Category: मुक्तक

  • अपराजिता

    माँ,
    तुम्हारे बारे में लिखना कठिन है
    या यूँ कहूँ कि ये असमर्थता समानुपातिक है
    उस सहजता के जिससे तुम
    मेरे मौन के पीछे छिपी गहरी उदासी पढ़ लेती हो..!!

    तुम जलती रहीं निरन्तर एक दीप की तरह
    मेरे जीवन के अँधेरे मिटाने को
    ख़ुद के भीतर से तो खत्म चुकी हूँ कब की
    पर एक तुम ही हो जिसने अब तक बचा रखा है
    मुझे अपनी मुट्ठियों में..!!
    क्योंकि एक स्त्री हार मान सकती है परन्तु एक माँ नहीं
    मुझे विश्वास है कि तुम संजोये रखोगी
    मुझे अंत तक..!!

    निस्संदेह ये दुनिया एक अन्तहीन समर है
    और माँ एक ‘अपराजेय योद्धा’..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (09/04/2021)

  • वहम

    कभी-कभी
    आसपास पानी होने का भ्रम
    चंद साँसों का इजाफ़ा कर देता है
    तड़पकर मरते हुए
    किसी प्यासे मुसाफ़िर की ज़िन्दगी में
    तुम भी
    मेरे जीवन में एक मरीचिका की तरह हो
    तुम कहीं नहीं हो मगर
    तुम्हारे साथ होंने का वहम काफ़ी है
    जीवन की दुष्कर राहें नापने के लिए..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (08/04/2021)

  • कमाई करो

    प्यार से पहले
    कमाई करो
    धन हो या शिक्षा
    उसकी रोपाई करो,
    भूखे कभी न रहोगे
    ठग कभी न जाओगे,
    दुनिया तुम्हें रुलाएंगी,
    है ज्ञान तो रोने से बच जाओगे,
    शिक्षा- संघर्ष सवाल देती है
    धन- स्वाद, वस्त्र साधन देता है,
    जीवन को उत्तम से उत्तम रखना चाहो
    सिर्फ शिक्षा के प्रेमी के संग मिलकर रहना है
    ✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-

  • मत कर होड़ा होड़ी

    मत कर होड़ा होड़ी बीच सड़क तू चलने में।

  • भले मानुष बनो

    दिन पर दिन कर रहे व्यभिचार क्यों बढ़ा रहे हौं तुम‌ ऐब,
    खुद बीड़ी सिगरेट गुटखा खाए तम्बाकू पिये दारू, बच्चा खाए ना पावे एको सेब,
    मक्कारी चोरी छल से ना धन जोड़िए , ना मिलिहै कफन में जेब,
    उनका सबका पर्दाफाश करो ,जो तुम्हरा इस्तेमाल करि रहें अपनी रोटी सेंक,
    कथनी करनी सब जन याद करिहै ,कहिहै तो बंदा रहै एक
    व्यभिचार छोड़ भले मानुष बनो,इंसां बनो तुम नेक।।
    —✍️–एकता—–

  • मां बहन के नाम की गाली

    आज जब धरती मां सुला रही लोगों को अपनी गोद
    फिर भी रंजिशे मिट नहीं रही ,पुरानी बातें भी रहें खोद
    प्यार स्नेह तो बचा नहीं, गालियां देते एक दूजे को रोज
    मां बहन के नाम की गाली तो सब के मुंह में ऐसे रहे जैसे मोहनभोग
    भगवान के नाम से भी ज्यादा विख्यात हुई यें गालियां, है कुछ ऐसा संजोग
    बड़े बूढ़े तो देते फिरे खेलते समय बच्चे भी देते ,ना पातें खुद को रोक
    एक मां के जाए दो लाल यदि आपस में लड़े , अपनी मां को भी गाली देते हैं ताल ठोक
    गालियों से शुरू होता झगड़ा और हो जाते गोलियों से खोपड़ियों में छेद
    मिंन्टों समय बीत ना पाए, रुक जाती सांसें और खून हो जाता सफेद
    नहीं इस पर कोई रोकथाम क्या‌ है इसका भेद
    मां बहन के नाम की गंदी गालियां सुन होता मन को बड़ा खेद
    ——-✍️——एकता

  • महक रहा है सावन

    महक रहा है सावन
    सुन्दर सुन्दर कविताओं का आँगन,
    और महक आ गई है जब से
    हुआ नये कवियों का आगमन।

  • समाज का विकृत रूप भाग(३)

