Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • लड़ती रही जिंदगी से खुशियों के लिए

    लड़ती रही जिंदगी से खुशियों के लिए
    झगड़ती रही खुद से अपनों के लिए
    उम्मीद थी इक सच्चे प्यार की इस झूठी दुनिया में
    आंखे बंद करने की ख्वाहिश है सपनों के लिए

  • shikawe

    !!!!! SAGAR KE DIL SE !!!!!

    apno ne hi loot liya yarro
    shikayat karte bhi tau kis se

    apno ne hi zakham diye yaaro
    marham lagwate bhi tau kis se

    chor kar aaye apne hi mujhe
    masaan tak

    gila aur shikwa karte bhi tau kis se

    @@ SAGAR @@
    21/12/15 :: 11:30 PM…. (642) … ©

  • ” किस्सा–कुर्सी — का “

    व्यंग्य गीत ———– अनुपम त्रिपाठी
    ” किस्सा–कुर्सी — का ”
    बचपन में किस्सों में कुर्सियों की बातें सुनते थे।आजकल कुर्सियों के किस्से आम हैं । लेकिन ये कुर्सियाँ मिलती कैसे हैं ?
    इस लोकतंत्र की महती विडम्बना भी यही है कि ; कुर्सी सेवा पर हावी है।
    बेशक ; लोकतंत्र जीवित है ——– जीवन्त नहीं बना पाए हम इसे ।
    क्या अपने वर्तमान — अपने इतिहास से सीखा है;हमने कुछ!!!
    —————–*********—————–
    ये कुरसी का खेल रे भैया ; ये कुरसी का खेल है |
    राजनीति में आज शराफत ; बुरीतरह से फेल है ||
    अर्थव्यवस्था गिरवी हो गई ; विश्व-बैंक के हाथों में ।
    बजट तोडता दम ये हमारा ; कर्ज के भारी खातों में ।।
    भूख–गरीबी–बेकारी या ; रोटी–कपड़ा और मकान।
    सिमट के सारी तकलीफें भी ; रह गई कोरी बातों में ।।
    मज़हब : वोट बैंक बन गया ; धर्म बना : सत्ता की सीढी।
    पिछला कितना भोगा हमने ; भोगेगी अब अगली पीढ़ी ।।
    सबसे सस्ता खून हो गया ; बिकता मंहगा तेल रे भैया।
    ————————– ये कुर्सी का खेल है भैया ।।1।।
    ————————-
    “दल–दल”में दल मिलते जाते ; नया मोर्चा रोज बनाते।
    जनता का दिल धडका करता ; सेन्सेक्स के आते – जाते।।
    संविधान का चीर –हरण अब ; संसद में भी आम हो गया।
    नैतिकता और जनसेवा का ; नारा ही बदनाम हो गया।।
    घडियालों से पटा पडा है ; लोकतंत्र का महासमन्दर।
    अपना ही सिर मूंड रहे हैं ; “गाँधी—- टोपी वाले बंदर” ।।
    जेब में दम हो– तुम भी खरीदो ;चुने हुओं की सेल रे भैया।
    —————————- ये कुर्सी का खेल रे भैया ।।2।।
    ————————
    जब हों इलेक्शन—-भूल के फ्रेक्शन ; सारे एक हो जाते हैं।
    अल्पसंख्यक और दलित नाम पर ; सारे नेक बन जाते हैं।।
    हिन्दू–मुस्लिम—सिख–ईसाई ; कहता कौन हैं : भाई-भाई।
    अलग–अलग कानून सभी के ; जुदा—जुदा है : रहनुमाई।।
    वोट का सारा गणित इन्हीं से ; ताश के बाबन — पत्ते हैं ।
    वक्त — जरुरत ट्रम्प — कार्ड ये ; बाद में सारे छक्के हैं ।।
    पाँच साल तक सोते रहते ; फिर मचती रेलम-पेल है भैया।
    —————————– ये कुर्सी का खेल रे भैया ।l3ll
    ——————-
    ज्यों–ज्यों मंहगी हुई है खादी ; नेताओं के मूल्य गिरे हैं ।
    नैतिकता के ताने—–बाने ; नेतृत्व के कारण बिखरे हैं ।।
    मूल्यवृध्दि में पिसकर अब ; जनता ये सिर धुनती है ।
    धूँ….धूँ करके देश जल रहा ; ” दिल्ली ॐचा सुनती है “।।
    अरे ! जागो—-जागो भारतवालों ; देश तुम्हारी थाती है।
    ” सिंहासन खाली करो …… कि ; जनता आती है ” ।।
    मेरा देश महान है , क्योंकि ; लोकतांत्रिक जेल है भैया।
    ————————- ये कुर्सी का खेल है भैया ।।4।।
    ————————-
    संविधान की सब धारायें ; सुविधा के आधार पर चलतीं।
    नेताओं की निष्ठायें भी ; मौका देख के रंग बदलतीं ।
    दो दूनी वे पांच हो गए ; पत्थर थे : अब काँच हो गए ।
    इतना झूठ पका हांडी में ; नेता सारे : आँच हो गए ।।
    देशप्रेम अब हवा हो गया ; सुन बापू ! ये क्या हो गया ?
    फिर से तिरंगा बीच सडक पर;जाने न्याय कहां खो गया।।
    मरजी पे मतदान कराते ; इनकी कहां नकेल रे भैया ..।।
    ————————— ये कुरसी का खेल रे भैया ।।5।।
    ***************
    (अपने जन्मस्थान की वीरांगना रानी झांसी को और उनके माध्यम से समस्त स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को श्रृध्दासुमन सहित ] **************
    आजादी की अमर—- कहानी ; जाने कितनी बार पढी ।
    फिर भी याद नहीं ये हमको ; कहां की ” रानी खूब लडी” ।।
    कौव्वे सारे शिखर पे बैठे ; भटक रही कोयल वन–वन में ।
    सुलग रही है — आग मगर ये ; हौले — हौले जनगण में ।।
    अब विश्वास करें हम किसपर? और किसे हम अपना मानें ??
    हर चुनाव में दुविधा भारी ; अंधे चुनें …… या चुन लें काने।।
    जहाँ हो मरजी — चेन खींच लो ; देश ये जनता–रेल है भैया।
    अब बदलाब जरुरी “अनुपम” ; बासी हो गई भेल रे भैया ।।
    ——————————ये कुरसी का खेल रे भैया ।।6।।
    ……………….. ये कुरसी का खेल है……… ………………………..
    ‪#‎anupamtripathi‬
    ‪#‎anupamtripathiG‬
    *******************——-**************

