
    रफ़्तार जिंदगी की बहुत ही तेज़ हो गई है।
    हम ही नहीं है काबिल तुम्हें आजमाएं कैसे।।
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    तन्हा मेरा सफर है न मंजिल है न किनारा।
    साहिल कश्ती है भवँर में साहिल पे जाएं कैसे।।
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  • ये बात मेरे भी जहन में है।

    ये बात मेरे भी जहन में है।
    की जेब कहा कफ़न में हैं।।
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  • बेवफ़ाई समझी नहीं वफ़ा वफ़ा करने लगे।

    बेवफ़ाई समझी नहीं वफ़ा वफ़ा करने लगे।
    जरा सी चोट खाई नही दवा दवा करने लगे।।
    ,
    नासमझ हो तुमने काँटे है जंगल पे जंगल।
    अब जब साँस रुकी है तो हवा हवा करने लगें।।
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    पुरानी दस्तानो इस कद्र न याद आया करों।
    की जख्म अपना कोई खुद हरा हरा करने लगें।।
    ,
    तुमको समझें थे हम तुमको समझते रह गए।
    हम बोलों भी तो क्या तुम खता खता करने लगे।।
    ,
    हममें है बुराई की हक़ीक़त ए जिंदगी कह देते है।
    तुम क्या आये की ख्वाबो का धुँआ धुँआ करने लगे।।
    ,
    फ़रेबियो की हिम्मत देख जब डर लगने लगा है।
    साहिल आसमाँ को देखकर खुदा खुदा करने लगें।।
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  • हल्की हल्की सी हवा जो ये बह रही है।

    हल्की हल्की सी हवा जो ये बह रही है।
    न जानें क्या है जो ये मुझसे कह रही है।।
    ,
    तन्हाइयों को देखा है मैंने रोते हुए अक्सर।
    सब मेहफिलो का दर्द है जो वो सह रही है।।
    ,
    तुम्हारे होने का बस इतना सा एहसास है हमें।
    की बिना चाँद के ही रोशनी बिखर रही है।।
    ,
    ता उम्र हम जीते रहे है इक वहम के साथ में।
    बर्बाद होते रहें तो लगा की जिंदगी सुधर रही है।।
    ,
    मेरा होना न होना किसके लिए मायने रखता है।
    वो तो मुकर गया अब मेरी साँसे मुकर रही है।।
    ,
    साहिल खुद को जो सैलाब ए बला समझतें है।
    हमसे ज़रा मुखातींब तो हो क्यूँ डर रही है।।
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  • जब जब मैं बेबाक हुआ हूँ।

    जब जब मैं बेबाक हुआ हूँ।
    तब तब मैं मजाक हुआ हूँ।।
    ,
    बेगुनाह होके सज़ा काटी है मैंने।
    तब जाके कही इंसाफ हुआ हूँ।।
    ,
    गवाह है मेरा जलता हुआ मकान।
    की ज़िन्दा था मैं जो राख हुआ हूँ।।
    ,
    मेरी रवादारी पे सवाल करने वालो।
    मैं तुम्हारे गुनाहों का हिसाब हुआ हूँ।।
    ,
    माना की कुछ नहीं हूँ नजरों में तुम्हारे।
    इक शायरी था मैं जो किताब हुआ हूँ।।
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  • मोहब्बत के बदलें मोहब्बत नहीं है।

    मोहब्बत के बदलें मोहब्बत नहीं है।
    हक़ीक़त के बदले हक़ीक़त नहीं है।।
    ,
    बहुत मर्तबा हम भी उलझें थे भँवर में।
    पहले सी अपनी अब तबियत नहीं है।।
    ,
    सुबह शाम मेरी थे जो फ़िक्र करने वाले।
    अब जुबाँ पे उन्हीं के हिदायत नहीं है।।
    ,
    मुझे तुम पढ़ो जो गिला कुछ न करना।
    तज़ुर्बा है ये सब कोई शिकायत नहीं है।।
    ,
    दिलों से कभी तुम किसी के न खेलों।
    ये टूटे अगर जो कही भी मरम्मत नहीं है।।
    ,
    सफर में है साहिल तुफानों से कह दो।
    वो रोकेंगे हमकों ऐसी जुर्रत नहीं है।।
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  • मेरी ये जिंदगी सारी वतन के नाम लिख देना।