    आज की शिक्षित समाज के लोगों को मैंने अनपढ़ पाया ,
    बेटी बनी बहू को भी एक पल में ठुकराया,
    मानवता तो बची नहीं जताते बड़ा अपना_ पराया ,
    मायका भी है ससुराल भी है गोद में एक मासूम सा बच्चा भी है , लोगों की भीड़ में उसने खुद को अकेला पाया ,
    ना जाने हम सब में ही छुपा कहां दानव बैठा ,
    जिसने स्त्री के अस्तित्व को मिटाने का नियम बनाया ,
    हे ईश्वर आपकी बनाई दुनिया ने स्त्री का क्यों मजाक बनाया ।।——✍️–एकता—-

  • समाज का विकृत रूप भाग(२)

    2 साल अभी बस बीते, पोते की खुशी में सब जीते ,
    अचानक पति की तबीयत बिगड़ी और वह सांस ना ले पाया,
    छोड़ दी उसने अपनी सांसे ऑक्सीजन उसे न मिल पाया ,
    बेटे की मौत हुई अभी दो दिन हुए नहीं बहू को भी ससुरालियों ने ठुकराया,
    जिस बेटी ने बन बहू, बीवी, सब का फर्ज निभाया ,
    पति की मौत जैसे हुई, क्यों सब ने उसका अस्तित्व मिटाया,
    ना मायके का साथ न ससुरालियों ने अपनाया ,
    मायके वाले भी सोचे हमने तो बेटी की शादी कर सारा फर्ज निभाया ।

  • समाज का विकृत रूप

    आज मन बड़ा द्रवित हुआ , सोचा सबको बतला दूं,
    समाज का एक ऐसा भी रूप सोचा सब को दिखला दूं,
    बड़ा परेशान पिता था बेटी की शादी के लिए ,
    ना जाने कितने लड़के आए उसकी बेटी को देखने के लिए,
    कोई सांवली कह देता, किसी ने नाटी कहकर ठुकराया,
    कोशिश जारी रही और एक रिश्ता नजर आया ,
    कर दी बेटी की शादी सुंदर सा था घर बसाया ,
    घर पहुंची बेटी बहू बनकर तो सब ने प्यार से अपनाया ,
    2 साल अभी बस बीते पोते की खुशी में सब जीते

  • प्रार्थना (हनुमान जयंती )

    सोचा था आज है हनुमान जयंती, कराऊगीं सुंदर से भजन कीर्तन
    पर बड़ा द्रवित यह मन हो उठा, सुनकर चंहुओर क्रंदन
    करती हूं प्रार्थना बजरंगी, सुन लो अब मेरी विनती ।
    लोगों की पीड़ा हरो , ताकि स्वस्थ और खुशहाल हो सब जन
    ———-✍️———— एकता गुप्ता

  • बौद्धिक संपदा (दिवस)

    है अनमोल धरोहर ये अपनी बौद्धिक संपदा
    कर सकता इसे कोई इसे क्षीण नहीं ,रहती साथ में सर्वदा
    कोई नया काज करें , या कोई हो स्रजित् अविष्कार
    हो कोई कलात्मक कार्य , या हो विचारकों के विचार
    हो कोई नयी क्रति कलात्मक , या कोई संगीत आत्मक
    जिन्हे व्यक्ति करे स्वयं बौद्धिक श्रम से उत्पादित
    करके कुछ नया प्रतिपादित
    है उसे बौद्धिक संपदा का अधिकार
    लोगों की नयीं खोजे हो नवाचार ।
    इनका उपयोग कर बढा सकते हम अपनी धन संपदा !!
    क्यों रौब दिखाते हम पुरखों की विरासत पर
    कुछ लोग लडते रहते हैं झूठी सियासत पर
    इसे कोई भी छीन नहीं सकता आप की भी इजाजत पर
    आओ कुछ नया करें ,और नाज करें खुद की बनाई
    नयी विरासत पर
    अपनी बौद्धिक संपदा को अपनी विरासत बनाये।
    आओ बौद्धिक संपदा दिवस मनायें
    ——✍️—– एकता