  • हास्य कविता — सन्नाटे की गूँज

    (हर पति की ओर से अपनी पत्नी के प्रति शाश्वत भावना एवं हर पत्नी की अपने पति के प्रति सारस्वत भावना को समर्पित् हास्य — रचना )

    आखिरकार ईश्वर ने हमारी सुन ही ली
    आज सुबह-सबेरे ही पत्नी बोली ——-
    “ऐ; जी! सुनो , मैं तो मायके चली
    यहां तो तंग आगई हूं
    कुछ दिन चैन से रहूँगी
    : हद होती है; यार ! ………. कब तक सहूँगी “.

    खुली जेल में ; यह पहली आजादी की
    बयार थी
    दोपहर तक श्रीमती जी! सामान सहित
    तैयार थी
    : हमारा मन-मयूर नाच रहा था
    पत्नी की हर भंगिमा जाँच रहा था.

    तभी उसने धमाका सा किया ;
    एक कागज़ गोपनीय — पत्र सा
    हमें थमा दिया
    क्या करें ? ———– क्या ; न करें ??

    कागज़ क्या था! दिशानिर्देश भरा फरमान था
    पत्नी का जाना जितना सच था —————-
    आजादी का अहसास उतना ही बे- ईमान था.

    -“घडी का अलार्म सुबह छह पर है : उठ जाना
    सात बजे नल चले जायेंगे — : जल्दी नहाना
    फिर दूधवाला भईया आयेगा ;
    दूध लेकर गरम कर लेना
    : दूध और गैस को भूल मत जाना ————-
    याद रखना ! सिर्फ अखबार ही न पढ़ते रहना !

    —” ठीक आठ बजे कामवाली बाई आयेगी
    कामचोर है : तुम्हें अकेला जानकर रिझाऐगी
    : मेरी कसम है ! ——— उससे बचकर रहना
    बेहतर होगा ; उस दौरान
    कुछ पूजा पाठ कर लेना .”

    — “खाना तो बाहर ही खाओगे ? ? ? ? ?
    मुझे पता है —— फिर उसी जगह जाओगे ?
    : इससे बेहतर मौका कब मिलेगा ? ? ?
    बुढापा आ गया है !
    ये सब आखिर कब तक चलेगा ? ”

    —“अच्छा होगा ; अगर रोज शाम – बिना काम
    एक – एक करके पुराने दोस्तों के घर हो आना
    : देखो जी! अपने ही घर में रोज ;
    महफिल मत जुटाना .”

    यह उसकी सलाह थी — या; मुझपर ऊलाहना
    समझ सको यार ! —- तो ; मुझे भी समझाना .

    मैं ; शांति से सब पढ ———- सुन रहा था
    तमाम झंझावतों के बीच ,
    हसीन सपने बुन रहा था

    पता नहीं क्यों ?
    आज घडी भी कुछ धीमी चल रही थी
    भाग्यवान ! …….तैयार तो थी;
    पर बाहर नहीं निकल रही थी.

    उसका भाषण जारी था ———-
    उफ़ ! समय भी कितना भारी था.

    आखिरकार वह घङी भी आई;
    पत्नी को हमने दी भावभीनी बिदाई

    उसकी आँखों में अविश्वास-सा झलक रहा था
    शायद ! मेरा चेहरा ; खुशी के मारे
    ———————— कुछ ज्यादा चमक रहा था.

    गार्ड की पहली व्हिसिल के साथ;
    उसने अंतिम बार चेताया
    –” याद रखना ! —– कुछ गडबड न हो !!
    ——– जल्दी ही आ जाऊँगी ———

    अपना ध्यान रखना —- रोज मुझे फोन करना .

    मैं ; आज्ञाकारी—- सा सिर हिलाता रहा
    गाडी अभी हिली भी न थी ………………..
    बे — वजह दोनों हाथ लहराता रहा .