    मेरी ये जिंदगी सारी वतन के
    नाम लिख देना।
    कि है जिनकी वजह से हम उन्हें
    सम्मान लिख देना।।
    ,
    मैं कुछ भी हूँ नहीं इसके बिना न
    पहचान है मेरी।
    कोई पूँछे मेरा मजहब तो हिन्दुस्तान
    लिख देना।।
    @@@@RK@@@@

  • ख़ुद को तेरे नाम पे करने से पहले।

    ख़ुद को तेरे नाम पे करने से पहले।
    जिंदा तो हम भी थे मरने से पहले।।
    ,
    ये क्या जरा सी हवा हिला गई हमें।
    चलों समेट लूँ खुद को बिखरने से पहले।।
    ,
    फितरत उसकी समझना नामुमकिन है।
    जो देता है नए जख़्म पुराने भरने से पहले।।
    ,
    हर एक बात पे तेरे ऐतबार भी लाजिम है।
    क्यूँ देखते हो ऐसे हमें गुजरने से पहले।।
    ,
    कागज़ से दोस्ती पानी की कब तलक है।
    साहिल समझों बादलों के बरसने से पहले।।
    @@@@RK@@@@

  • खुद को ही खुद से मैंने जुदा कर दिया।

    खुद को ही खुद से मैंने जुदा कर दिया।
    इक इंसान था जिसे हमने खुदा कर दिया।।
    ,
    मुक़म्मल होने में लगे थे हमको कई साल।
    मगर तुमने मुझे पल भर में धुंआ कर दिया।।
    ,
    जिंदगी मेरी तजुर्बो से आसान कहाँ हुई थी।
    मुझे तो बस चंद मुश्किलो ने रवां कर दिया।।
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    इक इक लम्हा गुजरा है हम पर सदियो सा।
    मुलाकातों के नाम पे बस तुमने दुआ कर दिया।।
    ,
    अश्क़ जब पूँछते है अपने बेअसर होने का सबब।
    फिर क्या कहें की खुद को कहाँ से कहाँ कर दिया।।
    ,
    इक सच है हमारा रातों को यूँ ही जागते रहना।
    पर ऐसा भी नहीं की हमने नींदों को मना कर दिया।।
    ,
    साहिल जवाब ढूंढ़ने में यूँ ही दर ब दर होते रहें।
    ज़िन्दगी से जिंदगी को पूँछा क्या गुनाह कर दिया।।
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  • तुमसे दूर होकर भी ज़िन्दा हूँ मैं।

    तुमसे दूर होकर भी ज़िन्दा हूँ मैं।
    बस इतनी सी बात पे शर्मिंदा हूँ मैं।।
    ,
    ख़्वाहिशों की दुनियां में जाना तो था।
    पर जो उड़ न पाया वो परिंदा हूँ मैं।।
    ,
    ज़िन्दगी गुजारी है इक उम्मीद पे मैंने।
    हाँ वीरान शहर का अकेला बासिन्दा हूँ मैं।
    ,
    वैसे तो मेरी कोई हस्ती नहीं मानता हूँ।
    पर खुद के लिए शख़्स कोई चुनिंदा हूँ मैं।।
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    उम्र भर रहा मगर एक हौसला साहिल।
    की इक मुलाक़ात तो कोई आइन्दा हूँ मैं।।
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  • जब कभी भी तुमको पुकारा है हमने।