  • एक बूढ़ी अम्मा का आग्रह

    एक बूढ़ी अम्मा का घर आना हुआ,
    बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ,
    अम्मा कहती जब से ई मोबाइल आया,
    वयस्कों संग बच्चा भी हमसे बात करने से कतराया,
    जैसे ही सुबह हुई बच्चों ने बस मोबाइल चलाया,
    गलती केवल बच्चों की ही नाहीं ,
    मोबाइल तो मां-बाप ने ही बच्चों को पकड़ाया
    ई मोबाइल के चक्कर में बच्चा भी सारे संस्कार भुलाया,
    जहां हंसी ठिठोली होती थी वहां अब सन्नाटा छाया,
    हमका भी कुछो अब याद नहीं, न जाने कब हमने था
    बच्चन का कहानियां सुनाया,
    कहती अम्मा जब था कीपैड फोन आया,
    बड़ा खुश हुआ मेरा मन ,घर बैठे जब सब से बात कर पाया
    पर सूना हुआ मेरा आंगन, जब से ई एंड्राइड फोन आया
    अम्मा भी चाहें हंसना और बच्चों के संग बतियाना,
    हम जानित हैं मोबाइल भी है जरूरी
    पर थोड़ा समय साथ में हमहूं चाही बिताना,
    अपने बुजुर्गों के संग थोड़ा समय व्यतीत करें
    ताकि हम बुजुर्ग भी खुशहाल रहें,
    बस बूढी अम्मा ने आप सबको यही संदेशा भिजवाया है।
    _____✍️____ एकता गुप्ता

  • कसाई खाना

    कहा बकरी ने मेमने से
    मैं तुझे जहां भेजती हूँ
    हंसते हुए जाना
    ले जाने वाला भगवान् के सामने तेरी काटेगा गर्दन
    और तेरे जिसम का प्रसाद बांटेगा मगर तुम
    रोना मत
    क्यूँकि ये संसार एक कसाई खाना है
    यहां सबको इसी तरह जाना है

  • प्रेम और सौंदर्य

    आकाश की सुंदरता बढ़ाता कपासी बादल नहीं
    धरती का प्रियतम है वह काला बादल जो
    अपने प्रेम से करता है धरा का शृंगार..
    कानों में रस घोलती सुरीली तान फूटती है
    काली कुरूप कोयल के कण्ठ से..!!

    कलियों का संसर्ग होता है कुरूप भ्रमर से
    कोमल गुलाब पनपता है काँटों के बीच,
    वहीं कमलदल फूलते हैं कीचड़ में..
    गहरी चंचल आँखों से कहीं अधिक गहन प्रेम
    पाया जाता है किसी की प्रतीक्षा से
    पथराई सूनी आँखों में…!!

    हम प्रेम को खोजते हैं अपनी शर्तों, आकांक्षाओं
    और नियमावलियों की परिधि में
    परंतु प्रेम हमारे समक्ष आता है समस्त निर्धारित
    मानदण्डों की सीमाएँ लांघ कर
    अपनी दृष्टि पर लालसाओं का आवरण डाले
    हम..उसे पहचान नहीं पाते..!!

    विरोधाभासों में कहीं अधिक प्रबल होती है
    प्रेम की उत्पत्ति की संभावना…!!
    वास्तव में प्रेम की व्याख्या अधूरी है इस तथ्य की स्वीकार्यता के बिना..
    “प्रेम में सौंदर्य है, किन्तु प्रेम केवल सौंदर्य में नहीं है”..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (25/04/2021)

  • पर्यावरण के दोहे

    पर्यावरण बचाइए, हे मानव समुदाय
    सुख समृद्धि शांति, का है जो पर्याय
    नदिया पर्वत वन और, वन्य जीव समुदाय
    मानव दानव से हमे, कोई लेव बचाय
    धरा वायु जल सब हुए, दूषित सुनो पुकार
    प्रकृति रोग वर्षा करे, जगत हुआ बीमार
    प्रकृति अंग लकवा हुआ, दुखी नहीं संतान
    वृद्धा आश्रम छोड़ कर, कहे जाप भगवान्
    एटम बम के पालना, झूले राजकुमार
    बापू गौतम बुद्ध की, सभा में हाहाकार
    झरना नदिया बाग वन, पर्वत और पठार
    रक्षा कर अस्तित्व की, कहत पुकार पुकार

  • भारत माता कह रही (दोहे)

    भारत माता कह रही, एक जुट हो सब लाल
    शत्रु की ईंट जवाव दो, पत्थर से तत्काल
    भारत माता कह रही, संकट में इंसान
    मत भूलो इंसानियत, सब मारो शैतान
    भारत माता कह रही, ईश्वर जैसे एक
    वैसी है सब आत्मा, चाहे पंथ अनेक
    भारत माता कह रही, भाई चारा खेत
    बोय फसल तैयार कर, दुनिया को सुख देत
    भारत माता कह रही, देश को अपना मान
    सबके त्याग से लिखित औ निर्मित है संविधान
    भारत माता कह रही, जीने का अधिकार
    संविधान सबको दिया, पशु पक्षी मत मार
    भारत माता कह रही, फौजी जैसे मान
    रक्षक बनिए देश के, चाहे जाए प्राण

