दया धर्म के बल पर प्राणी,
जीत लेता है विश्व संसार।
कर्म धर्म को करते रहना,
कभी ना मानना तुम हार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
दया धर्म के बल पर प्राणी,
जीत लेता है विश्व संसार।
कर्म धर्म को करते रहना,
कभी ना मानना तुम हार।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
जो दया धर्म के राह चलते,
उसका कोई बिगाड़ नहीं सकता।
दिन दुखी का जो सेवा करते,
सदा उनका जयकारा होता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कर्मभूमि पर न्योछावर करके,
अपनों को जो गले लगाते है।
निष्ठावान से जो धर्म सेवा करते,
जग सदैव वीरों को गले लगाती है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
दया धर्म की पोटली बांधकर,
जो राह पर अपने चलते हैं।
कर्म भूमि को याद करके,
जो राह पर अपने बढ़ते हैं।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
विनाश के चक्कर में पड़कर,
जीवन को क्यों बर्बाद करना।
दया धर्म कर्म करके इंसान,
मानवता का तुम उध्दार करना।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
सत्य राह पर चलो आहिस्ते आहिस्ते,
झूठ फरेब को खदेड़ो दौड़ा दौड़ा कर।
धर्म कर्म निती पर रखकर विश्वास,
हे मानव दिखलाओ कुछ अलग कर।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ जीवन को खुशहाल बनाओ,
धरा को सुसज्जित करके वायुमंडल को स्वच्छ बनाओ।
वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ तन मन को प्रफुल्लित कर जाओ,
सुखी धरती पर वृक्ष लगाकर बादल से वर्षा करवाओ।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
सुखी बंजर भूमि करें पुकार,
वृक्ष लगाकर करो श्रृंगार ।
भूमण्डल का बिगड़ा संतुलन,
वृक्षों से ही है सबका जीवन।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
रूखी सूखी खाकर भी
अमृत का पान कराती है।
वो तो गैया मैया है अपनी
जो हर विपदा से बचाती है।।
देवव्रत का भीष्मप्रतिज्ञा
या धृतराष्ट्र का अंधापन।
गंधारी के आँखों की पट्टी
या कुन्ती का अबलापन।।
किसको दोषी कहूँ मैं आखिर
सब हैं कारण महाभारत के।
सबके जिद ने नाश किया
अगणित जन गण भारत के।।
जिम्मेदार किसे ठहराया जाय
आखिर महाभारत के युद्ध का।
उत्तर मांग रहा तत्काल हमार
ये कैसा धर्मयुद्ध प्रबुद्ध का।।
वटसावित्री का पूजन किया
बड़गद की टहनी रोपकर।
वृक्षराज को देकर कलेश
कैसी पूजा है ये शोकहर।।
तप रही धरा को सुसज्जित फिर से करना है,
वृक्षारोपण करके धरा को हरा भरा बनाना है।
वृक्षारोपण का संकल्प इंसा को लेना होगा,
वायुमंडल को बचाने के लिए वृक्ष लगाना होगा।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
सोचा था जो वो पुरा ना हो सका
बदलते हालात को देख मैं अपना ना हो सका
आंखों के आंसूओं को मैं अपने पोंछ ना सका
टुटते बिखरते देखता रहा मैं कुछ कर ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका
बदलते काल चक्र में मैं किसी का ना हो सका
रिस्तें पर दाग लगाकर मैं खुद का ना हो सका
ख्वाहिशों को मैं अपने रूसवा मैं कर ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका
अरमानों को मैं ढ़ोता रहा उड़ान दे ना सका
अपने अन्दर के इच्छाओं को मैं खो ना सका
आश लगाए बैठा रहा मैं कुछ कर ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका
महामारी के काल में मैं खामोश रह ना सका
आवाज़ उठाता रहा लेकिन मैं पलायन रोक ना सका
मजदूरों का दर्द देखकर मैं सह ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका
महेश गुप्ता जौनपुरी
निष्काम ना बैठ मन तू
कर सृजन, तू कर सृजन
गूंज बन भंवरा जगत में
कर गुन्जन तू कर गुन्जन
