Category: Other

  • ठण्डी के बिगुल

    शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
    मौसम ने यूं पलट खाया,
    शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
    कोहरे ने बिगुल बजाया!!

    हीटर बने हैं भाग्य विधाता,
    चाय और कॉफी की चुस्की बना जीवनदाता,
    सुबह उठ के नहाने वक्त,
    बेचैनी से जी घबराता!!

    घर से बाहर निकलते ही,
    शरीर थरथराने लगता,
    लगता सूरज अासमां में आज,
    नहीं निकलने का वजह ढूढ़ता!!

    कोहरे के दस्तक के आतंक ने,
    सुबह होते ही हड़कंप मचाया,
    शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के
    मौसम ने यूं पलटा खाया!!

    दुबक पड़े इंसान रजाईयों में,
    ठण्ड की मार से,
    कांप उठा कण-कण धरती का
    मौसम की चाल से!!

    बजी नया साल की शहनाईयां,
    और क्रिसमस के इंतज़ार में,
    झूम उठा पूरा धरती,
    अपने-अपने परिवार में!!

    शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
    मौसम ने यूं ही पलट खाया,
    शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
    कोहरे ने बिगुल बजाया!!

    सुशील कुमार वर्मा
    सिन्दुरियां,महराजगंज,गोरखपुर

  • ठण्डी के बिगुल

    शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
    मौसम ने यूं पलट खाया,
    शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
    कोहरे ने बिगुल बजाया!!

    हीटर बने हैं भाग्य विधाता,
    चाय और कॉफी की चुस्की बना जीवनदाता,
    सुबह उठ के नहाने वक्त,
    बेचैनी से जी घबराता!!

    घर से बाहर निकलते ही,
    शरीर थरथराने लगता,
    लगता सूरज अासमां में आज,
    नहीं निकलने का वजह ढूढ़ता!!

    कोहरे के दस्तक के आतंक ने,
    सुबह होते ही हड़कंप मचाया,
    शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के
    मौसम ने यूं पलटा खाया!!

    दुबक पड़े इंसान रजाईयों में,
    ठण्ड की मार से,
    कांप उठा कण-कण धरती का
    मौसम की चाल से!!

    बजी नया साल की शहनाईयां,
    और क्रिसमस के इंतज़ार में,
    झूम उठा पूरा धरती,
    अपने-अपने परिवार में!!

    शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
    मौसम ने यूं ही पलट खाया,
    शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
    कोहरे ने बिगुल बजाया!!

    सुशील कुमार वर्मा
    सिन्दुरियां,महराजगंज,गोरखपुर

  • ख्वाबों की बेवफाई

    ख्वाबों की बेवफाई

    हम तो ख्वाबों की चौखट पर बैठे थे ,
    लेकर हसीन ख्वाब …
    प्यारी आँखों के परदे पर ||

    ख्वाबों को ख्वाब बनाने ,
    आया एक मुसाफिर ,
    रख दिया ख्वाबों को ,
    उसने जलती आग पर ||

    कोशिश बहुत की ,
    ख्वाबों की नमी जोड़ने की ,
    पर मेरे ख्वाब भी मनचले निकले ,
    चल दिए …….
    सवार हो धुएं पर ||

    अफ़सोस, धुआँ भी तो आग का है ,
    ना उम्मीद है बादल की ,
    ना ही उम्मीद है बारिश की ,
    अब इस बंजर जमीं पर ||

    उठ … चल दिए है चौखट से ,
    ना ही गुस्सा है ,
    ना ही उम्मीद है ,
    अब उन उजड़े ख्वाबों से…
    नमी सी है यादों की ,
    कुछ धुंधली तस्वीरें है आँखों पर ||

    बस धड़कने बढ़ रही है ,
    भरोसा जो टुटा है ख्वाबों पर ||

    चल दिए है ख्वाब ….
    मनचले कदमो से ,
    बस बेवफाई की उम्मीद बैठी है ,
    इन बची साँसों पर ||
    ~ सचिन सनसनवाल

  • मुक्तक

    कोई नहीं है मंजिल न कोई ठिकाना है!
    हरपल तेरी याद में खुद को तड़पाना है!
    मैं कैसे रोक सकूँगा नुमाइश जख्मों की?
    जब शामे-तन्हाई में खुद को जलाना है!

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • मुक्तक

    मुक्तक

    मुझको याद फिर तेरा जमाना आ रहा है!
    मुझको याद फिर तेरा फसाना आ रहा है!
    चाहत की मदहोशी से जागी है तिश्नगी,
    मुझको याद तेरा मुस्कुराना आ रहा है!