  • राजनीतिक दोहे

    पाँच साल में अब नहीं, हो हर साल चुनाव
    बहती गंगा प्रेम की, होते दूर तनाव
    पढ लिख कर नौकर बने, या होते बेकार
    एक बार नेता बनो, दो कई पीढ़ी तार
    कानो को प्यारे लगे, नेता जी के बोल
    पर इनका होता नहीं, सचमुच कोई मोल
    नेता जी के वेश में, आया भ्रष्टाचार
    डरकर लोगों ने कहा, स्वागत है सरकार
    बदल गए नेता मगर, बदल सके ना चाल
    महगाई बढ़ती गयी, मुस्किल रोटी दाल
    एक बार बनवाइए, हे जनता सरकार
    करेंगे अपने क्षेत्र में, घोटाला बौछार
    बहरे राजा सो रहे, प्रजा कर रही शोर
    सुंदर सपना देखते, महल बने चहुं ओर

  • बेकारी

    घर बनाने गए दो हाथ
    घर बनाने के लिए
    हाथ जोड़ते रह गए
    आखिर जबाब मिल ही गया
    काम नहीं
    तब से बनी हुई इमारत और
    पलंग तोड़ते रह गए

  • राष्टीय एकता के दोहे

    शक्कर पानी ज्यों घुले, ऐसे घुलमिल देश
    शर्बत पी लें शांति का, यह भारत संदेश
    भारत है एक बाग सा, कई प्रजाति के फूल
    औ माली भगवान् हैं, सींच रखे अनुकूल
    भाषाए होंगी अलग, होंगे अलग विचार
    क्रिस्मस होली ईद सब, भारत मां त्योहार
    भारत महिमा गा गए, स्वामी विवेकानंद
    भारत महिमा को सुना, विश्व हुआ मुख बंद

  • हे धरित्री

    हे धारित्री,
    पञ्च महाभूतों में से एक तुम,
    तुमसे ही उत्पन्न होकर भी मानव
    अछूता रहा तुम्हारी सहनशीलता के गुण से..!!
    काश! तुम्हारे धैर्य का अंशमात्र भी
    वह आत्मसात कर पाता अपने भीतर तो
    आज प्रश्नचिन्ह न लगा होता उसके अस्तित्व पर..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • प्रेम की दास्तान

    प्रेम….
    किसी को समझाया नहीं जा सकता।
    यह तो केवल एक अनुभूति है,
    जो स्वयं ही होती है।
    प्रेम स्वार्थहीन है,
    सागर सी गहराई लिए हुए ,
    एक खूबसूरत एहसास!!
    इन्तजार में और भी वृद्धि करता है
    और मिलन में होता है ख़ास।
    प्रेम पूर्णत: है एक एहसास,
    प्रेम को आवश्यकता नहीं है समझाने की
    उसको आंखें कर देती हैं बयान।
    और प्रेम करने वाले,
    स्वयं ही कर लेते हैं आभास।
    यही है प्रेम की दास्तान॥
    _____✍गीता

  • तुम्हारी आँखे

    कल अचानक ही तुम्हारी तस्वीर पर आकर
    ठहर गईं मेरी निगाहें…
    और मैं उलझकर रह गयी तुम्हारी
    आँखों के तिलिस्म में ..!!

    गहरी ख़ामोशी समेटे हुए सागर सी ये तुम्हारी आँखे,
    साक्षी हैं ज़िन्दगी के न जाने कितने तूफानों,
    न जाने कितने ही चक्रवातों की,
    दर्द के लाखों मोती रोज ही मिलते हैं
    इस सागर की तलहटी में..!!

    जानते हो एक दिलचस्प किस्सागोई करती हैं ये,
    तुम्हारे होंठों से कहीं ज़्यादा कहानियाँ बसती
    हैं तुम्हारी आँखों में,
    तुम्हें पता है, एक पूरी ज़िन्दगी बिताई जा सकती है
    इन्हें पढ़ते हुए..!!

    उदासियों द्वारा कत्ल की गई शामों के लहू में डूबी
    ये तुम्हारी कत्थई आँखे जब भी नम होती होंगी
    तो अमावस के अंधेरों से लड़ते हुए किसी
    सुर्ख तारे सी चमकती होंगीं,
    जब तुम हँसते होंगे तो हजारों जुगनू झिलमिलाते
    हुए नज़र आते होंगे इनमें…!!

    तुम्हारी इन आँखों को निहारते हुए अचानक ये
    एहसास हुआ कि ईश्वर का निवास इंसान के
    हृदय में नहीं बल्कि आँखों में होता है.. !!

