Category: Other

  • बदल गया है देश

    वो कहते हैं अपनी सरकार आते ही बदल गया है देश, 

    रंग है बदला रूप है बदला और बदल गया परिवेश,

    बेवजह झूठे दावे करने की इनको लगी बीमारी है,

    भुखमरी, भ्रष्टाचार, महंगाई से से कहां मुक्त हो गया देश।

     

    जिज्ञासु

  • I want to say something….

    ચિંતન મનન કરતા કરતા મારે કંઈક કહેવું છે,
    ખબર નથી શું? પણ છતાં મારે કંઈક કહેવું છે.

    જીવન છે ટૂંકું, રસ્તો છે લાંબો, છતાં મારે કંઈક કહેવું છે,
    આ સ્વાર્થી દુનિયાના સ્વાર્થી લોકો વિષે મારે કંઈક કહેવું છે.

    ગાય ને ઘાસ નાંખે, કુતરા ને બિસ્કીટ નાંખે,પણ ઘરના સભ્યો ને તરછોડે, આવા
    માણસો વિષે મારે કંઈક કહેવું છે,
    વહેલી સવારના પંખીઓ  તથા આથમતા સૂર્ય વિષે મારે કંઈક કહેવું છે.

    સબરી ના રામ વિષે તથા મીરાં ના કૃષ્ણ વિષે મારે કંઈક કહેવું છે,
    પરમ કૃપાળુ પરમાત્મા વિષે તથા  નિ:સ્વાર્થ ભાવે પ્રેમ કરનાર
    એવા મારા મા-બાપ વિષે મારે કંઈક  કહેવું છે.

    ભાઈ જેવા મિત્રો વિષે તથા રામ-ભરત જેવા મારા ભાઈઓ વિષે
    મારે કંઈક કહેવું  છે,
    કઠીન છે પરિસ્થિતિ, પણ આ પરિસ્થિતિ ના મારા સંઘર્ષો વિષે
    મારે કંઈક  કહેવું છે.

    સ્વાર્થી મિત્રો છે ઘણા, પણ અમુક સુદામા જેવા મારા મિત્રો વિષે
    મારે કંઈક કહેવું છે,
    કંઈ બોલ્યા વગર સમજી જાય એવા જીવનસાથી વિષે
    મારે કંઈક  કહેવું છે.

    ચિંતન મનન કરતા કરતા મારે કંઈક કહેવું છે,
    ખબર નથી શું? પણ  છતાં મારે કંઈક કહેવું છે……

  • दोहे

    “कुछ दोहे”

    गुरु की महिमा का हरि करते है गुंणगान |
    श्रेष्ठ न गुरू से है कोई बता दिये भगवान ||

    नित्य श्रद्धा से लीजिए श्री भगवत का नाम |
    सब संयम से कीजिए दिए जो उसने काम ||

    खाली हाथ तु आया है जाना खाली हाथ |
    फिर भी पागल भाँति क्यों मरता तु दिन-रात ||

    पाखंडो में गवां दिये तुमने कितने धन – धान |
    पर गरीब की भूख को दिया न कुछ भी दान ||

    आया है तो जायेगा जतन लाख कर योग |
    धन बैभव सब कुछ तेरा करता दूजा भोग ||

    जीवन का उपयोग करो दान धरम के साथ |
    आखिर गत पछताओगे कुछ ना लगेगा हाथ ||
    उपाध्याय…

  • कविता – इलाहाबाद की बात निराली

     

    इलाहाबाद की बात निराली
    नगरी वही निराला वाली |
    एक तरफ प्रयाग राज है
    दूजी तरफ गंगा मतवाली ||
    इलाहाबाद की बात…
    गूढ भेद सारगर्भित बातें
    बडी निराली इसकी रातें |
    देख उजाला ऐसा लगता
    जैसे हर एक रात दिवाली ||
    इलाहाबाद की बात…
    पावन करने कर्म नहाने
    महाकुंभ में दुनियां आती |
    धन्य धरा इलाहाबाद की
    सबके पाप छुडाने वाली ||
    इलाहाबाद की बात निराली…
    उपाध्याय…

  • कविता

    ……..दर्शन…….
    यह अति नूतन दर्शन है
    पावन यह परिवर्तन है |
    सर्वोत्तम ज्ञान का दर्पण
    है दिव्य दान यह धन है ||
    इसका उत्थान इसी में
    नित नव्य कला साधन है |
    है ज्ञान तभी जीवन है
    यह मुक्ति हेतु बंधन है ||
    उपाध्यायय…

  • कविता

    सो रहा कई रातों का जगा
    तुम आज मुझे जगाना मत |
    शब्दों के घाव बड़े मतिहीन
    उर को मेरे पहुँचाना मत ||
    होती रिश्तों की डोर नरम
    कदापि इसे आजमाना मत |
    होते है कान दिवारों के
    खुद को भी राज बताना मत ||
    छल क्षद्म भरा सारा जग है
    मुझसे तुम नेह लगाना मत |
    यदि मन मुझसे लग जाये तो
    नीज नेह भी मुझे जताना मत ||
    उपाध्याय…

