हम देश के सिपाही ये हिन्द है हमारा। चंदन लगे हैं माटी अभिमान है हमारा।।
हम देश के सिपाही ये हिन्द है हमारा। चंदन लगे हैं माटी अभिमान है हमारा।।
देश के भीतर कोरोना है और सरहद पर आतंकवाद। संयम और धीरज से हमसब निज देश को रखेंगे आबाद।।
यूँ हीं नौराता बीत गया और गई बैशाखी खाली-खाली। कहर कोरोना के कारण जेब तिजोरी सब हो गए खाली।।
ना तीर से डरते हैं ना तलवार से डरते हैं। हम तो वीर सैनिक हैं सिर्फ गद्दार से डरते हैं।।
नब्ज टटोलकर भी पूछते हो तुम्हें रोग क्या है ? दिल दिलदार का पूछता है दवा-ए-वियोग क्या है?
एक तरफ सावन के बरसात तो दूसरे तरफ अश्कों के शैलाब। जब जब बैरी कँगना खनके तब तब दिल हो जाए बेताब।।
दिल के वीराने में फिर, उल्फते गीत गा रहा है कोई। महफूज धड़कनो में मुद्दत बाद, एहसास दे रहा कोई।।
कोरोना कें कहर में न ताली काम आई न थाली काम आई। काम आई तो सिर्फ घर घर कंगाली ईनाम आई।।
हां मशगूल हूं अपनी दुनिया में मुझसे बेहतर मुझे कोई जानता नहीं खामोश रहूं? या सवाल करू? मेरे शब्दों को कोई पहचानता नहीं।
आईना नहीं है आंखें मेरी फिर भी हकीकत तो जानती हैं ना तुम राही हो ,ना हमराही हो फिर भी तुम्हें अपना मानती हैं ।
कैसे होगी शहरी अब कैसे होगा इफ्तार भला। कहर कोरोना के कारण बन्द पड़ा बाजार भला।।
न फूल मिला न हार मिला। न नारियल चुन्नी सिंगार मिला। मन्दिर में ताले लटक रहे यूँ हीं नौराते का त्यौहार गया।।
मन का घोड़ा ,बेशक़ लंगड़ा हरदम जाए भागे-भागे। जन्नत भी फीका लगता है महबूब की गलियों के आगे।
बेशक़ बदनाम हो गई उनकी गलियों में बाकसम अब भी अपनी -सी लगती है।
ज्ञान और विज्ञान की धरती त्याग और बलिदान की धरती। क्यों बन रही है आज एक जालिम और बेईमान की धरती।।
ए आँखें, ए होंठ किसी मय से कम नहीं। वो मय किस काम का जिस मय में आप नहीं।।
काली स्याह जुल्फे तेरी, काली घटा पे कयामत ढाती है। गर बिखरा दे अपनी जुल्फ, मेरी कयानात में रौशनी आ जाती है।।
कौन कहता है तेरी अदा के कायल हम नहीं है। रात दिन तेरी गेसुओं मे उलझा रहता हूँ ए क्या कम है।।
यों न देख इस अदा से कहीं मर हम न जाए। ए आँखें देखे है कई मर्तबा दीवानो को मरते हुए।।
आजकल अल्फ़ाज़ हैं कुछ बिखरे- बिखरे कितने भी समेंटूं गज़ल नहीं बनती।
ऐ वक्त जरा रुक जा क्या लाँँकडाउन है सिर्फ हमारे लिए?
नजरें चाह रही दीदार-ए-माहताब का नाचीज़ को क्या पता अमावस भी होती है।
दिल फरेबी का आलम कुछ इस कदर छाया, दिल देकर भी दिलदार गद्दार नजर आया।
जीवन में एक वक्त ऐसा भी आता है जब रिश्ते भी टूट जाते हैं और फ़रिश्ते भी काम नहीं आते
चलो हम भी बनाए एक ताजमहल दिल के आगरा में। शाहजहाँ जैसे बनाउंगा एक महल दीवानो के कब्र में ।।
विलख रही धरती आसमान भी रो रहा। देख के अनाचार को भगवान भी सो रहा।।
नकाब चेहरे पर लिपटा है शोख लगता है…. ये उतर जाता तो बा-खुदा क्या आलम होता….