    जब कभी भी तुमको पुकारा है हमने।
    बस इक मीठे से दर्द को उभारा है हमने।।
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    सूनसान राहों पर हुई हो जो कोई आहट।
    तो वही उम्मीद वही चेहरा निहारा है हमने।।
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    मेरी मौत का ज़िम्मेदार मैं ख़ुद हूँ सच है ये।
    की खुद को जिन्दा रख रख के मारा है हमने।।
    ,
    हक़ीक़त से जब भी आँखें मेरी चार हुई है।
    फिर गलतियों को सौ बार संवारा है हमने।।
    ,
    साहिल मुमकिन नही की चाँद तक जा सके।
    पर कइयों बार चाँद को ज़मी पे उतारा है हमने।।
    @@@@RK@@@@

  • जब जब तेरी याद आई है,

    जब जब तेरी याद आई है,
    मैंने खुद को समझाया है।।
    बीते जीवन के लमहो में,
    तुमको ही बस पाया है।
    रह गया अकेला इस जीवन में,
    क्यू तूने मुझे भुलाया है।

    जब जब तेरी याद आई है।
    मैंने खुद को समझाया है।।

    जब मैं होता था तनहापन में,
    तेरी राहो को तकता था।
    तेरे सहारे ही जीवन के,
    हर तूफानो से लड़ता था।

    जीवन के सुलझे धागों को,
    क्या मैंने ही उलझाया है।

    जब जब तेरी याद आई है,
    मैंने खुद को समझाया है।

    मिलने की ख्वाहिश में मुझसे,
    जब तू खाली सा होता था।
    मेरे पास तुझसे मिलने का,
    समय न कयू तब होता था।

    अब मिलने की ख्वाहिश मेरी है,
    पर तुमने खुद को मजबूर बताया है।।

    जब जब तेरी याद आई है।
    मैंने खुद को समझाया है।।
    @@@@RK@@@@

  • बहते ही रहते है हम हवाओं की तरह।

    बहते ही रहते है हम हवाओं की तरह।
    मगर बदलेंगे नही कभी अदाओं की तरह।।
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    कल अचानक ही मौसम बदल गया था ऐसे।
    जैसे वो मिला हो हमें कही घटाओं की तरह।
    ,
    पहली बार चले तो गिरे उलझ उलझकर।
    अब बहते है पहाडों में दरियाओं की तरह।।
    ,
    ज़िंदगी भर कहते रहे हम महफिल महफिल।
    जबकि तन्हाई का असर था दवाओं की तरह।।
    ,
    इक बात कहे हमनें खुद से भी फरेब किया था।
    बद्दुवाओं को भी कबूल किया दुवाओं की तरह।।
    ,
    हमारे हालातों पर सवालातो का दौर चलने दो।
    साहिल बिखेरेंगे रोशनी जलती शम्माओ की तरह।।
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  • इक शाम हूँ ख़मोशी की आवाज हूँ मैं।

    इक शाम हूँ ख़मोशी की आवाज हूँ मैं।
    मैं इक समंदर हूँ समझो बेहिसाब हूँ मैं।।

    सुनो उम्र भर मुझसे रूठकर रहने वाले।
    कहते हो सबसे,की तुमसे नाराज हूँ मैं।।

    इक शहर था मैं जिसके बासिन्दे नहीं है।
    फिर क्या कहूँ खुद से की,आबाद हूँ मैं।।

    मुफलिसी से घिरती है जब जिंदगी कोई।
    न जगाओ नींद से,रोटी वाला ख्वाब हूँ मैं।।

    मेरे लफ्जो को पढ़ने की फुरसत तुम्हें नहीं।
    माना की मैं कल रहूँ न रहूँ,पर आज हूँ मैं।।

    तमाम मुश्किलो से गुजरी है जिंदगी मेरी भी।
    सबका नहीं पर कुछ सवालों का जवाब हूँ मैं।।

    खुद को तुम कहा कहा ढूंढ रहे हो साहिल ।
    इक अधूरे पन्ने हो,न कहो की किताब हूँ मैं।।
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  • दर्द ऐसे भी अपने कोई संभाला करता है।