  • शक्तिशाली इंसान कौन

    शक्तिशाली इंसान कौन

    एक पिता ने अपने बेटे की बेहतरीन परवरिश की। बेटा एक सफल इंसान बना और एक मल्टीनेशनल कम्पनी का CEO हो गया । शादी हुई और एक सुन्दर सलीकेदार पत्नी उसे मिली।

    बूढ़े हो चले पिता ने एक दिन शहर जाकर अपने बेटे से मिलने की सोची। वह सीधे उसके ऑफिस गया। भव्य ऑफिस, मातहत ढेरों कर्मचारी, सब देख पिता गर्व से फूल गया।

    बेटे के पर्सनल चेंबर में प्रवेश कर वह बेटे की चेयर के पीछे जाकर खड़ा हो गया और बेटे के कंधे पर हाँथ रखकर प्यार से पूछा—“इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है ?” …. बेटे ने हँसते हुए जवाब दिया—“मेरे अलावा और कौन हो सकता है, पिताजी।”
    .
    पिता दुखी हो गया। उसने सोचा था कि, बेटा कहेगा कि, पिताजी सबसे शक्तिशाली आप हैं, जिन्होंने मुझे इतना शक्ति संपन्न बनाया।

    पिता की आँखें भर आईं। चेंबर के द्वार से बाहर जाते हुए पिता ने मुड़कर बेटे से कहा—“क्या सच में तुम ही सर्वाधिक शक्तिशाली हो ?”

    बेटा बोला—“नहीं पिताजी, मैं नहीं, आप हैं सर्वाधिक शक्तिशाली, जिसने मुझ को शक्ति संपन्न बना दिया।”

    आश्चर्यचकित पिता ने कहा—“अभी अभी तुम शक्तिशाली थे और अब मुझे बता रहे हो। क्यों ?”

    बेटा उन्हें अपने सामने बिठाते हुए बोला—
    “पिताजी, उस समय आपका हाथ मेरे कंधे पर था, तो जिस बेटे के कंधे या सर पर पिता का मजबूत हाथ हो, वो तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान होगा ही। आप कहिए, क्या मैं सही नहीं ?”

    पिता की आँखों से झर झर आँसू बह निकले। उन्होंने बेटे को गले लगा लिया और कहा—” तुम बिलकुल सही हो बेटा।।”

  • गांव आना चाहता हूं

    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    उस घर में
    जहां से आधुनिकता की आंधी ना गुजरी हो अभी तक,
    वहां मिट्टी के चूल्हे की रोटी खाना चाहता हूं…
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    खेत वाली झोपड़ी में बैठकर
    सफेद गाय का कच्चा दूध पीना है।
    फिर से वही चीनी वाला शर्बत
    जो गर्मियों में पीपल की छांव में बैठकर पीते थे सब…
    आम के बगीचे में बैठकर परिंदों को उड़ाना चाहता हूं…
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    बुजुर्गों के पास बैठकर
    किस्से सुनने हैं उनके ज़माने के।
    हंसी-मजाक भरी बातें
    और फिर अचानक से
    रामायण की कोई चौपाई सुनाते हुए गंभीर हो जाना।
    अम्मा के हाथ चला ताजा मट्ठा
    और होली वाली गुझिया।
    बूढ़े हो चुके दरख्तों की छांव में बैठकर
    पुराने गीत गुनगुनाना चाहता हूं…
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    घर के कनस्तर से चुराए गेंहुओं के बदले
    चुर्री और कंपट दिया करता था जो बनिया,
    उससे उधार लेकर कुछ मीठे आम खाना चाहता हूं…
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    दोस्तों संग सरकारी स्कूल के बरगद तले
    धूप में बैट-बल्ला खेलना है।
    फिर शाम को जाकर
    ट्यूबवेल के पानी में नहाना चाहता हूं…
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    रात को छत पर लेट कर तारे देखते हुए बातें करना..
    दादी की वो कहानी जो अधूरी छोड़ दी थी उन्होंने,
    उस राजकुमार को फिर से जिलाना चाहता हूं…
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    आपका वो बेंत उठाकर वापस खींच लेना
    और फिर कहना कि टांगे तोड़ दूंगा…
    बाल नहीं कटवाने पर
    आपकी प्यार वाली डांट खाना चाहता हूं।
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं।
    इस शहर की चमक तेज है,
    चमकीली है पर नकली है बाबा,
    गांव की मिट्टी को फिर माथे से लगाना चाहता हूं।
    बाबा मैं वापस गांव आना चाहता हूं……