    आखिरकार ; राम-राम करके गाडी खुली
    मैंने राहत की साँस ली ——————–
    उड़ते – उडाते घर पहुंचा ;
    मन को देता रहा धोखा.

    सामने खाली पडा मकान मुंह चिढा रहा था
    हर बीता लमहा शिद्दत से याद आ रहा था

    पत्नी की उपस्थिति से बढ़कर …………..
    …………… उसकी रिक्तता पसरी पडी थी

    मैं वही था…………….. दीवारो — दर वही थे
    लेकिन ; ………. “घर ” कहीं खो गया था.

    धीमी चलती घडी ———- रुकी खडी थी
    सन्नाटा : चींख रहा था —————–
    ——————- तनहाई : बिखरी पडी थी.

    हर औरत !
    ” अपने घर ” की ज़रुरत होती है………

    हाँ ; ये सच है कि —————–
    अपनी उपस्थिति में ही ” वह ”
    अपना वुजूद खोती है ……..
    हाँ ! यही सच है——————

    ***********———************———*******

  • गुस्ताखी माफ़ !

    गुस्ताखी माफ़ !

    बच्चों के प्रश्न भी अज़ीब होते हैं !
    मगर ; सच्चाई के कितने क़रीब होते हैं !!
    कल ही आधुनिक–भारत का सच पढ़ते हुए ,
    प्रत्यक्ष – से , परोक्ष – रूप में लड़ते हुए ,
    मेरे बेटे ने मुझे पूछा ——————-
    ‘‘ पापा ! कानून की आंखों पर पट्टी क्यों बंधी होती है ?
    क्या, न्याय—-प्रक्रिया वास्तव में अंधी होती है ?? ’’

    ‘‘ हे, ईश्वर ! यह प्रश्न था या पहाड़ ?
    सभी तो समान हैं —————
    बिहार का बेऊर जेल हो…या दिल्ली का तिहाड़. ’’

    मैं , ………………… निरूत्तर था,
    बेटे का प्रश्न — स्वयं में उत्तर था.

    उसकी जिज्ञासा जारी थी —- मेरे अनुभव पर भारी थी.

    वह बोला -‘‘ शायद ! कानून ; धृतराष्ट्र की तरह जन्मजात् अंधा होगा
    या फिर , भीष्म—पितामह-सा , संवैधानिक—- सत्ता से बंधा होगा
    यदि लोग जान लेंगे कि , कानून : वास्तव में अंधा है ,
    : अंधाधुन्ध फैसले इसीलिए करता है
    तो, उनका विष्वास उठ जायेगा………………
    अदालत तक , न्याय पाने , कौन जायेगा ? ’’

    ‘‘ लोगों में यह भ्रम बना रहे कि , कानून अपना काम कर रहा है ……………
    न्याय : केवल नज़ीर की बात नहीं , वातावरण—-सा चारों ओर बिखर रहा है
    न्यायमूर्ति ! आंखों पर पट्टी बांधकर , सबूतों के आधार पर सच पहचानकर ,
    उसी की तरफ फै़सला सुनाता है—‘तराजू का जो पलड़ा’ भारी कर दिया जाता है ’’
    ‘‘ तराजू : इसीलिए तो खाली झूलती है, पापा !
    कि, जो चाहे ——— अपनी ओर झुका ले. ’’

    मैं, इस नये दृष्टिकोण से हैरान था,
    बाल-सुलभ अंदाज़ से परेशान था
    उसे कैसे समझाता —- ‘‘ हे, आज़ाद भारत के निष्कलंक आईने !
    तू कब बूझेगा , प्रतीकों के माईने ? ’’

    – ‘‘ कानून की आंखों पर बंधी पट्टी , भेदभाव–रागरंजिश से परे होती है
    प्रेमचंद का ‘पंच—परमेश्वर ’, ‘ अलगू ’ हो या ‘ जुम्मन ’ ,
    खाला—-सी—-जनता , न्याय पर भरोसा धरे होती है

    —— ‘‘ बेटे ! यह तुम्हारा नहीं, पीढ़ी का दोष है
    मुझे पता है, तू ! पूर्णतः निर्दोष है. ’’

    —‘‘मीडिया के मार्फत अपराध का महिमामंडन् ,
    व्यवस्था का हृास———–मूल्यों का विखंडन् ,
    इसी तरह का सामाजिक ढांचा तैयार करता है
    कि , आदमी ! अपनी परछाई से भी डरता है . ’’

    ———‘‘ न्यायाधीश भी इन्सान् होता है , ‘ उसका भी ईमान होता है’ !
    समाज़ : समय का आईना होता है , समय : सत्य को सूत्र में पिरोता है. ’’
    ——‘‘ तू ! आस्था का चिराग जलाये रखना , ताउम्र सच की राह पे चलना
    प्राकृतिक-न्याय सदैव निष्पक्ष होता है, सत्य : सुगंध की तरह प्रत्यक्ष होता है”

    क्योंकि, झूठ के पाँव नहीं होते !
    परछाईयों के गाँव नहीं होते !!

    : अनुपम त्रिपाठी

    ….000….000….000….

  • मित्र कौन !

     

    सच्चा मित्र —— होता है : संघरित्र !