    सुनो! अगर कल को ज़िन्दगी से हारी हुई कोई
    तलाश तुम्हारी आँखों मे पनाह माँगे न तो
    उसे निराश मत करना,
    क्योंकि मैं चाहती हूँ कि ये दुनिया इस तथ्य को जाने
    कि इस क़ायनात में अब भी एक महफूज़ जगह है
    और वो है ‘तुम्हारी आँखे’…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • “नाम”

    नाम….
    यही तो है हमारी पहचान,
    हमारे व्यक्तित्व की शान।
    नाम केवल एक नाम ही नहीं है,
    एक विशेष शख्सियत है…
    जिसे जानते हैं हम उस “नाम” से,
    उसके आचरण से
    और उसके व्यवहार से।
    तो दोस्तों…
    कभी अपना “नाम” खराब न करना।
    क्योंकि एक बार
    यदि ख़राब हो जाए नाम,
    तो बरसों बीत जाएंगे उसे ठीक करने में।
    ज़िन्दगी की दोपहर से,
    हो सकती है ज़िन्दगी की शाम भी।
    तो आओ प्रण करते हैं कि,
    नहीं करेंगे कभी ऐसा काम
    जिससे ख़राब हो जाए “नाम”
    क्योंकि बरसों बीत जाते हैं “नाम” कमाने में॥
    _____✍गीता

  • खूबसूरत सुबह

    खूबसूरत सुबह
    तुझे प्रणाम है मेरा,
    सूर्य की रश्मियों को
    आज प्रणाम मेरा।
    खिल रही दिशाएं
    चहकते खग वृंदों,
    चमकती ओस बूंदो
    तुन्हें प्रणाम मेरा।
    तुम्हें प्रणाम मेरा।

  • माफी एक हुनर है

    माफी एक हुनर है,
    सत्य अहिंसा का पूरक है,
    राम कृष्ण ईशा को प्यारा है,
    बच सकते है शान तुम्हारे
    बिगड़े काम बने तुम्हारे
    झुक कर देखो एक बार,
    बागों में फूल खिले रोज तुम्हारे,
    दो गांव की इज्जत आज बचे
    सभ्यता संस्कृति फूल फले
    दे दो माफी ले लो माफी
    सच कांटों में भी फूल खिले
    ……………………………
    कवि ऋषि कुमार प्रभाकर

  • ये जो जिन्दगी है ना..

    ये जो जिन्दगी है ना,
    बहुत ख्वाब दिखाती है।
    कुछ ख्वाब होते हैं पूरे,
    तो कुछ अरमान मिटाती है।
    तोड़ कर दिल कभी किसी का,
    उसको आंसू पिलाती है।
    कभी किसी को,
    बिन प्रयास ही खूब प्रतिष्ठा दिलाती है।
    पता ही नहीं चलता है,
    ये जिन्दगी क्या-क्या दिखलाती है॥
    ______✍गीता

  • रंगमंच

    दुनियाॅं के रंगमंच पर,
    हम सभी आते हैं
    अपना-अपना किरदार निभाने,
    किरदार निभाते-निभाते
    भूल ही जाते हैं..
    कि एक दिन इस रंगमंच से,
    जाना है एक दूसरी दुनियाँ में,
    यहां रहकर जो मिला है किरदार,
    वह निभाना है
    अपना एक स्थान बनाना है,
    और फिर इस रंगमंच से
    चले जाना है,
    यही है जीवन..
    और जीवन का रंगमंच…
    ____✍गीता

    विश्व रंगमंच की हार्दिक शुभकामनाएं

  • रंगमंच

    दुनिया के रंगमंच में कुछ किरदार ऐसे
    होते हैं जो कभी किसी का ध्यान
    आकर्षित नही कर पाते…
    मगर उनके बिना अधूरी है कहानी
    की खूबसूरती…!!
    वो कभी नहीं करते प्रयास कहानी का
    नायक बनने का…
    मगर पूरी तत्परता से निभाते हैं अपना
    किरदार बिना किसी सराहना
    की उम्मीद किये…!!
    और एक दिन ज़िन्दगी की पेचीदा पटकथा
    में उलझकर खो जाते हैं नेपथ्य में…!!

    मैं तुम्हारी दुनिया के रंगमंच का शायद
    वही किरदार हूँ..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (27/03/2021)

  • काश कि इतना आसान होता

    काश के इतना आसान होता !
    दिल के जख्मों का भर जाना,
    तुझे देखकर तुझको भूल पाना
    बिन देखे तुझे रह पाना…

  • कविता

    असम्भव है तुम्हें परिभाषा के
    दायरे में बांधना..
    तुम हो वो सागर, जिसमें विलीन होता
    है व्याकुलता का दरिया..
    या निष्प्राण मन के भीतर बसी नीरवता को
    चीर के उपजी स्नेहमय अनुगूँज..!!
    एक बजंर हृदय के धरातल पर सहसा
    फूटता हुआ भावों का सोता..
    या फिर एक नज़रिया, जो हर दृष्टिगोचर
    में अंतर्निहित वास्तविक सत्य को
    उजागर करने का..!!