  • फर्क सिर्फ इतना थ

    उसने बन्दूक उठाई , मैंने कलम
    उसने गोली चुनी , मैंने शब्द
    उसने खून बहाया , मैंने आंसूं
    उसने घर जलाये , मैंने दिल
    उसने दीपक बुझाया , मैंने उसे जलाया
    उसने लोगों को सुलाया , मैंने लोगों को जगाया
    वो बदनाम हुआ , मेरा नाम हुआ
    वो कैद हुआ , मैं आज़ाद हुआ
    उसे फांसी मिली , मुझे फांस
    हम दोनों एक ही तो थे
    बस उसने बन्दूक उठाई मैंने कलम।

  • और बात थी

    और बात थी

    बात गर खत्म हो जाती तो और बात थी।
    रात गर खत्म हो जाती तो और बात थी।
    हीर और राँझा अब भी है देश में लेकिन
    जात गर खत्म हो जाती तो और बात थी।

    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”

    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ 

  • Drafts of hallows..

    Waking to a draft of air the moonlight empowers the scape, shadows cast to the floor. The smells of grass carried through the windows and the feel of wood on the sill.. I look out and see a world of darkness fall on the land all is gone and I am removed the moon stands alone with nowhere to cast it’s light but to the skin of my once warm pajama clothed body.. the air is cold and I grasp but the movement  takes me nowhere despite where I turn I am right side up. The air now so cold it pierces my lungs and the draft has slithered up my sleeves and wrapped my pajamas around my legs. All fades from me and the world is placed far away from me it is I, here. The face was starting to tingle and as I separated I found myself looking at my cast now lifeless with the eyes closed pajamas growing colder. The feeling was mutual and I felt the split..

  • सरस्वती वंदना

     

    सुनो शारदे ज्ञानदायनी,

    विनती मेरी बारम्बार ।
    भँवर बीच में नैया मेरी,
    आकर मात लगाओ पार ।।
    तम का साया मुझ पर छाया,
    अंधकार से मात उबार ।
    मुझे सद्बुध्दि स्मरण शक्ति दो,
    मिट जाए अज्ञानी विकार ।

    कण-कण जोत जलाओ देवी,
    बहे ज्ञान की गंगा धार ।
    तुमने सबको राह दिखाई,
    मेरा भी पथ करो तैयार ।।

    धरा आसमां महिमा गाते,
    सब जन करते जय जैकार ।
    कृपा करो,हे ! माँ जगदम्बे,
    हो जाए मेरा उद्धार ।।

    नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष

    +91 84 4008-4006

  • सूकून

    बच्चे झगड़ रहे थे मोहल्ले के जाने किस बात पर,

    सूकून इस बात का था न मंदिर का ज़िक्र था न मस्जिद का |

  • राज गोरखपुरी

    राज गोरखपुरी

    माँ के दिल में बसर नहीं छोड़ा.
    बाकी कोई कसार नहीं छोड़ा.
    घर की मजबूरियों ने भेजा है,
    हमनें यूँ ही शहर नहीं छोड़ा.

    —–डॉ.मुकेश कुमार (राज गोरखपुरी)
    www.facebook.com/drmkraj2010

  • जीवन पथ

    नीर बन जो बह रही धरा पर,
    थी वह पर्वत की शिरमौर्य कभी,
    आज तपन बाधाएँ निज पग में,
    सह रही जो,था उसके जीवन में,
    भी शीतलता का अंम्बार कभी,
    पतझड़ में झड़ते पत्ते जो,
    उनपे भी था मधुमास कभी,
    सपने में धूमिल हुए जो पल,
    उनमें भी था प्रकाश कभी,
    जीवन गलियारे में,आशाओं के ,
    पखवारे में कौन किस पर भार बना,
    कौन निज जीवन का सुख त्याग कर,
    भगवान बना,अँधियारे, उजियारे में,
    पथभ्रमित कितने दीवार बने,
    नयनो से ओझल होते,
    कितने सपने परिहार बने,
    रूत बदले, हम न बदले,
    मौन उठे पुकार तुझे,
    जीवन पथ पर चलते-चलते,
    हम एक-दूजे के हार बने ।।

    image

  • Own Path

    Everyone has his or her own 

    Path to traverse,

    Known or unknown,

    Without any options of a reverse

    Back,going back to the start

    Again and taking another path,

    Beginning with a jumpstart,

    Treading into strange swaths.

    Mom took my fingers and showed,

    Me the world out of the door,

    Daddy directed me to the access roads,

    Just that,no holding my hands anymore,

    Some friends did accompany,

    They too had their own paths to tread,

    I was always short of company,

    Still I walked straight ahead.

    Few friends left me early to follow

    Their paths,some continued till a little later

    All our promises to walk together turned hollow,

    Everybody left to touch heights greater,

    Finally no friend was a forever friend,

    As all walked and traveled alone,

    Life continued and was not the road’s end,

    I tread along the path as the lights shone.