    आपसे जुड़कर—आपका विषाद बाँटता है
    आपकी ऊष्मा आत्मसात् करता है
    ……….. आपको ऊर्जा से भरता है.

    सच्चे मित्र के मुँह पर ; ऊगते हैं : बबूल !
    वह गुलाब–सा ललचा कर
    लहू——-लुहान नहीं करता
    : अनचाहे–अनजाने काँटे नहीं चुभाता
    आपकी परछाई होता है………………..
    ……………..आप पर हावी नहीं हो जाता .

    सच्चा मित्र …… आपकी ज़रुरत होता है !
    वह आपके ” मन के खलिहान ” में
    सजग प्रहरी सा सोता है
    जब आप बेख़बर होते हैं
    वह…… जाग रहा होता है
    : आपके दुश्मनों के पीछे
    ———– भाग रहा होता है.

    आप !
    मित्र के कांधे पर सिर टिकाकर
    ————— रो सकते हैं
    मित्र के विश्वास से महकते मन में
    ————— सो सकते हैं.

    सच्चा मित्र ; आप से कभी प्रतिदान नहीं चाहता !
    वह ” कर्ण– विदुर या भामाशाह ” सा होता है
    वही तो अनुभव के महासागर की थाह होता है.

    सच्चा मित्र ; जीवन की परम् उपलब्धि होता है
    ” सब कुछ ” खो जाता है
    : जब सच्चा मित्र खोता है.

    तो; क्या ‘ हम ‘ भी !
    किसी का सच्चा मित्र बन पाए हैं ?
    : अनुपम त्रिपाठी
    ************—————–***********
    संघरित्र— एक उपकरण जो ऊर्जा का संचय करता है/Condenser./capacitor
    ———*********———–

  • #2Liner-30

    कुछ तो खता तुम्हारी, बेशुमार यादों की है ‘साहब’;
    .
    ღღ___यूँ ही बे-सबब कोई, आवारा नहीं होता !!…….‪#‎अक्स‬
  • khushi aur gam

    !!!!! SAGAR KE DIL SE !!!!

    bahut koshish karta hun
    khushion ko paas bulane ki

    par shayad gammo ka
    pehra kuch jayada hi sakht hai

    @@ SAGAR @@
    30/12/15 :: 11:22 AM …. (___) …. ©

  • “ धूप की नदी “

    लड़की ; पड़ी है : पसरी
    निगाहों के मरुस्थल में
    ………….धूप की नदी सी ।

    लड़की का निर्वस्त्र शरीर
    सोने—सा चमकता है
    लोलुप निगाहों में
    शूल—सा चुभता है ।

    मगर , वह बे—खबर है
    पसरी
    पड़ी
    है
    धूप की नदी सी ………
    निगाहों के मरुस्थल में ।
    देह की रण—भूमि पर
    विचारों के कुत्सित—शस्त्र
    मर्यादा का ख़ून कर
    गूँथ गए भूलकर
    लड़की का बे—बस पिता
    हाथ जोड़े तक रहा
    : एक और जलती चिता ।

    लड़की ; तनिक भी नहीं हिली ……शायद ! वह जानती है : अपनी नियति ।

    उसे ; पता है ———–
    निगाहों का मरुस्थल , उसका जीवन होगा !
    और धूप की नदी : उसकी अभिन्न सखी !!

    उसे ; पता है ———–
    फैला
    है
    जिस्म
    धूप बनकर धरती पर ।
    कल ;
    जब होंगे ….. उसकी देह पर खेत
    हटाई जाएगी …… आसपास की रेत
    वक्त : एक सवाल बनकर सम्मुख खड़ा होगा
    “ शीशे की दीवार पर “ ; पारे—सा जड़ा होगा

    निगाह : नदी बनकर बहेगी
    नदी : समर्पण—कथा कहेगी
    उसका हौंसला — उसकी उड़ान होगा
    मुट्ठी में बिंधा ——– आसमान होगा
    इतिहास के पृष्ठों से उभरकर ……….
    भविष्य की जमीन पर बिखरकर……….
    ……………….. नई इबारत लिखी जाएगी
    यही नदी : समंदर की पहचान कहलाएगी

    जिस्म
    का
    जंगल
    सुलगेगा
    : बनेगा कुन्दन
    धूप के मरुस्थल में ……………
    ………………. हवस दम तोड़ देगी

    इसीलिए तो ; ——-
    पसरी पड़ी है : लड़की
    : निगाहों के मरुस्थल में
    : धूप की नदी सरीखी ।
    : अनुपम त्रिपाठी

  • use dhund

    tu use mandir ya masjid me mt dhund.
    usne mohabbat ki h
    use meykhane me dhund..

  • bharosa

    !!!! SAGAR KE DIL SE !!!!!

    Koi gair phir bhi de dega sahara tujhe

    apno ke bharose reh kar kahin gir na jana

    @@ SAGAR @@
    22/12/15 :9:19 PM

  • “आवारगी” #2Liner-29

    ღღ__इक उम्र गुज़ारी है आशिक़ी में, तो जाना है;
    .
    कुछ नहीं मिलता, इसमें इक आवारगी के सिवा !!……..‪#‎अक्स‬

  • दमन चक्र में घिरे हुए नर की व्यथा कौन कहे

    दमन चक्र में घिरे हुए नर की व्यथा कौन कहे
    शोषित होती नारी के, आसूओं में कौन बहे
    दिखती है अंधी दुनिया मुझे अपने चारो ओर
    ऐसी परायी दुनिया में बोलो कौन रहे ??