    कविता! तुम पर्याय हो मेरे लिए
    ‘सार्थकता’ की अनुभूति का..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (21/03/21)

  • गौरैया

    गौरैया,
    जाने कहाँ उड़ गई तुम
    अपने मखमली परों में बाँध के
    वो सुबहें, जो शुरू होती थी तुम्हारी
    चहचहाहटों के साथ और वो शामें,
    जब आकाश आच्छादित होता था तुम्हारे
    घोसलों में लौटने की आतुरता से…!!

    वो छत पर रखा मिट्टी का कटोरा सूखा पड़ा है
    न जाने कब से…
    आँगन में नहीं बिखेरे जाते अब पूजा की
    थाली के बचे हुए चावल…!!
    एक मुद्दत से नहीं देखा मैंने तुम्हें अपना
    नीड़ बुनते…
    और तुम्हारा अपने बच्चों को खाना खिलाने
    का दृश्य भी अब धुंधलाने लगा है
    मस्तिष्क के पटल से…!!

    अब जब मशीनों के शोर से घुटन होने
    लगती है तो कानों को याद आता
    है तुम्हारा चहचहाना..!!
    सोचती हूँ कोई बच्ची कैसे जान पाएगी
    कि क्या होता है चिड़ियों की तरह
    आकाश में उड़ना…!!

    हे प्रकृति की मासूम प्रतिनिधि! हम
    तुम्हारे अपराधी हैं..
    हम लालची इंसानों ने छीना तुमसे तुम्हारा
    आवास, तुम्हारे हिस्से का आकाश,
    और तुम्हारी परवाज़…!!
    दया आती है मुझे हम इंसानों की लाचारी पर ,
    हमें हर चीज का महत्व समझ तो आता है,
    मगर उसे खो देने के पश्चात..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (20/03/2021)

  • ख़ामोशी का हलाहल

    ख़ामोशी की तह में,
    छिपा कर रखते हैं हम,
    अपने सारे ग़म।
    क्योंकि कर के कोलाहल,
    दिखाकर दुःख दर्द अपने
    नहीं मिटेंगे अन्धेरे ज़िन्दगी के।
    पीना ही पड़ता है,
    ख़ामोशी का हलाहल
    ज़िन्दगी के कुछ उजालों के लिए ।।
    _____✍️गीता

  • कठपुतली

    कठपुतली तो देखी होगी ना….
    हाँ, वही काठ की गुड़िया।
    जिसकी डोर रहती है सूत्रधार के हाथों में,
    वह अपनी उँगलियों से जैसे चाहे,
    उसे नचाता है….
    दर्शकों को भी आनन्द आता है।
    लगता है कि उसमें जान है,
    लेकिन, कहां….
    वह तो बिल्कुल बेजान है।
    नाचती रहती है सूत्रधार के इशारों पर केवल।
    इशारों पर नाचोगे,
    तो नचाएगा यह जमाना…
    हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।।
    _______✍️गीता

  • सुनो वनिता

    संसार द्वारा रचित तुम्हारी महानता
    के प्रतिमान वास्तव में षड्यंत्र हैं
    तुम्हारे विरुद्ध…!!
    तुम सदा उलझी रही स्वयं को उन
    प्रतिमानों के अनुरूप ढालने में
    और वंचित रही अपने सुखों से..!!

    सुनो वनिता!
    जब तक तुम अनभिज्ञ हो इस तथ्य से कि
    “तुम्हारा सुख तुम्हारी महानता में नहीं
    वरन तुम्हारे साधारण होने में है”…
    तब तक ये सृष्टि हो नहीं सकेगी
    तुम्हारे योग्य…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (08/03/2021)

  • मरीचिका

    सुंदरता के प्रति हमारा उन्माद इतना
    अधिक रहा है कि हमनें तकनीकों
    का सहारा लेकर हर वस्तु को
    सुंदर बनाने का भरसक
    प्रयास किया…!!

    जबकि हमें बदलनी चाहिए थी अपनी
    दृष्टि जो रचती है भेद सुंदरता
    और असुन्दरता का !!

    दुर्भाग्य से हम विफ़ल रहे हैं समस्याओं
    के वास्तविक मूल को पहचानने में और
    भटकते रहते हैं अपने मन द्वारा
    रचित मरीचिकाओं में..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (06/03/2021)

  • एहसास

    कुछ एहसास हैं जो आकर ठहर गये हैं
    ज़बान की नोंक पर…
    होंठो की सीमाएँ लाँघने को आतुर,
    बस उमड़ पड़ना चाहते हैं एक
    अंतर्नाद करते हुए…!!