    Lanes and by lanes I crossed,

    Passed ridges,pits and ravines,

    On way I met my partner,love was not lost,

    He had his own dreams to fulfill by all means,

    So I was left to chart out my own path

    And he carved his own,

    There was no bad blood,nor wrath,

    No tears flowed,nor any moans.

    Was happy when the children arrived,

    Took as the companions of my journey,

    But tied to me how could they survive,

    To take off on their own,they were in a hurry,

    They took their own roads 

    As I was left behind,

    They were ready to write their own episodes,

    To my destiny I resigned.

    Today I walk on my own, taking slow steps

    I try to bridge the gap to my destination,

    I have drawn my own stops and checks,

    Today I have transformed into a new cation,

    I need no one to depend on,

    Forwards I move on my endeavour,

    Today I can draw out a path of my creation,

    I have become my best friend forever.

    On my own ,I tread on my path,

    Without anyone to hold my hand,

    My feet,still step, where they never hath,

    Also treading into territories banned,

    A confidant me walks ahead,with a head held high,

    A heart full of gratitude to those who left me,

    Taught me to be courageous and opened my eyes,

    Lead me to my path and let me be,where I now may be.

    -Madhumita 

  • मुक्तक

    मुक्तक

    तेरी मुलाकात मुझे अब याद नहीं है!
    अश्क की बरसात मुझे अब याद नहीं है!
    रफ्ता-रफ्ता गुजर रही है जिन्दगी मगर,
    दर्द़ की सौगात मुझे अब याद नहीं है!

    Composed By #महादेव

  • मनहरण घनाक्षरी

    मनहरण घनाक्षरी

    रण में लड़े जो सदा, शत्रुओं से डरे बिना
    वीरों में भी वीर ऐसे राणा अति वीर थे ।
    धर्म देश जाति नीति, का सदैव मान रखे
    त्याग तप ज्ञान बुद्धि, की बड़ी नज़ीर थे ।
    शत्रु हेतु रूद्र रूप, काल से कराल अति,
    सुजन प्रजानु हेतु, मलय समीर थे ।
    आन बान शान हेतु, राष्ट्र स्वाभिमान हेतु
    सूर्य से भी तेजवान, राणा सूरवीर रणधीर थे ।।
    राहुल द्विवेदी ‘स्मित’

  • dhoka

    Dhoka krne vale mat kr dhokha

    Nhi tou tujhe bhi kisi moke per dhokha milega

    Us din ek dhoke baj dusre dhokhe baj SE dhoka milega

    Ye is duniya ka hai dastor jaisa krogye vaisa bHarogye

    Aj tum krogye tou kal tum bharogye

    Dhoka de kr kya jeet loge

    Kuch ache insano ka usne jayda SE jayda haq chin logye

    Upar vale ki nigao  SE kaise bacho oo khud ko

    Kya Issi dhokha dhadhi k bazar pe baich paogye khud KO

    ByRLvgahlot


     

  • dhoka

    Dhoka krne vale mat kr dhokha

    Nhi tou tujhe bhi kisi moke per dhokha milega

    Us din ek dhoke baj dusre dhokhe baj SE milegamilega

    Ye is duniya ka hai dastor jaisa krogye vaisa bHarogye

    Aj tum krogye tou kal tum bharogye

    Dhoka de kr kya jeet loge

    Kuch ache insano ka usne jayda SE jayda haq chin logye

    Upar vale ki nigao  SE kaise bacho oo khud ko

    Kya Issi dhokha dhadhi k bazar pe baich paogye khud KO

    ByRLvgahlot

  • mohobat

    Mohobat mai unki aisa alam tha

    Na din ka pta na rat ka dhikana tha×2

    Chur the hum unki yado mai

    Or lafjo per unka hiii afsana tha

    Ger bna kr ek pal mai chodh gyi

    Is masom dil KO tode gyi

    Ye kissa hiii bewafao ka Purana that

    By RLvgahlot

     

  • Rat de khamoshi

    Rat de khamoshi

    Te akha vich piyar

    Rab to v sona labiya mai yr

    Te odi ek hasi vich meri

    Duniya vasdii aye

    Te ode gum NAL meri zind kut diii ayeee

    Socha mai aisa ki c mere yar mai

    Jo meri zindhiii ode NAL saj diii aye

    by RLvgahlot

  • माँ

    ??????(मुक्तक)????????
    ?????????
    माँ चरण आपके स्वर्ग का रूप है।
    माँ सभी शक्तियो का मिला रूप है।
    जिंदगी श्याम मेरी न होगी कभी।
    माँ नजर आपकी प्रेम का धूप है।
    ?????????
    रचनाकार अविनाश सिंह अमेठिया
    (देवरिया) +919135481448

    ?????????