  • naakam mohbbat

    !!!! SAGAR KI KALAM SE !!!!!

    itne mash’hoor ho gaye hum
    nakam jo hue mohabat main

    ki hum se hamari hi dastaan
    bayaan kar gaya ik ajnabi

    @@ SAGAR @@
    24/12/15 :: 2:00 PM

  • मैं आंसू बटोर लाता हूं

    सैकड़ों आंसू …. , यूं ही नहीं …. खज़ाने में मेरे ,

    जब भी कोई रोता है , उसके आंसू बटोर लाता हूं .

    किसके हैं … , कब गिरे थे … वज़ह …… बता सकता हूं .

    उंगलियों के पोरों पर रख …
    गिरने का…. वक़्त बता सकता हूं .
    सफर अनज़ान ही सही .. पर खत्म किस जगह …
    वो मंज़िल बता सकता हूं
    आंसूओं से मिलान आसूओं का कर ..
    फ़र्क़ बता सकता हूं
    आंखों के….. मज़हब से …..नहीं वास्ता इनका ,
    नमक क्यूं घुला… आंखों से निकलकर …
    वो दर्द बता सकता हूं .
    झूठी शान का है ……या भूखे पेट से टपका
    चख के खारापन ……
    इनका फर्क़ बता सकता हूं
    मैं हर आंसू का किमिया बता सकता हूं ॥
    कुछ खास आंसू भी रखें हैं , मेरे खज़ाने में ,
    ज़िंदगी के दौड़ में नाक़ाम …..
    और “ हासिल” से नाखुश
    कई दुख के आंसू …..
    बिकते ज़िस्म के भीतर . … मौजूद
    पाकीज़ा रुह के .. आंसू
    फिर भी …. समेट नहीं पाता हूं
    एक़्वेरियम में कैद —
    शीशे से झांकती
    मायूस आंखों के आंसू ..
    जो निकलते ही घुल जाते हैं ,
    अपने ही संस्कारों के पानी में .
    आसान नहीं है , हर आंख को इंसाफ़ दिला पाना
    थक कर सोचता हूं , छोड़ दूं ये काम अपना
    पर क्या करुं….
    काम मन का हो तो , छोड़ा नहीं जाता
    लाख चाह के भी मुंह मोड़ा नहीं जाता
    अरे सुनी है … ये सिसकी .. अभी तुमने …
    जाना होगा… मुझे ….
    गिरने से पहले जमीं पर… थामना होगा उन्हें
    क्या करूं , मैं हूं ही ऐसा …
    शामिल .. उन चंद लोगों में….
    जो बेज़ुबानों के बोल जानते हैं ,
    जो उनके आंसूओं का मोल जानते हैं . ॥
    ………………..रविकान्त राऊत 
  • “ सच का साक्षात्कार “

    कल अनायास मिला राह में
    दीन – हीन ; कातर
    याचक—सा खड़ा : सच
    उसने आवाज़ लगाई —
    “ मुझे रास्ता बताओ ….. भाई ! “
    सच एक सुगंध की तरह फैलता है : ज़ेहन में
    और ; मसल देते हैं …….. लोग
    भावनाओं को ————– जुगनुओं की तरह
    — “ जाने कब से भटक रहा ; बेचारा !”
    मैंने सोचा , ……… साथ ले आया
    लोग कतराने लगे ………………
    मुझसे परे जाने लगे ……………
    क्योंकि ; अब लटका रहता हरदम
    : सच मेरे काँधों पर
    शब्द : आँखों की शालीनता और
    भावों का माधुर्य बाँटने के बावजूद
    : अश्लील क़रार दिए गये……….
    मैं ; परिचितों से होता गया दू…र और दू……र
    ज्यों—ज्यों बनता गया : सच …… मेरा अंतरंग
    यक़ीन कीजिए ; कई बार सोचा ————————–
    “ कहीं दू….र छोड़ आऊँ —— मुसीबत से छुटकारा पाऊँ “
    लेकिन ; नैतिकता का तक़ाज़ा ………………….
    ..“ जाने कितना भटका होगा ; ……… बेचारा ! “
    : सच ; मेरे साथ ही रहा ………….
    “ वह “ आत्म-ग्लानि में डूबा …… एकाकी—उदासीन
    “ मैं “ ; डरा—सहमा ………..उपेक्षित—–आत्म—लीन
    धीरे—धीरे बौखलाने लगा : सच !
    सच ! बात…बे-बात झल्लाने लगा
    अपनी उपस्थिति जानकर ; छद्म—परिवेश पहचानकर
    कड़वाहट घुल गई , सच की जुबान में
    उभरने लगी हताशा ————- आँखों के तरल पर
    “उसने” ; बाहर निकलना बंद कर दिया
    घोंघे—सा दुबका रहता,“चुप के मकान में“
    लोग आते ——– झाँकते मेरे कमरे में
    सच की उपस्थिति महसूस कर
    : नि:शब्द लौट जाते
    —– कहीं कोई अवसाद नहीं………………
    सच ……………. बैचेन रहने लगा
    अपने—आप से अनमना ; एक दिन बोला —-
    “ मुझे उन्हीं बीहड़ों में छोड़ आओ : भाई ! “
    “ ये ; फ़रेब की दुनियाँ , कतई रास नहीं आई !!”
    —– “ मर चुकीं हैं ……….. मानवीय संवेदनायेँ
    परस्पर ; मात्र औपचारिकता का नाता है ………..
    यहाँ तो ; साया भी मुँह चुराता है……………………. “
    आज भी ; असंख्य सच मँडराते हैं : हमारे आस—पास
    मगर ; हम गुजर जाते हैं ; उनसे नजरें चुराकर : सप्रयास
    सच !
    बेहद हताश होकर जुटाते हैं
    : थोड़ी—सी नींद
    और “दे…….र—– सुबह” तक सोते हैं——-
    यक़ीन कीजिए ; ——————–
    सच ! ………… सारी रात रोते हैं———–
    ***********————*****************