    मगर उन एहसासों के पैर बंधे हुए हैं
    एक डर की ज़ंजीर से…!!
    वही जाना-पहचाना डर “उसे खो देने का”
    जिसे पाया है बड़ी मुश्किल से
    या फिर इस भ्रम के टूट जाने का
    कि हाँ! वो मेरा है…!!

    सच कुछ एहसास कितने बदनसीब होते हैं
    लफ्ज़ों के साँचे में ढलते ही बिखेर कर
    रख देते हैं ख्यालों की खूबसूरत दुनिया को..!!
    कुछ रुई के फाहों से कोमल सपनें खो
    देते हैं अपनी धवलता उन शब्दों के
    पैरों तले दबकर..!!

    आख़िर कितना न्यायसंगत है उन एहसासों
    को हकीकत के धरातल पर उतारना
    बेहतर यही है कि वो दम तोड़ दें
    हलक के भीतर ही….!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (05/03/2021)

  • भ्रम

    हम भ्रम पाल लेते हैं, “मैंने ही उसे बनाया है”,
    कभी सोचा तूने, भू-मण्डल किसने बसाया है।
    भाई ये सब कर्मानुसार ही, ब्रह्मा की माया है,
    कोई सूरमा आज तक, अमर नहीं हो पाया है।।

  • फुलझडियां

    मनचले ने रुपसी पर, तंज कुछ ऐसा गढ़ा,
    काश जुल्फ़ों की छांव में, पड़ा रहूं मैं सदा।
    रुपसी ने विग उतार, उसे ही पकड़ा दिया,
    ले रखले जुल्फ़ों को तू, पड़ा रह सदा सदा।।

    फेसबुक की दोस्त को, बिन देखे ही दिल दे दिया,
    जो भी मांगा प्रेयसी ने, आॅनलाईन ही भेज दिया।
    एकदिन पत्नी के पास वही गिफ्ट देख चौंक गया,
    उसकी पत्नी ही फ्रेंड थी, बेचारा मूर्छित हो गया।।

    पत्नी से प्रताड़ित पति ने ईश्वर को ताना दिया,
    क्या पाप किया मैंने जो इससे मुझे बांध दिया।
    ईश्वर ने तपाक से भ्रमित पति को समझा दिया,
    धैर्य रख अज्ञानी पुरुष, कई जन्मों का साथ है।।

    कत्ल आंखों से करती हसीना, पर वो क़ातिल नहीं,
    दिल हसीनाओं के चुराते हैं, पर चोर वो शातिर नहीं।
    हर महिला में औरत है, कुछ पुरुषों में पुरुषार्थ नहीं,
    मुकाम तक पहुंचाती सड़क, खुद कहीं जाती नहीं।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी (राजस्थान)

  • क़िताबें

    जब भी मन घिर जाता है अपने
    अंतर्द्वंदों की दीवारों से,
    जब मस्तिष्क के आकाश में छा
    जाते हैं बादल अवसादों के…!!
    तब
    छांट कर संशय के अँधियारों को,
    ये जीवन को नई भोर देती हैं,

    ‘किताबें’…..मन के बन्द झरोखें
    खोल देती हैं..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • प्रेम और विज्ञान

    एक महान विज्ञानी का कथन है…
    ‘हर क्रिया की बराबर किंतु विपरीत
    प्रतिक्रिया होती है’..!!
    प्रेम करने वाले इस तथ्य के जीवंत
    उदाहरण हैं….
    समाज ने जितनी तत्परता से रचे हैं
    प्रेमियों को एक दूजे से दूर
    करने के षड्यंत्र…
    प्रेम उतने ही वेग से गहरी पैठ बनाता
    गया है प्रेमियों के हृदयों में…!!
    वास्तव में विज्ञान के समस्त सिद्धांतों
    की व्याख्या हेतु प्रेम सर्वोत्तम
    माध्यम है…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • चुम्बन

    वो भटकता रहा लफ़्ज़ दर लफ़्ज़
    गढ़ने को परिभाषायें प्रेम की,
    रिश्तों की, विश्वास की…!!

    और
    मैंने अंकित कर दिया हर एहसास
    उसके दिल में सिर्फ चूम के
    उसके माथे को…!!

    ‘दरअसल चुम्बन, आलिंगन और प्रेमल
    स्पर्श मानव को सृष्टि द्वारा प्रदत्त
    सर्वश्रेष्ठ भाषाएँ है..!!’