बचपन पर ना डालो इतना बोझ,
खेल कूद उत्पात मचा लेने दो।
याद करके अपने बचपन को,
बच्चों को मौज कर लेने दो ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किसान अपने परिवेश को छोड़,
खुद को कलंकित नहीं है करता।
खून पसीने को बहाकर अपने,
देश से गद्दारी नहीं है चाहता ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किसान अपने परिवेश को छोड़,
खुद को कलंकित नहीं है करता।
खून पसीने को बहाकर अपने,
देश से गद्दारी नहीं है चाहता ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
किसान जंग जब छेड़ता है,
सरकार घुटने टेकता है ।
मनवा कर अपना सारा शर्त किसान,
सरकार का अक्ल ठिकाने लगा देता है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
भ्रष्टाचार के जंजीरों में ना जकड़ो सरकार,
किसान को किसान ही रहने दो मेरे सरकार।
अलाप नहीं रोना मुझको नेता के पकड़ पांव,
खून पसीने को मेरे देश में करो ना बदनाम मेरे सरकार।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
अन्न की कद्र जाने किसान,
खेत को पुजे समझ भगवान।
पैसे वाले कद्र क्या जाने अन्न का,
उनके अन्दर समां गया है शैतान।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
खेत को जोतकर बो ही देता,
हो कितना भी परेशान किसान।
फंड को तांक में रखकर किसान,
मेहनत करके अन्न उगाता किसान।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बच्चों की किलकारी पर बोझ लाद रहे हैं हम,
नन्हें-मुन्हें मासूम पर जिम्मेदारी
लाद रहे हैं हम।
अपनी नाकामी को साबित करके महान बने हम
खुशियां छिनकर ज्ञान के चक्कर में तौल रहे हैं हम।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
भार के आगोश में सजा काट रहा है,
बचपन अपना भूल कर समझदार बन रहा है।
किताबी संसार को अपना जीवन समझ रहा है,
बदलते शिक्षा में कुछ को दोषी समझ रहा है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चमकते बादल का दर्द किसान से पुछो,
हवा के झोंके का हाल किसान से पुछो।
कितना दर्द हैं देता ओलावृष्टि का मार,
टूटे हुए सपनों का ख्वाब किसान से पुछो।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
अस्त ब्यस्त लस्त में भी खुद को जिंदा रखता,
खून पसीने को बहाकर खेत हरा भरा रखता।
प्रकृति के हालातों से कभी नहीं झुकता,
मेहनत के डर से किसान कभी नहीं भागता।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
कितनी भी सिढीयां चढ़ लो,
खाने के लिए मेरा है अन्न ।
खुद को महान भले ही समझो,
पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
शिक्षा और शिक्षक का नाता है भरा बस्ता,
ज्ञान की बातों में छुपा है कोई रास्ता।
भारी बस्ते से आमदनी है होता,
बचपन के बोझ से उनका नहीं कोई वास्ता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
तन मन की शक्ति आती है योग साधना से,
दिल को चैन आता है भगवान के आराधना से,
योग वेद पुराण का अलौकिक उपहार है,
योग धरा पर ऋषि मुनियों का वरदान है।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
सरकारी बाबू बनकर है बैठे,
गरिब मजदूर से पैसे हैं ऐंठे ।
नमक हलाल से बचाये भगवान,
अफसर के भेष में है दलाल बैठे।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पैसे के लोभ में इंसान खुद को भूल गया,
अफसर के ओहदे में सुख को भूल गया।
चन्द रूपये के लालच में खुद को बेच गया,
नाम बड़ा करने में रिस्तें को तोड़ गया ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
करो योग सुबह और शाम,
रहो निरोग करके व्यायाम।
मन तन की शक्ति परख कर,