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • अनसुलझी पहेली “रहस्य “देवरिया

    अनसुलझी पहेली “रहस्य “देवरिया

    Dosto गोरखपुर में हो रहे मासूम बच्चों की मौत बहुत ही दूखद हैं मेरे चार शब्द उन बच्चों नाम (( plz god sef the all children’s ))

    एक एक कर जिन्दगीया निगलती जा रही हैं ये ,
    एक अनसुलझी पहेली बनती जा रही हैं ये ,,


    खिले थै बड़ी मन्नतो से जिनके ऑगन में फूल,
    उन माँओ की गोद सूना करती जा रही हैं ये ,


    रहा करती थी हर पल खुशियाँ जिनके घरों में ,
    वाहा गमों का सागर भरती जा रही हैं ये ,,


    माँ बाप मजबूर हैं गरीबी इस काल के आगे ,
    हर दवा दुआ को बेअसर करती जा रही हैं ये ,,


    एक एक कर जिन्दगीया निगलती जा रही हैं ये /

    ” रहस्य ” देवरिया

  • माँ महंगे होटलों में भी “रहस्य “देवरिया

    माँ महंगे होटलों में भी “रहस्य “देवरिया

    माँ महेंगे होटलो मे भी (“रहस्य”)

    तेरी हाथों कि वो दो रोटियाॅ कहीं और बिकती नहीं
    माँ महँगे होटलों में भी खाने से भूख मिटती नही
    “”””””””””
    “”””””””””
    गरमाहट बहुत मिलती थी तेरी ऑचल कि ऑड मे मुझे
    अब तो ये ठिठूरन किसी कम्बल रजाई से जाती नही
    “”””””””””
    “”””””””””
    निंद आ जाती थी तेरी लोरियाॅ कहाँनिया सूनकर
    अब तो कोई भी गाने सुनू पर ऑखो को निंद आती नही
    “”””””””””
    “”””””””””
    मै चाहे लाख तलाश लू सुकून मंदिर मस्जिद मे भी
    पर जो सूख तेरी कदमो मे थी वो कही मिलती नही
    “””””””””
    “””””””””
    तेरी हाॅथो कि वो दो रोटियाॅ कही और बिकती नही
    “””””””””
    “””””””””
    “”””(“रहस्य”)”””देवरिया

  • ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी “रहस्य “देवरिया

    ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी “रहस्य “देवरिया

    Happy mother day मेरे तरफ से एक छोटी सी कोशिश उम्मीद करता हूँ सबको पसंद आएगा
    €€€€€€€€€€€€€
    ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी देने की वजहा बता देता,
    ऐसा क्या किये थे तू मुझे मेरी खता बता देता,,
    **********
    अपने भूख प्यास को भूला के तूझे पालते रहे,
    अगर हैं ये खता तो मुझे मेरी सजा बता देता,,
    **********
    जरूरत पडीं तो आज भी जान निसार करदू तूझपे,
    तूझे काबिल बनाने मे कमी रही हो तो वो कमी बता देता,,
    **********
    आज कमजोर पडती हाथों से साथ छोड़ा लिया तूने,
    कहाँ जाएंगे अब इस उम्र मे बेटा वो जगहा बता देता,,
    **********
    ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी देने की वजहा बता देता,
    **********
    ****(“रहस्य “)देवरिया ****

  • एक और मासूम की जिंदगी “रहस्य “देवरिया

    एक और मासूम की जिंदगी “रहस्य “देवरिया

    एक और मासूम की जिन्दगी (“रहस्य”)
    ??????
    दौलत की चाहने रिश्तों के धागे को तार तार कर दिया हैं,
    एक और मासूम की जिन्दगी को मरने पर लाचार कर दिया हैं,,
    ??????
    पापा सब दिया आपने इन्हें मेरी सूख खूशीओ की खातीर,
    पर इन दहेज़ के लोभीओ ने मेरा जिना दूशवार कर दिया हैं,,
    ??????
    और ना हो सको परेशान मेरी वजहा मेरी होठों की हॅशी के लिए,
    माफ करना बाबा मुझे इसी लिए अपनी जान निसार कर दिया हैं,,
    ??????
    दौलत की चाहने रिश्तों के धागे को तार तार कर दिया हैं,
    ??????
    ((((“रहस्य “))))((देवरिया))

  • मुर्दों को उठाने चलें है “रहस्य “देवरिया

    मुर्दों को उठाने चलें है “रहस्य “देवरिया

    मुर्दों को उठाने चलें है ” रहस्य “देवरिया

    अफ़सोस की हम सबको जगाने चलें है ,
    हाँ ये सच है की मुर्दों को उठाने चलें है,,

    हर हिन्दू मस्त है अपनें मे जमाने से बेखबर ,
    उनको आनें वाली सच्चाई अब दिखाने चलें है,,

