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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

@pt-vinay-shastri-vinaychand • Joined Oct 2019 • Active 5 months ago

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

भजन

October 23, 2019 in गीत

कर ले राम भजन रे भाई।
राम भजन की महती महिमा वेदों ने है गाई ।
तड़े अजामिल गणिका तड़ गई तड़ा सदनकसाई।।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण सबरी सतानंद की माई।
राम राम कह जरठ जटायु परम गति को पाई।।
दुख दुनिया में मनका मेरे सुख की आग लगाई।
राम नाम के गान बिना यह जीवन है दुखदाई।।
मानव तन अनमोल तुम्हारे ना कर पाई -पाई।
‘विनयचंद ‘रे राम भजन कर रट ले कृष्ण कन्हाई।।
पंडित विनय शास्त्री

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विनती

October 20, 2019 in गीत

हे घनश्याम गोपाल मुरारी।
मेरी सुधि लो गिरिवरधारी।।

दीनबंधु करुणा के सागर।
भगतबच्छल प्रभु आरतहर।।
जगतपति जगतारनहारी,
मेरी सुधि लो गिरिवरधारी।।

तेरी कृपा बरस रही निश-दिन।
बाहर-भीतर किनमिन किनमिन।।
दो बूंद का चातक ‘विनयबिहारी’,
मेरी सुधि लो गिरिवरधारी ।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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रिक्शावाला आई़ 0ए0एस0

October 18, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

शेषांश,,,,,,,,,

दो रुपये का ब्लेड भला दाढ़ी काटे फिर उग आये।
मुट्ठी एक चना से भूखा अपनी भूख मिटा पाए।।

लो मैडमजी आ गए हम महिला काॅलेज के द्वारे।
दस के बदले बीस रुपये देने लगी मैं उसको भाड़े।।

वह बोला मैडमजी मुझपे क्योंकर कर्ज चढ़ाती हो?
दस रुपये के कारण क्यों मेरा इमान हिलाती हो?

कर्ज नहीं है तेरे ऊपर मेहनत का इनाम है ये।
सदाचार की करे प्रशंसा पढ़े लिखे का काम है ये।।

देना चाह रही हो आप तो इतनी विनती करना।
सबके जीवन में खुशियाँ हो प्रभु से विनती करना।।

कल प्रातःकाल की बेला में सबको एक खुशी हो।
मेरे संग संग सबके मुख पर हर्षित मधुर हँसी हो।।

रविवासरीय अखवार देख चौंक गई मैं एकाएक।
वही बेनाम रिक्शावाला पन्ना पे बैठा आलेख।।

मेहनत आज रंग लाया रिक्शावाला आई़ ए़ एस़ था।
रोशन नाम किया अपना जग में नहीं वह बेबस था।।

विनयचंद नहीं रुप रंग ज्ञान बुद्धि व मेहनत हो।
कोयला हीं हीरा बनता है भूगर्भ में अवनत हो।।
पं़विनय शास्त्री

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रिक्शावाला आई0 ए0एस0

October 17, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

बढ़ी हुई दाढ़ी थी उसकी
फटा पुराना कपड़ा था।
सुन्दर सुखद सुशील सलौना
रिक्शावाला तगड़ा था।।

कह के बैठ गई रिक्शा में
महिला काॅलेज चलो भाई।
खींच खींच के चलने लगा
वह ओवरब्रिज की चढ़ाई।।

टाईम पास में पूछ गई मैं
नाम तुम्हारा क्या है?
मैडमजी कहके टाल गया
वह काम तुम्हारा क्या है?

बात बदल के पूछी मैं
दाढ़ी क्यों न करवाते हो?
एक ब्लेड बहुत सस्ता है
सूरत क्यों घटवाते हो?
आगे,,,,,,,

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पंछी

October 11, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

जालिम हमें हमारी दिल की गुमान दे दो।
रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।।
जज़्बात की ये कैंची
मेरे पंख पे चलाके।
पंगु बना न देना
जालिम करीब आके।।
मत छीन जिन्दगानी
ना मौत का सामान दे दो।
रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।।

राही हूँ मैं मस्त मौला
नभ पथ पे चलने वाला।
पिंजरे में बन्द होकर
रोएगा हँसने वाला।।
मांगू मैं तुमसे इतना
मत खान-पान दे दो।
रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।।

जल्लाद था वो अच्छा
जिसने पकड़ के खाया।
मरकर भी देह मेरा
औरों के काम आया।।
“विनयचंद “दो आजादी
कुछ आन -शान दे दो।
रखो जमीन अपनी कुछ आसमान दे दो।।
पं़विनय शास्त्री

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रावण दहन

October 7, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

रावण का पुतला जला जला
अम्बर को काला कर डला।
अहंकार का पुतला जला न पाया
खुद को रावण कर डाला।।

सत्य धर्म के ख़ातिर
वन-वन भटके नारायण।
जिनकी दिनचर्या कथा रुप में
लिखा गया रामायण।।

सेवा और त्याग की मूरत
लक्ष्मण और भरत थे सुखरासी।
स्वार्थ की बेदी पर बाली
हो गए कैसे स्वर्गवासी।।

विनयचंद रे देख तू दुनिया
बन जा मानव सुखकारी।
सेवा त्याग तपस्या से
पाओगे प्रभु दुखहारी।।
पं विनय शास्त्री

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चांद की ब्यथा

October 6, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

निज आंगन में बैठा- बैठा
देख रहा था चन्द्र वदन को।
धवल सुशीतल चन्द्रकिरण ने
नहलाया बसुधा के तन को।।

सुधा सुधाकर बरसाए पर
निज मस्तक न धो पाए।
दाग चढ़ा कैसा माथे पर
अंखिया मीच न सो पाए।।

मैं भी जागूँ तुम भी
क्योंकर रात सुहानी में।
तुझे देख मैं जाग रहा
और तुम किसके कुर्बानी में।।

कहा चांद सुन प्रेमी मेरे
एक चकोर के कारण मैं
रच रजनी रजनीचर बन
आंगन खूब सजाया था।
पर्वत शर सरिता बसुधा को
कुसुमित सेज बनाया था।।

एक -एक कर बीत गए
और आई रात अमावस की।
मेरा तन मन डूब गया
बिन पानी बिन पावस की।।

उसी चकोर के का कालापन
मेरे मन मंदिर में छाया।
हर रात जागता रोता हूँ
पर इसको धो नहीं पाया।।

विनयचंद तू आशिक बन
पर इतना रखना याद सदा।
प्रेम पुंज को जग ने
माना जीवन बाद सदा।।

विनय शास्त्री

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गुलशन

October 6, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

गुलशन तेरी बात हीं कुछ और है।
तेरी महक से महके सब
क्या सज्जन क्या चोर है।।

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गुलाब

October 2, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

काँटों में देखा खिला फूल,
क्षण भर अपने को गया भूल।
पलकों में आई शीतलता,
ये भूल गया है वहाँ शूल।।

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