  • यपूर्व की हवाएँ

     

    पूर्व की हवाएँ

    जब भी बदलता है मौसम
    वसंत के बादऔर ग्रीष्म के पहले
    का लंबा अंतराल
    तो सूर्य के विरुद्ध जा कर
    पुरबवैयाँ चलती हैं।

    गाँव में कहावत है
    ऐसे मौसम में
    मत सोया करो बाहर
    ये पूरब की हवाएँ हैं ना
    पुराने दर्द उभार देती हैं
    इन हवाओं की सरसराहट सुगंध
    पिछली यादों में घोल देती हैं।
    कहा जाता है इन हवाओं में
    सूखे पुराने यादों के पत्ते उड़ कर
    हमारे ही आँगन में जमा हो जातें हैं
    उन पत्तों की महक को ढकेलती हुई
    घुसजातीं है हमारे ही चौखट
    ये पूरब की हवाएँ
    रात में किसी पुरानी धुन
    सी घुस जातीं हैं ये हवाएँ
    भूली यादों को फिर याद
    दिला जातीं है ये हवाएँ।
    हम कहते रह जातें है
    अच्छा नहीं लग रहा
    क्यूंकी मौसम बदल रहा है
    मगर सच तो यह है
    इन हवाओं में घुल कर
    तू खुद बदल रहा है।

    बच कर रहना
    पूरब की हवाएँ हर साल आतीं हैं
    पुराने दर्द उभार जातीं हैं

    ~अम्बरीश शुक्ला

  • मुक्तक

    तेरी लहर मिल गयी है यादों की फिर से!
    तस्वीर मिल गयी है इरादों की फिर से!
    डूबी है फिर जिन्दगी तेरे अफसानों में,
    जागीर मिल गयी है मुरादों की फिर से!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    मुझे तुम किसलिए जगाते हो यूँ रातों में?
    नींद आती नहीं ख्वाहिश-ए-मुलाकातों में!
    लिपट गयी हैं हसरतें यादों से इसतरह,
    जिन्दगी मदहोश है तेरे ख्यालातों में!

    Composed By #महादेव

  • दोस्त

    तेरे होने ना होने के बीच

    मेरी आँखें पिस रही है़ं॥

    रह रह के रिस रही हैं

    दिन रात घिस रही हैं॥

  • मेरी चिरइया

    मेरी चिरइया

    मेरी चिरइया
    मेरी चिरईया कुंदति फांदती , कब बड़ी हो गई मुझे पता ही नहीं चला
    ठुमक ठुमक के चलने वाली कब पैरों पर चलने लगी
    कभी मचलती इन्ना ,कभी किलकारियों के साथ उसका वो हसना
    लेती जब गोद में उसको उठा कैसे मेरे बालों को लेती पकड़ अपनी नन्ही उँगलियों में वो
    माथे पर मेरे चम चम करती बिंदिया को कब छुड़ा मुहं में दाल लेती वो और मुस्कुराने लगती
    जैसे कोई बड़ी फ़तेह कर ली हो
    मेरे दुप्पटे को अपने सर पर ढक लेना और उसके अंदर ताली बजाकर हसना आज भी याद हैं मुझे
    बड़ी हुई विद्यालय गई चतुर वो इतनी हर गुण को वो अपनाने लगी
    उफ्फ्फ अभी देखो मेरी बांनयी फ्रॉक को पहने कैसे हैं इतराई खुद पर वो
    आती जब थक हार कर बोले मुहं बनके जल्दी स दे दो कहाँ जोभी बनया हो तुमने
    देखे दाल रोटी मुहं चिढाय वो इतना
    कुछ अच्छा सा और बना दो मेरी प्यारी माँ
    कुछ मीठा सा कुछ तीखा सा कुछ नमकीन सा
    कुछ अपने प्यार जैसा माँ
    भर जाये पेट मेरा जिसे खाकर
    जैसे तुम्हारा प्यार पाकर हो गई में बड़ी अभी
    तुम्हारे प्यार की लालशा रहेगी जीवन भर मेरी मइया
    ऐसा बोले हैं वो नैना मटकाऐ के मेरी चिरईया कब बड़ी हुई मुझे पता नहीं
    गौरी गुप्ता १७ /५/२०१६

     

  • आँगन में जो फुदक रही थी

    आँगन में जो फुदक रही थी
    एक छोटी सी चिड़िया!
    दौड़ी उसे पकड़ने
    उसके पीछे छोटी बिटिया!!

    बोली मैंने आज पढ़ा है
    तू है दुर्लभ प्राणी!
    तुझे संजोना है हम सब को
    देकर दाना पानी !!

    गौरैया ने तनिक ठहर
    धीरे से पंख हिलाये
    भाव करुण से उस पक्षी की
    आँखो में आ छाये!