  • “साँसें”

    ღღ__बाकी हैं चन्द साँसें अब, बेज़ार से दिसम्बर की;
    .
    एक नए दिन की तलाश में, पूरा साल ही जा रहा है !!…….‪#‎अक्स‬
  • अब तो दिल ही हमारा महफिलों ढल गया

    तालीम नहीं मिली कभी, ना इल्म था हमें कभी
    बस इक तसव्वुर था, जो ज़हन मे घुल गया
    कभी शिरकत किया करते थे, हम महफिल ए इश्क में
    अब तो दिल ही हमारा महफिलों ढल गया…

  • “ठंड” #2Liner-28

    ღღ__माफ़ करना पर आज, कोई शायरी नहीं है “साहब”;
    .
    कि रिश्तों की ठंड में, लफ्ज़ भी जम गये मेरे !!……..‪#‎अक्स
  • par shaayad pyaar bhot hi khoobsurat hai….

    pyaar sirf ek alfaaz hai humare liye…

    jiski na koi surat hai, na hi koi murat hai…

    par aapke alfaazon se andaaza lgate hai,

    jo bhi ho,

    par shaayad pyaar bhot hi khoobsurat hai….

  • ” फैसला” #2Liner-27

    ღღ__मेरे गुनाह-ए-इश्क़ का, कोई फैसला तो सुना दो “साहब”
    .
    इस दिल को समझाने में, कुछ वक़्त भी तो लगता है!!…..‪#‎अक्स‬
  • kyunki aaj hum khud k liye bhi laapta hai…

    chal pdii hu aise ek raste pr,

    jiski manzil ka na koi pta hai….

    khushiyaan dene ki koshish ki maine bhot,

    yahi meri sabse bdii khta hai….

    meri talaash mein mat nikalna yaaron,

    dhund na paoge humein….

    kyunki aaj hum khud k liye bhi laapta hai….

  • khaabon k zariye hi tumse milna ab pasand hain humein…

    dil-o-jaan se chahte hain hum tumhein…

    hakiqut mein milna shaayad ab naseeb mein nahi…

    isliye jaldi palko ka milan aankhon se kra dete hai…

    kyonki khwaabon k zariye hi tumse milna,

    ab pasand hain humein…

  • ” इक जिद्द अधूरी रह गयी “

    थे क़रीब इक दूजे के ….

    लेकिन फिर भी दरम्यां हमारे , दुरी रह गयी ….

    इबादत करते हुए , इक भी दर ना छोड़ा ख़ुदा का …

    फिर भी कोई मज़बूरी रह गयी..

    कह देते थे , महफ़िल – ए – यारों में ….

    ” वो हैं मेरी ” …

     

    .

    बस यही इक जिद्द अधूरी रह गयी …..

     

    पंकजोम ” प्रेम “

  • आज मेरे आंगन में आफ़ताब आया है

    आज मेरे आंगन में आफ़ताब आया है
    सर्द दिन में लगता है ख्वाब आया है
    नये नये रंगो में नहाया हुआ
    जिंदगी का नया पैगाम आया है

  • ” धुंधला नजारा “

    मोहब्त का ले सहारा उन्हें पाने की सोची…..

    ख़ुद ही बे – सहारा हो गए …..

     

    जिनका अक्श कभी ओझल ना हुआ , नजरों से ….

    वही आज इक धुंधला नजारा हो गए ….

     

    जिन सागरों के किनारों पर रुक जाती थी ….

    हमारी कश्ती – ए – चाहत ….

     

    आज वहीँ सागर बे – किनारा हो गए …..

     

    पंकजोम ” प्रेम “

  • ” कसक मुसलसल है “

    चलो आज बात करे गुज़रे जमाने की

    मैंने जरूरत समझी आप सबको बताने की …..

     

    संग उसके मुस्कुराकर समझते थे

    क्या बेनज़ीर रौनक है मेरे काशाने की ….

     

    इक मरतबा भुला ही दिया ख़ुदा को

    बड़ी ख़ुशनसीब जिंदगी थी इस दीवाने की …

     

    बेसूद हुआ एक एक अल्फ़ाज़ मेरा

    जब कोई राह ना दिखी उसे मुझे चाहने की…..