    दर्द ऐसे भी अपने कोई संभाला
    करता है।
    जैसे चराग जलता है मगर उजाला
    करता हैं।।

    सफर करने निकले थे कुछ रोशनी
    को लेकर।
    पर ये तूफान है कि हर वक्त दम
    निकाला करता हैं।।
    ,
    दिन गुजरता हैं जिसका बस सूखी
    रोटी की लिए।
    अफसोस हैं कि वो ख्वाबो में एक
    निवाला करता हैं।।
    ,
    जिक्र उसका भी था मेरे बिखरे हुए
    कुछ पन्नों पर।
    कि जो कागज के खेलों मे उसे उछाला
    करता हैं।।

    और क्यूँ आए भी चाँद वो जब जमीन
    का तो नहीं हैं।
    फिर भी बेवजह ही ख्वाब कोई पाला
    करता हैं।।
    @@@@RK@@@@

  • जिंदगी में यहा सबका कोई हमदर्द नहीं होता!

    जिंदगी में यहा सबका कोई हमदर्द नहीं होता!
    गमों से कहना हो कह दो हमें अब दर्द नहीं होता!!

    की मौसम भी बदला है हवाएँ भी अब भी ठंडी है!
    मगर जहाँ पर बर्फ गिरती थी वहां अब सर्द नहीं होता!!

    तेरे मिलने के वादो की कई किस्ते जो बाकी है।
    उन्हें मिलकर पूरा कर दो कि अच्छा कर्ज नहीं होता।।

    हरदम ही तनहा तनहा हो किसकी याद मे साहिल।
    उसे तुम सोचतें हो क्यों की जिसको फर्क नहीं होता।।
    @@@@RK@@@@

  • भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती।

    भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती।
    माँ के पास कहानियों के सिवा कुछ न था।
    @@@@RK@@@@

  • ज़िन्दगी से क्या कहे आसान हो जाओ।

    ज़िन्दगी से क्या कहे आसान हो जाओ।
    खामियां खुद में है साहिल क़बूल करते है।।
    @@@@RK@@@@

  • खुद को उम्र भर अख़बार किया मैंने।

    खुद को उम्र भर अख़बार किया मैंने।
    और वहम भी है की शायरी करते है।।
    @@@@RK@@@

  • सच में अगर हमकों अपना मानते हो तुम।

    सच में अगर हमकों अपना मानते हो तुम।
    फिर क्या कहे हाल ए दिल तो जानते हो तुम।।
    @@@@RK@@@@

  • मासूम चेहरे जो कभी,गुनाह नहीं करते।

    मासूम चेहरे जो कभी,गुनाह नहीं करते।
    हम यूँ जाग के रातो को,सुबह नही करते।।
    ,
    हममें है लाख कमियां,चलो हम मानते है।
    पर दिल से कहना,क्या तुम खता नहीं करते।।
    ,
    तर्जुबा एक ये भी हो गया,चलो अच्छा ही हैं।
    लोग अब वफ़ाओं के बदले,वफ़ा नही करते।।
    ,
    जब संज़ीदगी के साथ,देखते है जिंदगी को।
    फ़िर बहुत सी बातों पे,हम हँसा नही करते।।
    ,
    बेवजह है तुम्हारा,मुलाकात की बातें करना।
    हमकों मालूम है,शहर में तुम रहा नही करते।।
    ,
    जज्बातों से खेलना है,अगर फितरत तुम्हारी।
    तो सुनो साहिल भी,ज़ख्मो की दवा नही करते।।
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  • चाँद जमीन पर कभी उतरता है क्या??

    चाँद जमीन पर कभी उतरता है क्या??
    बिन तपे कभी सोना निखरता है क्या??

    हम कहेंगे हजार बार फरेबी को फरेबी।
    सच लिखने से यहाँ कोई डरता है क्या??