    निंद मे हो तो मौत की निंद सूला दिये जावोगे ,
    सपनो से जगा के सच से रूबरू कराने चलें है,,

    वो एक होते जा रहे छोटा बड़ा सब भूलकर,
    एक हम उच नीच जाती के नाम से लड़ते चलें है ,,

    “रहस्य “देवरिया

  • दिल को मेरे जलाया होगा “रहस्य “देवरिया

    दिल को मेरे जलाया होगा “रहस्य “देवरिया

    जिस्म को मेरे जलाये होंगे “रहस्य”देवरिया

    दर्द कितने खुद में हमने छुपाये होंगे ,
    तूने जब दिल को मेरे जलाया होगा ,

    ये रूह मायूस बेबस होकर तूझ से ,
    जब तन्हाई में खुद को छुपाया होगा ,

    मेरा साया तेरे कदमों से लिपट कर ,
    कितना तेरे आगे वो रोया होगा ,

    मासूम सा दिखने वाला कातील मेरा ,
    कैसे गुनाहो को अपने छुड़ाया होगा ,

    दर्द कितना खुद में हमने छुपाया होगा /

    ” रहस्य ” देवरिया

  • दिल को मेरे जलाया होगा “रहस्य “देवरिया

    दिल को मेरे जलाया होगा “रहस्य “देवरिया

    जिस्म को मेरे जलाये होंगे “रहस्य”देवरिया

    दर्द कितने खुद में हमने छुपाये होंगे ,
    तूने जब दिल को मेरे जलाया होगा ,

    ये रूह मायूस बेबस होकर तूझ से ,
    जब तन्हाई में खुद को छुपाया होगा ,

    मेरा साया तेरे कदमों से लिपट कर ,
    कितना तेरे आगे वो रोया होगा ,

    मासूम सा दिखने वाला कातील मेरा ,
    कैसे गुनाहो को अपने छुड़ाया होगा ,

    दर्द कितना खुद में हमने छुपाया होगा /

    ” रहस्य ” देवरिया

  • उनसे गुफतगू ना हो “रहस्य “देवरिया

    उनसे गुफतगू ना हो “रहस्य “देवरिया

    उनसे गुफतगू ना हो “रहस्य “देवरिया

    ऐ खुदा काश कि अब से वो रूबरू ना हो ,
    ख्वाबों में भी अब उससे गुफतगू ना हो ]

    कम्बख्त झूठे सपने देखना कौन चाहता है,
    वो रात ही ना हो जिसमें निंद पूरी ना हो ]

    याद ना करू ये तो तेरी दिली ख्वाहिश थी,
    ना आ सामने कही ये हसरत पूरी ना हो ]

    ऐ खुदा काश कि अब से वो रूबरू ना हो %

    ” रहस्य “देवरिया

  • शीर्षक – यादों का पिटारा….!!

    शीर्षक – यादों का पिटारा….!!

    लम्हे बचें जो जिंदगी के वो खुल के काट लें,
    जो बाकी रह जाए पिटारे में उसे आपस में बांट लें,

    वो नीले समंदर के किनारे,
    पिघले मोती से अंगारे,
    चल ख्वाहिशों की मुट्ठी में बांध लें,

    वो रंगीन लम्हे जिंदादिल के सारे,
    खुशी की चादर ओढ़े पलकों की बाहों में थाम ले,

    धूप छांव के खेल निराले,
    कुछ अपनी किस्मत के छाले,
    अपनी प्रेम की वर्षा कर जिंदगी को जिंदगी का नाम दें,

    लम्हे बचें जो जिंदगी के वो खुल के काट लें,
    जो बाकी रह जाए पिटारे में उसे आपस में बांट लें…!!!

    – राज बैरवा’मुसाफिर’

  • एक शहर….!!

    एक शहर….!!

    रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया,
    जिससे उढते धुएँ में इंसानियत का रिसता खुन नज़र आया,

    हँसते हुए चेहराे में, खुद को झूठा साबित करता हर इंसान जाे पाया,
    तब कहीं जाकर हमें भी कलयुग की रामलीला का सार समझ आया,

    रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!!
    कुछ आेर आगे बडे, ताे खंडर हुईं ईमारताें का मलबा था,

    कहीं दुआ दबी थी , कहीं काेई शिकायत, कहीं ममता बिखरी पड़ी थी,
    ताे कहीं साेने की ईंटों के नीचे दबा लाचार ईश्वर चिखता पाया,

    रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!!!