     

    वो इस क़दर रुसवा हुए मुझ से

    की इक बार भी ज़रूरत ना समझी लौट आने की …

     

    वो दिल से एक दफ़ा अपना कह देते

    तो आज ग़ैरों से जरूरत न होती कहलवाने की…..

     

    कल मोहब्त भरी निग़ाहों से तराश लेते हमें

    तो आज ज़रूरत ना होती नज़रे चुराने की….

     

     

    1. ये  दौर – ए – इखलास सदा क़ायम रहेगा ” पंकजोम ” प्रेम

    बस कसक मुसलसल हैँ इंसान बदल जाने की……

     

    पंकजोम ” प्रेम “

  • “सितम” #2Liner-26

    ღღ__जो तुम कर रहे हो “साहब”, सितम की इन्तहा नहीं तो क्या है;
    .
    कि दूर भी जा रहे हो मुझसे, वो भी ज़रा-ज़रा कर के !!………‪#‎अक्स‬
  • समझने को दुनिया ने क्या क्या हमें समझा

    समझने को दुनिया ने क्या क्या हमें समझा
    जो न समझना था, लोगो ने वही समझा
    देख के दुनिया की समझदारी, हम यही समझे
    जो न कुछ समझा यहां, वही सब कुछ समझा|

  • ” चाँद ” आया हैं

    क़ायनात ने क्या ख़ूब साज सजाया हैं ….

    जिंदगी के बे- रंग रंगो ने क्या रंग दिखाया हैं….

    ज़रा नज़रे उठा देख ए – फ़लक , मेरी और ….

    मिलने मुझ से ” चाँद ” आया हैं….

     

    पंकजोम ” प्रेम “

  • लफ्ज है ये या बेबस दिल है मेरा

    लफ्ज है ये या बेबस दिल है मेरा
    धड़कन जिसकी किसी को सुनाई नहीं देती… अनु

  • किनारे रहते है लोग मेरी मझंधारों से

    कोई नहीं जानता ख्वाहिशें मेरी
    अनजान है सब मेरे ख्वाबों से
    मेरे अश्कों को पानी समझती है दुनिया
    किनारे रहते है लोग मेरी मझंधारों से

  • “वफ़ा” #2Liner-25

    ღღ__भला और क्या दूँ तुझको, सुबूत अपनी वफ़ा का मैं;
    .
    कि ख़ुद का भी ना हुआ हूँ, जबसे तेरा हुआ हूँ मैं !!…….‪#‎अक्स‬
  • बस दर्द के शार्गिद में अब नज्में-ए-गम लिखा करते है

    वो पूछते है हमसे कि आजकल हम क्या करते है
    क्या बताएं कि उनके इंतजार में किस कदर मरते है

    अपने अहसास, अपनी आरजू दिल में दबाए रखे है
    वो कहते है कि आजकल हम कुछ चुप से रहा करते है

    कहते है वो आज से हम बाते नहीं करेंगे आपसे
    उनके लफ्जों के सहारे ही लम्हे गुजरा करते है

    जाते जाते वो आज जो हमसे खफ़ा हो गये
    बस दर्द के शार्गिद में अब नज्में-ए-गम लिखा करते है

  • ” मेरे अल्फाज़ “

    महफ़िल – ए – यारोँ में , थोड़ा अलग दिखा देते हैँ …..

    मुझे , मेरे अल्फ़ाज ……

    फितरत बता देते हैं , मेरी ….

    मेरे अल्फ़ाज …..

    मैं इंसान हूँ तो जायज़ हैं , नफ़रत मैं भी कर लूँ …..

    लेकिन हर मरतबा मोहब्त जता देते हैं …….

    मेरे अल्फ़ाज …..

     

    पंकजोम ” प्रेम “

  • “ख्वाहिशें” #2Liner-24

    ღღ__शायद ये आँखें मूँद लेने का, सही वक़्त है “साहब”;
    .
    कि रोज़ ख्वाहिशों का मरना, हमसे अब देखा नहीं जाता !!……‪#‎अक्स‬
    .
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  • “बेबसी” #2Liner-23

    ये सर्दियों का मौसम, और ये तन्हाईयों का आलम;
    .
    कहीं जान ही ना ले-ले, इनसे मिलके बेबसी मेरी !!……‪#‎अक्स‬
    .
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  • जिंदगी जैसे रुक सी गयी है

    दिल खोया हुआ है अलसाई बादियों में
    ख्वाबों को भी नींद लग गयी है
    सर्दी की इस अलसाई आदतों ने
    जिंदगी जैसे रुक सी गयी है

  • ” तलबगार हो गए “

    तलब ऐसी उठी दिल से…..

    की उन्हीं के तलबगार हो गए….

    जमाने की जुबां पर ….

    किस्से हमारी मुलाकातों के बार – बार हो गए….

    पता कर चुके थे , हैँ उनकी तरकश में इक तीर – ए – मोहब्त …..

    और उसी तीर के हम शिकार हो गए….

     

    तलब – चाह

    तलबगार -चाहने वाला

  • एक अधूरा बचपन

    एक अधूरा बचपन

    आंधी की आग में जला था एक घर,

    हँसी थी गई,  खिलौने थे टूटे, छूटा था एक बचपन !