    हमें तो याद है हर मोड़ उस कहानी का।
    तुम्हारे भी जहन में कुछ उभरता है क्या??

    जो भी कहना हो सोच समझकर कहा करो?
    अब कोई वादों से अपने मुकरता है क्या??

    साहिल लिखते क्यूं हो बिना सबब के शायरी।
    बताओ तुमको भी कोई कभी पढ़ता है क्या??
    @@@@RK@@@@

  • हज़ार दवा है बस इक बुख़ार के लिए

    हज़ार दवा है बस इक बुख़ार के लिए।
    अब दुआ ही करो इस बीमार के लिए।।
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    हम ख़ुशी से रहते है मौसम चाहें जो हो।
    अब इंतज़ार थोड़े करेंगे बहार के लिए।।
    ,
    यहाँ ज़ख्मो और चेहरो की बात न करेंगे।
    बस अब हौसला नहीं है ऐतबार के लिए।।
    ,
    जज्बातों से खेलने की सज़ा कोई हो गर।
    इक जगह रखना उस गुनहगार के लिए।।
    ,
    किसे फ़ुरसत की कोई हमकों भी मिलें ।
    हम ही मिलते है नींदों से बस इतवार के लिए।।
    ,
    साहिल आसान नहीं होती है जिंदगी कभी।
    बस हौंसला न छोड़ना उस पार के लिए।।
    @@@@RK@@@@

  • “किस वज़ह से मिली है ये तन्हाई हमको”

    किस वज़ह से मिली है ये तन्हाई हमको।
    दिखतीं ही नहीं है ख़ुद की परछाईं हमकों।।
    ,
    सदियों पहले किसी ने पुकारा था हमें भी।
    वो आवाज़ आज तक देती है सुनाई हमको।।
    ,
    न तेरे काबिल हुए न खुद के ही काबिल हुए।
    महँगी पड़ी है खुद से खुद की लड़ाई हमको।।
    ,
    लाख कोशिशों के बावजूद तुम्हें भूल न पाए।
    हर वक्त ही देती है तेरी तस्वीर दिखाई हमको।।
    ,
    ताउम्र याद करने की सज़ा क्यूँ दे गए हो हमें।
    बहुत हुआ अब चाहिए इस सजा से रिहाई हमको।।
    ,
    कब तक लिखेंगे साहिल हल ए दिल यूँ ही।
    की अब तो कम पड़ने लगी है रोशनाई हमको।।
    @@@@RK@@@@

  • इल्तज़ा क्या करे।।

    इल्तज़ा क्या करे कुछ न बाकी रहा।
    न वो महफिल रही न वो साथी रहा।।

    इस क़द्र जिंदगी भी खफा हो गई।
    साँसे चलती रही कुछ न बाक़ी रहा।।

    जख़्म देकर वो कहते है मिलते नहीं।
    हम कहे क्या उन्हें इतना काफी रहा।।

    मंज़िलों का शहर मेरी किस्मत न थी।
    इक मुसाफ़िर था मैं इक मुसाफिर रहा।।
    ,
    जो उम्र भर रहे थे हम तनहा यहाँ।
    था सबब कुछ नहीं मै बेवजह ही रहा।।

    रोशनी इक मिली थी फिर सहारा हुआ।
    पर ये मौसम कहा तक मुआफ़िक रहा।।

    वो कहतें है साहिल तुम मुकम्मल हुए हो।
    पर हक़ीक़त तो है की सब तबाह ही रहा।।
    @@@@RK@@@@

  • “खुद को ही खुद में उलझा लिया मैंने”