क्यूँ मुझसे नज़रे चुराते हो क्यूँ अपना प्यार छुपाते हो नींद नहीं आती तो फिर क्यूँ मेरे ख्व़ाब सजाते हो
नजर मिला के मेरे हमराज़ वहाँ छोड़ा । देखने आते हैं दो गुलाब जहाँ तालकटोरा।। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, इश्क़ -ए-राहत के दवा लाया जब इन्दौर से। उतरने लगा तब इश्क़ -ए- जुनून मेरे सिर से।।
आज सोंचा जाकर उनसे थोड़ी गुफ्तगू कर लूँ तभी पीछे से उनकी भाभी आ गयीं हाय तौबा!
रात के अंधेरे में मुंह छुपा कर चलने वाले . एक न एक दिन तुम्हें उजाले में आना ही पड़ेगा। अपने किए करनी के हिसाब ए चतुर इन्सान, दुनिया के सामने तुझे रखना ही पड़ेगा […]
जब मै अपना नब्ज दिखाया “मीर ” को। उसने कहा इश्क़ -ए -बुखार है आपको।।
मानवता का वास है या फिर दानवता का त्रास है। दुनिया के हर बसर को देखा मतलबपरस्ती हीं अब खास है।।
आसमां तो है सबका मगर मुझे हकीकत की जमी पर रहने का जुनून है
सिले हैं होंठ मेरे उसूलों के धागों से पर क्या करूँ मेरे उसूल ही मेरे जीने का बहाना हैं…..
हाँथ फैलाकर मैने कभी कुछ भी नहीं माँगा पर तुझे पाने की चाहत कयामत तक रहेगी
हाँथ फैलाकर खुदा से कुछ भी नहीं माँगा मैने आज तक मगर ए हमदम! तुझे पाने की चाहत कायनात तक रहेगी
ए काश !मेरा प्यार भी कोरोना जैसा होता हम उन्हें छू लेते और उन्हें भी हो जाता
दूर जाने का उन्हें एक और बहाना मिल गया है कोरोना वायरस अब मेरी मोहब्बत पर भारी हो चला है
ना तुम कुछ कहो ना हम कुछ सुनें बस खामोशियों को खमोशियों से बात करने दो
तुम लाख बिठा लो पहरे तुम्हारे दर पर आऊंगी जरूर !! ना उतरा है ना उतरेगा कभी तेरी आँखों का सुरूर !!
किसी को मिलती है जन्नत की रौनक किसी के आशियाने में अँधेरा पसरा हुआ है खुदा से पूंछ्ना है मुझे
जंग- ए-आजादी के हमसफर अब काहे को मतभेद है। कूपहि भंग पड़ी है भैया यही भाव कचोट रहा यही दिल की खेद है।।
ये दर्द के रिश्ते यूँ ही नहीं निभाये जाते मुस्कुराना पड़ता है गहरे जख्म खाने के बाद
ये कैसा वक्त है शताब्दियों सा लगता है हर पल मुझको घड़ी की सुइयां स्थिर ही रहती हैं ना जाने क्यूँ
कोई पी के जहर भी अमर हो गया। किसी का जीवन भी यारों जहर हो गया।। मौत आई थी जिसकी़ वो मर न सका। मौत की सब गलियाँ और शहर हो गया।।
फिक्र कहाँ उस रस्सी को जान किसी के जाने को। गले लगाया जिसने उसको मरने को छोड़ दिया दीवाने को।।
आँखों में अश्क लिए शायद,मेरे कब्र पे आ गया है कोई। मैं नहीं था बे-वफा शायद, यही गीत गुनगुना रहा है कोई।।
नजर तुम्हारी देख रही है मुझको चिलमन के पार से। एक दीदार तो दे दो जानम मैं भी तो देखूँ तुझको प्यार से।।
क्रोध न करना कभी उन पर जो सत्य दिखाने वाले हैं। नाजुक कांच है दर्पण में जो शक्ल दिखाने वाले हैं ।।
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