    बोली बिटिया तू तो जाने
    क्या तेरा दायित्व
    लेकिन तू ये समझ
    तेरा भी ख़तरे में अस्तित्व!

    कैसे तुमसे कहूँ
    तुझे है इतना नहीं पता
    मेरा संकट अगर प्रदूषण
    तेरा तेरे मात पिता!!

    कुछ हत् भागे नहीं चाहते
    हो बेटी का जन्म
    बोझ समझते हैं वे तुमको
    ऐसे उनके कर्म !

    कभी गर्भ में कर देते हैं
    वह तेरा ही अन्त
    अगर जन्म तू फिर भी ले
    तो कतरें तेरे पंख !!

    मैं तो उड़ती खुले गगन में
    फिरती हूँ स्वच्छन्द
    तू फँसती है अदृश जाल में
    पिंजड़े में है बन्द !!

    तेरे चारों तरफ़ शिकारी
    करते तुझ पर वार
    नहीं असर कर पाती उन पर
    कोई तीर तलवार !

    हाल रहा जो यही ! प्रजाति
    मेरी मिट जायेगी
    लेकिन बिटिया तू भी अब
    दुर्लभ ही कहलायेगी !!!

    #savesparrow #savegirlchild #betibachaobetipadhao

  • शारदे वंदना

    मां वीणा वादिनी का नमन करते हुए इस नये सफर की शुरुआत करता हूं

     

    मा शारदे मेरी मा शारदे

    सद्विचारो भरा हमको संसार दे

    मा शारदे मेरी मा शारदे।

    अपनी ममता की बारिश की बौछार दे

    मा शारदे मेरी मा शारदे

     

    तेरी आराधना मा मै कैसे करूं

    हाथ मे है कलम शब्द मिलते नही

    मूढ अज्ञानी मै कैसे वन्दन करूं

    सामने तू खड़ी स्वर निकलते नही

    कर रहे आरती हम खड़े द्वार पे

    करके स्वीकार वन्दन हमे तार दे

     

    मा शारदे मेरी मा शारदे

    सद्विचारो भरा हमको संसार दे

    मा शारदे मेरी मा शारदे।

     

    अंधकारो भरा मेरा जीवन सुनो

    एक तुम्हारे सहारे चले आऐ है

    राह भटका हूं मै पथ दिखाओ मुझे

    जग से हारे बेचारे चले आऐ

    दिन का भूला हुआ लौटा है शाम को

    अब गले लगा के मा उपकार दे

     

    मा शारदे मेरी मा शारदे

    सद्विचारो भरा हमको संसार दे

    मा शारदे मेरी मा शारदे।

     

    सच ही निकले मेरी लेखनी सदा

    सच का साथी बनू ऐसा वरदान दो

    झूठ से मै बचू छल कभी ना करूं

    अपने चरणों माँ मुझको स्थान दो

    मै अंधेरों से डरता रहा उम्र भर

    मेरे जीवन को उज्ज्वल करो शारदे

     

    मा शारदे मेरी मां शारदे

    सद्विचारो भरा हमको संसार दे

    मा शारदे मेरी मा शारदे।

     

    सचिन मिश्रा साधारण

    7786957386

  • वफादार और तुम, ख्याल अच्छा है

    वफादार और तुम, ख्याल अच्छा है

    बेवफा और हम , इल्जाम अच्छा है ।।

    #unknown

  • बर्बाद

    मैने दिल को कितनी बार

    समझाया, उसे याद न कर

    वो अब किसी और की है।

    उसके लिए खुद को बर्बाद मत कर।

    माना मुश्किल है।उसे भुलाना

    पर पाना भी उसे अब मुमकिन नहीं।

    फिर क्यों नहीं तू

    मानता मेरी बात ।

    उसे याद कर मत धड़क

    मै वाकई प्यार में बेबस हूँ।

    मुझे और बेबस मत कर।

    मैने दिल को कितनी बार

    समझाया, अब उसे याद न कर

    वो अब किसी और की है।

    उसके लिए खुद को बर्बाद मत कर।

    कवि:अविनाश कुमार

     

  • ख्वाहिश

    समझदार हो गर, तो फिर खुद ही समझो।

    बताने से समझे तो क्या फायदा है॥

    जो हो ख़ैरियतमंद सच्चे हमारे, तो हालत हमारी ख़ुद ही देख जाओ।

    जो ख़ुद जान पाए न हालत हमारी, दिखाने से समझे तो क्या फायदा है॥

    मुहब्बत है क्या जो समझना हो तुमको, फ़ुर्सत से महफ़िल में आना हमारी।

    दीवानों से समझो समझ जाओगे सब, ज़माने से समझे तो क्या फायदा है॥

    चाहत अगर है तो चाहत से समझो,सताने से समझे तो कया फायदा है।

    इस दर्द को दिल लगा कर के समझो, दिल दुखाने से समझे तो क्या फ़ायदा है..।

    है कितनी मुहब्बत इन आँखों में देखो, बताने से समझे तो क्या फायदा है।

    आशिक़ हैं हम इश्क़ हक़ है हमारा, बेशक़ ये हमने जताया नहीं है।

    महबूब इस हक़ को खुद ही समझ ले, जताने से समझे तो क्या फ़ायदा है..।

    आँखों में तेरा ही चेहरा बसा है,धड़कन तेरे नाम के गीत गाती।निगाहों की गर तुम सदाऐं न समझे,सुनाने से समझे तो क्या फायदा है।