    -राज बैरवा’मुसाफिर’

  • खामोशिया

    मेरी खामोशिया खामोश नहीं है
    जरा इक बार सुन कर तो देखो|

  • मानुषी छिल्लर

    मानुषी छिल्लर

    फ़क्र है हमें, नाज है
    हरियाणा की बेटी
    तू भारत की शान है|

  • मैं बेटी हूँ

    मैं बेटी हूँ…..
    मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ।
    खामोश सदा मैं रहती हूँ।
    मैं बेटी हूँ…..

    मैं धरती माँ की बेटी हूँ।
    निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ।
    मैं बेटी हूँ……..
    मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ।
    खामोश सदा मैं रहती हूँ।
    मैं बेटी हूँ…..

    मैं धरती माँ की बेटी हूँ।
    निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ।
    मैं बेटी हूँ…….

  • हैरानी सारी हमें ही होनी थी – बृजमोहन स्वामी की घातक कविता।

    हैरानी कुछ यूँ हुई
    कि उन्होंने हमें सर खुजाने का
    वक़्त भी नही दिया,
    जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नही देखा गया,
    लब पर जलती हुई
    सारी बात हमने फूँक दी
    सिवाय इस सिद्धांत के
    कि हमने सपनों की तरह
    आदमी देखे,
    जबकि ‘सपने’ किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो
    सारे अल्ट्रासाउंड
    घड़ियों की तरह बिकते
    और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते,
    मेहँदी की तरह लांछन लगाते,
    सिगरेटों की तरह घर फूंकते,
    कुत्तों की तरह बच्चे पालते,
    रक्तदान की तरह सुझाव देते,
    एक हाथ से ताली बजाते,
    औरतें चूड़ियों में छुपाती ‘सुहाग’
    आदमी बटुओं में ‘सुहागरात’ छुपाते
    और भाट पूरी रात गाते विरुदावलियाँ

    सच बताऊँ तो हुआ यूँ था कि
    जब हमने आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई
    तो हमारी अंगुलियां बर्फ की तरह जमी हुई मिली, हमारे गलों में
    और हमने तकलीफों को
    मुद्दों की तरह उठाया
    जबकि ‘रोना’ कॉलेजों के शौचालयों में ही घुटाकर मरा
    बाहर हमारे बनाये पोस्टर दम तोड़ते गए।

    हमने हयात फूंकने की ज़हमत उठाई
    और हड्डियों के बुरादे को
    रोटियों में मिलाकर खाया
    ताकि एक पीढ़ी बचा सकें।

    प्यार के दरवाज़े हमारे लिए सिर्फ
    स्कूलों की उबासियों में टिफिन की तरह ही खुलते थे
    और चीन के साथ लड़ाई की
    खबरों के साथ हमने नींद के केप्सूल खाये,
    जबकि बीच रात पालने में खेलते
    हमारे छोटे बहन-भाइयो का बदन
    दैनिक जागरण और भास्कर नामक अखबारों से पोंछा जाता रहा
    उनमे इसी दुनियां के लोगों के मौत की खबरे थी
    हमने बिस्तरों की चादरें खींच कर
    अपने बदन और चेहरे को ढक लिया था
    समझदार प्रेमिकाओं की तरह।

    अपनी महानता के नियमों में
    मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
    सान्त्वना देने के बहाने
    हमने धरती रोककर
    उनका मांस सहलाया,
    पावरोटी सी फूली बाजुएँ लिए फिरे,
    ‘गूँगी चीखों’ को जन्म दिया गया,
    आपत्तिजनक टिप्पणियाँ
    कागजों में ही सोई रही।

    संयोग से
    आदमी ही हथियार बनाया गया
    नौकरी सिर्फ विज्ञापनों में रही,
    क्रन्तिकारी तस्वीरों में चले गए,
    अंगूरों पर मौत लिखी गई,
    टीवी, रेडियो और मोबाइलों पर जिंदगी

    अब जाकर नशा टूटा
    आज़ादी का असली मतलब देखा
    हमने उन्ही रास्तों में पिरोये दस्तखत
    उन्हीं सपनों को जिया
    जो हमारे सर काटना चाहते थे
    जबकि रेलगाड़ियों के आगे कटकर मरना सस्ता था।

    सबकुछ छीनने के बाद भी
    उन्हीं सांसों में सहारा लिया गया
    जो सिर्फ ‘सांसें’ थी
    और गुनाह सिर्फ इतना था
    की हमने
    घटनाओं का विरोध करना अपने बच्चों को सौंपा !!