जीवन में अपने करो आराम।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पैसे का इमान देता नहीं कभी साथ,
गरिबी अमीरी छोड़ कर मिलाओ हाथ।
अफसर बनकर भगवान तुम नहीं हुए,
सद्भाव गलत कर्मो को माफ करो हे नाथ।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया है,
बादलों के गर्भ में चांद देखो समाया है।
अंधेरे रात में आज चांद रोशनी भूल आया है,
चांद के उजाले को बादल ने अपने आगोश में छिपाया है।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
तुम्हारी ये सुनहरी जुल्फें और तुम्हारी याद,
चेहरे की हंसी और दमकता हुआ ये चांद।
मुझे याद बहुत आता है तुम्हारा साथ,
रब से करना मिलने का तुम फरियाद।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
चांद को छिपाकर बादल,
तारों की चमक छिन लिया।
धरा को करके अन्धेरा,
चांद की रोशनी छिन लिया।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
मन तन की शक्ति को पहचान,
भेजो यारों दोस्ती का पैगाम ।
चेहरे की सुंदरता में फंसकर,
ना करो अपना समय बर्बाद।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
चांद को पाना सबके बस की बात नहीं,
चांद को ख्वाब में देखना हसरत की बात है।
चांद का रोशनी रोशन करता है जहां को,
चांद को कैद कर दीदार करना सबके बस की नहीं है।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
पैसे का इमान देता नहीं कभी साथ,
गरिबी अमीरी छोड़ कर मिलाओ हाथ।
अफसर बनकर भगवान तुम नहीं हुए,
सद्भाव गलत कर्मो को माफ करो हे नाथ।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
तन मन से करो प्रात: काल योग,
भाग जायेंगे तुम्हारे सारे रोग ।
मन तन दिल खिला खिला रहेगा,
सदियों तक रहोगे तुम निरोग ।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
भ्रष्टाचार की पोटली खोल रहें हैं अफसर,
कुछ इमानदारी से कर रहे हैं उजागर।
कुछ टेबल के नीचे से कर रहे हैं पार्सल,
घी रोटी खाकर पेट फुलाये बने पड़े हैं अजगर।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
योग एक अलौकिक छाया है,
दूर करता लोगों का काया है।
रोग दोष को दूर हैं करता,
मन मस्तिष्क को तेज हैं करता।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
चोर चोर मौसेरे भाई,
नेता अफसर दोनों लिप्त,
एक चुराता एक बचता,
इसी में है दोनों विलुप्त।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता बड़ी निराली,
बच्चों की करती है रखवाली।
एक एक दान चुग कर लाती,
अपने बच्चों को खिलाती।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
सरकार बेचारी फिसड्डी हो गयी,
जनता अब मारी मारी है फिरती।
लगकर लाईन में उम्मीद लगाएं,
कोरोना का प्रकोप इन्हें है डसती।।
✍ महेश गुप्ता जौनपुरी
मां की ममता पिता का दुलार,
दिखता है पशु पक्षी में भी ।
दाने चुग कर लाती है मां,
भरण पोषण करती बच्चों का भी।।
महेश गुप्ता जौनपुरी
किस किस पर आरोप लगाते,
अपने दुःख दर्द को किसे दिखाते ।
सरकार फिसड्डी बरसों से है,
कब तक हम आवाज उठाते।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
अपनी गलती कब तक हम ठेलेंगे,
विज्ञान के आड़ में कब तक बम फोड़ेंगे।
चुनौतियों से पिछा छुड़ा कर,
अपनी नाकामी से कब तक हम भागेंगे।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
कितनी भी सिढीयां चढ़ लो,
खाने के लिए मेरा है अन्न ।
खुद को महान भले ही समझो,
पैसे से कर्ज नहीं अदा होता सुन।।
✍महेश गुप्ता जौनपुरी
बेहिसाब अहसासों को हम सिमटे कैसे
कहां हो पाता है मुकम्मल मकां-ए-नज्म मिरा
हर बार टूट जाते है अहसास,
ख्वाबों के जैसे
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