    ये अल्फाज़ मेरे, गवाह-ए-ग़जल हैं,

    यकीनन ये पहुंचेंगे दिल तक तुम्हारे।

    इन्हें पढ़कर, सुनकर, गुनगुनाकर समझ लो, बिन तराने के समझे तो क्या फ़ायदा है..॥

    चलो मैं भी ऐसी ग़जल छेड़ता हूँ, हर इक शेर में आपका नाम होगा।अगर पढ़के समझे सलामत रहूँगा, मिटाने से समझे तो क्या फायदा है।

    जो रखना है दिल में तो धड़कन सा रखो, बसाओ हमें अपनी हर साँस में यूँ।

    मुझे याद रख कर हर पल समझना, भुलाने से समझे तो क्या फ़ायदा है..॥

    मेरी ज़िंदगी में अहमियत तुम्हारी, है कितनी मैं तुमको ये कैसे बताऊँ।

    मैं जिंदा हूँ उनकी ही चाहत के दम से, वो जान जाने से समझे तो क्या फायदा है।

    अगर इश्क़ में दर्द पाया है तुमने, तो आँखों की शबनम न यूँ ही बहाना।

    आशिक वो सच्चा जो आँसू समझले, मुस्कुराने से समझे तो क्या फ़ायदा है..॥

    ये आँखे तरस के बरसी हैं बरसों, मगर दिल में मेरे नमीं की कमी है।नमीं से हरी हैं ये यादें तुम्हारी, सुखाने से समझे तो क्या फायदा है।

    हमने तुम्हारे लिए ख़त लिखे जो, वो हर एक ख़त बिन पढ़े मत जलाना।

    क्या क्या लिखा है ये पढ़कर समझना, जलाने से समझे तो क्या फ़ायदा है..॥

    ____________

    शिवकेश द्विवेदी

    सह रचयिता : आशीष पाण्डेय ‘अकेला’

     

  • वो तो बहक गये थे

    वो तो बहक गये थे इश्क के ख्यालात से हम

    वरना नफरत के दम पर तो

    सादगी से एक उम्र जी चुके हम ।।

    #suthars’


     

  • मेरा जीवन कब मेरा है

    मेरा जीवन कब मेरा है
    बस आती जाती सांसें हैं
    इसमें सुख दुख दूजों का है
    वे दूजे मेरे अपने हैं !

    जब जब कोई मेरा अपना
    हँसता है मैं हंस लेती हूँ !
    जब कहीं कोई मेरा अपना
    रोता है मैं रो देती हूँ!!

    हर चोट लगे जो अपनों को
    मेरे ही तन पर पड़ती है!
    जब आहत हो मन अपनों का
    मेरी आत्मा तड़पती है!

    मैं जिनकी ख़ातिर जीती हूँ
    वे सारे मेरे हिस्से हैं,
    मैं एक किताब सरीखी हूँ
    वे सारे मेरे क़िस्से हैं !

    ये वात्सल्य से पूर्ण ह्रदय
    कब अपने लिये धड़कता है!
    बस देख देख अपनी थाती
    इसमें स्पन्दन बढ़ता है !!

    हाँ ये अपने जो हैं मेरे
    बस चन्द मात्र ही संख्या में
    प्रभु कर दो मेरा मन विशाल
    जुड़ जाऊँ सब से कड़ियों से!!

    फिर कहाँ रहे कोई राग द्वेष
    न बैर कहीं भी रहे शेष
    हम संतति सब परमात्मा के
    वसुधा हो मात्र कुटुम्ब एक !

  • पहला प्यार

    पहला प्यार

    सुनते ही

    उछल पड़ता है

    ख्यालों का असीम समन्दर

    पर समझ न आता क्या लिखूं

    बस तुम वैसे ही थे

    जैसे खिल उठता है

    सूरज को देख

    सूरजमुखी का चेहरा,

    वैसे ही जैसे

    खिल उठता है

    पहली बारिश को देख

    किसान का झुर्री वाला चेहरा भी।

    वैसे ही जैसे,

    जैसे पहली बून्द

    समन्दर में पड़ते ही

    मुस्कुरा पड़ता है

    मोती!