    बेज़ुबां दास्ताँ ये…
    कितने दर्द छुपाएगी?

    © copyright Brijmohan Swami
    poem by brijmohan swami,  बृजमोहन स्वामी की हिंदी कविता

  • ओम पुरी जिन्दा है – बृजमोहन स्वामी

    चलाओ टीवी,
    भिन्डी काटती हुई अंगुली का
    पसीना न पोंछते हुए
    प्रेमिका को मिलाओ फोन,
    बांटों दुःख
    ओम पुरी चले गए,
    सुनाओ निःशब्द
    रो लो तीन सौ आँसू
    लिखो डायरी में,
    बदलो तस्वीरें
    और बताओ खुद को

    इतना खरा आदमी था
    कि मौत में
    बीमारी या दर्द की मिलावट नहीं की ऐसे आदमी को कैसे याद किया जा सकता है,
    शायद उनकी पिछले सालों की
    बुरी फिल्में देख कर?

    काटो तो खून,
    न काटो तो वक़्त
    इंसान बस उतना ही होता,
    जितना वह छोड़कर जाता

    पर बार बार कैमरे के सामने
    हल्की आवाज़ पर
    ओम पुरी यह हिम्मत छोड़ कर गए
    हिम्मत
    जिसे हमने कभी नही परखी
    गरीब और
    बे-बाप लड़कों में देख सकते हैं,
    और उधर मुम्बईया लोग
    बार बार कुरेदते आपके सपने
    “आप स्टार बन सकते हैं”

    ओम पूरी एक युग थे
    उम्मीद और इन्साफ़ का नेम प्लेट
    डूबते दिल से
    आखिरी रात,
    मैंने सेट मेक्स पर
    उन हाथों को सलाम किया
    उन्हें चूमा,
    उनकी दुनियां का आख़री साँस खिंचा
    जैसे रो पड़े
    मेरी माँ के हाथ…

    ओम पुरी जिन्दा है
    और दुनियां मर चुकी है।

    om puri jinda hai, by- Brijmohan Swami

  • कविता:- सफर

    जीवन के इस सफ़र में
    प्रकृति ही है जीवन हमारा,
    बढ़ती हुई आबादी में किंतु
    हर मनुष्य फिर रहा मारा-मारा॥

    मनुष्य इसको नष्ट कर रहा है
    जिंदगी अपनी भ्रष्ट कर रहा है,
    करके नशा देता भाषण
    क्या नहीं जानता नशा नाश का कारण॥

    मान प्रतिष्ठा या चाहे हो शोहरत
    है निर्भर सब धन दौलत पर,
    मान प्रतिष्ठा चाहे हो शोहरत
    है निर्भर सब धन दौलत पर,
    बनकर ब्रहमचारी सामने इस जग के
    निगाहें रखता हर औरत पर॥

    हर प्राणी ईश्वर की रचना
    फिर भी प्राणी का प्राणी से बैर,
    हर प्राणी ईश्वर की रचना
    फिर भी प्राणी का प्राणी से बैर,
    मतलब आने पर दुश्मन भी अपने
    और मतलब जाने पर अपने भी गैर॥

    मानव की है फितरत इतनी
    दुनिया को बांटें धर्म का ज्ञान,
    मानव की है फितरत इतनी
    दुनिया को बांटें धर्म का ज्ञान,
    मंदिर मस्जिद के नाम पे लेकिन
    है लड़ता मरता हर इंसान
    है लड़ता मरता हर इंसान॥॥॥

    धन्यवाद॥॥

  • आँखों से बहता पानी…

    आँखों से बहता पानी…

    आँखों से बहता पानी
    कहाँ एक सा होता है

    कभी खुद के लिए रोता है,
    कभी खुदा के लिए रोता है !

    कभी कुछ पा के रोता है ,
    कभी कुछ खो के रोता है !

    कभी किसी की यादो मे रोता है ,
    कभी किसी को याद करके रोता है !

    कभी खतों मे रोता है ,
    कभी ख़ता करके रोता है !

    कभी आँखो से पानी टपकाकर रोता है ,
    कभी दिल मे छुपकर रोता है !

    रोता है जब भी दर्द का
    अहसास कराकर रोता है !