    खुद को ही खुद में उलझा लिया मैंने।
    मुझे वहम था ,तुझे सुलझा लिया मैंने।।
    ,
    दूर तलक देखा सब अँधेरा ही अँधेरा था।
    फिर इक रोशनी को पास बुला लिया मैंने।।
    ,
    चले थे हवाओं के रुख पर सफर करने।
    खुद को ही बीच समंदर में डूबा लिया मैंने।।
    ,
    तन्हाई में खुशियो की बातें अब हम क्या करे।
    ज़रूरत के मुताबिक खुद को रुला लिया मैंने।।
    ,
    टूटकर चूर चूर हो गए ख़्वाब शीशे की तरह।
    क्या बताये तुमसे की अब कुछ बचा लिया मैंने।।
    ,
    माना की गलत है चुराना कुछ भी किसी से।
    पर साहिल जिंदगी को मौत से चुरा लिया मैंने।।
    @@@@RK@@@@

  • बस इक लम्हा हूँ गुजर जाऊंगा मैं

    कहाँ किसी को समझ आऊँगा मैं।
    बस इक लम्हा हूँ गुजर जाऊंगा मैं।।

    तूफानों अब के दम भर के मिलना।
    तिनका नही हूँ जो बिखर जाऊँगा मैं।।

    मुझे गुमराह करने वाले वहम में है।
    मुझे छोड़ा हैं तो किधर जाऊंगा मैं।।
    ,
    मंजिल करीब हो तो रास्ते खुद बनेंगे।
    गिरने के डर से क्या ठहर जाऊँगा मैं।।
    ,
    मेरी हैसियत नहीं के तुम्हें कुछ दे सकूँ।
    चाहो टूटकर तारों सा बिखर जाऊँगा मैं।।
    ,
    हज़ार जख़्म जिन्दा है अभी तक दिलो में।
    ये जरा सी चोट पर क्या सिहर जाऊँगा मैं।।
    ,
    मुश्किलो जितना चाहो तपा लो मुझको।
    इक जिंदगी हूँ आखिर निखर जाऊँगा मैं।।
    @@@@RK@@@@

  • जख़्म दे रहे है,दवा देने वाले।

    जख़्म दे रहे है ,दवा देने वाले।
    गुनाह कर रहे है,सजा देने वाले।।
    ,
    चिरागों की हस्ती,मिटती नहीं है।
    सुन लो तुफानो को,पता देने वाले।।
    ,
    अभी मैं हूँ तनहा ,कल क्या रहूँगा।
    महफिल से अपनी,उठा देने वाले।।
    ,
    मुझे मेरी मंजिल अब,दिखने लगी है।
    कर दो निगाह मुझपे,हवा देने वाले।।
    ,
    सदिया है गुजरी,न आहट है कोई।
    कहाँ तुम छिपे हो ऐ,जुबा देने वाले।।
    ,
    लफ्ज़ो को मेरे है ,सभी का सहारा ।
    वरना भँवर थे कई,डुबा देने वाले।।
    ,
    अभी तक थे साहिल,हम भी वहम में।
    बहुत शुक्रिया मुझको,दगा देने वाले।।
    @@@@RK@@@@

  • ज़िन्दगी जीने की वजह कोई।

    ढूंढ रहे है जिंदगी जीने की वजह कोई।
    तुम्हारी यादें न हो है ऐसी जगह कोई।।
    ,
    हक़ीक़त बयान करना अगर जुर्म है गर।
    फिर बोल दो हमारे लिए भी सजा कोई।।
    ,
    दर ब दर घुमे है न जानें किस जुस्तजू में।
    जबकि न कोई मंजिल है न है पता कोई।।
    ,
    इक जख़्म हरा होता रहा यादों के सहारे।
    जिसके लिये न मरहम है,न है दवा कोई।।
    ,
    सूख गई अरमानो की फ़सल बिना बारिश के।
    कब समझा आखिर मौसमो की अदा कोई।।
    ,
    सूखे पत्तो की तरह बिछे थे ख्वाब राहों में।
    कही है नई महफ़िले तो कही है जुदा कोई।।
    ,
    सबब एक नहीं थे साहिल मेरी मौत के लिए।
    वैसे भी मौत से कहाँ आज तक बचा कोई।।
    @@@@RK@@@@

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