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (13/02/2021)

  • आलिंगन

    सांसारिक कुचक्रों में उलझ कर
    अपनी मौलिकता से समझौता
    करते मानव सुनो..!!
    अपने भीतर हमेशा बचा कर रखना
    इतना सा प्रेम…!!
    कि
    जब भी कोई व्यथित हृदय तुम्हारा
    आलिंगन करे तो उस प्रेम की
    ऊष्मा से पिघलकर आँसू बन
    बह उठे उसके मन में जमी
    पीड़ाओं की बर्फ…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (12/02/2021)

  • वचन

    यदि बाँधने जा रहे हो किसी को
    वचनों की डोर से, तो इतना
    स्मरण रखना

    कहीं झोंक न दे वचन तुम्हारा
    उसे उम्र भर की अनन्त
    प्रतीक्षा में…

    क्योकि,
    प्रतीक्षा वह अग्नि है जो भस्म कर
    देती है स्वप्नों और उम्मीदों के
    साथ-साथ मनुष्य की
    आत्मा को भी…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • रिक्तता

    निकाल कर फेंक दिया है मैने
    अपने भीतर से
    हर अनुराग, हर संताप…
    अब न ही कोई अपेक्षा है बाक़ी
    औऱ न ही कोई पश्चाताप..!!

    मैं मुक्त कर चुकी हूँ स्वप्न पखेरुओं
    को आँखो की कैद से…
    वो उड़ चुके हैं अपने साथ लेकर मेरे
    हृदय के सारे विषादों को..

    अब मेरे अंतस में है एक अर्थपूर्ण
    मौन और रिक्तता..
    रिक्तता जो स्वयं में है परिपूर्ण
    जो पूरित है सुखद वर्तमान से…!!

    वर्तमान,जो स्वतंत्र है विगत की परछाइयों से
    जो भयमुक्त है भविष्य की आशंकाओं से
    जो आच्छादित है असीम संतोष से…!!

    संतोष,जिसके मूल में है एक स्वीकारोत्ति
    “मेरी हर तलाश का अंत मुझमें निहित है।”

    ©अनु उर्मिल’अनुवाद’

  • दोहरा चरित्र

    जब भी प्रेम करने वालों को कोसा गया
    मैंने बंद कर लिए अपने कान…
    जब भी प्रेमियों पर अत्याचार किये गए
    मैंने मूँद लीं अपनी आँखें…!!

    जब भी किसी प्रेमी युगल ने देखा मेरी तरफ
    उम्मीद से, मैंने उन्हें निराश किया..
    अखबारों में आये दिन छपने वालीं
    प्रेमियों के कत्ल की खबरें भी
    रहीं मेरे दिल पर बेअसर…!!

    अपनी कविताओं में प्रेम के क़सीदे
    पढ़ने वाले हम….
    प्रेम की ताकत का बखान
    करने वाले हम…
    अपने लेखन में प्रेमियों की हिमायत
    करने वाले हम…
    अपने जीवन मे क़भी डटकर खड़े नहीं हो
    पाते सच्चा प्रेम करने वालों के साथ…!!

    वास्तव में प्रेम पर लिखीं गईं हमारी सारी
    कविताएं कोशिशें हैं अपनी धिक्कारती हुई
    अंतरात्मा की आवाज़ को दबाने की…!!
    दरअसल हम बेचारे हैं
    निश्चित ही हम दोहरे चरित्र के मारे हैं…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • सुख दुःख

    एक विरोधाभास रहा है
    हमेशा से हमारी कल्पनाओं
    और वास्तविकता के बीच..!!

    जहाँ कल्पनाएं सुख की मीठी नदी है,
    वहीं वास्तविकता दुःख का खारा सागर..!!

    मगर हम हमेशा
    वास्तविकता की अवहेलना कर
    चुनते हैं कल्पनाओं की नदी में गोते लगाना!!

    ये जानते हुए भी कि
    अनेकों नदियाँ अपना अस्तित्व खोकर
    भी मिटा नहीं सकती सागर के खारेपन को..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • जय हिंद

    मुल्क है हम हैं, समझ जा जमाने तू,
    देश माँ है, तू बेटा है, जुट रिश्ता निभाने तू।
    किसी भी हाल में भारत को हमने
    सींच देना है,
    जय हिंद का जेहन में सबके
    गीत देना है।

  • चुप रहे

    वे न बोले हम न बोले
    चुप रहे,
    सच के आगे आज भी हम
    छुप रहे,
    रोशनी में डाल कर पर्दा बड़ा
    बस अंधेरे के ही
    नगमे लिख रहे।

  • कब तलक

    कब तलक फूंकती रहेंगी गाड़ियां
    कब तलक यह आग सी मन में रहेगी,
    कब तलक सब ठीक होगा देश में,
    कब दिखेंगे लोग सच्चे वेश में।

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