  • तेरे दुःख मेरा कर्ज

    तेरे दुःख मेरा कर्ज

    मेरे जीवन का किसान बनकर,
    तूने सफलता के बीज़ बोए |
    अपने सपने बेचकर तूने,
    मेरे मामूली ख़्वाब संजोए |

    अक्षर का शुरूआती ज्ञान￰￰ देकर
    मुझे अपना शिष्य बनाया |
    अपना पेट काट -काट कर ,
    तूने मेरा भविष्य सजाया |

    अंको का लालच बहुत था मुझे ,
    रात – रात जागना होता था |
    तेरी नींद अचानक खुलती ,
    न चाहते हुए भी सोता था |

    एक तेरा साथ रहा ,
    तभी तो मेरा आज है |
    पूरा श्रेय मुझे दे दिया ,
    कहा , “तू ही तो मेरा नाज़ है”|

    दुनिया जब भी विरोध में थी ,
    तूने मेरा साथ दिया है |
    किसी का भी भरोसा न था ,
    उस पल तूने विश्वास किया है |

    जब -जब मुझे ठोकर लगी ,
    तेरी आँखे रोती थी |
    टुकड़ो – टुकड़ो में मैं सोता था ,
    तेरी आंखे न सोती थी ||

    ©moHiT

  • आज फिर …

    कुछ लिख कर आज फिर
    मिटा दिया,
    कुछ बना कर आज फिर
    बिगाड़ दिया,
    वो आज भी नहीं आएगा
    मालूम है हमे, पर
    फिर भी उसके आने के
    इन्तजार मे खुद को फिर
    सँवार लिया !

  • मुक्तक

    जो यही सजा है मेरे गुनाह की
    तो यही सही , लेकिन
    सुनवाई का एक मौका तो दे !
    (निसार)

  • मुक्तक

    दिल मे दर्द उतना ही रखना
    जितना आँखों मे समां सके
    क्योकि जो छलक गया वो
    लोगो की हंसी का हो गया !
    (निसार)

  • ख्वाब

    कुछ ख्वाब ऐसे थे,
    कुछ ख्वाब वैसे थे,
    कुछ दिल के हिस्से थे,
    कुछ दर्द के किस्से थे,
    कुछ खुदा को समझाने थे,
    कुछ खुद को समझने थे,
    कुछ टूटकर रह गए,
    कुछ अश्क संग बह गए,
    कुछ आदत बन गए,
    कुछ भूल बन गए,
    कुछ ख्वाब ऐसे थे,
    कुछ ख्वाब वैसे थे!
    ( निसार)

  • मौला….

    मौला अपनी तू रहो मे,
    बैठे रहने दे छाओ मे
    एक दिन तो होगा कर्म
    ये भ्रम तो रहने दे !

    चाहे सपनो को सपने रहने दे,
    लकिन अपने तो रहने दे
    शिकवे, शिकायत क्या करने है
    पर कुछ तो हक से कहने दे!

  • खुदा से

    जब दिल रोए पर
    अश्क ना हो ,
    जब नफरत हो पर
    रश्क ना हो ,
    जब सजदा हो पर
    दुआ ना हो ,
    जब किस्सा हो पर
    बया ना हो ,
    जब जिन्दा हो पर
    अहसास ना हो ,
    तब कह दे ना खुदा से
    अब तू मेरे साथ और
    बदनाम ना हो !
    ‘निसार’

  • खोया बचपन

    खोया बचपन

    बचपन के  शहर मे जाने ,
    क्यों  ख़ाली से मकान पड़े है
    सयानेपन के हर जगह पर
    ऊँचे-ऊँचे बंगले खड़े है
    कुछ आधुनिकता की आड़
    मे लूट गए
    कुछ को मजबूरियों न
    लूटा है
    महँगे खिलौनो की सौदेबाजी मे,
    बचपन को जाने किसने लूटा है!
    कहाँ गए जाने जो
    कागज की कश्ती बनाया करते थे,
    नन्हे-नन्हे हाथो से मिटटी के घर बनाया
    करते थे
    जो पत्थर के टुकड़ो से भी खेल बनाया
    करते थे !

    कोई तो  उनको ढूंढ के ला दो ,
    कोई तो  उनको खोजकर ला दो ,
    मासूम-सा बचपन,
    नादानी का वो,
    कोई तो इस शहर को फिर बसा दो!
    ‘ निसार ‘

  • फूलों की खेती

    चन्द्र मोहन किस्कु
    फूलों की खेती
    **********

    दुनिया में अब
    बढ़ गया है हिंसा
    लोग मिलते ही
    लड़ते है झगड़ते है
    और हत्या के लिए
    हथियार हाथ में लेते है

    दुनिया में अब
    बढ़ रहा है
    बोम और हथियारों की संख्या
    बढ़ रहे है फैाज
    इसलिए तो फूलों पर
    कविता लिख रहा हूँ

    बोना शुरू किया है
    फूलों की बीज
    हँसी, हर्ष की
    स्वप्न, शान्ति की
    एक दिन बो दूँगा
    पुरे दुनिया में
    फूल ही फूल
    रंग -बिरंगे सुन्दर फूल

    हँसीवाले स्वप्न
    और गानेवाले हरे खेत
    के बीच
    ढुँढ़ नहीं पाअोगे
    बोम और बारूद रखने की जगह.