     

    घर था टुटा, आदर्श था छूटा ,

    चल रही थी सासे, दम था घुटा,

    दिखावटी थे अपने,थे उनके झूठे सपने,

    दिन के उजालो में उम्मीद थी गयी मर,

    रात के अंधेरो में माँ की आँखे थी तर,

    एक आंधी में टुटा जो था घर !

     

    रंगो-सजावट के जोर में, पटाखो के शोर में,

    आई थी होली, आई थी दिवाली,

    सुना सुखा अँधेरे में था एक घर !

    रंगो-रौशनी के त्यौहार में कैसे बनाता ख़ुशी,

    कैसे भूलता जलती रौशनी में बेरंग हुआ था एक घर,

    हँसी थी गई, खिलौने थे टूटे, छूटा था एक बचपन !

     

    ना बदली थी गीता, ना बदली थी कुरान,

    सब पर समय था बलवान,

    समय बदला था, बदला था हर इंसान …

     

    समय ने आँखे भरी, भर आया हौसला,

    जब तिनको से बनाती दिखी चिड़िया घोंसला,

    यादो से आगे बनने चला था नया घर,

    कोने में थी यादे, कोने में था बचपन,

    ना आई वो हँसी, ना आये वो खिलौने, जो अधूरा था बचपन !

     

    आंधी की आग में जला था एक घर,

    हँसी थी गयी, टूटे थे खिलौने, छूटा था बचपन!

    [सचिन सनसनवाल ]
  • “याद” #2Liner-22

    ღღ__इस कदर भी याद, ना आया करो “साहब”;
    .
    मेरी खुशियों की नींद में, खलल पड़ता है !!…….‪#‎अक्स‬
    .
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  • kya bataye…

    kya bataye kese din maan chalte h

    mere..

    bahut hi kharab haalat par har pal

    machalte h mere.

    mein jhuti hasi hasu toh bhi mera hi

    kasoor…

    ke dusman to dusman dost bhi jalte h

    mere….

    pahle jin aankhon me sapne the aaj

    wo banjar h.

    sapne dekhne ke liye bhi sapne taraste

    h mere..

    sochta hu pyar chahiye to kisi ko dil

    dedu.

    par hoshle fir vahi galti karne se darte

    h mere..

    bachpan me bahaya aansu aaj bhi

    yaad h.

    khuch lamhe jo jiye sadiyo jese gujarte

    h mere..

    ek to dil nazuk aur har khusi me avsad.

    ke bat bat pr aankho se barf ke parvat

    pighalte h mere….

    by kavi ”MAN”

  • darr h muje

    vishvas na krna tum muj par
    glti se toot jane ka darr h muje..
    mera na hona tum kbhi par
    tere chuut jane ka darr h muje..
    yu to kbhi m drii nhi zindgi me
    par tere liye sb bhul jati hu m…

    ye koi mohabbat to nhi..
    mgr ho jane ka darr h muje..

  • ” राह – ए – माबूद “

    थोड़ा रंज में , थोड़ी ख़ुशी में , साल ये बीता ….

    ख़ुद की मोहब्त को हारा , लेकिन फिर भी जीता ……

     

    मुसलसल हैं आज भी यादों का कारवाँ ….

    थोड़ा तन्हा , थोड़ा मुस्कुराकर हूँ लिखता …

     

    मुसाफ़िर हूँ यारों  , मंज़िल का पता नहीं ..

    इक टक लगायें राह – ए – माबूद हूँ देखता …

     

    जाने वाले चले गए अपना बना कर ….

    आख़िर कोई क्यों नहीं , जाने वालों को रोकता ….

     

    कल मेरी मोहब्त किसी और की हो गयी ….

    मैं समझा , ना जाने क्यों ये दिल नहीं समझता ….

     

    और भी है रंग जमाने को अपने ” पंकजोम ” प्रेम ….

    लेकिन उस रंग के बग़ैर , कोई और रंग नहीं जमता ….

     

     

    मुसलसल – निरन्तर 

    माबूद – ईश्वर

  • jane kya baat hogi

    jane kya baat hogi aaj din bhar me
    khusi c baith gyi h seene me
    lbon se muskurahat hatt nhi rhi
    kosis kitni krega jmana bhaf ne
    jane kya baat h aaj subh bhar me..

    sbdo ne funki ek nyi jaan h
    danton tle dbi meri ungli h
    khamosh ankhe bhi muskurai raat bhar me
    jane kya baat h aaj din bhar me..

    kaidi panchi ne fir bhari ek udaan h
    es baar pinjra b le udd jane ka farmaan h
    masti bhari fir iski chaal me
    jane kya baat hui aaj sham me..

    umeedo me aayi fir roshni h
    jhan tha dhuaan whan fir jli agni h
    na ummedi ne choda daaman raste me
    jane kya baat hogi aaj raat bhar me..

  • jane kya baat h aaj din bhar me

    jane kya baat h aaj din bhar me
    khusi c baith gyi h seene me
    lbon se muskurahat hatt nhi rhi
    kosis kitni ki jmane bhar ne
    jane kya baat h aaj din bhar me

  • “गुनाह” #2Liner-22

    ღღ___तुझको पाने की कोशिश भी, तू जो कह दे तो ना करूँ;
    .
    पर पाने की आरजू रखना, तो कोई गुनाह नहीं !!………‪#‎अक्स‬

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