    वैसे ही जैसे

    बच्चे का पहला शब्द

    सुन माँ विह्वल हो उठती है

    वैसे ही जैसे

    ओस के स्पर्श से

    खिल उठती है

    विरह में झुलसी घास!

    वैसे ही जैसे

    मिठाई देख

    चहक उठता है मधुमेह रोगी!

    वैसे ही जैसे

    मरते हुए को मिल जाएँ

    कुछ और साँसे

    जिनमे वह जी सके।

    बस ये हो तुम।

    सब कुछ हो तुम।

    @@सरगम@@


     

  • सुन लो मेरी आह पिया जी

    सुन लो मेरी आह पिया जी ,
    एकला मुश्किल राह पिया जी ….

                             राम हृदय दुर्लभ जग में हैं ,
    परख के बोलो शाह पिया जी ….

    सिरफ़ रात तक चाँद तुम्हारा ,
    करता मैं आगाह पिया जी ….

                              चादर तक ही पैर ये रखना ,
    इच्छा की क्या थाह पिया जी ….

    धोखा धंधा पैसा फंदा ,
    कर दो सबका दाह पिया जी ….

                               सावन भादो औ बसन्त हो ,
    तुम बिन कैसा माह पिया जी ….

    जनम जनम के साथी हो लो ,
    मुझको और क्या चाह पिया जी ….

                         – शशांक तिवारी

  • पर चला करता हूँ…

    अकेला ही सही पर मैं चला करता हूँ
    नाम तेरे से, दिल में हौसला करता हूँ,,

    कभी जी लेता हूँ खुद के वास्ते मैं भी
    पिलाके पानी चिड़ियों का भला करता हूँ,,

    बनने बिगड़ने की आदतें हमे भी आती है
    थोड़ा सा बहककर मै भी संभला करता हूँ,,

    दिल और दिमाग की जंग मै हार जाता हूँ
    क्योंकि मै अक्सर दिल से फैसला करता हूँ,,

    बड़ा डर रहता भीड़ में खो जाने का हमको
    काफिलों से दूर होकर तन्हा चला करता हूँ,,

    मोहन मुरली 02/05/2016

  • चाह छोटी है.

    अमीरी है तो जन्नत है
    गरीबी है तो जिल्लत है,
    वहाँ भी मौत देखी है जहाँ
    पग -पग मे दौलत है,
    हवेली है बडी़ फिर भी
    अकेलेपन से मरते हो,
    हमे दो चैन से सोने हमें
    सडको की आदत है,|
    (✍?बागी✍?)

  • माँ

    हर दर्द मां सहती रही,
    पूरी मेरी हर बात की.,
    हर जिद को मेरी मान के
    हर वक्त मेरे साथ थी,
    अब मै बडा़ जबहो गया
    कैसे भुलादूं मां को मै ,
    दुनियाँ ही मेरी माँ से है
    मां खुशियों की सौगात थी

    बागी के दिल कि आह,.

  • ~~”मजदुर”~~

    ~~”मजदुर”~~

    ~~”मजदुर”~~

    ..वह ‘सृजनकर्ता’ है ‘दुख’ सहके भी ‘सुख’ बांटता है..

    ..वो ‘मजे’ में ‘चूर’ हैं, बस इसलिए ‘मग़रूर’ हैं..
    ..हम ‘मजे’ से ‘दूर’ हैं, बस इसलिए ‘मजदूर’ हैं..

    ..सेतु , नेहेरे , बांध उसके, ‘श्रम’ से ही ‘साकार’ है..
    ..’देश’ की ‘सम्पन्नता’ का बस वही ‘आधार’ है..

    ..चाहें लग जाए ‘सावन’, या चल रहा हो ‘वसंत’..
    ..पर रेहता है हमेशा , ‘पतझड़’ की तरह ‘झरता’ हुआ..

    ….✒…01/05….

  • Ram

    रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
    देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

    काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
    दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
    सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी |
    देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

    बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े |
    देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े||
    दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी |
    देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

    रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
    देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

    ‪#‎विकास_भान्ती‬

  • Kami thi mahabbat me’n shayad hamaare

    Kami thi mahabbat me'n shayad hamaare... Bichadna hamara to mumkin nahi'n tha
    Kami thi mahabbat me’n shayad hamaare…
    Bichadna hamara to mumkin nahi’n tha
  • बेड़ियां

    बेड़ियां जो पैरों में
    उसे घुंघरू बना लें
    आओ ज़िंदगी का मज़ा लें
    नाच ,गा लें
    औरों को नचा दें

    ज़िंदगी को खुशियों से सज़ा लें
    आओ बाधाओं को
    अवसर बना लें
    सूखती नदियों में
    बादलों को बरसा दें ।

    आसमान में खेती करके
    धरती को लहलहा दे
    सबकी भूख मिटा दे

    आओ सब मिलकर
    असंभव को
    संभव बना दें ।

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