  • समझाऊँगी क्या मैं तुझको
    बतलाऊँगी क्या मैं तुझको !
    कभी तो अपना जान तू मुझको
    कभी तो अपना मान तू मुझको !
    बस इतना-सा वादा कर दे
    बस इतना-सा सच्चा कर दे !
    मुझको तू अपने काबिल कर दे
    मुझको तू इतना कामिल कर दे !

  • क्यों मिली नहीं रहमत तेरी
    अब तक
    क्या मेरी कोई भूल तेरे
    दर मे गुनाह मुक़र्र हुई है !

  • क्यों खुदा तेरा दिल भी
    बंजर-सा हुआ
    क्या तेरा भी कोई अपना
    बेईमान-सा हुआ !

  • मेरी डायरी

    साथी मेरी न्यारी है
    मुझको सबसे प्यारी है
    राज ये मेरे रखती है
    किसी को नहीं दस्ती है
    हर वो बात ये सुनती है
    जो दुनिया को चुभती है
    दोस्ती ये ऐसी सच्ची है
    जो सबसे पक्की है !

  • चार दिन की थी जिंदगी
    एक दिन का था बचपन उसमे
    थोड़ा-सा कच्चा था,
    थोड़ा-सा अच्छा था लेकिन
    वो ही सबसे सच्चा था , क्योंकि
    जिन्दा था बैखोफ मैं उसमे चाहे
    रोता था माँ की गोद मे छुपके!

    दूसरे दिन की थी जवानी
    जिम्मेदारी ना थी कोई उसमे
    बस मस्ती की कंधो पर गठरी थी
    सारा दिन घूमता था यहाँ-वहाँ
    किसी मंजिल पर जाने की
    कहा मुझको जल्दी थी !

    तीसरे दिन, मै ना जवान था ना बूढ़ा था
    बस ज़िम्मेदारियों का पुतला था
    हर कदम सोच-समझकर उठाता था
    इतना तो शायद मै माँ की गोद से
    उतरकर भी ना घबराता था !

    चौथे दिन का था बुढ़ापा
    जिसमे था मै सबका काका
    कोई मुझसे हंसकर बोलता था
    कभी कोई ग़ुस्से से झींकता था
    लेकिन मै कुछ नहीं बोलता था बस
    सूर्यास्त की राह देखता था !

    एक-एक कर चारो दिन ख़त्म हो गए
    जिन्दा से हम मुर्दा हो गए !

  • जाने कहां वो

    जाने  कहां वो,

    सिलसिले  रह गये,

    कोई शिकवे ना गिले रह गये,

    अब जिंदगी पहुंच गई उस मुकाम पर,

    जहां तुम  तुम  ना रह गये,

    और हम  हम  ना रह गये।

    और हम हम ना रह गये।

  • एक नज्म

    मेरी एक नज्म, दूसरी नज्म पर हंसती है
    तो कल वाली खुद पर इतराती है
    आज वाली खुद पर नाज करती है
    कभी वो वाली जो रात अचानक
    बिस्तर से उठ कर एक कागज पर लिखकर
    किताब मे रखी थी अपनी
    याद दिलाती है , तो भूली हुई एक
    नज्म नाराजगी जताती है
    कभी-कभी एक-दूसरे से लड़ जाती है
    मैं हू सबसे अच्छी , मैं हू चहीती
    मुझ पर है वो निसार*
    मैं चुप-चुप हंसती हू कुछ नही बोलती
    जब थक जाती है तो अपने आप
    करीने से लगकर गजल बन जाती है !

  • पतझड़

    शाखों से टूटकर पते
    पतझड़ की निशानी दे गए!

    कल थे शान जिन दरख्तों की
    आज कदमो तले रुंद गए !

    साए देते थे जो मोसफिरों को धूप मे
    आज अपने सहारो को भी छोड़ गए !

    दरख्तों का लिबास थे कल तक
    आज अपना लिहाज भी भूल गए !

    पतझड़ आया है तो बहार भी आएगी
    नई बहार के साथ , नई कोंपले फिर आ जाएगी !

    पतझड़ मे जो दरख्ते कहलाए है ,
    फिर पेड कहलाएगे!

  • इश्कबाज

    इश्कबाज पसंद है मुझे,

    चाहे इश्क़ में ना पड़ा हूँ कभी,

    अल्फाज बह जाते है आशिकी देखकर

    चाहे आशिक़ ना बना हूँ कभी

    #पंकज

  • मौसम

    चल रही है ठंडी हवाएं ,आँखों से बादल बरसेगा
    रात के आगोश में . मेरा मेहताब पिघलेगा
    मुद्दतों बाद फेंका है एक नजर का टुकड़ा उसने
    पतझड़ के मौसम में भी , अब तो गुलशन महकेगा
    @पंकज गर्ग

  • बैरन बारिश

    बैरन बारिश

    Aj Barish fer se beran ban gayi,
    tanha dil ko fer se mahfil mil gayi,
    moti gire boondno ke jab balkha ke,
    kisi anjan chehre ki fer tasveer ban gayi…

    chupaye rakha armano ko ab tak,
    band tha dil ka tahkhana,
    toofan se pahle sannae jesa,
    dil ka bhi hal tha veerana
    ghiri ghanghor ghata kali,
    kesa ye boondno ka itrana,
    dil ke badal bhi garaj uthe,
    harkat hui fer bachkana
    lagi jhadi jab saavan ki,
    khwabon me koi sanwar gayi,
    kalam bhi meri bevafa nikli,
    jo uske hi sajde me jhuk gayi
    kisi anjan chehre ki fer tasveer ban gayi……

    Bheegnu barish me sang uske,
    khyalno pe nahi ab vash mera
    boondno me aksh tarashnu uska,
    chanchal man uda tod ke pahra
    bikhra de bhiga badan mujhpe wo,
    chu loon jab uska chehra
    har ek katra apne hontho se pi loon,
    jo bhi uske hontho pe gira
    ynu hi sochte sochte aankno me,
    ek hasin shakshiyat utar gayi
    aur na le imthna mausam mera,
    badnaam najar meri ban gayi
    kisi anjan chehre ki fer tasveer ban gayi……

  • badal

    बादलों बरसने को आँखें तरस गई है
    तुम तो न बरसे पर आँखें बरस गई है

    राजेश “अरमान ”

  • निसार

    निसार होना आसान नहीं ,
    किसी का होना आसान नहीं
    आस हो जो ना की
    कुछ भी आसान नहीं , और
    जब ना और हां का बन्धन
    ना हो तो निसार होना मुश्किल नहीं !

  • पहचान

    रिवाजो से हटकर
    जो अपनी राह बना ले,
    जिन्दा वही है ,
    जो अपनी पहचान बना ले !

  • BEST

    Best food= Thoughts

    Best teacher= Experience

    Best dress= Smile

    Best hobby= Service (surplus time)

    Best medicine= Laughter

    Best sport= Duty

    Best lesson= Patience

    Best book= Life

    Best student= Attempt

    Best relation= Love

  • जज्बा

    जज्बा

    एक बार ठान ले तो एक पर्वत  है तू
    जो अगर यूँ ही बीत जाने दे , तो रेत
    जो एक आकार दे खुद को , तो एक मूरत है तू
    जो बस यूँ ही छोड दे , तो गीली मिट्टी
    जो तू चाहे तो खुद को रंगों में ढाल के इंद्रधनुष बन जा
    जो बारिश के साथ बह जाये, तो मटमैला कर दे सब
    तेरी किस्मत तेरे खुद के जज्बे से है
    जज्बा रहा तो जिन्दादिली भी रहेगी
    नहीं तो जिंदगी बिना जीवन सी रहेगी..

  • समर्पण…

    समर्पण…

    बाती की इक रोज ,दीए से लड़ाई हो गयी
    मगरूर हुई बाती खुद पर, लगी दीए पर भड़कने
    मैं जलकर खाक हो जाती हूँ, और
    तारीफे बटोरता है तू ,
    नहीं जलूंगी तेरे साथ अब ओर
    तय कर लिया मैंने ,
    तू ढूंढ ले कोई ओर अब नहीं रहना संग तेरे !
    चुप-चाप सुनता हुआ दिया अब बोल उठा
    तू जलकर खाक हो जाती है
    तेरी कालस तो मैं ही समेटता हूँ
    तू जलती है जब-जब तेरी
    तपिस तो मैं ही सहता हूँ !
    कैसे ढूंढ लू कोई ओर
    मुझे कोई और मिलेगा नहीं ,
    तुझे कोई और जचेगा नहीं
    बाती मुस्कुरा गईं
    जिसके लिए बनी थी, उसी मे समा गईं !

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